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                <title>असुरक्षा की तरफ बढ़ रहा समाज</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/society-moving-towards-insecurity/article-4611"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/society-moving-towards.-insecurity.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">महानगर दिल्ली में आदमियों की भीड़ है इसके बावजूद मनुष्य अकेला और असुरक्षित है। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक घर में परिवार के 11 मैंबरों की फंदे से लटकती लाशें मिली हैं। दस व्यक्तियों की आँखों पर पट्टी बँधी हुई थीं। पुलिस के लिए बड़ी उलझन यह है कि यह मामला कत्ल का है या खुदकुशी। हो सकता है आने वाले दिनों में यह गुत्थी सुलझ जाएगी पर यह घटना समाज की जिस भयानक तस्वीर को पेश कर रही है वह आधुनिकता, सुरक्षा तथा विकास जैसे शब्दों को सवालों के घेरे में लाती है। दरअसल ‘कानून व्यवस्था’ शब्द कहने को कुछ तथा देखने में कुछ है। अपराध शुरु होने का कारण कोई भी हो इसके बढ़ने का कारण कानून व्यवस्था का कमजोर होना है। अपराधियों को यही लगता है कि वह कानून की पकड़ में नहीं आएंगे, यदि पकड़े भी गए तो कैसे ना कैसे निकल जाएंगे। पुलिस प्रबंध इतना ढीला व लापरवाह तीजा है। पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ घटना होने पर ही दोषियों को ढूंढने और सजा दिलवाने की नहीं, बल्कि ऐसा माहौल बनाने की होती है कि अपराधी अपराध करने की हिम्मत ना कर सके। उनके दिल में कानून का भय हो। दिल्ली तथा अन्य महानगरों में पता नहीं कितनी ही घटनाएं हो चुकी हैं जब मकान में एक दो सदस्यों को लुटेरों ने मार दिया। दु:ख कीहै कि आम आदमी के नुकसान की किसी को कोई फिक्र नहीं। चोर गुंडों को कोई रोकने वाला नहीं। आम इंसान लूटा जाए तो उसकी रिपोर्ट भी जल्दी से कोई नहीं लिखता। पुलिस की जिम्मेदारी सिर्फ सत्ताधारी पार्टियों की रैलियां या मंत्रियों के दौरों को सुरक्षा देने तक सीमित हो गई है। झपटमारों के गिरोह दिल्ली से चलकर छोटे शहरों कस्बों तक पहुंच गए हैं। कभी गलियों, खुलें आंगनों में लोग बेखौफ होकर सोते थे अब दिल्ली के घरों में डबल दरवाजे लग गए हैं। लोगों द्वारा अपनी सुरक्षा के प्रबंध खुद करना पुलिस प्रबंध की कमियों का ही न बात है कि ऐसी घटनाएं प्रशासन के लिए कोई मुद्दा नहीं होती। ना तो इस बात की संसद में चर्चा होती है तथा ना ही कोई पार्टी धरना प्रदर्शन करती है क्योंकि ऐसी घटना में वोट का मतलब हल नहीं होता। सरकार के लिए देश तरक्की कर रहा है पर समाज पतन की ओर जा रहा है। विकास का अर्थ भौतिक तरक्की नहीं बल्कि मुनष्य के निर्भय होकर जिंदगी गुजारनें में है।</p>
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                <pubDate>Mon, 02 Jul 2018 11:47:16 +0530</pubDate>
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