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                <title>darkness - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>बठिंडा : पराली के धुएं से पसरा दिन में अंधेरा</title>
                                    <description><![CDATA[दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे पराली के धुओं के कारण जहां यातायात बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है ।
वहीं इस धुएं ने लोगों का जीना दुभर कर दिया है ।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/bathinda-darkness-in-the-daylight-spread-by-the-smoke-of-straw/article-10997"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/pollution1.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">पराली का धुआं लोगों के लिए बना मुसीबत | Pollution</h1>
<p><strong>बठिंडा/पक्का कलां(पुशपिन्दर सिंह)।</strong> दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे पराली के धुओं के कारण जहां <strong>(Pollution)</strong> यातायात बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है वहीं इस धुएं ने लोगों का जीना दुभर कर दिया है और खास कर छोटे -छोटे बच्चे इस धुएं से बहुत परेशान हैं। इस धुएं के साथ लोगों की आंखों में जलन पैदा हो रही हैं और चमड़ी के रोगों का शिकार हो रहे हैं। किसान लगतार पराली को आग लगा रहे हैं और उनका कहना है कि पराली को आग लगाना उनका शौक नहीं बल्कि मजबूरी है जबकि इस धुएं के बुरे प्रभावों से भी अच्छी तरह जानकार हैं। पराली का धुआं असामन में फैलने से दिन में ही रात जैसा माहौल बन गया है और राहगीरों को अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<h2>लोग घर से बाहर आते समय अपना मुंह व आंखें ढक कर रखें | Pollution</h2>
<p>प्रैगमा अस्पताल के छाती के विशेषज्ञ डॉ. सुरेन्द्र कांसल का कहना था कि धुएं से प्रदूषण बढ़ गया है और सांस की बीमारियां बहुत बढ़ गई हैं उन्होंने लोगों को सलाह दी कि लोग घर से बाहर आते समय अपना मुंह व आंखें ढक कर रखें व समय पर डॉक्टर की सलाह लें, जिससे दमे की बीमारी से बचा जा सके। भारतीय किसान यूनियन सिद्धूपुर के प्रधान बलदेव सिंह सन्दोहा ने कहा कि पराली को जलाना किसानों की मजबूरी बन गई है।</p>
<h2><strong> पराली की गठड़ियां बनाने वाली मशीनें काफी महंगी</strong></h2>
<ul>
<li><strong>उन्होंने कहा सरकार पराली को आग न लाने पर सख्ती तो इस्तेमाल कर रही है </strong></li>
<li><strong>परंतु इसका पक्का हल नहीं निकाल रही क्योंकि गठड़ियां बनाने वाली मशीनें काफी महंगी हैं </strong></li>
<li><strong>जो किसानों की पहुंच से बाहर हैं </strong></li>
<li><strong>परंतु यदि सरकार यह मशीनों सस्ते उपलब्ध करवाए तो </strong></li>
<li><strong>इस समस्या का कुछ हद तक हल हो सकता है। </strong></li>
</ul>
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<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Nov 2019 19:51:09 +0530</pubDate>
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                <title>समाज में उजालें क्यों हो रहे हैं कम?</title>
                                    <description><![CDATA[व्यक्ति परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से भी जुड़ा है Why Society Heading Towards darkness? स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। क्योंकि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-society-heading-towards-darkness/article-4840"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/society-heading-darkness.jpg" alt=""></a><br /><h1>व्यक्ति परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से भी जुड़ा है Why Society Heading Towards darkness?</h1>
<p>स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। क्योंकि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की तलाश ने अनेक समस्याएं पैदा की हैं। सामाजिक जीवन का एक आधारभूत सूत्र है सापेक्षता। निरपेक्ष व्यक्तियों का समूह भीड़ हो सकती है, समाज नहीं। जहां समाज होगा वहां सापेक्षता होगी। और जहां सापेक्षता होगी वहां सहानुभूति, संवेदनशीलता और आत्मीयता होगी। किसी भी संस्था, समाज, देश या राष्ट्र की शक्ति एवं सफलता का आधार है सापेक्ष सहयोग, आपसी प्रतिबद्धताएं। जिस समाज से जुड़े हुए व्यक्ति समूह के हितों के दीयों में अपनी जिंदगी का तेल अर्पित करने की क्षमता रखते हों वही समाज संचेतन, प्रगतिशील, संवेदनशील और संजिदा होता है। स्वस्थ एवं उन्नत समाज वह है जिसमें सामाजिक चेतना एवं संवेदनाओं की अनुभूति प्रखर हो और उसकी क्रियान्विति के प्रति जागरूकता बरती जाती हो। अनेक संगठनों ने सेवा, सहयोग एवं संवेदना की दृष्टि से एक स्वतंत्र पहचान बनाई है।</p>
<h1>स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है। Why Society Heading Towards darkness?</h1>
<p>डेरा सच्चा सौदा, स्वामिनारायण वाले हो या इस्कान वाले, कोई अणुव्रत का मिशन हो या सुखी परिवार अभियान-इनकी विभिन्न संस्थाएं सेवामूलक जनकल्याणकारी प्रवृतियों से जन-जन को अभिप्रेरित कर रही है। रोग या बुढ़ापे की स्थिति में हमारा क्या होगा, इस चिंता से ये संस्थाएं और उनसे जुडे़ लोग निश्चिंत करते हैं। वे पूरी जागरूकता से इस दायित्व को निभाते हैं। हमें भी सेवा का दर्शन अपनाते हुए अपने जीवन के साथ इसे जोड़ना है। इसे जोड़ने का अर्थ है कि हम खुद के लिए जीते हुए औरों के लिए भी जीने का प्रयत्न करें। व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समूहगत भावना से जहां, जब, जो भी हो उसमें हिस्सेदार बनें। इस भावना के विकास का अर्थ होगा कि हमारी संवेदनशीलता जीवंत होगी। सड़क पर पड़े आदमी की सिसकन, भूखे-प्यासे-बीमार की आहेंं, बेरोजगार की बेबसी, अन्याय और शोषण से प्रताड़ित आदमी की पीड़ा-ये सब स्थितियां हमारे मन में करुणा और संवेदना को जगांएगी। और यह जागी हुई करुणा और संवेदना हमें सेवा और सहयोग के लिए तत्पर करेंगी। इस तरह की भावना जब हर व्यक्ति में उत्पन्न होगी तो समाज उन्नत बनेगा, सुखी बनेगा और सुरक्षित बनेगा। न असुरक्षा की आशंका होगी, न अविश्वास, न हिंसा, न संग्रह, न शत्रुता का भाव। एक तरह से सारे निषेधत्मक भावों को विराम मिलेगा और एक नया पथ प्रशस्त होगा।</p>
<h2>पुनरावर्तन के अभाव में पढ़ा हुआ, सीखा हुआ ज्ञान भी विस्मृत हो सकता है Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>हम अपनी महत्वाकांक्षाओं से इतने बंध गए कि इस स्वार्थ में हमारी संवेदना भी खो गई। आज दूषित राजनीति में सिर्फ अपने को सुरक्षित रखने के सिवाय राजनेताओं का कोई चरित्र नहीं है। यही वजह है कि राष्ट्रीय समस्याओं, फैलती बुराइयों, अंधविश्वासों और अर्थशून्य परंपराओं के सामूहिक विरोध की ताकत निस्तेज पड़ती जा रही है फिर सेवा और सहयोग के आयाम कैसे पनपे? जरूरत है दिशा बदलने की। परार्थ और परमार्थ चेतना जगाने की। दोनों हाथ एक साथ उठेंगे तो एकता, संगठन, सहयोग, समन्वय और सौहार्द की स्वीकृति होगी। कदम-से-कदम मिलाकर चलेंगे तो क्रांतिपथ का कारवां बनेगा। यही शक्ति है समाज में व्याप्त असंतुलन एवं अभाव को समाप्त करने की। व्यक्ति प्रमाद या जड़ता से चरित्र भ्रष्ट हो सकता है, पुनरावर्तन के अभाव में पढ़ा हुआ, सीखा हुआ ज्ञान भी विस्मृत हो सकता है, किंतु सेवा कभी नष्ट नहीं होती। सेवाजनित लाभ कभी कहीं नहीं जाता। राजस्थानी कहावत है-ह्यकरें सेवा मिलें मेवा। समाज स्तर पर सेवा के लाभ की मीमांसा करते हुए स्थानांग सूत्र के टीकाकार लिखते हैं-सेवा के व्यावहारिक लाभ हैं, शारीरिक या मानसिक दृष्टि से रुग्ण तथा वृद्ध व्यक्तियों के चित्त में समाधि पैदा करना, उन्हें भविष्य के प्रति आश्वस्त करना, ग्लानि का निवारण करना, वात्सल्य प्रकट करना, रोगी या वृद्ध को नि:सहायता अनाथता का अनुभव न होने देना।</p>
<h2>प्राचीनकाल में स्वार्थ कम तथा स्नेह व सौहार्द ज्यादा था, आज उसमें आई कमी  Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>निशीथ भाष्यकार लिखते हैं-समाज के सदस्यों की सेवा करने वाला धर्म-वृक्ष की सुरक्षा करता है। सबकी प्रियता प्राप्त करता है और महान निर्जरा, चित्त शुद्धि का भागी बनता है। मेरी दृष्टि में यही सच्ची धार्मिकता है।<br />
समाज में उजालों की जरूरत आज ज्यादा महसूस की जा रही है, क्योंकि वास्तविक उजाला जीवन को खूबसूरती प्रदान करता है, वस्तुओं को आकार देता है, शिल्प देता है, रौनक एवं रंगत प्रदान करता है। उजाला इंसान के भीतर ज्ञान का संचार करता है और अंधकार को खत्म कर जीवन को सही मार्ग दिखाता है। नकारात्मक दृष्टिकोण दूर कर सकारात्मक दृष्टि और सोच प्रदान करता है। खुली आंखों से सही-सही देख न पाएं तो समझना चाहिए कि यह अंधेरा बाहर नहीं, हमारे भीतर ही कहीं घुसपैठ किये बैठा है और इसीलिये हम अंधेरों का ही रोना रोते हैं। जबकि जीवन में उजालों की कमी नहीं हैं। महावीर का त्याग, राम का राजवैभव छोड़ वनवासी बनना और गांधी का अहिंसक जीवन -ये उजालों के प्रतीक हैं जो भटकाव से बचाते रहे हैं।</p>
<h2>उजाला इंसान के भीतर ज्ञान का संचार करता है Why Society Heading Towards darkness?</h2>
<p>महान दार्शनिक आचार्यश्री महाप्रज्ञ ने सेवा की प्रवृतियों को प्रोत्साहन दिया है। उन्होंने कहा है प्राचीनकाल में स्वार्थ कम तथा स्नेह व सौहार्द ज्यादा था। आज उसमें कमी आई है। इसका एक कारण है धन के प्रति आकर्षण और नकारात्मक चिंतन। जहां सकारात्मक चिंतन का विकास होता है वहां संबंधों में सौहार्द बढ़ता है। इसके लिए जरूरी है व्यक्ति अपने भीतर झांके। अंतर्दृष्टि को जागृत कर नया प्रकाश प्राप्त करें। अपेक्षा है कि समाज का हर अंग सेवा की विभिन्न प्रवृतियों के साथ जुड़कर उसी नये प्रकाश को प्राप्त कर सकते हैं, वह ईश्वरत्व का बीज है, स्वयं से स्वयं के साक्षात्कार का मार्ग है।</p>
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                <pubDate>Sun, 15 Jul 2018 07:42:16 +0530</pubDate>
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