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                <title>भाषा की मर्यादा खोते राजनेता&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/politicians-losing-the-dignity-of-language/article-12962"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/dignity-of-language.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जात हैं? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"><strong>सोनम लववंशी</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">ततत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो राजनीतिक सरगर्मी उफान पर है। सियासत के सुरमा जिक्र तो लोक कल्याण और समावेशी विकासों का करते है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के बदलते भारत की राजनीति भी करवटें बदल रही है। विपक्ष तो विपक्ष सत्ता पक्ष भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कब राजनीति की नैतिकी और सिद्धांतों को धत्ता बता दे। यह पता ही नहीं चलता। ऐसे में अभिव्यक्ति के नाम पर अनर्गल बयानबाजी ने राजनीति की शुचिता आदि को तार-तार कर दिया हैं। बोल के लब आजाद है तेरे पंक्ति का शोर आजकल राजनैतिक आबोहवा में काफी गुंजित हो रहा… ऐसे में मालूम तो यही पड़ता कि जब मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने इन पंक्तियों को लिखा होगा तो शायद ही कभी ये सोचा होगा कि देश के राजनेता उनकी इस पंक्ति के सहारे शब्दों की सारी मर्यादा लांघ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अमर्यादित भाषा के वायरस से पीड़ित हो चुका है। जो उसके लिए बहुत बड़ी विडंबना वाली बात है। राजनीति का अर्थ यह तो कतई नहीं होता कि सियासतदां एक-दूसरे के निजी जीवन पर आक्षेप करने लग जाएं। राजनीति सदियों से हमारे समाज का अंग रही है। फिर हमारे सियासत के सूरमा लोकतंत्र के भीतर राजनीति के सिद्धांतों को तिलांजलि क्यों दे रहें। आज जिस दौर में भारतीय राजनीति में भाषा की गिरावट अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच गयी है। राजनेताओं के बोल बिगड़ते जा रहे हैं। उन्हें दूसरे राजनीतिक दल के नेताओं को बुरा बोलने में कोई बुराई नजर नहीं आती है। फिर सवालों की एक लंबी फेहरिस्त उत्पन्न होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या उसके उत्तर हमारे लोकतांत्रिक पहरुओं के पास हैं? पहला सवाल अभिव्यक्ति की आजादी ये तो नहीं कहती कि आप किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के मान को भंग करें? फिर आखिर ऐसा क्यों होता है? राजनीति निजी दुश्मनी अदा करने का कोई अखाड़ा भी नहीं। फिर अमर्यादित होने का क्या निहितार्थ? जब संवैधानिक व्यवस्था में राजनीति का जन्म देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए हुआ। फिर मूल उद्देश्य को क्यों बिसार देते है राजनीति के सिपहसालार? इसके अलावा जब भाषा हमारे सामाजिक परिवेश का स्तर तय करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाषा हमारी सोच का पैमाना होती है। तो राष्ट्रीय पार्टियों के सरीखे नेता बदजुबानी करके समाज और वैश्विक परिदृश्य को क्या यह दिखाना चाहते हैं कि हम तो जुबानी रूप से असभ्य हैं ही, इससे ही भारत भूमि के बारे में अंदाजा लगा लीजिए? अगर ऐसे कुछ विचार हमारे नेताओं के हैं तो उन्हें अपने बारे में न सोचकर एक मर्तबा देश की संस्कृति और परम्परा की तो सुध लेनी चाहिए खुले मंचों पर अमर्यादित बयानबाजी करने से, क्योंकि यह हमारे देश की छवि को निकृष्ट करने का कार्य करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना है यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जाते है? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर उस दायित्व को वे क्यों भूल जाते है? यह समझ से परे है। एक मिनट के लिए राजनीति को दरकिनार करके बात करते हैं। छोटे बड़े का मान-सम्मान करना तो हमारी पुरातन संस्कृति का हिस्सा सदैव रहा है। फिर लोक जीवन में तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। लेकिन हमारे देश के नेताओं को पता नहीं किसकी नजर लग गई है, कि वे एक-दूसरे पर बदजुबानी करने से बाज नहीं आते। इक्कीसवीं सदी में यह वायरस और तेजी से बढ़ रहा, जो काफी चिंताजनक है। आज दूसरे दल के नेताओं के प्रति सम्मान समाप्त हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक राजनीतिक बदजुबानी की बानगी पेश करते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष जब देश के प्रधानसेवक को डंडे से मारने की धमकी दे दे, तो यह समझा जा सकता है कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो कुर्सी का खेल मुगलई दौर का होता जा रहा। बनिस्बत अंतर इतना है, तब तलवार का बोलबाला था और आज संवैधानिक लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक बदजुबानी का।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक बात स्पष्ट हो। राजनेताओं के बोल बिगड़ने का यह मसला कोई नया नहीं है। देश की आम सड़कों से लेकर चुनावी सभाओं तक राजनेताओं के बोल असंयमित होते जा रहे हैं। राजनेता अब चुनावी वादों से चुनाव जीतने की बजाय विपक्षी दल पर अभद्र टिप्पणी के जरिये चुनावी रण फतह करने की राह में आगे बढ़ रहे हैं और उनके इन सपनों को साकार करने में हर मीडिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। टीवी और सोशल मीडिया इस दुष्प्रचारक का न सिर्फ गवाह बना है, बल्कि इसके विस्तार में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा। सवाल उसके हो जाने के बाद के रिएक्शन का है । डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि ‘‘लोकराज, लोकलाज से चलता है।’’ आज प्रखर समाजवादी नेता के विचारों को उन्हीं के खेवनहार डुबो रहे यह बड़े ताज्जुब की बात है। यहां अतीत के पन्नो में जाकर देखें तो सन 1964 में लोकसभा में आचार्य कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि- जवाहरलाल कहते हैं कि चीन ने जो हमारी जमीन छीनी है, वहां कुछ पैदा नहीं होता था। जवाहरलाल के सिर पर भी बाल नहीं तो क्या उनकी गर्दन काट लें?</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यहीं से राजनीति में बदजुबानी के युग की शुरूआत मान लें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा। ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है। पहले समाजवादी पार्टी पर ही आरोप लगते थे कि उनकी भाषा मर्यादित नहीं है , लेकिन वर्तमान समय की बात करें तो हर राजनीतिक दल ने भाषा की सारी मर्यादा को पार कर दिया है। देश की सेना से लेकर देश के प्रधानसेवक तक पर असभ्य टिप्पणियां की जाने लगी हैं। महिलाओं के प्रति तो मर्यादा की सारी सीमाओं को नेता पहले से ही पार करते आएं हैं, लेकिन अफसोस कि उन्हें इसमें न ही कोई बुराई नजर आती और न ही माफी मांगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अगर इक्कीसवीं सदी में राजनेता अपनी राह से भटक गए हैं। तो उन्हें सही राह दिखाने का काम अवाम को उठाना होगा। उन्हें याद दिलाना होगा, कि लोकतंत्र में जुबानी तीर का कोई औचित्य नहीं, बल्कि देश की भलाई का कार्य करना होगा। इसके अलावा अगर चुनाव आयोग शक्ति से ऐसे नेताओं से पेश आएं जो राजनैतिक बदजुबानी करते हैं। उनके चुनावी भविष्य पर विराम आदि लगाने जैसी कुछ व्यवस्था करें तो शायद अमर्यादित बोल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम आने बन्द हो जाएं।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Feb 2020 21:09:00 +0530</pubDate>
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                <title>राहुल ने गिराई संसद की गरिमा?</title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा में सवा चार साल पुरानी राजग सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा लोकसभा में सवा चार साल पुरानी राजग सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर कारगर ढंग से राजनीतिक हमले किए। सरकार की नाकामियां गिनाते हुए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/rahul-dropped-dignity-of-parliament/article-4959"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/rahul-dropped-dignity-parliament.jpg" alt=""></a><br /><h1>लोकसभा में सवा चार साल पुरानी राजग सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा</h1>
<p style="text-align:justify;">लोकसभा में सवा चार साल पुरानी राजग सरकार के खिलाफ पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर कारगर ढंग से राजनीतिक हमले किए। सरकार की नाकामियां गिनाते हुए फ्रांस के साथ हुई राफेल विमान खरीद सौदे को कठघरे में खड़ा किया और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर इस बाबत झूठ बोलने के आरोप लगाए। राहुल ने जियो के विज्ञापन में प्रधानमंत्री की तस्वीर, बेरोजगारी और नोटबंदी पर भी सरकार को घेरा। सर्जिकल स्ट्राइक के बहाने जुमला स्ट्राइक कहकर तंज कसा। भाषण के बाद आत्ममुग्ध राहुल संसद की परंपरा तोड़ते हुए कुर्सी पर बैठे प्रधानमंत्री के गले भी पड़ गए। इसके बाद अपनी कुर्सी पर बैठकर राहुल ने जिस ढंग से आंख मारी, उसने संसद की गरिमा तो गिराई ही, साथ ही संसद की सीधी कार्यवाही देख रही देश और दुनिया की अवाम को यह संदेश भी दे दिया कि वे वाकई अभी भी गंभीर नहीं हैं। वैसे भी हमारे लोक-मानस में आंख चमकाने की क्रिया को छिछौरापन ही माना जाता है।</p>
<h2>राहुल संसद की परंपरा तोड़ते हुए कुर्सी पर बैठे प्रधानमंत्री के गले भी पड़ गए: राहुल गांधी</h2>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इन सब आरोपों और हरकतों से निर्लिप्त रहते हुए और अविश्वास प्रस्ताव जैसी कार्यवाही के बाजूद सरकार एवं प्रधानमंत्री सहज दिखे। क्योंकि उन्हें अपने सांसद, सहयोगी दल और रणनीति पर पूरा भरोसा था। इसीलिए अविश्वास प्रस्ताव 199 मतों के भारी अंतर से गिर गया। बावजूद संसद में बहस के दौरान अच्छी बात यह रही कि इसकी शुरूआत सकारात्मक ऊर्जा के साथ हुई और प्रधानमंत्री ने भी जवाबी भाषण में राहुल के चौकीदार बनाम भागीदार मुहावरे की धार भौंथरी करते हुए अपनी भागीदारी को गरीब व किसानों से जोड़कर रचनात्मक संदेश दिया। उम्मीद है आगे भी संसद में बहस की यही स्थिति दिखेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि अविश्वास प्रस्ताव तेलुगू देशम पार्टी द्वारा लाया गया था। एक समय तक तेलुगू देशम भाजपा का भरोसे का मित्र दल रहा है, लेकिन राजनीति में दोस्त को दुश्मन होने में देर नहीं लगती। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आंध्र को विशेष दर्जा देने की मांग कर रहे हैं। किंतु मोदी ने इसे अनसुना किया हुआ है। अब उन्होंने अपनी मन की बात कहते हुए संसद में कहा कि जोर और जुल्म के बीच आंध्र एवं तेलंगाना का विभाजन हुआ है। उस समय मैंने यह कहा था कि तेलुगू हमारी मां है। तेलुगू की एकता को टूटने नहीं देना चाहिए। कांग्रेस की वजह से तेलंगाना विवाद पैदा हुआ, नतीजतन प्रदेश का बंटवारा हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस ने ही भारत-पाकिस्तान का विभाजन किया, जिसकी मुसीबत हम आज भी झेल रहे हैं। कांग्रेस विभाजन करके आंध्र जितना चाहती थी, लेकिन आंध्र मिला न ही तेलंगाना। जाहिर है, इस बंटवारे के परिणामस्वरूप कांग्रेस ने आधी रोटी छोड़, साजी को भागे, साजी मिले न आधी पावे कहावत को चरितार्थ कर दिया। प्रधानमंत्री ने एक तीर से दो निशाने साधकर स्पष्ट कर दिया है कि आंध्र को विशेष राज्य का दर्जा उनके रहते हुए मिलने वाला नहीं है। साथ ही आंध्र के बंटवारे में कांग्रेस की उस छिपी हुई राजनीतिक मंशा को भी मोदी ने उजागर कर किया, जिस बंटवारें के चलते वह आंध्र की सत्ता चाहती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">राफेल सौदे को लेकर राहुल पहले भी सड़क से लेकर संसद तक केंद्र सरकार पर हल्ला बोलते रहे हैं। किंतु इस बार संसद में इस मुद्दे पर सरकार को घेरना, उन्हें इसलिए महंगा पड़ गया क्योंकि फ्रांस ने उनके आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। राहुल ने कहा है कि इस विमान सौदे में विमानों की कीमत बढ़ा दी गई है। इस कारण बड़ा घपला हुआ है। इस आरोप का जबाव देते हुए फ्रांस सरकार ने कहा है कि दोनों देशों में सूचना गोपनीय रखने का करार है। इसलिए इसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। फ्रांस सरकार ने अपने बयान में यह भी हवाला दिया है कि 2008 में सुरक्षा समझौते के तहत दोनों देश गुप्त सूचना को सार्वजनिक नहीं कर सकते हैं। इस करार के समय कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार केंद्र में थी। राहुल ने एक हवाई जहाज 1600 करोड़ में खरीदना बताया है, जबकि संप्रग सरकार ने यह सौदा 520 करोड़ रुपए प्रति विमान किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि फ्रांस से लड़ाकू विमान राफेल खरीद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या केंद्र सरकार पर गड़बड़ी की आशंका व्यर्थ है। यूपीए की सरकार के दौरान 2008 में जब इसी विमान सौदे की बात चल रही थी, तब प्रति विमान 526.1 करोड़ रुपए पर सहमति बनी थी। केंद्र सरकार पारदर्शिता बरतते हुए विमान की कीमत भले ही करार की मयार्दा के चलते स्पष्ट नहीं कर रही हो, जबकि इसी सरकार के रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे ने 8 नवंबर 2016 को लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया था कि फ्रांस के साथ 23 सितंबर 2016 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसके तहत तमाम जरूरी रक्षा उपकरणों, सेवाओं और हथियारों से युक्त 36 राफेल विमान खरीदे जाएंगे। प्रत्येक विमान की कीमत करीब 670 करोड़ रुपए होगी। अप्रैल 2022 तक सभी विमान भारत आ जाएंगे। जब सरकार लोकसभा में विमान की कीमत बता चुकी है तो अब गोपनीयता क्यों बरत रही है ? चूंकि यह विमान सौदा फ्रांस के राश्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद और नरेंद्र मोदी के बीच हुई सीधी बातचीत से तय हुआ था, इसलिए इसमें शक की कहीं कोई गुंजाइश रह ही नहीं जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">देरी और दलाली से अभिशप्त रहे रक्षा सौदों में राजग सरकार के वजूद में आने के बाद से लगातार तेजी दिखाई दी है। मिसाइलों और रॉकेटों के परीक्षण में भी यही गतिशीलता दिखाई दे रही है। इस स्थिति का निर्माण, सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए जरूरी था। वरना रक्षा उपकरण खरीद के मामले में संप्रग सरकार ने तो लगभग हथियार डाल दिए थे। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के चलते तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी तो इतने मानसिक अवसाद में आ गए थे कि उन्होंने हथियारों की खरीद को टालना ही अपनी उपलब्धि मान लिया था। नतीजतन, हमारी तीनों सेनाएं शस्त्रों की कमी का अभूतपूर्व संकट झेल रही थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">नरेंद्र मोदी ने 2016 में फ्रांस यात्रा के दौरान फ्रांसीसी कंपनी दासौ से जो 36 राफेल जंगी जहाजों का सौदा किया है, वह अर्से से अधर में लटका था। इस सौदे को अंजाम तक पहुंचाने की पहल वायु सैनिकों को संजीवनी देकर उनका आत्मबल मजबूत करने का काम करेगी। फ्रांस के राष्ट्रपति और नरेंद्र मोदी से सीधे हुई बातचीत के बाद यह सौदा अंतिम रुप ले पाया है, इस लिहाज से इस सॉैदे के दो फायदे देखने में आ रहे हैं। एक हम यह भरोसा कर सकते हैं कि ये युद्धक विमान जल्दी से जल्दी हमारी वायुसेना के जहाजी बेड़े में शामिल हो जांएगे। दूसरे, इस खरीद में कहीं भी दलाली की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है, क्योंकि सौदे को दोनों राष्ट्र प्रमुखों ने सीधे संवाद के जरिए अंतिम रूप दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह और रक्षा मंत्री एके एंटनी की साख ईमानदार जरूर थी, लेकिन ऐसी ईमानदारी का क्या मतलब, जो जरूरी रक्षा हथियारों को खरीदने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाए ? जबकि ईमानदारी तो व्यक्ति को साहसी बनाने का काम करती है। हालांकि रक्षा उपकरणों की खरीदी से अनेक किंतु-परंतु जुड़े होते हैं,सो इस खरीद से भी जुड़ गए हैं। यह सही है कि जंगी जहाजों का जो सौदा हुआ है वह संप्रग सरकार द्वारा चलाई गई बातचीत की ही अंतिम परिणति है। इस खरीद प्रस्ताव के तहत 18 राफेल विमान फ्रांस से खरीदे जाने थे और फ्रांस के तकनीकी सहयोग से स्वेदेशीकरण को बढ़ावा देने की दृश्टि से 108 विमान भारत में ही बनाए जाने थे। स्वदेश में इन विमानों को बनाने का काम हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ;एचएएलद्ध को करना था, ये शर्तें अब इस समझौते का हिस्सा नहीं हैं। इससे मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम को धक्का लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि तत्काल युद्धक विमानों के निर्माण की तकनीक भारत को मिलने नहीं जा रही है ? जाहिर है, जब तक एचएएल को यूरोपीय देशों से तकनीक का हस्तांतरण नहीं होगा, तब तक न तो स्वेदेशी विमान निर्माण कंपनियों का आधुनिकीकरण होगा और न ही हम स्वेदेशी तकनीक निर्मित करने में आत्मनिर्भर हो पाएंगे ? इसलिए मोदी कुछ विमानों के निर्माण की शर्त भारत में ही रखते तो इस सौदे के दीर्घकालिक परिणाम भारत के लिए कहीं बेहतर होते ?</p>
<p style="text-align:justify;">विमानों की इस खरीद में मुख्य खामी यह है कि भारत को प्रदाय किए जाने वाले सभी विमान पुराने होंगे। इन विमानों को पहले से ही फ्रांस की वायुसेना इस्तेमाल कर रही है। हालांकि 1978 में जब जागुआर विमानों का बेड़ा ब्रिटेन से खरीदा गया था, तब ब्रिटिश ने हमें वही जंगी जहाज बेचे थे,जिनका प्रयोग ब्रिटिश वायुसेना पहले से ही कर रही थी। लेकिन हरेक सरकार परावलंबन के चलते ऐसी ही लाचारियों के बीच रक्षा सौदें करती रही है। इस लिहाज से जब तक हम विमान निर्माण के क्षेत्र में स्वावलंबी नहीं होंगे, लाचारी के समझौतों की मजबूरी झेलनी ही होगी। इस सौदे की एक अच्छी खूबी यह है कि सौदे की आधी धनराशि भारत में फ्रांसीसी कंपनी को निवेश करना अनिवार्य होगी। बहरहाल इस बहस ने यह तय कर दिया है कि 2019 में होने वाले आम चुनाव रोचक होने जा रहे हैं। लेकिन इनकी रोचकता तभी सामने आएगी, जब राहुल परिपक्वा का परिचय दें।                        <strong><em>प्रमोद भार्गव</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 22 Jul 2018 08:01:20 +0530</pubDate>
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