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                <title>Sanitary Pad - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>82 फीसदी महिलाएं नहीं खरीद पातीं सेनेटरी पैड</title>
                                    <description><![CDATA[12 फीसदी औरतें ही सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल कर पाती हैं देर से ही सही आखिर सरकार ने महिलाओं को राहत देते हुए सेनिटरी नैपकिन को जीएसटी से मुक्त कर दिया है यानि अब यह करमुक्त हो गई है। सेनिटरी नैपकिन पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाने का देशभर में महिलाओं ने विरोध किया था। जीएसटी काउंसिल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/82-percent-women-can-not-buy-sanitary-pad/article-4972"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/women.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">12 फीसदी औरतें ही सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल कर पाती हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">देर से ही सही आखिर सरकार ने महिलाओं को राहत देते हुए सेनिटरी नैपकिन को जीएसटी से मुक्त कर दिया है यानि अब यह करमुक्त हो गई है। सेनिटरी नैपकिन पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगाने का देशभर में महिलाओं ने विरोध किया था। जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में सैनिटरी पैड्स को लेकर बड़ा फैसला लिया गया, जिसके चलते महिलाओं को अब सैनिटरी पैड्स टैक्स फ्री मिलेंगे। पहले सैनिटरी पैड्स पर 12 प्रतिशत जीएसटी लगता था जबकि अब यह टैक्स फ्री होगा। सैनिटरी नैपकिन का अर्थ है एक ऐसा सोखने वाला पैड जिसे मासिक धर्म के दौरान महिलाएं रक्त को सोखने के लिए उपयोग में लाती हैं। महिलाएं और लड़कियां माहवारी के दौरान सेनिटरी नैपकिन का उपयोग करती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की 255 मिलियन महिलाओं में से सिर्फ 12 फीसदी औरतें ही सैनिटरी पैड्स इस्तेमाल कर पाती हैं, जिसका कारण है इसकी देश की 70 फीसदी महिलाएं इसे खरीद में असमर्थ थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">82 फीसदी महिलाएं आज भी पुराना कपड़ा अपनाती हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी हटाने के बाद अब 100 रुपए वाले 10 सैनिटरी पैड का पैक 88 रुपए में मिलेगा। अगर वह सालाना 12 पेड्स का इस्तेमाल करती हैं तो 1200 रूपए के सैनिटरी पेड्स 1056 रूपए में मिलेंगे यानि की 144 रूपए की बचत। फेडरेशन आॅफ आॅब्सटेट्रक एंड गाएनाकोलॉजिकल सोसाइटी आॅफ इंडिया (एफओजीएसआई) के अनुसार देश की सिर्फ 18 फीसदी महिलाएं और लड़कियां ही माहवारी के दौरान सेनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि 82 फीसदी महिलाएं आज भी पुराना कपड़ा, घास और यहां तक कि राख जैसे अस्वच्छ एवं असुरक्षित विकल्प अपनाती हैं।</p>
<p> </p>
<h2>71 फीसदी महिलाओं को अपने पहले मासिक धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं होती</h2>
<p style="text-align:justify;">आज भी देश में 71 फीसदी महिलाओं को अपने पहले पीरियड से पहले मासिक धर्म के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। आकड़ों की माने तो महिलाओं की जनसंख्या में दूसरे स्थान पर रहने वाले भारत में 82 प्रतिशत महिलाएं आज भी मासिक धर्म के दौरान पुराने कपड़े, सूखे पत्ते, लत्ते, सूखी घास, बुरादा और राख का इस्तेमाल करती हैं। माहवारी को लेकर आज भी भारत में जागरुकता का अभाव है। ऐसा खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में देखा जाता है क्योंकि वहां महिलाओं को इस बारे में अधिक जानकारी नहीं होती और दूसरा बड़ा कारण वह इसे लेने में असमर्थ भी हैं जिस वजह से वह परंपरागत चीजें (जैसे कपड़ा घास राख) का इस्तेमाल करती है हालांकि अब सरकार द्वारा टैक्स फ्री किए जाने के बाद महिलाओं को काफी राहत मिलेगी और यह कदम फायदेमंद भी साबित होगा।</p>
<h2><span style="text-align:justify;">देश में 23 फीसदी महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की शिकार हैं</span></h2>
<p style="text-align:justify;">महिलाओं की कई अन्य गंभीर बीमारियों और संक्रमण का कारण भी मासिक धर्म में अस्वच्छता और जागरुकता में कमी होना पाया गया है यही नहीं महिलाओं की कई अन्य गंभीर बीमारियों और संक्रमण का कारण भी मासिक धर्म में अस्वच्छता और जागरुकता में कमी होना पाया गया है इसी का परिणाम है कि आज देश में 23 फीसदी महिलाएं सर्वाइकल कैंसर की शिकार हैं और 27 फीसदी महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण पाए गए हैं। जाहिर है कि कई महिलाएं और किशोर लड़कियां समाज के निम्नतम भाग से हैं, जहां गरीबी और पुरानी प्रथाओं के चलते माहवारी में स्वच्छता और स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके कारण वहां के परिणाम बेहद दयनीय और भयानक होते हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं जबकि शहरों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं। कुल मिलाकर देखा जाए तो 57.6 प्रतिशत महिलाएं ही इसका इस्तेमाल करती हैं महावारी के दौरान महिलाएं जिन सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं, वो अक्सर उसे सुरक्षित मान कर चलती हैं। सरकार ने इसके लिए मानक तय कर रखे हैं। इंडियन ब्यूरो स्टैंडर्स ने सैनेटरी पैड के लिए पहली बार 1980 में मानक तय किए, जिसमें समय-समय पर बदलाव भी किए गए हैं। सैनिटरी पैड का काम सिर्फ ब्लीडिंग को सोखना नहीं है इसे हाइजिन के पैरामीटर पर भी खरा उतरना चाहिए। बाजार में बिकने वाले सैनिटरी पैड्स पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते हैं. इनमें जिस प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल किया जाता है वो कार्सिनोजेनिक हो सकता है ऐसे में इन पैड्स का इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ मोनिका ओझा खत्री</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 23 Jul 2018 03:08:29 +0530</pubDate>
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