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                <title>Story: जब बापू ने मेरी बीएड के लिए अपनी ट्रॉली बेच दी</title>
                                    <description><![CDATA[Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/story.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही पिता की भूमिका भी उतनी ही गहन और व्यापक होती है। माता और पिता दोनों ही संतान के लिए अलग-अलग किंतु समान रूप से अनमोल स्थान रखते हैं। बच्चे का परिवेश- उसका पड़ोस, उसका वातावरण, उसका विद्यालय और उसका शहर- उसके व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। अपने प्रियजनों के बिछुड़ जाने के बाद मन उदासी से भर जाता है और तब जीवन का अगला चरण उन्हीं की स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ने लगता है। कहा जाता है कि ठहरा हुआ पानी भी खराब होने लगता है, जबकि बहता पानी अपनी अलग ही सुगंध और ताजगी लिए होता है। यही जीवन का सिद्धांत है- समय के साथ चलते रहना, बदलते रहना।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना काल के कठिन समय में मेरा बापू मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गया। जब तक वह जीवित थे, मुझे जीवन की किसी भी बात की तनिक भी चिंता नहीं थी। मैं अपनी मस्ती भरी दुनिया में मग्न था। लेकिन उनके जाने के बाद जिम्मेदारियों का जो एहसास हुआ, वह मेरे जीवन का एक नया अध्याय बन गया। आज सोचता हूँ, न जाने कैसे वह कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद हम तीनों भाई-बहनों को पढ़ाते रहे और घर-गृहस्थी की गाड़ी भी खींचते रहे। यह बात 1998 की है, जब मेरा बी.एड. में प्रवेश हुआ। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। छमाही फसल बिकने के बाद ही कहीं जाकर आढ़ती से कुछ पैसे मिलते और उन्हीं से हमारे कपड़े-वगैरह और अन्य आवश्यकताओं का प्रबंध होता। परीक्षा पास करने के तुरंत बाद बी.एड. में दाखिले की खुशी इतनी अधिक थी कि मैं उसे संभाल भी नहीं पा रहा था। मुझे क्या पता था कि इतनी भारी फीस भरना हमारे लिए संभव ही नहीं था। मैं चुपचाप सो गया। Story</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माँ ने पिता से इस बारे में बात की कि बेटे का दाखिला हो गया है, वह आगे चलकर मास्टर बनेगा, पर फीस बहुत अधिक है- कोई उपाय करना होगा। अगले ही दिन मेरे पिता, बिना अपने साधनों की परवाह किए, अपनी ट्रॉली बेच आए और मेरी फीस के लिए पैसे जुटा दिए। मुझे इस बात का पता बाद में चला, जब मैंने उन्हें दूसरों से ट्रॉली मांगकर काम करते देखा। पिता के जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। पिता तो अपने बच्चों के लिए अपना संपूर्ण जीवन तक न्यौछावर कर देता है। आज भले ही मेरे बापू हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियां ही मेरे जीवन को आगे बढ़ाने का संबल बनी हुई हैं।<br />
जब मैं आज अपने विद्यार्थियों को यह प्रसंग सुनाता हूँ, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं और उनके मन में अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान और भी गहरा हो जाता है। माता-पिता घर की वह नींव होते हैं, जिनके रहते किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जिन बच्चों के माता-पिता बचपन में ही उन्हें छोड़ जाते हैं, उनसे पूछकर देखिए कि बिना माता-पिता के जीवन कैसा होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि जीवन में यादें न हों, तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। अच्छी और बुरी, दोनों प्रकार की यादों के सहारे ही जीवन आगे बढ़ता है। माता-पिता हमें छोड़कर जाने के बाद भी हमारे सपनों में आकर हमें सही और गलत का मार्ग दिखाते रहते हैं। वास्तव में, जीवन की यादें एक विशाल चलचित्र है, जिसे हमारा मन अपने भीतर संजोए रखता है। अच्छी यादें हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। हमें चाहिए कि हम अपने बड़ों का सम्मान करें और जीवन की मधुर यादों को दूसरों के साथ भी साझा करें।<br />
अमनदीप शर्मा, गुरने कलां, मानसा, मो. 98760-74055</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान" href="https://www.sachkahoon.com/oil-companies-issued-a-statement-regarding-the-increase-in-petrol-and-diesel-prices/">Petrol-Diesel Price: पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने को लेकर तेल कंपनियों का आया बड़ा बयान</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/mother-has-a-very-important-place-in-life/article-83707</link>
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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 15:35:40 +0530</pubDate>
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                <title>Sant and Shishya: समुद्र के किनारे पर एक गुरु और उनका शिष्य &amp;#8230;.</title>
                                    <description><![CDATA[Sant and Shishya: समुद्र के किनारे पर एक गुरु और उनका शिष्य बैठे थे। लहरों की मधुर ध्वनि वातावरण को गंभीर और पवित्र बना रही थी। तभी शिष्य ने अपने गुरु से भावुक होकर कहा, ‘गुरुदेव, जब मैं आपके ज्ञान के बारे में सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। मैंने आपसे बड़ा कोई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/the-story-of-the-guru-and-his-disciple-on-the-seashore/article-83271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/sant-and-shishya.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Sant and Shishya: समुद्र के किनारे पर एक गुरु और उनका शिष्य बैठे थे। लहरों की मधुर ध्वनि वातावरण को गंभीर और पवित्र बना रही थी। तभी शिष्य ने अपने गुरु से भावुक होकर कहा, ‘गुरुदेव, जब मैं आपके ज्ञान के बारे में सोचता हूं, तो आश्चर्य में पड़ जाता हूं। मैंने आपसे बड़ा कोई और ज्ञानी नहीं देखा। आप तो ज्ञान के अथाह सागर हैं।’ शिष्य की यह बात सुनकर गुरु मुस्कुराए नहीं, बल्कि उनके चेहरे पर हल्की गंभीरता आ गई। उन्होंने धीरे से पास पड़ी एक सूखी लकड़ी उठाई और उसे समुद्र के जल में डुबोकर बाहर निकाला। फिर शिष्य की ओर देखते हुए बोले, ‘वत्स, इस विशाल सागर को देखो। इसमें अनंत जल भरा है, पर यह लकड़ी इसमें डूबकर भी केवल कुछ बूंदें ही अपने साथ ला सकी।’ शिष्य ध्यानपूर्वक गुरु की बात सुन रहा था। Sant and Shishya</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु ने आगे कहा, ‘ज्ञान भी इस सागर की तरह अनंत है। मैं भी इस सागर से अभी तक केवल कुछ बूंदें ही प्राप्त कर पाया हूं। इस संसार में मुझसे अधिक ज्ञानी अनेक लोग हैं, जिनसे मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है।’ गुरु के इन शब्दों ने शिष्य के मन को झकझोर दिया। उसे समझ आ गया कि सच्चा ज्ञान वही है, जिसमें विनम्रता हो, न कि अहंकार। इससे संदेश स्पष्ट है कि अहंकार मनुष्य को अंधकार की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझ लेता है, वह सीखने के मार्ग को बंद कर देता है। इसलिए जीवन में सदा विनम्र रहकर ज्ञान अर्जित करते रहना ही सच्ची सफलता का मार्ग है।</p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 15:05:05 +0530</pubDate>
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                <title>Daughter Like Son: बेटों जैसी बेटी</title>
                                    <description><![CDATA[रमेश सेठी बादल Daughter Like Son: गाँव की पगडंडी पर धूप हल्की-हल्की बिखरी थी। मैं चक्की से आटा लेकर लौटती एक लड़की को देख रुक गया। सहज जिज्ञासा से पूछ बैठा – ‘बेटा, तुम किस घर की हो? किसकी बेटी हो?’ उसने बिना हिचक, आत्मविश्वास भरे स्वर में कहा – ‘अंकल जी, मैं मास्टर करमचंद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/the-story-of-a-daughter-like-a-son/article-74991"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-08/daughter-like-son.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रमेश सेठी बादल</strong><br />
Daughter Like Son: गाँव की पगडंडी पर धूप हल्की-हल्की बिखरी थी। मैं चक्की से आटा लेकर लौटती एक लड़की को देख रुक गया। सहज जिज्ञासा से पूछ बैठा – ‘बेटा, तुम किस घर की हो? किसकी बेटी हो?’ उसने बिना हिचक, आत्मविश्वास भरे स्वर में कहा – ‘अंकल जी, मैं मास्टर करमचंद की बेटी हूँ, जो पिछले वर्ष सेवानिवृत्त हुए हैं।’ मैंने मुस्कराते हुए पूछा – ‘पढ़ाई कर रही हो या छोड़ दी?’</p>
<p style="text-align:justify;">वह बोली – ‘जी, मैं बी.ए. फाइनल में हूँ।’ मुझे हैरानी हुई। इतनी पढ़ी-लिखी लड़की घर का इतना कठिन काम! मैंने पूछा – ‘तुम्हारी मम्मी क्या करती हैं?’ उसने सहजता से कहा – ‘पापा-मम्मी दोनों बीमार रहते हैं, घर पर ही हैं। काम करना मेरी मजबूरी भी है और आदत भी।’ मैंने तारीफ के अंदाज में कहा – ‘फिर तो तुम बेटों जैसी बेटी हो।’ पर वह ठिठक गई। उसकी आँखों में एक अनकही पीड़ा चमक उठी। ‘अंकल जी, क्यों? सिर्फ बेटों जैसी बेटी क्यों? बेटियों जैसी बेटी क्यों नहीं? क्या बेटी की पहचान तभी होगी जब उसे बेटों से जोड़ा जाए?’ उसके सवाल ने मुझे भीतर तक हिला दिया। मैंने सोचा था कि यह प्रशंसा है, पर उसके लिए यह अपमान था। Daughter Like Son</p>
<p style="text-align:justify;">वह आगे बोली- ‘अंकल जी, समाज की सोच ऐसी बन गई है कि बेटा सब कुछ है और बेटी पराया धन। लेकिन बेटियां भी तो आपका ही खून होती हैं। बेटों में से कितने ही शादी के बाद माता-पिता को छोड़ जाते हैं, केवल अपनी हिस्सेदारी में रुचि रखते हैं। पर बेटियां? वे निस्वार्थ सेवा करती हैं।’ उसने पड़ोसी का उदाहरण दिया- ‘बगल वाले घर में आंटी बीमार हैं। उनके बेटे उनकी देखभाल नहीं करते, लेकिन बेटियां आकर उनकी सेवा करती हैं। अस्पताल में भर्ती रहीं तो बेटी ने सब संभाला।’ उसके शब्द चुभ रहे थे, पर सच थे। वह रुकी नहीं- ‘अगर बेटियाँ भी बेटों जैसी खुदगर्ज हो जाएं तो बुजुर्गों का सहारा कौन बनेगा? माँ के साथ सुख-दुख कौन करेगा? बेटियां माता-पिता को वह सुकून देती हैं, जो बेटों से नहीं मिलता।’</p>
<p style="text-align:justify;">अंकल जी! मैं घर में सबसे छोटी हूँ। बड़े चाव से मेरे दोनों भाइयों की शादियाँ की गईं। सारे रीति-रिवाज पूरे किए गए। कुछ दिनों तक तो मेरे माता-पिता खुशी के मारे जमीन पर पैर नहीं रख पा रहे थे। मेरी माँ का तो मानो खुशी से मन नहीं समा रहा था। घर में दो-दो बहुएँ आ गई थीं, पर यह खुशियाँ कुछ ही दिनों तक रहीं। फिर घर में तकरार शुरू हो गई। बहुओं के नखरे मेरी माँ से बर्दाश्त नहीं हुए। पापा रिटायरमेंट के करीब थे, इसलिए भाइयों ने अलग हो जाने में ही भलाई समझी और अपना-अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए। कई दिनों तक माँ रोती रही।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर उसने हालात से समझौता कर लिया। मैंने माँ को ढांढस बंधाया— माँ, मैं जो हूँ, तुम चिंता मत करो। और उसी दिन से मैंने घर के सारे कामों की जिम्मेदारी संभाल ली। अब न पापा से काम होता है, न मम्मी से। हाँ, जो पेंशन आती है, उससे घर का गुजारा चल जाता है। बाकी काम की कोई चिंता नहीं है।‘क्या अब भी आप मुझे बेटों जैसी बेटी कहेंगे? क्या मैं आपको सिर्फ बेटी जैसी बेटी नहीं लगती?’ मेरे पास उत्तर नहीं था। मैं चुप रहा, लेकिन भीतर से उसकी बातों को स्वीकार कर चुका था। Daughter Like Son</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 23 Aug 2025 17:42:27 +0530</pubDate>
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                <title>Fishes Story: तीन मछलियां</title>
                                    <description><![CDATA[Fish Story: एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता है, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/three-fishes-story/article-61683"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-09/fish.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Fish Story: एक नदी के किनारे उसी नदी से जुड़ा एक बड़ा जलाशय था। जलाशय में पानी गहरा होता है, इसलिए उसमें काई तथा मछलियों का प्रिय भोजन जलीय सूक्ष्म पौधे उगते हैं। ऐसे स्थान मछलियों को बहुत रास आते हैं। उस जलाशय में भी नदी से बहुत-सी मछलियां आकर रहती थी। अंडे देने के लिए सभी मछलियां उस जलाशय में आती थी। वह जलाशय लम्बी घास व झाड़ियों द्वारा घिरा होने के कारण आसानी से नजर नहीं आता था। Fish Story</p>
<p style="text-align:justify;">उसी में तीन मछलियां यही आकर रहती थी। उनके स्वभाव भिन्न थे। अन्ना नाम की मछली संकट आने के लक्षण मिलते ही संकट टालने का उपाय करने में विश्वास रखती थी। प्रत्यु कहती थी कि संकट आने पर ही उससे बचने का यत्न करो। यद्दी का सोचना था कि संकट को टालने या उससे बचने की बात बेकार हैं करने कराने से कुछ नहीं होता जो किस्मत में लिखा है, वह होकर रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन शाम को मछुआरे नदी में मछलियां पकड़कर घर जा रहे थे। बहुत कम मछलियां उनके जालों में फंसी थी। अत: उनके चेहरे उदास थे। तभी उन्हें झाड़ियों के ऊपर मछलीखोर पक्षियों का झुंड जाता दिखाई दिया। सबकी चोंच में मछलियां दबी थी। वे चौंके। Fish Story</p>
<p style="text-align:justify;">एक ने अनुमान लगाया ‘‘दोस्तो! लगता हैं झाड़ियों के पीछे नदी से जुड़ा जलाशय हैं, जहां इतनी सारी मछलियां पल रही हैं।’’<br />
मछुआरे पुलकित होकर झाड़ियों में से होकर जलाशय के तट पर आ निकले और ललचाई नजर से मछलियों को देखने लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">एक मछुआरा बोला ‘‘अहा! इस जलाशय में तो मछलियां भरी पड़ी हैं। आज तक हमें इसका पता ही नहीं लगा।’’ ‘‘यहां हमें ढेर सारी मछलियां मिलेंगी।’’ दूसरा बोला।</p>
<p style="text-align:justify;">तीसरे ने कहा ‘‘आज तो शाम घिरने वाली हैं। कल सुबह ही आकर यहां जाल डालेंगे।’’</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार मछुआरे दूसरे दिन का कार्यक्रम तय करके चले गए। तीनों मछिलयों ने मछुआरे की बात सुन ली थी। अन्ना मछली ने कहा ‘‘साथियो! तुमने मछुआरे की बात सुन ली। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं हैं। खतरे की सूचना हमें मिल गई हैं। समय रहते अपनी जान बचाने का उपाय करना चाहिए। मैं तो अभी ही इस जलाशय को छोड़कर नहर के रास्ते नदी में जा रही हूं। उसके बाद मछुआरे सुबह आएं, जाल फेंके, मेरी बला से। तब तक मैं तो बहुत दूर अटखेलियां कर रही होऊंगी।’’</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यु मछली बोली ‘‘तुम्हें जाना हैं तो जाओ, मैं तो नहीं आ रही। अभी खतरा आया कहां हैं, जो इतना घबराने की जरुरत है हो सकता है संकट आए ही न। उन मछुआरों का यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो सकता है, हो सकता हैं रात को उनके जाल चूहे कुतर जाएं, हो सकता है। उनकी बस्ती में आग लग जाए। भूचाल आकर उनके गांव को नष्ट कर सकता हैं या रात को मूसलाधार वर्षा आ सकती हैं और बाढ में उनका गांव बह सकता हैं। इसलिए उनका आना निश्चित नहीं हैं। जब वह आएंगे, तब की तब सोचेंगे। हो सकता हैं मैं उनके जाल में ही न फंसूं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">यद्दी ने अपनी भाग्यवादी बात कही ‘‘भागने से कुछ नहीं होने का। मछुआरों को आना हैं तो वह आएंगे। हमें जाल में फंसना हैं तो हम फंसेंगे। किस्मत में मरना ही लिखा हैं तो क्या किया जा सकता हैं?’’</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार अन्ना तो उसी समय वहां से चली गई। प्रत्यु और यद्दी जलाशय में ही रही। भोर हुई तो मछुआरे अपने जाल को लेकर आए और लगे जलाशय में जाल फेंकने और मछलियां पकड़ने । प्रत्यु ने संकट को आए देखा तो लगी जान बचाने के उपाय सोचने। उसका दिमाग तेजी से काम करने लगा। आस-पास छिपने के लिए कोई खोखली जगह भी नहीं थी। तभी उसे याद आया कि उस जलाशय में काफी दिनों से एक मरे हुए ऊदबिलाव की लाश तैरती रही हैं। वह उसके बचाव के काम आ सकती हैं। Fish Story</p>
<p style="text-align:justify;">जल्दी ही उसे वह लाश मिल गई। लाश सड़ने लगी थी। प्रत्यु लाश के पेट में घुस गई और सड़ती लाश की सड़ांध अपने ऊपर लपेटकर बाहर निकली। कुछ ही देर में मछुआरे के जाल में प्रत्यु फंस गई। मछुआरे ने अपना जाल खींचा और मछलियों को किनारे पर जाल से उलट दिया। बाकी मछलियां तो तड़पने लगीं, परन्तु प्रत्यु दम साधकर मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही। मछुआरे को सड़ांध का भभका लगा तो मछलियों को देखने लगा। उसने निश्चल पड़ी प्रत्यु को उठाया और सूंघा ‘‘आक! यह तो कई दिनों की मरी मछली हैं। सड़ चुकी हैं।’’ ऐसे बड़बड़ाकर बुरा-सा मुंह बनाकर उस मछुआरे ने प्रत्यु को जलाशय में फेंक दिया। Fish Story</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यु अपनी बुद्धि का प्रयोग कर संकट से बच निकलने में सफल हो गई थी। पानी में गिरते ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुंचकर जान की खैर मनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">यद्दी भी दूसरे मछुआरे के जाल में फंस गई थी और एक टोकरे में डाल दी गई थी। भाग्य के भरोसे बैठी रहने वाली यद्दी ने उसी टोकरी में अन्य मछलियों की तरह तड़प-तड़पकर प्राण त्याग दिए। Fish Story</p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Sep 2024 16:32:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजा और खरगोश</title>
                                    <description><![CDATA[Story: बहुत पुरानी बात है। मॉरिशस में एक राजा रहता था। दुनिया के तमाम आलसी राजाओं की तरह वह राजा भी आलसी था और नहाता नहीं था। न नहाने के कारण उसके शरीर पर मैल की मोटी परत जम गयी। एक बार उसका शरीर खुजलाने लगा। इससे शरीर पर दाने निकल आए। राजा खुजली, दर्द […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/the-king-and-the-rabbit-story/article-60477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/rabbit-story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: बहुत पुरानी बात है। मॉरिशस में एक राजा रहता था। दुनिया के तमाम आलसी राजाओं की तरह वह राजा भी आलसी था और नहाता नहीं था। न नहाने के कारण उसके शरीर पर मैल की मोटी परत जम गयी। एक बार उसका शरीर खुजलाने लगा। इससे शरीर पर दाने निकल आए। राजा खुजली, दर्द और दुर्गंध से परेशान हो उठा। तब राजवैद्य को बुलाया गया। राजवैद्य ने जांचकर बताया, ‘आपको नगर से बाहर किसी स्वच्छ पानी के तालाब में स्नान करना चाहिए।’</p>
<p style="text-align:justify;">नगर से बाहर एक अच्छा सा तालाब खोजा गया। राजा को तालाब दिखाया गया। राजा ने तालाब देखने के बाद उसमें नहाने की सहमति व्यक्त की। तय हुआ कि कल प्रात:काल राजा तालाब में स्नान करेंगे। दूसरे दिन राजा अपने सहायकों व सेवकों के साथ नहाने को तालाब पहुंचे तो उन्हें यह देखकर बड़ी निराशा हुई कि तालाब का पानी गंदला था। इसका मतलब है कोई जानवर उसमें नहाकर गया है क्योंकि कल शाम तक तो तालाब का पानी एकदम साफ था। Story</p>
<p style="text-align:justify;">तय हुआ कि कल सुबह स्नान किया जाएगा। कोई तालाब के पानी को गंदा न करे, इसके लिए तीर-धनुषधारी एक पहरेदार की तालाब पर नियुक्ति कर दी गई। रात भर पहरेदार तालाब के चारों ओर घूम-घूमकर पहरा देता रहा पर रात भर कोई जानवर या मनुष्य नहाने को तो क्या पानी पीने तक को नहीं आया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रात: होने वाली थी। थकाहारा पहरेदार एक जगह बैठा ऊंघ रहा था। तभी एक बड़ा-सा खरगोश उसके पास आया। उसने नमस्ते की। फिर उसने कहा, ‘आप काफी थक गये होंगे। मेरे पास ऊंची पहाड़ियों से लाया गया बड़ा शानदार शहद है। इसके गुण और स्वाद तो दुनिया के सभी शहदों से श्रेष्ठ हैं। अगर आप खाना पसंद करें तो मैं थोड़ा-सा आपको दे सकता हूं। खाते ही आपके शरीर में शक्ति-फुर्ती का संचार होगा।’</p>
<p style="text-align:justify;">शहद की बात सुनकर पहरेदार के मुंह में पानी आ गया। उसने खरगोश से शहद लिया और चाट गया। कुछ ही देर में उसे गहरी नींद आ गयी। खरगोश बड़ा चालाक और शैतान था। वह नित्य तालाब में मस्ती से स्नान करता था। वह नहीं चाहता था कि राजा तालाब को गंदा करे। उसने पहरेदार को नशीला रस शहद में मिलाकर दिया था ताकि पहरेदार बेसुध हो जाए। इसके बाद खरगोश ने तालाब में जी भरकर स्नान किया और दिन से ज्यादा उछल कूद मचाई कि पानी अधिक गंदा दिखे। Story</p>
<p style="text-align:justify;">जब राजा स्नान करने पहुंचा तो पानी गंदा दिखा और पहरेदार सोता हुआ। उसे जगाकर डांट-फटकार लगाई तो पहरेदार ने अपने साथ घटी घटना का ब्यौरा कह सुनाया। राजा ने अपने कर्मचारियों को आदेश दिया कि उस शैतान खरगोश को पकड़ कर लाया जाए। आसपास के क्षेत्र और जंगल सैनिकों ने छान मारे मगर खरगोश कहीं न मिला।</p>
<p style="text-align:justify;">खरगोश कैसे पकड़ा जाए, इस के लिए सब लोग राजा के समक्ष बैठे विचार विमर्श कर रहे थे। न तो बैठक में कोई ठीक-सा सुझाव आया, न किसी ने खरगोश को पकड़ने की जिम्मेदारी ली। राजा बड़ा खिन्न था। तभी वहां एक कछुआ आया। कछुए ने राजा से कहा, महाराज, अगर आप मुझे आज्ञा दें तो मैं खरगोश को पकड़वा सकता हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी हैरत से कछुए को देखने लगे। राजा आश्चर्य से बोला, ‘तू….! तू खरगोश को पकड़वाएगा।’<br />
कछुआ बोला, ‘हां महाराज, अगर आप चाहते हैं कि खरगोश पकड़ा जाए तो आप पहरा हटा लें। पहरेदार की कुर्सी यहीं रहने दें। आज पहरा मैं दूंगा।’</p>
<p style="text-align:justify;">राजा बोला, ‘ठीक है, भाई, तुझे भी आजमा लेते हैं।’ यह कहने के बाद राजा ने बैठक समाप्त कर दी। सभी अपने घर चले गये।</p>
<p style="text-align:justify;">रात को कछुए ने मजबूती से चिपकाने वाला गोंद कुर्सी के ऊपर और नीचे पायों पर लगा दिया। फिर वह कुर्सी के पायों के नीचे घुसा। कुर्सी के पाए उसकी पीठ पर मजबूती से चिपक गये। कछुआ फिर चैन की नींद सो गया।<br />
सुबह होने से पहले ही खरगोश आया। इधर-उधर दूर तक उसने देखा। चौकीदार कहीं नजर न आया। खाली कुर्सी देखकर वह और खुश हुआ। वह उछलकर कुर्सी पर चढ़ बैठा। वह ठीक से चिपक गया पर इस बात का उसे पता न चला। उसके कुर्सी पर बैठने से कछुए की नींद खुल गयी। उसने कुर्सी की ओर देखा। खरगोश को बैठा पाकर वह चल दिया। अब कुर्सी साथ जा रही थी। Story</p>
<p style="text-align:justify;">खरगोश कुर्सी के चलने से घबरा गया। उसने उतरना चाहा तो हाथ-पैर कुर्सी से अलग न हुए। उसने नीचे की ओर झुककर देखा। कछुए ने कहा, ‘आराम से बैठे रहो। तुम्हें मैं राजा के पास ले जा रहा हूं।’ खरगोश ने बहुतेरा जोर लगाया लेकिन कुर्सी से खुद को छुड़ा न पाया। उसने कछुए को डराया, धमकाया और ललचाया भी पर कछुआ उसे छोड़ने को तैयार न हुआ। उसने अपने चलने की गति तेज कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">जब कछुआ राजा के पास पहुंचा तो वे तालाब पर जाने के लिए चलने वाले थे। राजा और सभी कर्मचारी कछुए, खरगोश और कुर्सी को देखकर दंग रह गये। राजा ने खरगोश को मारने का आदेश दिया लेकिन कछुए की अनुनय-विनय पर उसे चेतावनी देकर रिहा कर दिया गया। कछुए व खरगोश की बातें सुनकर राजा ने कछुए को इनाम दिया। फिर रोजाना नहाने का संकल्प लिया। Story</p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jul 2024 17:47:54 +0530</pubDate>
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                <title>गुरु प्रेम अमूल्य वस्तु</title>
                                    <description><![CDATA[Guru Prem प्रात: काल का समय था। वायु पेड़ों के पत्तों से खेल रही थी। भोर का नभ पूर्व में पहाड़ियों के काले बादलों से ढका था। पक्षियों की चहचहाट सारे वातावरण को जगाने का प्रयत्न कर रही थी। फूलों के पराग की महक संपूर्ण सृष्टि को मदमस्त बना रही थी। ऐसे खुशमिजाज प्राकृतिक परिवेश […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/guru-love-priceless-thing/article-60469"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/guru-prem.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Guru Prem प्रात: काल का समय था। वायु पेड़ों के पत्तों से खेल रही थी। भोर का नभ पूर्व में पहाड़ियों के काले बादलों से ढका था। पक्षियों की चहचहाट सारे वातावरण को जगाने का प्रयत्न कर रही थी। फूलों के पराग की महक संपूर्ण सृष्टि को मदमस्त बना रही थी। ऐसे खुशमिजाज प्राकृतिक परिवेश में गुरु जी अपने समक्ष उपस्थित शिष्य-मंडली को अपनी अलौकिक वाणी से समझा रहे थे। नगरी शोरगुल से दूर उस पवित्र स्थल पर गुरु जी की मधुरमयी वाणी सारे आश्रम को प्रेम की धारा में डुबो रही थी। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी बोले-‘‘प्रिय वत्सों, हमारी देह और प्रेम में से सबसे पहले परमपिता ने प्रेम भाव को बनाया था और बाद में मानव तन का सृजन किया। ईश्वर ने प्रेम को इसलिए उपजा क्योंकि प्रेम में वह मालिक स्वयं प्रकट रूप में विराजमान है। इसलिए यदि हमें तन को त्यागने के बदले प्रभु प्रेम की एक क्षणिक झलक भी मिलती है तो ग्रहण कर लेना चाहिए क्योंकि प्रभु प्रेम का वह क्षणिक आनंद हमारी आत्मा का उद्धार है।’’ गुरु जी की इस ईश्वरीय वाणी को एक नवागंतुक सुन रहा था। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">वह आजादगढ़ का राजकुमार था जो कई महीनों से शांति की तलाश में घूम रहा था। उस रात उसने आश्रम में ही अपनी रात गुजारी। राजकुमार का नाम उद्दंड बहादुर था। वह गुरु जी के समीप आकर करबद्ध हो विनम्र वाणी से बोला, ‘‘हे प्रेम पुंज गुरु जी! मैंने आपकी वाणी में शांति की झलक तथा प्रेम की ईश्वरीय धारा बहती हुई देखी है। अत: हे दीनबंधु! मुझे भी अपने पवित्र प्रेम की एक किरण बख्श कर अपनी शिष्य-मंडली में शामिल करने की अनुकंपा करें।’’</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी ने उनकी विनती सुनकर पूछा-‘‘हे नवयुवक! तुम कौन हो और यहाँ आश्रम में कब आए?’’<br />
‘‘हे गुरु जी! मैं आजादगढ़ का राजकुमार हूँ। मेरा नाम उद्दंड बहादुर है। मेरा राज्य ईर्ष्या की आग में जल रहा है। उस ईर्ष्या की आग को शांत करने हेतु मैं शांति की टोह में निकला हूँ ताकि मैं स्वयं शांति पाकर राज्य पर भी शांति नीर छिड़क कर ईर्ष्या अग्नि को बुझा सकूँ।’’ नवागंतुक ने झुककर अपने उद्गार प्रकट किए।<br />
‘‘इसके लिए परीक्षा ली जाएगी।’’-गुरु जी गंभीर वाणी में बोले</p>
<h3 style="text-align:justify;">‘‘मैं तैयार हूँ।’’-राजकुमार ने सविनम्र कहा | Guru Prem</h3>
<p style="text-align:justify;">‘‘हे उद्दंड बहादुर! यदि तुम दुनिया की सबसे अमूल्य वस्तु प्राप्त करके हमारे पास ले आओ तो हम तुम्हें अपनी प्यारी शिष्य-मंडली में शामिल कर लेंगे व शांति प्राप्ति का मूल माध्यम गुरुमंत्र तुम्हें बख्श देंगे।’’</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी की शर्त का उत्तर ढूँढने के लिए राजकुमार उद्दंड बहादुर तुरंत आश्रम से निकल पड़ा। वह जंगलों, पहाड़ों, उजाड़ों और वीरानों को पार करता हुआ एक छोटे से गाँव के समीप से गुजर रहा था। भूख-प्यास के कारण शरीर जर्जर कंकाल-सा नजर आ रहा था। वह गाँव के शमशानघाट के पास एक भारी विशालकाय बरगद के पेड़ के नीचे कुछ समय तक बैठ पाया था कि उसे शमशान की ओर से रोने की ऊँची-ऊँची आवाजें सुनाई दीं। उसने अपनी पुतली शमशानघाट की ओर घुमाने पर देखा कि लगभग 20 वर्ष के एक युवक की गोदी में उसी के हमउम्र का एक शव पड़ा है। लोगों की भीड़ उसके चारों ओर खड़ी है। कुछ समय उपरांत शव को अंत्येष्टि के लिए शैया पर रखकर मुखाग्नि दे दी गई। अग्नि की लपटें ऊँचाई को छूने लगीं। तभी एकाएक दूसरा युवक भी उस अग्नि में कूद गया और देखते ही देखते वह 20 वर्षीय युवक भी उन प्रचंड लपटों में स्वाह हो गया। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘यह दूसरा नौजवान आग की इन प्रचंड लपटों में क्यों समा गया?’’-उद्दंड बहादुर ने भीड़ में से एक व्यक्ति से पूछा<br />
‘‘ये दोनों गहरे मित्र थे। जन भलाई के कामों में हमेशा आगे रहते थे और बड़े-बुजुर्गों को बहुत सम्मान करते थे। इन्होंने साथ मरने-जीने की कसम खा रखी थी। इसलिए दूसरा अपने मित्र का वियोग सहन न कर सका और उसके साथ एक ही शैया में समा कर अपनी पक्की दोस्ती का प्रमाण दे गया। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">वाह, क्या दोस्ती थी, बिल्कुल पूजने लायक!’’-व्यक्ति ने नम आँखों को पोंछते हुए कहा।<br />
कुछ समय बाद भीड़ अपने-अपने घर को चली गई तथा दोनों युवकों की देह राख ठंडी हो गई। उद्दंड बहादुर उनकी देह से बनी राख उठाकर गुरु जी के पास पहुँचा। उसने गुरु जी को दोनों युवकों का किस्सा सुनाया व उनकी देह की राख गुरु जी के चरणों में रखते हुए कहा-‘‘गुरु जी, दोनों युवकों की प्रेम से सनी ये भस्म मुझे दुनिया की सबसे अमूल्य वस्तु लगी। कृपया मेरी ओर से इस अमूल्य वस्तु को स्वीकार करें।’’</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी ने उसकी हिम्मत को बल देते हुए कहा-‘‘राजकुमार, तू वास्तव में बहादुर है परंतु अमूल्य वस्तु कोई और भी तो हो सकती है। जाओ, और प्रयत्न करो।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उद्दंड बहादुर को शांति की चाह थी। इसलिए वह पुन: अपने उद्देश्य की ओर चल पड़ा। लगातार कई दिन भटकने के बाद वह एक राज्य की राजधानी में पहुँचा। उसने वहाँ देखा कि राजा ने एक प्रसिद्ध नामी हत्यारा पकड़ा था जो बच्चों के कलेजे निकालकर खाया करता था। उसकी दहशत से उस राज्य के सभी नागरिकों ने अपने बच्चों को कैद सा कर लिया था। आज उसी हत्यारे को हत्थे पर चढ़ाया जाना था। राजा के जल्लाद उस हत्यारे को हत्थे पर चढ़ाने हेतू फाटक तक ले गए व फाटक उसके गले में डाल दिया गया। उसी समय एक छोटा-सा बच्चा मैदान में उछल-कूद कर रहा था। उसकी माँ उसे पकड़ने की कोशिश करती व बच्चा पुन: मैदान के बीच उछल-कूद करने लग जाता। इतने में मौत की सजा पाने से पूर्व वह नामी हत्यारा बोला-‘‘हे राजा! मैं अंतिम समय दो मिनट के लिए इस मासूम बच्चे से मिलना चाहता हूँ, इसे गले लगाने की इच्छा है। कृपया स्वीकार करें।’’</p>
<h3 style="text-align:justify;">‘‘आज्ञा है’’-राजा ने हत्यारे की आखिरी इच्छा पूरी करते हुए कहा | Guru Prem</h3>
<p style="text-align:justify;">जल्लादों ने दो मिनट के लिए हत्यारे को छोड़ दिया। उसने बच्चे के पास जाकर उसे गोद में उठाकर बहुत प्यार किया व अपने बचपन के दिनों को याद करने लगा। वह भी बचपन में स्वतंत्रतापूर्वक उछल-कूद करता था। उसकी माँ उसके कौतुक देख खुशी से भर जाती थी। अपने बचपन के उन दृश्यों को याद करके हत्यारे की आँखों से आँसू बहने लगे। जो व्यक्ति कठोर शिला-सम हृदय वाला, बच्चों के कलेजों को निकाल कर खाने वाला तथा जो उनकी मौत एक झटके में कर देता था, वह आज पश्चाताप के आँसू बहा रहा था। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">उद्दंड बहादुर उसके पास गया और उसके गालों पर गिरे पश्चाताप की आग से तृप्त एक बूंद आँसू को उठाकर एक छोटी डिब्बी में रख लिया। इसके पश्चात हत्यारे को हत्थे पर चढ़ाकर मौत की नींद सुला दिया गया। उद्दंड बहादुर आँसू के उस मोती को लेकर गुरु जी के पास पहुँचा। गुरु जी को पूरी कथा सुनाते हुए आँसू रूपी अमूल्य वस्तु को उनके कर-कमलों में रख दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘राजकुमार! तुम बलवान होने के साथ-साथ बुद्धिमान भी हो। वास्तव में तुम शांति की झलक के पुजारी हो, परंतु दुनिया की अमूल्य वस्तु कोई और भी तो हो सकती है। इसलिए हम तुम्हें एक और अवसर देते हैं। यदि तुम इस बार अमूल्य वस्तु ढूँढ सके तो शांति प्राप्ति के गुरुमंत्र के अधिकारी बनोगे और यदि असफल हुए तो…………….।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘नहीं, गुरु जी, नहीं, इस बार मैं आपकी कृपा से दुनिया की अमूल्य वस्तु जरूर प्राप्त करूँगा क्योंकि मुझे आपके स्वर में, आपकी फटकार में उस वस्तु की चमक नजर आ रही है। अत: हे गुरु जी! मुझे लक्ष्य प्राप्ति हेतु जाने की आज्ञा दीजिये।’’<br />
‘‘जाओ और विजयी होकर लौटों, गुरुमंत्र पाकर स्वयं व अपनी प्रजा का भला करो।’’-गुरु जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी की आज्ञा लेकर उद्दंड बहादुर पुन: अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गया। कई दिनों तक घूमता हुआ अनजाने में वह दूसरे राज्य की सीमा में प्रवेश कर गया। शरीर का अंग-अंग थकान से चूर-चूर हो गया था। होंठ प्यास से फट गए थे। आँखों की लाली व चेहरे की चमक मलीन-सी हो गई थी। तन पर शाही पोशाक की जगह चीथड़े हवा में लहरा रहे थे। उम्मीद टूट सी गई थी। अमूल्य वस्तु के ख्यालों में पत्थरों में ठोकरें मारता व ज्यों ही उस राज्य की सीमा पार कर कुछ दूरी पर आगे बढ़ा तो उसने देखा कि वहाँ दो गुटों का आपस में द्वंद्व चल रहा था। एक गुट प्यार की भीख माँग रहा था तो दूसरा उग्रता से अपनी बुद्धिहीनता का परिचय दे रहा था। प्रेम भिखारी समूह किसी समाज सुधार प्रवर्तक गुरु का शिष्य था। उनके प्रेरणा स्रोत समाज से बुराई निकालने का भरसक प्रयास कर रहे थे और सामाजिक बुराई से जुड़ा उग्र समूह उनके मार्ग में बाधक बन रहा था। Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">इस कारण उग्र समूह उस गुरु व उसके प्रेम पुजारी जनमानस का विरोध कर रहा था। अत: दोनों समूहों में देखते ही देखते युद्ध हो गया और दोनों ओर से लोगों के सिर धड़ से अलग हो जमीन पर गिरने लगे। कुछ ही समय में चारों ओर लाशें ही लाशें बिछ गर्इं। उन्हीं लाशों में पड़ा एक घायल व्यक्ति पानी-पानी पुकार रहा था। राजकुमार उद्दंड बहादुर जैसे ही उसके पास पहुँचा तो देखा कि उसका तन खून से लथपथ है। शरीर का सारा रक्त बह गया है। एक-आध बूंद कभी-कभी गिर पड़ती थी। उद्दंड बहादुर ने उसे अपनी गोद का सहारा दिया और उससे पूछा-‘‘हे वीर! तुम कौन हो? इस तरह लड़ते-लड़ते शहीद होने का क्या प्रयोजन है?’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘हमने अपने पीरो-मुर्शिद गुरु जी की सेवा में अपने नश्वर तन को लगाकर गुरु भक्ति की परंपरा का निर्वाह किया है।’’ यह कहते-कहते उसके तन से लहू की अंतिम बूंद बह निकली। प्रेम भिखारी समूह का वह वीर सैनिक शहीद हो गया। खून के उस अंतिम कतरे को उद्दंड बहादुर ने अपनी अंगुली पर उठाकर डिब्बी में रख लिया और बिजली की गति से चलकर अपने गुरु के समक्ष उपस्थित हो गया। उद्दंड बहादुर ने गुरु जी को सारी घटना सुनाकर उस वीर उपासक की अंतिम लहू की बूंद गुरु जी को देकर कहा, ‘‘हे गुरु जी! अपने गुरु के लिए कुर्बान होने वाले शहीद के इस खून के कतरे से बढ़कर मुझे दुनिया की और कोई अमूल्य वस्तु नजर नहीं आती। कृपया इसे स्वीकार करें।’’</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी ने उद्दंड बहादुर के गुरु प्रेम को देखकर उसे अपनी छाती से लगा लिया तथा उसे गुरुमंत्र प्रदान करते हुए वचन फरमाए-‘‘हे वत्स, तुम और तुम्हारा राज्य शांति की शैया पर शयन करेगा!’’ Guru Prem</p>
<p style="text-align:justify;">गुरु जी की अलौकिक वाणी से विभूषित हो उद्दंड बहादुर अपने राज्य आजादगढ़ लौटकर शांति संपन्न राज करने लगा।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Sahitya: विलासिता का दुख!" href="http://10.0.0.122:1245/the-misery-of-luxury/">Sahitya: विलासिता का दुख!</a></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/guru-love-priceless-thing/article-60469</link>
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                <pubDate>Mon, 29 Jul 2024 16:10:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>कविता &amp;#8211; माँ मैं फिर आऊंगा</title>
                                    <description><![CDATA[Kavita: तेरे आँगन को, किलकारियों से फिर महकाऊँगा ! तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा बेशक दुनिया से विदा हो चला, पर तेरे आस – पास सदा मैं रहूंगा, झेली हो छाती पर गोलियां कितनी, पर दर्द भरी कहानियाँ तुझसे न कहूंगा ! मत रोना मेरी कब्र पर, किस्सा फिर कभी सुनाऊंगा। तूं घबरा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/mother-i-will-come-again/article-59693"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/two-soldiers-martyred.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Kavita: तेरे आँगन को, किलकारियों से फिर महकाऊँगा !<br />
तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक दुनिया से विदा हो चला, पर तेरे आस – पास सदा मैं रहूंगा,<br />
झेली हो छाती पर गोलियां कितनी, पर दर्द भरी कहानियाँ तुझसे न कहूंगा !<br />
मत रोना मेरी कब्र पर, किस्सा फिर कभी सुनाऊंगा।<br />
तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा</p>
<p style="text-align:justify;">तेरे हाथों की खुशबूदार रोटियां, मुझे अब भी लुभाती हैं<br />
खेतों की वो पगडंडियां, मुझे घर का पता बताती हैं ।<br />
सपने में तुझसे कभी, मीठी बातें करके चला जाऊंगा<br />
तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा</p>
<p style="text-align:justify;">तेरे अहसानों का कर्ज, कभी मैं भूल नहीं पाउँगा<br />
तेरे ममता के किस्से, माँ मैं स्वर्ग में भी सुनाऊंगा<br />
तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा</p>
<p style="text-align:justify;">तेरे हाथों का चूरमा जब, सरहद पे मैंने खाया था ,<br />
उसी ताकत से मैंने, आतंकी मार गिराया था ।<br />
बचपन की वो लोरियां, साथी फौजीयों को सुनाऊंगा<br />
तूं घबरा मत ! माँ मैं फिर आऊंगा</p>
<p style="text-align:justify;">माँ मैं मरा नहीं, कुछ पलों के लिए सो गया हूँ ,<br />
जिन्दा रहूँगा हर दिल में, मैं अमर हो गया हूँ।<br />
क्यों होते हैं फौजी शहीद, किस्सा ये फिर कभी सुनाऊंगा<br />
तूं घबरा मत माँ, मैं फिर आऊंगा ।।                                                                                                                                                                                                <strong>लेखक – कुलदीप स्वतंत्र</strong></p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/mother-i-will-come-again/article-59693</link>
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                <pubDate>Thu, 11 Jul 2024 16:03:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>एक झूठी दिलासा</title>
                                    <description><![CDATA[Jhuthi Dilasa Story: टोनी के पापा चले गए इस संसार से जब तीन साल का था टोनी। ‘‘सबके पापा हैं। मेरे पापा कहाँ हैं। आते नहीं हैं। रामू के पापा तो चले गए थे वो तो आ गए। मिठाइयाँ लाए थे। टॉफियाँ लाए थे। मेरे पापा पता नहीं कब आयेंगे। आयेंगे तो खूब बात करूँगा। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/jhuthi-dilasa-story/article-59348"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/jhuthi-dilasa-story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Jhuthi Dilasa Story: टोनी के पापा चले गए इस संसार से जब तीन साल का था टोनी। ‘‘सबके पापा हैं। मेरे पापा कहाँ हैं। आते नहीं हैं। रामू के पापा तो चले गए थे वो तो आ गए। मिठाइयाँ लाए थे। टॉफियाँ लाए थे। मेरे पापा पता नहीं कब आयेंगे। आयेंगे तो खूब बात करूँगा। पूछूँगा जल्दी क्योंं नहीं आते हो। जल्दी आ जाया करिए। बहुत याद आती हैं।’’ मम्मी के पास जाकर टोनी ने कहा।</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘मम्मी, पापा कब आयेंगे। तुम तो कहती थी। पापा कमाने गए हैं। खूब पैसा लायेंगे। टाफियाँ लायेंगे। सबके पापा बहुत अच्छे हैं। पापा हम लोगों को याद नहीं करते हैं। गंदे पापा हैं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘नहीं बेटे, छुट्टी नहीं है। छुट्टी मिलेगी। आ जायेंगे। तेरे पापा तुम्हें याद करते हैं। कहते हैं। आयेंगे तो टोनी से खूब बात करेंगे। टोनी मेरा बड़ा हो गया है। खूब टॉफियाँ लायेंगे . . .’’ मम्मी ने बेटे को झूठा दिलासा देते हुए कहा। माहौल भयानक पीड़ा का एहसास कराने वाला हो गया था। Jhuthi Dilasa Story</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘मम्मी तुम रो रही हो, पापा आयेंगे तब क्यों रो रही हो। टॉफियाँ पापा लायेंगे तो तुमको ढेर सारी टॉफियाँ पापा से कह कर दिला दूँगा,’’ टोनी मम्मी को चुप कराते हुए बोला। माँ टोनी को खींच कर अपने बाँहों में भर कर सिसकने लगी। टोनी भी माँ को रोते देख कर रोने लगा। गमगीन माहौल हो गया था। वेदना मुखर हो गई थी। चेतना शून्य हो गई थी। करुण बहाव झर-झर बह रहे थे। रुदन बेधता हुआ हृदय को चीर कर रख दिया था। झूठे दिलासे दिलाते-दिलाते माँ टूट गई।</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘टोनी अब तेरे पापा कभी नहीं आयेंगे। तेरे पापा भगवान के घर चले गए हैं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘मम्मी, मैं भगवान से कह दूँगा कि मेरे पापा को भेज दो। भगवान भेज देंगे। नहीं भेजेंगे तो बड़ा हो जाऊँगा तो भगवान से जरूर छीन लाऊंगा, मम्मी!’’</p>
<p style="text-align:justify;">बेटे के इस भोलेपन की बातें सुनकर माँ बेटे को देखती रह गई। अनाथ टोनी को माँ थपकियाँ देने लगी। आसमान की तरफ एकटक निहारने लगी। भावना शून्य हो गई। एक खामोश पल हो गया था। प्रकृति भी मौन हो गई थी।<br />
<strong>                                                                                                          -जयचन्द प्रजापति ‘जय’</strong></p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/jhuthi-dilasa-story/article-59348</link>
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                <pubDate>Wed, 03 Jul 2024 16:27:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कहानी: आत्म-मंथन</title>
                                    <description><![CDATA[Story: सुनो सखी रेवा, कैसा जमाना आ गया है? कैसी विक्षिप्त मानसिकता में जी रहे हैं लोग? कैसी विक्षिप्त चाहत है लोगों की? औरत ही जन्म का आधार होती है लेकिन जन्म का आधार ही आधार को जन्म नहीं देना चाहता। मीनू मेरे पड़ोस में रहती है। तीन बहनों में सबसे बड़ी। बड़ी होने का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/story-introspection/article-56148"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: सुनो सखी रेवा, कैसा जमाना आ गया है? कैसी विक्षिप्त मानसिकता में जी रहे हैं लोग? कैसी विक्षिप्त चाहत है लोगों की? औरत ही जन्म का आधार होती है लेकिन जन्म का आधार ही आधार को जन्म नहीं देना चाहता।</p>
<p style="text-align:justify;">मीनू मेरे पड़ोस में रहती है। तीन बहनों में सबसे बड़ी। बड़ी होने का मतलब जिम्मेदारियों को ढोना।<br />
‘‘देखो मीनू मेरे जाने के बाद दादी को परेशान नहीं करना और नीनू और पिंकी भी आपस में झगड़ें नहीं। सुबह जल्दी उठना। दोनों बहनों को भी उठा देना। सही समय पर तैयार हो कर स्कूल जाना। अपना होमवर्क पूरा करना और देखना नीनू और पिंकी भी अपनी पढ़ाई ठीक से करें। हम लोग बस दो दिन में ही आ जायेंगे।’’</p>
<p style="text-align:justify;">मीनू बड़े ध्यान से माँ की बातें सुन रही थी। तीनों बहनों में सबसे बड़ी होने के कारण जब भी माँ कहीं जाती, सारी जिम्मेदारियाँ उसके नन्हे कंधों पर डाल जाती। Story</p>
<p style="text-align:justify;">पिछली बार माँ और पिताजी इंदौर गये थे तब भी इसी तरह की ढेर सारी हिदायतें उसे मिली थीं। जाते वक़्त माँ कितनी खुश थी लेकिन लौटने पर उतनी ही उदास। मीनू को कुछ समझ नहीं आया इस बार इंदौर जाने के एक सप्ताह पहले से रोज दोपहर को दादी माँ के साथ बाहर जाती-कभी इस मंदिर तो कभी उस मंदिर, कभी किसी दरगाह के बाबा के पास तो कभी किसी तांत्रिक के पास। पिताजी के आॅफिस जाने के बाद दादी और माँ खाना खाकर दो-तीन घंटे के लिए चली जातीं फिर लौट कर आपस में बातें करतीं-‘‘भगवान ने चाहा तो इस बार मुराद पूरी हो जाएगी।’’</p>
<p style="text-align:justify;">इंदौर जाते समय तीनों बेटियों को बहुत प्यार करती, लेकिन लौट कर तीनों बहनों को बात-बात पर डाँटती, उनकी शक्ल भी देखना पसन्द नहीं करती, पास जाने पर झिड़क देती। फिर दो दिन बाद पिताजी के साथ अस्पताल जाती, शाम तक लौटती, फिर तीन-चार दिन बिस्तर पर पड़ी रहती। इन दिनों दादी, माँ की खूब सेवा करती। उनके के लिये खूब मेवा डाल कर घी-गुड़ के लड्डू बनाती, घर का कोई काम भी नहीं करने देती। रिश्तेदार और पड़ोस की औरतें आ-आ कर मीनू की माँ का हाल-चाल पूछतीं, फिर आश्वासन सा देतीं, ‘‘मीनू की माँ कोई बात नहीं, इस बार नहीं तो अगली बार। अभी कौन-सी तुम्हारी उमर निकल गई है। एक-दो बार तो और कोशिश कर सकती हो। तकदीर में होगा, तो लड़का जरूर होगा।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘एक मोड़ा के चक्कर में तीन-तीन मोड़ियाँ हो गईं। राम जाने इतनी महँगाई में कैसे ब्याही जाएँगी? पर बहू तुम चिंता न करो, ऊपर वाले ने चाहा तो एक मोड़ा भी हो जायेगा। आखिर वंश भी तो चलना चाहिए।’’ फिर हिकारत भरी नजरों से मीनू और उसकी बहनों की ओर देख कर कहती, ‘‘ये सब तो पराया धन हैं, चलीं जाएँगी, बाप को लूट कर।’’ इस तरह की बातें सुन कर छोटी बहनों के पल्ले चाहे कुछ न पड़ा हो लेकिन मीनू अवश्य समझने लगी थी और अपने लड़की होने की कुंठा भी धीरे-धीरे डसने लगी थी। अब वह अकेले में बैठकर गम्भीरता से इस बारे सोचने लगी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक साल यूँ ही बीत गया। इस बार उसने दसवीं कक्षा में प्रवेश किया था। बोर्ड की परीक्षा होनी थी इसीलिए इस बार उसे ज्यादा मेहनत करनी थी लेकिन अपने ऊपर अचानक आ जाने वाली जिम्मेदारियों के कारण वह चाह कर भी उतनी मेहनत नहीं कर पा रही थी। वह चाह कर भी यह बात किसी से नहीं कह सकती। अगर वह बोर्ड की परीक्षा का हवाला देगी तो दादी गरियाने लगेगी ‘‘का होने है पढ़ाई कर के? करने तो वोई रोटी-पानी है फिर काय को अपनो हाड जला रहीं?’’</p>
<p style="text-align:justify;">मीनू मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती, ‘‘प्रभु ऐसा कोई जतन कर दो कि अच्छी तरह से पढ़ाई कर सकूँ और बोर्ड की परीक्षा में अच्छे नंबर लाकर फर्स्ट डिवीजन में पास हो सकूँ।’’</p>
<p style="text-align:justify;">भगवान ने सुन ली मीनू की बात और कर दिया जतन। स्कूल से लौटी तो देखा—दादी की पंचायत जमी है। आज की ताजा खबर पर सभी महिलायें अपने-अपने विचार प्रगट कर रहीं थीं। खबर थी, ‘‘लिंग-परीक्षण पर सरकार द्वारा रोक’’ सभी महिलायें दादी की ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिला कर मीनू की माँ के प्रति सहानभूति जता रहीं थीं। अन्त में दादी के इस वक्तव्य से सभा बरखास्त हुई, ‘‘मीनू की माँ तुम चिंता न करो। जा रोक को असर कौन आजइ से होने है-साल दो साल तो लगाई जाहें।’’ मतलब सीधा है—मीनू की माँ एकाध कोशिश कर सकती हो।</p>
<p style="text-align:justify;">मीनू की सहेली-अनुभा कई दिनों से स्कूल नहीं आ रही थी इसलिए मीनू रविवार के दिन कारण पता करने के लिए अनुभा के घर गई। वहाँ जाने पर पता चला-अनुभा की माँ को दिल का दौरा पड़ा है और उनकी हालत गम्भीर है। वे अस्पताल में भर्ती है। अनुभा के दो भाई और एक बहन और थे। भाइयों की शादी हो गई थी और वे लोग दूसरे शहर में नौकरी करते थे। अनुभा की बड़ी बहन की शादी इसी शहर में हुई इसलिए माँ के बीमार पड़ने पर उसी ने आकर घर सँभाल लिया। पिता ने दोनों भाइयों को माँ की बीमारी का हवाला देते हुए तत्काल आने के लिये कहा। बड़ा भाई अपनी पत्नी के साथ खबर मिलते ही आ गया था। एक दिन रुका, माँ को देखने अस्पताल भी गया फिर रिश्तेदारों से मिलने चला गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर रिश्तेदारों को भी तो पता चलना चाहिए कि वह माँ की कितनी फिक्र करता है, लेकिन पिता से यह नहीं कह सका, ‘‘पापा, आप दो दिन से जाग रहे है, आज माँ के पास मैं रुक जाता हूँ, आप घर जाकर आराम कर लीजिए।’’ दूसरे दिन पिता के हाथ में पाँच हजार रुपये देकर कर बोला, ‘‘माँ के इलाज में किसी तरह की कमी नहीं करियेगा। पैसों की जरूरत हो कह दीजिएगा, भेज दूँगा।’’ और दफ़्तर से छुट्टियाँ न मिलने का बहाना कर के वापस चला गया।</p>
<p style="text-align:justify;">छोटा भाई तीन दिन बाद आया। आते ही माँ से मिलने अस्पताल चला गया। फिर पिता के हाथ में पैसे थमा कर बोला-बच्चों के टैस्ट चल रहे हैं, इसलिए मधु नहीं आ सकी। और पैसों की जरूरत हो तो भेज दूँगा। बेटों के इस तरह से चले जाने से माँ को दु:ख न हो इसलिए उन्होंने खुद को और माँ को समझाया-तुम परेशान न हो राजरानी, ‘‘वे दोनों तो रुकना चाहते थे लेकिन मैंने ही उन्हें रुकने से मना कर दिया। अभी मुझे उनसे ज्यादा, तुम्हारे इलाज के लिए उनके पैसों की जरूरत है।’’ राजरानी क्या अपने पति को जानती नहीं थी। सब समझ कर धीरे से मुस्का कर उनके हाथ पर अपना हाथ रख दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">रह गई अनुभा की दीदी और अनुभा। दीदी घर सँभालती तो अनुभा घर से अस्पताल और अस्पताल से घर के चक्कर लगाया करती। दीदी के ससुराल वाले बहुत अच्छे थे। उन लोगों ने इस भाग-दौड़ में बहुत मदद की। इन्हीं परेशानियों के कारण अनुभा स्कूल नहीं आ रही थी। Story</p>
<p style="text-align:justify;">अनुभा के घर से आकर मीनू ने सारी बातें माँ को बतार्इं। बगल के कमरे में बैठे पापा आॅफिस की फाइलें निपटा रहे थे, उन्होंने भी मीनू की सारी बातें सुन ली थीं। मीनू ने अनुभा की माँ से सुनी बातें माँ को बतार्इं कि कैसे बेटों के जन्म पर घर में कितना बड़ा आयोजन किया जाता था। बेटों को जन्म देने के कारण घर-परिवार में भी उनका कितना मान बढ़ गया था जबकि पुत्री-जन्म पर बिना किसी आयोजन के रिश्तेदारों और मिलने वालों को मात्र सूचित कर दिया जाता था। आज माँ के बीमार होने पर उन्हीं भाइयों ने बाप को माँ के इलाज के लिए मात्र पैसे दे कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली। आज माँ की बीमारी में अनचाही बेटियाँ ही माँ-बाप और घर को सँभाल रहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज मीनू की माँ बिना कुछ खाये-पिये बाबूजी के साथ अस्पताल गयी। सुबह की गई शाम को लौटी। लौट कर निढाल हो कर बिस्तर पर गिर पड़ी। मीनू का मन वितृष्णा से भर गया। लेकिन… उसे अचरज तो इस बात पर हुआ जब दादी ने माँ की सेवा करना तो दूर, माँ से सीधे मुँह बात भी नहीं की। Story</p>
<p style="text-align:justify;">आठ दिन बाद जब माँ फिर से तैयार हो कर बाबूजी के साथ अस्पताल जाने लगी तो मीनू से नहीं रहा गया, ‘‘माँ आपने देख तो लिया-अनुभा के दो-दो भाई हैं लेकिन माँ की बीमारी में सिर्फ पैसे देने आये थे, देख-भाल करने नहीं। इतना पैसा तो हम लड़कियाँ भी कमा के दे सकती हैं फिर आपको लड़के की इतनी चाह क्यों?’’</p>
<p style="text-align:justify;">माँ ने मीनू का माथा चूमते हुए कहा, ‘‘बस मैं टाँके कटवा कर आती हूँ। तू परेशान मत हो। मेरी आँखें खुल चुकी हैं।’’<br />
मुझे खुशी है कि मीनू की माँ ने आत्म-मंथन किया और निष्कर्ष निकाला कि घर संतान की किलकारियों से गूँजना चाहिए फिर वह चाहे लड़का हो या लड़की।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छा अब मैं तुमसे विदा लेती हूँ। फिर कभी आऊँगी तुमसे अपना दर्द बाँटने के लिए। तब तक मैं तुम्हारी लहरों से निनादित होती संगीतमयी ध्वनि को अपने मस्तिष्क में सँजो के रखूँगी जो सदा मुझे तुम्हारे सानिध्य का एहसास कराती रहेगी। Story</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Punjab-Haryana High Court: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हरियाणा में कच्चे कर्मचारियों को इस नीति के तहत करें नियमित" href="http://10.0.0.122:1245/regularize-raw-employees-in-haryana-under-this-policy/">Punjab-Haryana High Court: हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हरियाणा में कच्चे कर्मचारियों को इस नीति के तहत करें नियमित</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/literature/story-introspection/article-56148</link>
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                <pubDate>Mon, 08 Apr 2024 16:01:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>कहानी: बहू का दर्द</title>
                                    <description><![CDATA[Story: जाने क्यों आज अपने बेटे प्रतीक का पक्ष ले रही सीमा को मन ही मन दुख हो रहा था अपनी बहू तारा के लिए। क्योंकि वो गलत का साथ दे रही थी। ऐसे पति के साथ कोई रह भी कैसे सकता है? बस सीमा तो अपने बेटे कि उजड़ती गृहस्थी को नहीं देख पा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/daughter-in-law-pain-story/article-55445"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-03/story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: जाने क्यों आज अपने बेटे प्रतीक का पक्ष ले रही सीमा को मन ही मन दुख हो रहा था अपनी बहू तारा के लिए। क्योंकि वो गलत का साथ दे रही थी। ऐसे पति के साथ कोई रह भी कैसे सकता है? बस सीमा तो अपने बेटे कि उजड़ती गृहस्थी को नहीं देख पा रही थी इसलिए अपने बेटे की गलतियों पर पर्दा डाल रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बहू तारा ने जब सीमा के पाँव पकड़ सही का पक्ष लेने को कहा तो सीमा की रुलाई फूट पड़ी और बोली, ‘‘बेटा समय रहते अगर मैं इस बेटे का पक्ष न लेती तो आज ये दिन न देखना पड़ता। मुझे माफ कर दो।’’ तारा ने सीमा को गले लगा लिया बोली, ‘‘आप अब सही हो माँ। मेरा पक्ष ले आपने मुझे बहू से बेटी बना लिया लेकिन इन हालातों में प्रतीक के साथ रहना मुमकिन नहीं। अब छोटू पर भी इन परिस्थितियों का असर होता है। वो मुझसे अपने पापा के बारे में जो सवाल पूछता है उनका मैं क्या जवाब दूँ?’’</p>
<p style="text-align:justify;">सीमा निरुत्तर थी उससे भी कभी-कभी सहमा-सा छोटू अपने पापा के व्यवहार पर सवाल करता लेकिन उसके पास कोई जवाब न होता। नशे में प्रतीक के बहकते कदम और उसकी नशे में बोली जाने वाली गाली-गलौज करना साथ ही तारा को मारना। ये सब दिन-प्रतिदिन असहनीय होता जा रहा था फिर छोटू तो बच्चा था। Story</p>
<p style="text-align:justify;">सीमा को अब अपने बरसों पहले की गलती का अहसास हो रहा था। प्रतीक जब 20 वर्ष का होगा तब एक बार अपने दोस्तों के साथ शराब पीकर आया तब उसके पापा ने उसे बहुत डाँटा व पिटाई की तब सीमा ने बीच-बचाव किया। उसके बाद जब भी लेट आता, घर का दरवाजा खोल दो-चार बात कह सो जाती। धीरे-धीरे उसकी आदत हो गयी। कुछ वर्षों बाद प्रतीक के पापा एक दुर्घटना में चल बसे। अब उस पर कोई रोक-टोक न थी। शादी के वक़्त कुछ सँभला रहा लेकिन पुरानी आदतें इतनी जल्दी पीछा कहाँ छोड़ती हैं। वो फिर इसी राह पर चल पड़ा। रोजाना के झगड़े शुरू हो गये इसी दौरान तारा की गोद भर गई। घर का खर्च भी बढ़ गया था ऐसी स्थिति में तारा ने नौकरी ढूँढ़ ली।</p>
<p style="text-align:justify;">वो छोटू के साथ अपनी खुशियाँ ढूँढ़ने लगी लेकिन प्रतीक ने अपनी लत न छोड़ी। कई बार तारा ने अपनी सास सीमा से शिकायत की लेकिन उनके लाख समझाने पर भी वो उसी शराब के नशे में झूम रहा था। तारा ने कई बार तलाक की धमकी दी लेकिन प्रतीक पर कोई असर न हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">आज तो हद ही कर दी तारा के शराब पीने को रुपये ना देने पर मासूम छोटू के सामने तारा से मारपीट करने लगा। सीमा का बीच-बचाव भी कुछ काम न आया। छोटू सहमा-सा सब देख पलंग पर चादर से मुँह ढक लेटा था। सहमे छोटू को देख सीमा ने उसी वक़्त तारा से कहा, ‘‘कब तक इस शराबी जुआरी के साथ अपने व छोटू का जीवन बर्बाद करती रहोगी। जल्द ही कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा दो। अपने बेटे के कारण पोते का जीवन बर्बाद नहीं कर सकती। तुम भी जो सजा काट रही हो उससे मुक्त हो जाओ और अपने जीवन को नई दिशा दो। बहू मैं तुम्हारा ये दर्द और सहन नहीं कर सकती।’’ Story</p>
<p style="text-align:justify;">तारा अवाक् सी सीमा को देखती रह गई उसने सोचा भी नहीं था कि उसकी सास एक दिन उसका तलाक में साथ देगी। सीमा आज चुपचाप सी बिस्तर पर करवटें बदल रही थी तभी तारा सीमा के पास आकर बैठ गई। उसने देखा उनकी आँखें भीगी थीं और नींद आँखों से कोसों दूर थी। तारा ने चादर ओढ़ाते हुए कहा, ‘‘माँ सच आपका दिल बहुत बड़ा है। आपने मेरे व छोटू के लिए ये फैसला लेकर साबित कर दिया।’’</p>
<p style="text-align:justify;">सुबह सीमा ने तारा को अपने कंगन देकर कहा, ‘‘जब भी रुपया पैसा चाहिए, इन्हें बेच देना। मेरे बेटे के कारण बहुत कष्ट देख लिए। जा आज कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा दे।’’ तारा की आँखों में आँसू थे। वो आज समझ नहीं पा रही थी। सीमा के इस फैसले पर क्या करे! तभी सीमा ने कहा, ‘‘बेटा, अपने छोटू के बारे में सोच। प्रतीक का जीवन तो बर्बाद हो ही चुका है। उसके कारण मैं अपने पोते का जीवन बर्बाद नहीं कर सकती। जाओ वकील साहब से मैंने बात कर ली है, वो इंतजार करते होंगे।’’ अंदर के कमरे से शराबी प्रतीक बड़े आराम से उठ तारा को आवाज लगा रहा था। लेकिन नन्हा छोटू दादी से चिपक कर सो गया। तारा अपने बेटे के लिए पर्स उठाकर वकील साहब से मिलने के लिए निकल चुकी थी। Story        <strong>                                                                          -वन्दना पुरोहित</strong></p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 17 Mar 2024 15:33:06 +0530</pubDate>
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                <title>Success Story: UPSC की परीक्षा क्रैक कर बनी रेलवे अधिकारी, फिर बनी एसडीएम, यहां पढ़े हरियाणा की इस हुनहार बेटी की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[Success Story: हर स्टूडेंट जानते है कि UPSC की परीक्षा हर परिश्राओं में सबसे कठिन होती है, देश कि सबसे कठिन परीक्षाओं में से ये एक मानी जाती है। सालों की मेहनत के बाद भी लोगों को इसमें सफलता नहीं मिल पाती। लेकिन कुछ टैलेंटेड लोग इसे पास कर यह मुका हासिल कर लेते है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sach-kahoon-special-story/story-of-ias-officer-mani-arora/article-55003"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/mani-arora.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Success Story: हर स्टूडेंट जानते है कि UPSC की परीक्षा हर परिश्राओं में सबसे कठिन होती है, देश कि सबसे कठिन परीक्षाओं में से ये एक मानी जाती है। सालों की मेहनत के बाद भी लोगों को इसमें सफलता नहीं मिल पाती। लेकिन कुछ टैलेंटेड लोग इसे पास कर यह मुका हासिल कर लेते है। इस लेख में आज हम आपको एक ऐसी ही महिला अधिकारी के बारें में बताने जा रहे है, जिन्होंने UPSC परीक्षा के साथ-साथ स्टेट पीसीएस परीक्षा भी क्लियर कर लिया था, तो चलिए बताते है कौन है ये महिला अधिकारी…</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल हम बात कर रहे है IAS अधिकार मनी अरोड़ा की, जिन्हें हाल ही में मुरादाबाद में अपर नगर मजिस्ट्रेट बनाया गया है। इससे पहले मनी अरोड़ा मुरादाबाद सदर में SDM के पद पर तैनात थी। आपको बता दें कि मनी अरोड़ा हरियाणा के यमुनानगर जिले की रहने वाली है, उनके पिता कपड़े की दुकान चलाते हैं। मनी पढ़ाई में शुरू से ही काफी तेज रही हैं। उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी में MSC में दूसरा स्थान हासिल कर यह मुकाम हासिल किया था। Success Story</p>
<p style="text-align:justify;">आपको बता दें कि मनी हरियाणा के यमुनानगर जिले से आती हैं। उनके पिता कपड़े की दुकान चलाते हैं। मनी पढ़ाई में शुरू से ही तेज रही हैं। उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी में एमएससी में दूसरा स्थान हासिल कर यह मुकाम हासिल किया था। मनी के माता पिता का कहना है कि मनी का यूनिवर्सिटी का रिजल्ट देखकर उन्हें यकीन हो गया था कि वह कुछ बड़ा हासिल करेंगी। उनके पिता ने उनकी सिविल सर्विसेज की तैयारी कराने के लिए पर्सनल लोन भी लिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">बताया जा रहा है कि अधिकारी मनी अरोड़ा ने 3 बार यूपीएससी परीक्षा का अटेम्प्ट दिया था। पहले 2 बार में वह अपना रैंक से संतुष्ट नहीं थीं। जिसके बाद तीसरी बार में साल 2017 में मनी ने ऑल इंडिया रैंक 360 हासिल किया था। तब उनका सेलेक्शन बतौर IRAS अधिकारी के पद पर हुआ था। इसी बीच उन्होंने यूपीपीसीएस का भी एग्जाम दिया था। IRAS ट्रेनिंग के दौरान यूपी पीसीएस का रिजल्ट भी जारी हो गया था, जिसमें उन्होंने 24वी रैंक हासिल की थी। उनका सेलेक्शन बतौरा डिप्टी कलेक्टर हुआ था। जिसके बाद उन्होंने IRAS की नौकरी छोड़ डिप्टी कलेक्टर बनने का निर्णय ले लिया है। इंटरव्यू के दौरान मनी अरोड़ा ने कहा है कि प्रिपरेशन के दौरान पढ़ाई पर फोकस करने लिए उन्होंने सोशल मीडिया से दूरी बना ली थी। Success Story</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Team India: क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की जीत पर चाट विक्रेता खिलायेंगे फ्री चाट" href="http://10.0.0.122:1245/chaat-vendors-will-serve-free-chat-on-indias-victory-in-cricket-world-cup/">Team India: क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारत की जीत पर चाट विक्रेता खिलायेंगे फ्री चाट</a></p>
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                                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Nov 2023 15:46:08 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>परेशानियां और उसका हल</title>
                                    <description><![CDATA[Story: राजस्थान के एक गाँव में रहने वाला एक व्यक्ति हमेशा किसी ना किसी समस्या से परेशान रहता था और इस कारण अपने जीवन से बहुत दु:खी था। एक दिन उसे कहीं से जानकारी प्राप्त हुई कि एक साधू अपने काफिले के साथ उसके गाँव में पधारे हैं। उसने तय किया कि वह साधू से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/problems-and-their-solutions-story/article-54769"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Story: राजस्थान के एक गाँव में रहने वाला एक व्यक्ति हमेशा किसी ना किसी समस्या से परेशान रहता था और इस कारण अपने जीवन से बहुत दु:खी था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन उसे कहीं से जानकारी प्राप्त हुई कि एक साधू अपने काफिले के साथ उसके गाँव में पधारे हैं। उसने तय किया कि वह साधू से मिलेगा और अपने जीवन की समस्याओं के समाधान का उपाय पूछेगा। शाम को वह उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ साधू रुके हुए थे। कुछ समय प्रतीक्षा करने के उपरांत उसे साधू से मिलने का अवसर प्राप्त हो गया। वह उन्हें प्रणाम कर बोला, ‘हे महात्मा जी! मैं अपने जीवन में एक के बाद एक आ रही समस्याओं से बहुत परेशान हूँ।</p>
<p style="text-align:justify;">एक से छुटकारा मिलता नहीं कि दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। घर की समस्या, काम की समस्या, स्वास्थ्य की समस्या और जाने कितनी ही समस्यायें। ऐसा लगता है कि मेरा पूरा जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है। कृपा करके कुछ ऐसा उपाय बतायें कि मेरे जीवन की सारी समस्यायें खत्म हो जाये और मैं शांतिपूर्ण और खुशहाल जीवन जी सकूं।’</p>
<p style="text-align:justify;">उसकी पूरी बात सुनने के बाद साधू मुस्कुराये और बोले, ‘बेटा! मैं तुम्हारी समस्या समझ गया हूँ। उन्हें हल करने के उपाय मैं तुम्हें कल बताऊंगा। इस बीच तुम मेरा एक छोटा सा काम कर दो।’ व्यक्ति तैयार हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">साधू बोले, ‘बेटा, मेरे काफिले में 100 ऊँट है। मैं चाहता हूँ कि आज रात तुम उनकी रखवाली करो। जब सभी 100 ऊँट बैठ जायें, तब तुम सो जाना।’</p>
<p style="text-align:justify;">यह कहकर साधू अपने तंबू में सोने चले गए। व्यक्ति ऊँटों की देखभाल करने चला गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अगली सुबह साधू ने उसे बुलाकर पूछा, ‘बेटा! तुम्हें रात को नींद तो अच्छी आई ना?’</p>
<p style="text-align:justify;">‘कहाँ साधू जी? पूरी रात मैं एक पल के लिए भी सो न सका। मैंने बहुत प्रयास किया कि सभी ऊँट एक साथ बैठ जायें, ताकि मैं चैन से सो सकूं। किंतु मेरा प्रयास सफल न हो सका। कुछ ऊँट तो स्वत: बैठ गए। कुछ मेरे बहुत प्रयास करने पर भी नहीं बैठे। कुछ बैठ भी गए, तो दूसरे उठ खड़े हुए। इस तरह पूरी रात बीत गई।’ व्यक्ति ने उत्तर दिया। Story</p>
<p style="text-align:justify;">साधू मुस्कुराये और बोले, ‘यदि मैं गलत नहीं हूँ, तो तुम्हारे साथ कल रात यह हुआ?</p>
<p style="text-align:justify;">कई ऊँट खुद-ब-खुद बैठ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">कईयों को तुमने अपने प्रयासों से बैठाया।</p>
<p style="text-align:justify;">कई तुम्हारे बहुत प्रयासों के बाद भी नहीं बैठे। बाद में तुमने देखा कि वे उनमें से कुछ अपने आप ही बैठ गए।’<br />
‘बिल्कुल ऐसा ही हुआ साधू जी।’ व्यक्ति तत्परता से बोला।</p>
<p style="text-align:justify;">तब साधू ने उसे समझाते हुए कहा, ‘क्या तुम समझ पाए कि जीवन की समस्यायें इसी तरह है : कुछ समस्यायें अपने आप ही हल हो जाती हैं। कुछ प्रयास करने के बाद हल होती है। कुछ प्रयास करने के बाद भी हल नहीं होती। उन समस्याओं को समय पर छोड़ दो। सही समय आने पर वे अपने आप ही हल हो जायेंगी। कल रात तुमने अनुभव किया होगा कि चाहे तुम कितना भी प्रयास क्यों न कर लो। तुम एक साथ सारे ऊँटों को नहीं बैठा सकते। तुम एक को बैठाते हो, तो दूसरा खड़ा हो जाता है। दूसरे को बैठाते हो, तो तीसरा खड़ा हो जाता है। Story</p>
<p style="text-align:justify;">जीवन की समस्याएं इन ऊँटों की तरह ही हैं। एक समस्या हल होती नहीं कि दूसरी खड़ी हो जाती है। समस्यायें जीवन का हिस्सा है और हमेशा रहेंगी। कभी ये कम हैं, तो कभी ज्यादा। बदलाव तुम्हें स्वयं में लाना है और हर समय इनमें उलझे रहने के स्थान पर इन्हें एक तरफ रखकर जीवन में आगे बढ़ना है।’ व्यक्ति को साधू की बात समझ में आ गई और उसने निश्चय किया कि आगे से वह कभी अपनी समस्याओं को खुद पर हावी होने नहीं देगा। चाहे सुख हो या दु:ख जीवन में आगे बढ़ता चला जायेगा। Story</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="दादा जी की छड़ी" href="http://10.0.0.122:1245/grandfathers-stick-childrens-story/">दादा जी की छड़ी</a></p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Nov 2023 15:45:17 +0530</pubDate>
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