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                <title>Religion - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कट्टरवाद, आतंकवाद, अलगाववाद से धर्मों को बचाना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[हमारे देश के लिए जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, माओवाद और नक्सलवाद से भी बड़ा खतरा है कट्टरवाद, चरमपंथ, पाखंड और मजहबी उन्माद लेकिन इसके मूल कारण और स्थाई समाधान पर संसद-विधानसभा में सार्थक बहस नहीं हो रही है। कट्टरवाद, चरमपंथ, पाखंड और मजहबी उन्माद किसी भी मजहब में हों, वह मानवता के लिए हमेशा खतरा ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/religions-have-to-be-saved-from-fundamentalism-terrorism-separatism/article-37214"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/religions.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हमारे देश के लिए जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, माओवाद और नक्सलवाद से भी बड़ा खतरा है कट्टरवाद, चरमपंथ, पाखंड और मजहबी उन्माद लेकिन इसके मूल कारण और स्थाई समाधान पर संसद-विधानसभा में सार्थक बहस नहीं हो रही है। कट्टरवाद, चरमपंथ, पाखंड और मजहबी उन्माद किसी भी मजहब में हों, वह मानवता के लिए हमेशा खतरा ही होते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यूं तो कट्टरवाद सभी धर्मों में बढ़ा है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पिछले कई दशकों से इस्लाम के मानने वालों की हिंसक गतिविधियां पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं। प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ. पीटर हैमंड ने 2005 में विस्तृत शोध के बाद इस्लाम धर्म के मानने वालों की प्रवृत्ति पर एक पुस्तक लिखी थी जिसका शीर्षक है ‘स्लेवरी, टैररिज्म एंड इस्लाम-द हिस्टोरिकल रूट्स एंड कंटेम्पररी थ्रैट’। डॉ. पीटर हैमंड के अतिरिक्त ‘द हज’ के लेखक लियोन यूरिस ने भी कट्टरवाद, चरमपंथ, पाखंड और मजहबी उन्माद पर अपनी पुस्तक में विस्तार से लिखा है और जो तथ्य सामने आए हैं वे चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि चिंताजनक भी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जब मुसलमानों की जनसंख्या किसी देश प्रदेश या क्षेत्र में 5 से 10% होती है तब वे अन्य धर्मावलंबियों पर अनैतिक दबाव बढ़ाने लगते हैं और अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करने लगते हैं। जब किसी क्षेत्र में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 20 प्रतिशत या अधिक हो जाती है तब इनके संगठन जेहाद का नारा ही नहीं लगाते हैं बल्कि असहिष्णुता और धार्मिक हत्याओं का दौर भी शुरू हो जाता है, जैसा भारत और इथियोपिया में अक्सर देखा जाता है। किसी देश में जब मुसलमान 50 प्रतिशत हो जाते हैं तब उस देश में पहले सत्ता प्राप्त करते हैं और अन्य धर्मों की शासन प्रायोजित जातीय सफाई की जाती है। अन्य धर्मों के लोगों को उनके मूल नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया जाता है। कई तरह के हथकंडे अपनाकर मुस्लिम जनसंख्या को 100 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ये ऐसे कड़वे तथ्य हैं जिन्हें मजहबी चश्मे से नहीं बल्कि ठंडे दिमाग से प्रत्येक नागरिक को देखना और समझना चाहिए, चाहे वे हिंदू हों, मुसलमान, पारसी हों या ईसाई। यूं भी सामाजिक सद्भाव सबकी जिम्मेदारी है लेकिन ज्यादा जिम्मेदारी उन लोगों की है जो वास्तव में धर्मनिरपेक्ष हैं। उन्हें संगठित होकर आगे आना चाहिए और इस्लाम धर्म के साथ जुड़ने वाले आतंकवाद, कट्टरवाद, अलगाववाद और मजहबी उन्माद जैसे विश्लेषणों से इस्लाम को मुक्त कराएं अन्यथा न तो इस्लाम के मानने वालों का भला होगा और न ही दुनिया का।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Aug 2022 09:51:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>धर्म एक विचार है, जिसे नियंत्रित करना है असंभव</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश में ‘लव-जिहाद’ के खिलाफ कानून लाए जाने पर देश में एक राजनीतिक तूफान उठ रहा है। परन्तु यहां राजनीति से ज्यादा संवैधानिक पहलुओं को देखा जाना चाहिए। भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्टÑ है यहां कोई भी नागरिक किसी भी धर्म में श्रद्धा रखे या श्रद्धा नहीं भी रखे, राष्टÑ उस व्यक्ति के धार्मिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/religion-is-an-thought-that-is-impossible-to-control/article-19971"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/religions.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश में ‘लव-जिहाद’ के खिलाफ कानून लाए जाने पर देश में एक राजनीतिक तूफान उठ रहा है। परन्तु यहां राजनीति से ज्यादा संवैधानिक पहलुओं को देखा जाना चाहिए। भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्टÑ है यहां कोई भी नागरिक किसी भी धर्म में श्रद्धा रखे या श्रद्धा नहीं भी रखे, राष्टÑ उस व्यक्ति के धार्मिक विचारों की स्वतंत्रता की न केवल रक्षा करेगा बल्कि देश का संविधान किसी भी नागरिक की धार्मिक आस्थाओं में कोई हस्तक्षेप या छेड़छाड़ नहीं करेगा, न ही एक-दूसरे नागरिक से धर्म के आधार पर भेदभाव करेगा। ‘लव-जिहाद’ शब्द भी धार्मिक संर्कीणता की उपज है। कोई मुस्लिम बने, ईसाई बने, हिन्दू बने या सिक्ख या अपने पिता या माता से मिले धर्म का त्याग करे उस पर कोई अन्य नियंत्रण कैसे कर सकता है?</p>
<p style="text-align:justify;">गुरुग्राम का निकिता हत्याकांड अब की ताजा घटना है, जिसे धर्म की राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है अन्यथा वह एक सिरफिरे युवक द्वारा एक युवती की हत्या है, युवती जो पढ़ाई में रूचि रखती थी और उसे शादी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। एक तरफा आर्कषण से बंधे अनेकों मामले, मारपीट, घायल करने या हत्या के केस देश में रोज आ रहे हैं लेकिन यहां हत्यारा मुस्लिम व पीड़िता हिन्दू होने के कारण मामला धार्मिक हो गया। दरअसल धर्म के सिद्धांतों का पालन व उसके माध्यम से ईश्वरीय व्यक्तित्व पाने वाले बहुत ही कम लोग हैं, बाकी लोग धर्मों में चिन्हों, वेषभूषा व ऊपरी बातों पर लड़ाई लड़ने वाले हैं। हजारों-हजार साल की मानवीय सभ्यता में पता नहीं कितने धर्म आए व गए और आगे भी यह दौर जारी है, कोई भी सत्ता या समूह किसी एक विचारधारा को जड़ नहीं बना पाया। अत: देश में धर्म पर राज्य या केन्द्र सरकारों का बढ़ता हस्तक्षेप मानव कल्याण के किसी काम का नहीं है, धर्म एक विचार मात्र है।</p>
<p style="text-align:justify;">विचार की एक प्रकृति शाश्वत है, वह है विचार का परिवर्तनशील होना। विचार उपजा है तो परिवर्तन को रोककर नहीं रखा जा सकता, विचारों से ही आजादी मिली, विचार से ही भारत व इसके राज्यों ने आकार लिया, विचार ही है जो भारत ही नहीं पूरी दुनिया का भविष्य तय करेंगे। कौन सा धर्म रहेगा, कौन सा नहीं रहेगा, कौन सा शासन रहेगा, कौन सा नहीं रहेगा, कौन सा देश टूटेगा, कौन से दो देश एक होंगे ये सब संवैधानिक संस्थाओं से ऊपर विचारों में निहित है। अत: लव-जिहाद के नाम पर लगाया जा रहा वक्त एवं शक्ति समय गुजारने के सिवाय कुछ नहीं। बेहतर यही है कि नागरिकों के कल्याण के लिए नागरिकों को खुशी देने के लिए, उन्हें आजाद रहने दिया जाए व नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, जीविका व सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Nov 2020 09:35:16 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>धर्म और आतंकवाद में भेद समझना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[फ्रांस ने माली में सर्जिकल स्ट्राईक कर 30 बाइक सवारों को मौत के घाट उतार दिया है। फ्रांस का दावा है कि यह अलकायदा से जुड़े आतंकी थे। दरअसल फ्रांस ने यह कार्रवाई उस वक्त की जब फ्रांस में मुस्लमानों द्वारा राष्ट्रपति मैक्रों के ब्यान की निंदा की जा रही थी। इससे पूर्व राष्ट्रपति ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/it-is-important-to-understand-the-difference-between-religion-and-terrorism/article-19694"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/it-is-important-to-understand-the-difference-between-religion-and-terrorism-2.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">फ्रांस ने माली में सर्जिकल स्ट्राईक कर 30 बाइक सवारों को मौत के घाट उतार दिया है। फ्रांस का दावा है कि यह अलकायदा से जुड़े आतंकी थे। दरअसल फ्रांस ने यह कार्रवाई उस वक्त की जब फ्रांस में मुस्लमानों द्वारा राष्ट्रपति मैक्रों के ब्यान की निंदा की जा रही थी। इससे पूर्व राष्ट्रपति ने देश में एक अध्यापक द्वारा पैगंबर हजरत मोहम्मद का विवादित कार्टून दिखाने का समर्थन किया था। उस अध्यापक की हत्या के बाद हिंसा की दो अन्य घटनाएं घटी। विश्व भर के मुस्लमानों ने राष्ट्रपति मैक्रों के बयान की निंदा की। आखिर मैक्रों ने नई रणनीति के तहत धर्म आधारित कार्टून का समर्थन न करने की बात कहकर हिंसा को बर्दाश्त नहीं करने की चेतावनी दे दी। भले ही मैक्रों ने किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाकर फिर खेद व्यक्त कर दिया लेकिन तब तक मामला काफी आगे निकल चुका था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">दरअसल सारा मामला ही आतंकवाद व धर्म के बीच अंतर पैदा करने का है। आतंकवाद किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। आतंकवाद का कोई भी धर्म नहीं होता। आतंकवाद को धर्म के साथ जोड़ने वाले धर्म का दुरुपयोग करते हैं। अमेरिका में विश्व व्यापार केंद्र, भारतीय संसद व मुंबई आतंकी हमला आतंकवाद का काला चेहरा हैं। ऐसे में सभी देशों का यह कर्तव्य बनता है कि आतंकवाद व धर्म को अलग-अलग परिभाषित किया जाए। इस मामले में जॉर्ज डब्लयू बुश की नीतियां व रणनीतियों का जिक्र भी होना लाजिमी है। बुश ने विश्व व्यापार केंद्र पर हुए हमले के बाद एक महीने तक यह प्रचार किया कि वे आतंकवाद और धर्म को किसी भी रूप में एक नहीं मानते। आखिर बुश प्रशासन ने अफगानिस्तान में अलकायदा के खिलाफ जोरदार कार्रवाई भी की। अमेरिका की कार्रवाई के कारण आतंकवादी संगठन काफी कमजोर पड़ गए।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">जहां तक फ्रांस में घटनाओं का संबंध है, फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की तरह मजबूती से लड़ाई नहीं लड़ सका। आतंकवाद के खिलाफ पूरी दुनिया फ्रांस के साथ है लेकिन इस लड़ाई को गलत अर्थ निकालने वाली ताकतों के प्रति सावधान रहना होगा। आतंकवाद इंसानियत का दुश्मन है और धर्म व मानवता की सलामती चाहता है। धर्म के नाम पर आतंकवादी संगठनों ने न केवल शरीफ लोगों को गुमराम किया बल्कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवकों को भी हिंसक बना दिया, जिनमें इंजीनियर तक शामिल थे। इन परिस्थितियों में आतंकवाद के खिलाफ जंग को पूरी सतर्कता से लड़ने की आवश्यकता है ताकि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई किसी धर्म के खिलाफ साबित न हो।</h6>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Nov 2020 22:08:06 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरणास्त्रोत : धन के साथ धर्म</title>
                                    <description><![CDATA[           आप धन से मोहब्बत न करें, इसका मतलब यह नहीं है कि आप धन न कमाएँ या धन को एकत्रित न करें। अवश्य कमाइये और अवश्य जमा करिये। इस बात के लिए तो वेदों ने भी मना नहीं किया है फिर हम मना क्यों करें? धन कमाओ जीवन को चलाओ। पर धन को खर्च […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/religion-with-money/article-12540"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/gandhiji.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">           आप धन से मोहब्बत न करें, इसका मतलब यह नहीं है कि आप धन न कमाएँ या धन को एकत्रित न करें। अवश्य कमाइये और अवश्य जमा करिये। इस बात के लिए तो वेदों ने भी मना नहीं किया है फिर हम मना क्यों करें? धन कमाओ जीवन को चलाओ। पर धन को खर्च करते समय केवल भोग का ही नहीं बल्कि धर्म का भी ख्याल होना चाहिये। धन अगर फूल है तो धर्म उसकी खुशबू है। सुगंध के बिना फूल शोभा नहीं पाता। वेद आदेश देते हैं कि ‘‘धर्म में कर्त्तव्य बुद्धि रखो।’’ आप धार्मिक नहीं हैं ऐसा कोई नहीं कह सकता। यदि तुम धार्मिक नहीं होते हैं, ऐसा कोई नहीं कह सकता।<br />
यदि तुम धार्मिक नहीं होते तो सत्संग नहीं सुनते और ज्ञान की पुस्तक नहीं पढ़ते। धार्मिकता में अगर कर्त्तव्य-बुद्धि हो तो आनन्द की वर्षा होने लगती है। धर्म-बुद्धि हमें बताती है कि ‘‘हम क्या हैं?’’ हम सर्वश्रेष्ठ घर में रह रहे हैं। मानव-शरीर उत्तम घर है। ‘‘हमें क्या करना चाहिये।’’ वेद कहते हैं कि धर्म पर चलो। धर्म पर चलना मनुष्य का कर्त्तव्य है। धर्म पर चलने के लिए बुद्धि हमारी सहायता करती है। भगवान ने सबसे उत्तम-बुद्धि मानव को दी है। धर्म-बुद्धि से कर्म का शुद्धिकरण होता है। बुद्धि के प्रकाश से यह शक्ति मिलती है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? क्या खाना चाहिए क्या नहीं खाना चाहिए? हमारा घर कैसा हो, हमारा परिवार कैसा हो? सबमें उत्तम-संस्कार होने चाहिए।</h4>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/religion-with-money/article-12540</link>
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                <pubDate>Thu, 16 Jan 2020 20:43:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>राजनीति, धर्म और आतंकवाद</title>
                                    <description><![CDATA[जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार एक पुलिस अधिकारी के मामले में राजनीति बहस छिड़ गई है। कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। यही चर्चाएं आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में सबसे बड़ी रुकावट बन रही हैं लेकिन अब तो राजनीति में धर्म के पत्ते […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/politics-religion-and-terrorism/article-12496"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/politics-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जम्मू कश्मीर में आतंकवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार एक पुलिस अधिकारी के मामले में राजनीति बहस छिड़ गई है। कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। यही चर्चाएं आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में सबसे बड़ी रुकावट बन रही हैं लेकिन अब तो राजनीति में धर्म के पत्ते खेलने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा। कांग्रेसी नेता अधीर रंजन ने गिरफ्तार अधिकारी के धर्म का जिक्र कर जो विवाद छेड़ दिया है वह निंदनीय है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>अधीर रंजन ने दविन्द्र सिंह पर तीन ट्वीट किए, जिसमें उन्होंने लिखा कि कुलगाम में हिजुबल आतंकियों के साथ गिरफ्तार हुए पुलिस अधिकारी का नाम इत्तेफाक से दविंदर सिंह है। अगर दविंदर खान होता, तो विवाद बढ़ता। वास्तव में अधीर रंजन पहले भी कई बार विवादित टिप्पणियों के कारण माफी मांग चुके हैं, लेकिन इस प्रकार के विवादों से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता और प्रत्येक धर्म आतंकवाद के खिलाफ है। सभी देशवासी कानून के सामने बराबर होते हैं।</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">दरअसल राजनीतिक पार्टियों में अपने हितों को साधने की इतनी होड़ मची होती है कि वे बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी मुंह से उगल देते हैं। कोई भी पैंतरा खेलने से संकोच नहीं किया जाता। कश्मीर में गिरफ्तार अधिकारी को किसी धर्म विशेष से जोड़ने के मुद्दे पर बहस को जन्म नहीं देना चाहिए बल्कि वास्तविक्ता यह है कि आतंकवाद के मामले में केवल गलत या ठीक का सवाल होता है। आतंकवाद के खात्मे के लिए रणनीति में धर्म को मुद्दा बनाना उचित नहीं बल्कि इससे पाकिस्तान जैसे देशों को बोलने का मौका मिलता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">राजनीतिक पार्टियों को चाहिए कि आतंकवाद व धर्म को एक साथ जोड़कर देखने की बजाए कानून की परिभाषा को समझें। राजनीति केवल कश्मीर में घटी घटनाओं तक सीमित नहीं बल्कि मुंबई में 26/11 हमले पर कुछ राजनीतिक नेताओं ने विवादित ब्यान देकर आतंकवाद के खिलाफ शहीद होने वाले पुलिस अधिकारियों की शहीदी को भी अपमानित किया था। आतंकी आतंकी ही होता है, लेकिन उसे किसी धर्म के साथ जोड़कर पेश करना, आतंक विरोधी मुहिम को कमजोर करना है।</h4>
<p style="text-align:justify;">नेताओं में यह एक विचारधारा बन गई है कि पहले तो विवादित ब्यान दिए जाते हैं फिर मीडिया पर दोष मढ़कर पीछा छुड़ा लिया जाता है। बेहतर हो यदि राजनीतिक नेता जिम्मेदाराना तरीके से बयान दें। केवल मीडिया की सुर्खियां बटोरना ही राजनीति नहीं है।</p>
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                <pubDate>Wed, 15 Jan 2020 11:13:57 +0530</pubDate>
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                <title>‘धर्म’: महापुरुषों से समझें शासकों से नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों अपनी एक सप्ताह की अमेरिका यात्रा पूरी की। वे इस अवसर पर दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी मिले और विश्व के अनेक प्रमुख नेताओं से भी मुलाकातें कीं। राष्ट्रपति ट्रम्प व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही नेताओं ने एक दूसरे की खूब प्रशंसा की। अनेक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/religion-understand-great-men-and-not-rulers/article-10578"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-10/religion.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों अपनी एक सप्ताह की अमेरिका यात्रा पूरी की। वे इस अवसर पर दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से भी मिले और विश्व के अनेक प्रमुख नेताओं से भी मुलाकातें कीं। राष्ट्रपति ट्रम्प व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही नेताओं ने एक दूसरे की खूब प्रशंसा की। अनेक मुद्दों पर चचार्एं भी हुईं परन्तु इन मुलाकातों में आतंकवाद के विषय को सबसे अधिक प्रमुखता दी गयी। खास तौर पर ‘इस्लामी आतंकवाद’ का शब्द एक बार फिर इस सर्वोच्च स्तर की वार्ता के बाद खबरों की सुर्खियां बना। ‘इस्लामी आतंकवाद’ शब्द पर बार बार इतना जोर दिया गया गोया विश्व को सबसे अधिक खतरा उस वैश्विक आतंकवाद से है जो “इस्लाम धर्म से प्रेरित भी है और इस्लाम ही आतंकवाद का जननी धर्म भी है”।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में भी गत एक दशक से जब कुछ उदारवादी सोच रखने वाले लोग इस्लाम धर्म के आलोचकों या इस्लाम से नफरत करने का सांस्कारिक पूर्वाग्रह रखने वाले लोगों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि कोई भी धर्म आतंकी नहीं होता या किसी धर्म के सभी लोग आतंकवादी नहीं होते। लिहाजा सभी मुस्लमान भी आतंकवादी नहीं कहे जा सकते। इस तर्क पर इन्हीं लोगों द्वारा इसी बात को घुमा फिराकर फिर इस तरह से भी पूछा जाता है कि ‘यदि सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते फिर आखिर सभी आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं’। नि:संदेह चौदह सौ वर्षों से भी अधिक पहले की करबला की घटना से लेकर आज के अलकायदा, तालिबान, आईएसआई, दाइश, अलशबाब, जैश, लश्कर, लशकरे झांगवी, सिपाहे सहाबा जैसे संगठनों ने दुनिया को कुछ ऐसा ही सन्देश दिया है जिससे यह समझा जाने लगा कि इस्लामी शिक्षा कत्लोगारत, खूनरेजी, हिंसा तथा बर्बरीयत को बढ़ावा देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘इस्लामी आतंकवाद’ का जिक्र ढोल पीट पीट कर किया जा रहा है। दुनिया का कोई भी देश खास तौर पर कोई इस्लामी देश भी ‘इस्लामी आतंकवाद’ जैसे निरर्थक शब्द पर कोई आपत्ति करते नहीं सुनाई दिया। और अब तो यह शब्द इतना प्रचलित हो चुका है कि इसका विभिन्न भाषाओँ के शब्दकोशों में शामिल हो जाना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं होगा। विश्व में फैलते इस प्रकार के वातावरण में सैमुएल फिलिप्स हटिंगटन की सभ्यताओं का संघर्ष की अवधारणा भी अब सही प्रतीत होने लगी है। हटिंगटन को सभ्यताओं का संघर्ष के उनके दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। हटिंगटन का मानना था कि शीतयुद्ध के पश्चात दुनिया में संघर्ष का कारण किन्हीं राष्ट्रों के बीच विचारधाराओं के मतभेद नहीं बल्कि बड़ी सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक अंतर होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हम लगभग सभी धर्मों से संबंधित प्राचीन इतिहास में पूरी ईमानदारी के साथ नजर डालें तो हम यह भी देखेंगे कि दुनिया में अब तक सबसे अधिक हत्याएं भी धर्म के नाम का सहारा लेकर ही की गई हैं। इन्तेहा तो यह है कि प्रेम, सद्भाव, अहिंसा, परोपकार, परमार्थ, सहयोग, दया, करुणा तथा त्याग व तपस्या की शिक्षा देने वाले वास्तविक धर्मोपदेशको, संतो, फकीरों व धर्मगुरुओं को भी धर्म पर चलते हुए बड़ी से बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी है। परन्तु अफसोस की बात तो यह है आज के विश्व का शासक वर्ग अपनी सुविधानुसार उन्हीं क्रूर शासको, लुटेरों या आक्रांताओं का हवाला देकर उनके धर्म को ही धर्म की शिक्षा बताने व प्रचारित करने की कोशिश कर रहा है। जाहिर है इस्लाम भी इसी सोची समझी साजिश का शिकार है। भारत से लेकर अमेरिका तक ‘इस्लामी आतंकवाद’ शब्द ‘हैलो’ शब्द की तरह एक एक व्यक्ति द्वारा दिन में कई कई बार इस्तेमाल किया जाने लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी, विश्व के सामने बातें चाहे हम शांति दूत ‘महात्मा बुध’ की क्यों न करें परन्तु यही भारतवर्ष महाभारत की धरती भी है। राम-रावण युद्ध से लेकर अशोक- कलिंगा की लड़ाई तक इस धरती पर लाखों लोग मरे गए। हर जगह सत्ता व साम्राज्य की लड़ाइयां थीं। आज भी विजय दशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसंघ के लोग पूरे भारत में शस्त्र पूजा करते हैं। देश में महात्मा गाँधी की हत्या इस्लाम प्रेरित हत्या तो नहीं थी? गत कुछ वर्षों से तो मयार्दा पुरषोत्तम भगवान श्री राम का नाम लेकर सैकड़ों लोगों को मारा गया व हमले किये गए। इस हिंसा के लिए निश्चित रूप से न भगवन राम जिम्मेदार हैं न उनकी शिक्षाएं न ही हिन्दू धर्म। बल्कि यह सब सत्ता के खेल हैं जो बहुसंख्य समाज को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए शातिर राजनेताओं द्वारा खेले जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्यथा क्या इस्लामी आतंकवाद तो क्या हिन्दू या ईसाई आतंकवाद, इस तरह के शब्दों के जनक ही दरअसल वे शातिर लोग हैं जो सत्ता व विस्तार या मजबूती के लिए ऐसे शब्दों को गढ़ते रहते हैं। यदि किसी धर्म के मर्म को समझना है तो उस धर्म के शासक या राजा अथवा बादशाह के चाल चलन से नहीं बल्कि उस धर्म के महापुरुषों, संतों, फकीरों, त्यागी व बलिदानी लोगों के आचरण व उनके उपदेशों से समझना चाहिए।<br />
<strong><em>-तनवीर जाफरी</em> </strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 01 Oct 2019 21:04:30 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>‘धर्म हथियार’ से वोट हड़पने का फंडा नाकाम</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में मिली करारी हार के बाद मोदी लहर थम सी गयी है। तीनों राज्यों में अब कांग्रेस की सरकार है। किसी ने नहीं सोचा था कि भाजपा हारेगी परन्तु बाजी पलटी और सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई। देखा जाए तो लोग कांग्रेस के पक्ष में कम भाजपा के खिलाफ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/wrong-to-vote-for-religion/article-7006"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/vote-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में मिली करारी हार के बाद मोदी लहर थम सी गयी है। तीनों राज्यों में अब कांग्रेस की सरकार है। किसी ने नहीं सोचा था कि भाजपा हारेगी परन्तु बाजी पलटी और सत्ता कांग्रेस के हाथ में आई। देखा जाए तो लोग कांग्रेस के पक्ष में कम भाजपा के खिलाफ ज्यादा वोट कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि जनता हिंदू-मुस्लिम के विवाद को लेकर तंग आ चुकी है। बीजेपी के कुछ नेता धर्म को अपना हथियार बनाकर वोट हड़पना चाहते थे परंतु जनता जागरूक हो चुकी है वह सब जान चुकी है कि धर्म के नाम पर वोट मांगा जा रहा है जोकि सरासर गलत है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने सत्ता में आने से पहले कहा था कि अयोध्या विवाद का हल होगा परंतु प्रधानमंत्री बनने के चार साल बाद भी इसका हल नहीं निकला बल्कि सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद समस्या तनावपूर्ण बनती जा रही है। बीजेपी के शासन में जातिवाद को लेकर आए दिन हंगामे हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान जी तक को भी नहीं बख्शा वह उन्हें शूद्र संबोधित कर गए जोकि गलत बात है। वह खुद एक गेरुआ धारी हैं उनको तो सबको एक समान नजरों से देखा देखना चाहिए परंतु उन्होंने जातिवाद का भयावह खेल खेला और भगवान को भी नहीं छोड़ा तो हम इंसानों की बात ही छोड़ दी जाए। चुनाव होने से पूर्व इन तीन राज्यों में योगी जी कुल 74 रैली करने गए।</p>
<p style="text-align:justify;">अमित शाह ने कुल 36 रैली की और हमारे प्रधानमंत्री ने कुल 31 रैलियां करने के बावजूद उनको इन तीन राज्यों में मुंह की खानी पड़ी। योगी आदित्यनाथ ने तो इतने स्थानों के नाम बदल डाले कि पूछो ही मत, हद तो तब हो गई जब वह हैदराबाद गए और वहां जाकर बोले की हैदराबाद का नाम बदल देंगे। जनता जान चुकी है कि नाम बदलने से कुछ नहीं होता यदि आपको सत्ता में रहना है तो जनता के लिए काम करना होगा। प्रधानमंत्री बनने से पहले मोदी ने कहा था कि किसानों का कर्ज माफ कर देंगे और उनकी उपज डेढ़ गुना दाम पर बिकेगी परंतु यह राजनीति है यहां वादे केवल वोट पाने के लिए किए जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अब चार साल बीत गए परंतु किसानों के हित के लिए एक भी कार्य नहीं किया गया इसके अलावा मोदी जी ने कहा था बेरोजगारी की समस्या को जड़ से उखाड़ देंगे परंतु इसका विपरीत हुआ आज बेरोजगारी इतनी बढ़ गई है कि छात्र आत्महत्या करने पर विवश हो गए हैं। हाल ही में ग्रुप-डी की परीक्षा समाप्त हुई है और हम सब जानते हैं कि ग्रुप डी की परीक्षा में लगभग दो करोड़ अभ्यर्थियों ने फॉर्म भरा था जोकि भारत में पहली बार हुआ है। इससे स्पष्ट है कि भारत में बेरोजगारी कैसे पनप रही है। यही सब कारणों से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। सत्ता चाहे किसी के भी हाथ में हो, हमें ऐसा नेता चाहिए जो गरीबों की सुने, बेरोजगारी दूर करे। आज कांग्रेस की जीत हुई है, यदि वे ठीक से अपना काम नहीं करते तो उनको भी हार का सामना करना पड़ेगा।</p>
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                <pubDate>Sun, 16 Dec 2018 20:39:51 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>धर्म की राजनीति फैला रही हिंसा</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हिंसक भीड़ ने पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हिंसक भीड़ ने पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी (Violence spreading religion politics)। राज्य में कानून व्यवस्था का जनाजा निकल गया है। इस प्रकार के मामलों पर केंद्र सरकार गंभीर बयान देती है लेकिन जमीनी स्तर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/violence-spreading-religion-politics/article-6818"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/88.jpg" alt=""></a><br /><h2>उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हिंसक भीड़ ने पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी</h2>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हिंसक भीड़ ने पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी <strong>(Violence spreading religion politics)</strong>। राज्य में कानून व्यवस्था का जनाजा निकल गया है। इस प्रकार के मामलों पर केंद्र सरकार गंभीर बयान देती है लेकिन जमीनी स्तर पर गैर-कानूनी कार्रवाईयां निरंतर बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट मॉब लिंचिंग अर्थात भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को धर्म या जाति के आधार पर निशाना बनाने की घटनाओं पर केंद्र सरकार को फटकार लगा चुका है। प्रधानमंत्री नरिन्दर मोदी ने भी कानून को हाथ में लेने वालों के खिलाफ सख्त बयान दिये लेकिन यह सब कुछ कागजों तक सीमित है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">भीड़ ने धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति या समूह खिलाफ हिंसा भड़काई,</h2>
<p style="text-align:justify;">देश के विभिन्न हिस्सों में एक धर्म विशेष के लोगों की भीड़ ने धर्म के नाम पर किसी व्यक्ति या समूह खिलाफ हिंसा भड़काई, जिसमें दर्जनों जानें चली गई। कई मामलों में निजी रंजिश निकालने के लिए मामले को धर्म की रंगत दी गई। भले ही केंद्र सरकार ने हिंसा की निंदा की लेकिन इन घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। आखिर हिंसा करने वालों के हौंसले इतने बुलंद हो गए हैं कि वे पुलिस अधिकारियों पर भी हमले करने लगे हैं। नि:संदेह पुलिस की किसी मामले में कार्रवाई न होने पर रोष प्रदर्शन किया जा सकता है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कार्रवाई नहीं होने के कारण पुलिस अधिकारी अदालतों के चक्कर भी काट रहे हैं,</h2>
<p style="text-align:justify;">अधिकतर मामलों में कार्रवाई नहीं होने के कारण पुलिस अधिकारी अदालतों के चक्कर भी काट रहे हैं, कई सजाएं भी भुगत रहे हैं लेकिन पुलिस अधिकारी की हत्या कानून-व्यवस्था पर हावी होने की निशानी है। दरअसल जब तक सरकार में किसी कानून को लागू करने की इच्छा शक्ति पैदा नहीं होती तब तक कोई भी घोषणा लागू नहीं हो सकती। सरकार को सही नीयत से अपनी घोषणाओं पर काम करना चाहिए। पुलिस ही हिंसा का शिकार हो गई तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जा सकती है। यदि यही हाल रहा तो देश में धार्मिक व जाति टकराव निरंतर बढ़ता जाएगा।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">यह वस्तुएं उन विदेशी ताकतों को खूब रास आएंगी जो पहले देश को बांटने की फिराक में बैठे हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">मॉब लिंचिंग विदेशी ताकतों के काम को आसान कर रही है।</li>
<li style="text-align:justify;">यह कहना भी गलत नहीं होगा कि राजनेताओं की धर्म के नाम पर भड़काऊ बयानबाजी ऐसी परिस्थितियों की जड़ है।</li>
<li style="text-align:justify;">एक नेता दूसरे को देश छोड़ने के लिए कहता है और दूसरा कहता है कि देश तो उसके बाप का है।</li>
<li style="text-align:justify;">जब संवैधानिक पदों पर बैठे नेता ऐसे स्तरहीन बयान देंगे तो आम जनता में धर्मों के नाम पर टकराव होने से कौन रोकेगा।</li>
<li style="text-align:justify;">सच्चाई यही है कि सर्वोच्च पदों पर बैठे नेताओं को धार्मिक टकराव में अपनी राजनीति चमकती नजर आती है।</li>
<li style="text-align:justify;">ताजा हालात देश में धु्रवीकरा को बढ़ावा दे रहे हैं जो चिंता का विषय है।</li>
</ul>
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                <pubDate>Tue, 04 Dec 2018 20:25:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>धर्म के नाम पर न हो महिलाओं से भेदभाव</title>
                                    <description><![CDATA[केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी के गहरे अर्थ हैं। अगर आला अदालत का यह मत अपने मूल अर्थों में जमीन पर उतर सका, तो हम एक नए बदलाव के गवाह बनेंगे। अदालत ने मंदिर में महिलाओं के खिलाफ भेदभावपरक बंदिशों को संविधान के खिलाफ माना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/no-discrimination-with-women-on-the-name-of-religion/article-4962"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/no-discrimination-with-women-on-the-name-of-religion.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी के गहरे अर्थ हैं। अगर आला अदालत का यह मत अपने मूल अर्थों में जमीन पर उतर सका, तो हम एक नए बदलाव के गवाह बनेंगे। अदालत ने मंदिर में महिलाओं के खिलाफ भेदभावपरक बंदिशों को संविधान के खिलाफ माना है। उसने कहा है कि जब संविधान महिला और पुरुषों में कोई भेद नहीं करता, तो फिर मंदिर के कर्ता-धर्ता भला यह कैसे कर सकते हैं? वाकई, मंदिर में प्रवेश महिलाओं का सांविधानिक और धार्मिक, दोनों अधिकार है। किसी भी धर्म में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है, जिससे महिलाओं के दोयम दरजे होने का बोध होता हो। हर जगह औरतों को पुरुषों के समान अधिकार दिए जाने की बातें हैं। जब धर्म किसी तरह का अंतर नहीं करता, तो फिर आस्था के केंद्र ऐसा कैसे कर सकते हैं? अपने इबादतगाह जाने की वे भी बराबर की अधिकारी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">रही बात ईश्वर की, तो वह सबके लिए समान है। वह भक्तों में कोई अंतर नहीं करता। कुछ यही तर्क संविधान को लेकर भी दिए जा सकते हैं। हमारा संविधान जाति-धर्म-लिंग आदि के आधार पर विभेद की कतई वकालत नहीं करता। लिहाजा अगर कोई संस्था या व्यक्ति किसी तरह का भेदभाव करता है, तो वह संविधान की अवहेलना ही है। मैं शुरू से महिलाओं की इस लड़ाई में शामिल रही हूं। मेरा तो हमेशा से यही मानना था कि जब कभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में आएगा, तो निश्चित तौर पर हम महिलाओं के हक में ही फैसला होता पाएंगे। हालांकि जरूरी यह भी है कि अधिकारों की यह बहस सिर्फ सबरीमाला तक ही सिमटी न रहे। देश भर में जहां कहीं भी औरतों के साथ किसी तरह का भेदभाव किया जा रहा हो, उसे पूरी तरह से खत्म किया जाना चाहिए। देश में अब भी कई ऐसे धार्मिक केंद्र हैं, जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। ऐसे में, यह जिम्मेदारी संसद की बन जाती है कि वह जल्द ही इस तरह का कोई कानून बनाए कि हर जगह से भेदभाव खत्म हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">लोगों में यह संदेश जाना ही चाहिए कि महिलाओं के साथ किसी तरह का कोई भेद स्वीकार्य नहीं है। हमारा समाज महिलाओं के साथ किस तरह का व्यवहार करता है, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। सबरीमाला विवाद का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं की माहवारी है। इसी का उदाहरण काफी कुछ जाहिर कर देता है। मसलन, माहवारी के दौरान औरतें रसोई में नहीं जा सकतीं। वे खाना वगैरह नहीं छू सकतीं। घर के बाहर वाले कमरे में रहती हैं, और तमाम तरह की बंदिशें झेलने को मजबूर की जाती हैं। लेकिन मामला सिर्फ माहवारी का नहीं है। चंद अपवादों को छोड़ दें, तो बेशक महिलाएं विभिन्न मोर्चों पर कामयाबी का झंडा बुलंद कर रही हैं, पर उन्हें आज भी फैसले लेने का पूरा अधिकार हासिल नहीं हो सका है। वे घर की मुखिया नहीं मानी जातीं। उनके लिए पुरुषों के साये में रहना अनिवार्य होता है। अगर कोई महिला ताउम्र अकेले जीवन गुजारने की सोचती है, तो उसके चरित्र पर कई तरह के सवाल उठाए जाते हैं। शादी करके पति की सेवा को उनके जीवन का ध्येय बताया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">महिलाओं के प्रति इसी तरह के व्यवहार से समाज में यह धारणा पैदा हुई है कि वे पुरुषों से कमतर होती हैं। यह औरतों का सामाजिक दरजा नीचे गिराने की कोशिश है। ऐसा करके उनके महत्व को खारिज किया जाता है। महिलाओं के साथ आज होने वाले अत्याचार-दुराचार या हिंसा की यह एक बड़ी वजह है। आलम यह है कि समाज में बलात्कार की घटनाएं तो बढ़ ही गई हैं, परिवार में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं रहीं। उनके खिलाफ कई तरह की हिंसा होने लगी है। शिक्षा व रोजगार में तो उन्हें कभी भी पर्याप्त अवसर नहीं मिलते। औरतों की दुर्गति की असल वजह यह पुरुष वर्चस्ववादी सोच, क्या बदलनी नहीं चाहिए? अच्छी बात है कि भारतीय संविधान इन तमाम भेदभावों से ऊपर है। उसने पहले ही औरतों और पुरुषों को समान माना है। संविधान निमार्ता बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का तो स्पष्ट मानना था कि जिस देश में महिलाएं सम्मानित नहीं हैं और जहां उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल नहीं है, वह देश कतई आगे नहीं बढ़ सकता। संभवत: हिन्दुस्तान के पिछड़ेपन का यह एक बड़ा कारण है। इसलिए जरूरी है कि अब धर्म के ठेकेदार पीछे हट जाएं और महिला-विरोधी बातों को समाज पर लादने की कोशिश न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">धर्म तो ऐसी बातों का विरोध करता ही है, अब अदालत ने भी किया है। लिहाजा धर्म के कथित पहरुओं को भी अब स्वीकार कर लेना चाहिए कि महिला और पुरुष बराबर हैं। वे हर वह काम कर सकती हैं, जो पुरुष कर सकता है। उन्हें यह हक मिलना ही चाहिए। हालांकि एक सवाल यह भी है कि क्या समाज में गहरे पैठी यह महिला-विरोधी सोच सिर्फ कानून से खत्म हो पाएगी? मेरा मानना है कि कानून तभी कारगर हो सकता है, जब लोग उसको लेकर खुद संजीदा होंगे। देश में दहेज के लेन-देन को रोकने के लिए भी तो कानून है। मगर क्या दहेज जैसी बुराइयां खत्म हो गईं? नहीं। यानी सिर्फ कानून हालात नहीं बदलते, लोगों को खुद आगे बढ़ना होता है। इसलिए बड़ी जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो जागरूक हैं और मानवाधिकार का समर्थन करते हैं। आने वाले दिनों में समाज में सांस्कृतिक बदलाव जरूर होंगे। इसके लिए हमें लैंगिक समानता की ओर बढ़ना होगा। हर परिवार को इसमें अपना हाथ बंटाने की जरूरत है। उन्हें शपथ लेनी होगी कि वे लड़के और लड़कियों में किसी तरह का भेदभाव नहीं करेंगे। उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य का समान अवसर देंगे। दोनों की पसंद को बराबर तरजीह देंगे। एक महत्वपूर्ण फैसला समाज यह भी कर सकता है कि वह दहेज न लेगा, और न देगा। हमारे नीति-निमार्ताओं के लिए भी आवश्यक है कि वे संविधान में मिले अधिकार औरतों को दें। सबसे ज्यादा जरूरी तो यही है कि लोकतंत्र का मंदिर (संसद) प्रतिनिधित्व के मामले में उनके साथ कोई विभेद न करे।</p>
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                <pubDate>Sun, 22 Jul 2018 08:48:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>धर्मगुरु करें बलात्कारियों को धर्म से बाहर निकालने की घोषणा : सत्यार्थी</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली (वार्ता)। बच्चों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता तथा नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने आज कहा कि समाज में बलात्कार की घटनाओं को हतोत्साहित करने के लिए धर्मगुरुओं को आगे आकर कहना चाहिये कि बलात्कारियों को धर्म से बाहर निकाल दिया जायेगा। ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन’ द्वारा यहाँ मीडिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/declare-religion-to-be-proclaimed-out-of-religion-satyarthi/article-3620"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/satuyarthi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली (वार्ता)। </strong>बच्चों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता तथा नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने आज कहा कि समाज में बलात्कार की घटनाओं को हतोत्साहित करने के लिए धर्मगुरुओं को आगे आकर कहना चाहिये कि बलात्कारियों को धर्म से बाहर निकाल दिया जायेगा। ‘कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन फाउंडेशन’ द्वारा यहाँ मीडिया के लिए आयोजित एक कार्यशाला में श्री सत्यार्थी ने कहा “बच्चों के प्रति अपराध और बलात्कार की घटनाएँ रोकने का काम सिर्फ पुलिस, गैर-सरकारी संगठन और न्यायपालिका नहीं कर सकती। इसके लिए धर्मगुरुओं को भी आगे आना होगा। उन्हें मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों से यह घोषणा करनी होगी कि यदि किसी ने इस तरह का घिनौना काम किया तो उसे धर्म से बाहर निकाल दिया जायेगा।”</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बाल अपराध से जुड़े मामलों के जल्द निपटारे के लिए जिला स्तर पर विशेष अदालतों के गठन और एक राष्ट्रीय बाल प्राधिकरण बनाने की अपनी माँगें भी दोहराई। उन्होंने कहा कि ये दोनों माँगें पूरी होने पर कानून और उसके क्रियान्वयन में बाधा बन रही संस्थागत कमी की खाई पट जायेगी। नोबल पुरस्कार विजेता ने मीडिया को भी सिर्फ सनसनीखेज खबरों से हटकर इन मामलों की न्यायिक प्रगति के बारे में विस्तार से जानकारी लोगों तक पहुँचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि मीडिया और न्यायपालिका की सोच सरकार और पूरी राजनीतिक व्यवस्था की सोच से कहीं आगे है। मीडिया को अपना रुख पेशेवराना रखना होगा तथा पूरी लगन के साथ एक ध्येय के लिए काम करना होगा। बाल अपराध और बाल मजदूरी को सामाजिक और सांस्कृतिक समस्या करार देते हुये श्री सत्यार्थी ने कहा कि 38 साल पहले पंजाब में बंधुआ मजदूरों और उनके परिवारों समेत 36 लोगों को एक ईंट भट्ठे से छुड़ाने के साथ उन्होंने जो आंदोलन शुरू किया था वह अभी परिणति पर नहीं पहुँचा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा “अभी भी यह मसला खत्म नहीं हुआ है। दो साल की, आठ महीने की बेटियों के साथ बलात्कार हो रहा है। स्कूलों में छह साल, आठ साल के लड़कों से दुष्कर्म किया जा रहा है। हर घंटे देश में चार बलात्कार होते हैं और आठ बच्चों के गायब होने के मामले सामने आते हैं।” श्री सत्याथी ने कहा कि अदालतों में इन मामलों की त्वरित सुनवाई होनी चाहिये क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े कहते हैं कि पोस्को के तहत जो मामले लंबित हैं, यदि इसी रफ्तार से सुनवाई होती रही तो उनके निपटने में ही 50 साल लग जायेंगे।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Mar 2018 06:01:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्म परिवर्तन मामला, मारपीट में पादरी सहित दो जने घायल</title>
                                    <description><![CDATA[घायलों को जिला चिकित्सालय में करवाया भर्ती हनुमानगढ़ (सच कहूँ न्यूज)। सदर पुलिस थाना क्षेत्र के गांव डबलीवास मौलवी में बुधवार रात चल रहे कार्यक्रम के दौरान विवाद हो गया। पंजाब से आए ईसाई धर्म प्रचारक की ओर से कथित रूप से धर्म परिवर्तन करवाए जाने की सूचना जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को मिली […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/beating-in-case-of-religion-change/article-3183"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/protest-11.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">घायलों को जिला चिकित्सालय में करवाया भर्ती</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>हनुमानगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> सदर पुलिस थाना क्षेत्र के गांव डबलीवास मौलवी में बुधवार रात चल रहे कार्यक्रम के दौरान विवाद हो गया। पंजाब से आए ईसाई धर्म प्रचारक की ओर से कथित रूप से धर्म परिवर्तन करवाए जाने की सूचना जब बजरंग दल के कार्यकर्ताओं को मिली तो वे मौके पर पहुंचे। इससे दोनों पक्षों में हुआ विवाद मारपीट तक पहुंच गया। मारपीट में ईसाई धर्म प्रचारक सहित दो जनों के चोटें आई। विवाद बढ़ने पर सदर थाना प्रभारी डबली पुलिस चौकी पहुंचे तथा दोनों पक्षों से समझाइश की। इस संबंध में देर रात सदर थाने में एक पक्ष की ओर से बजरंग दल के कार्यकर्ताओं पर घर में घुसकर मारपीट करने के आरोप में मामला दर्ज करवाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार राजकीय जिला चिकित्सालय में उपचाराधीन रितीक (26) पुत्र मदनलाल अरोड़ा निवासी वार्ड 18 डबलीवास मौलवी ने पर्चा बयान दिया कि बुधवार रात उनके घर कार्यक्रम हो रहा था। इसमें जालंधर के क्रिश्चियन हरजोत सेठी मौजूद थे, तभी करीब साढ़े नौ बजे बजरंग दल व विश्व हिन्दू परिषद के बूटासिंह सरदार, आशीष, नवजोत खोसा व 20-25 अन्य लोग घर में घुसे तथा पादरी हरजोत सेठी व उनसे मारपीट शुरू कर दी। इससे हरजोत सेठी व उसके चोट आई। पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ भादंसं की धारा 458, 341, 323, 143 में मामला दर्ज कर लिया। दोपहर समाचार लिखे जाने तक वे थाने में डटे हुए थे। पुलिस उप अधीक्षक वीरेंद्र जाखड़ व सदर थाना प्रभारी जगदीश प्रसाद पाण्डर से दोनों पक्षों की वार्ता चल रही थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">धर्मांतरण का आरोप, कार्रवाई की मांग</h3>
<p style="text-align:justify;">उधर, इस संबंध में दूसरे पक्ष की ओर से सदर थाने में प्रार्थना पत्र देकर धर्मांतरण का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्रवाई की मांग की गई है। दीपक जांगू पुत्र राजेंद्र जाट निवासी कालीबंगा ने आरोप लगाया कि डबलीराठान निवासी मदन अरोड़ा व उसकी पत्नी उषा अरोड़ा सहित परिवार के अन्य सदस्यों की ओर से अवैध रूप से धर्मांतरण करवाया जा रहा है।</p>
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                <pubDate>Thu, 17 Aug 2017 07:37:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>थानों में जन्माष्टमी भी नहीं रोक सकता : योगी</title>
                                    <description><![CDATA[सड़कों पर भी होती है नमाज लखनऊ।  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की पिछली सरकार पर निशाना साधते हुए बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर वह ईद के दौरान सड़कों पर अदा की जाने वाली नमाज को नहीं रोक सकते हैं तो उन्हें थानों में मनाए जाने वाले जन्माष्टमी को भी रोकने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/how-i-can-stop-janmashtami-in-the-police-station-yogi/article-3173"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/yogi2.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सड़कों पर भी होती है नमाज</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ।</strong>  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की पिछली सरकार पर निशाना साधते हुए बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर वह ईद के दौरान सड़कों पर अदा की जाने वाली नमाज को नहीं रोक सकते हैं तो उन्हें थानों में मनाए जाने वाले जन्माष्टमी को भी रोकने का अधिकार नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल में गोरखपुर के एक अस्पताल में बच्चों की मौतों के कारण विवादों में रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है, “अगर मैं सड़क पर ईद के दिन नमाज़ पढ़ने से रोक नहीं लगा सकता तो मुझे कोई अधिकार नहीं कि मैं थानों में जन्माष्टमी के पर्व को रोकूं, मुझे इसका कोई अधिकार नहीं है।”</p>
<h2 style="text-align:justify;">सभी धर्म के लोगों को अपनी आस्था का पालन करने की आज़ादी</h2>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ यात्रा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कांवड़ यात्रा के दौरान अधिकारियों ने मुझे बताया कि डीजे और म्यूजिक सिस्टम के इस्तेमाल पर बैन है। मैंने कहा कि ये कांवड़ यात्रा है या शव यात्रा? अरे कांवड़ यात्रा में बाजे नहीं बजेंगे, डमरू नहीं बजेगा, ढोल नहीं बजेगा, चिमटे नहीं बजेंगे, लोग नाचेंगे नहीं, माइक नहीं बजेगा तो वो यात्रा कांवड़ यात्रा कैसे होगी? उन्होंने कहा कि भारत में सभी धर्म के लोगों को अपनी आस्था का पालन करने की आज़ादी है।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान मीडिया में ये खबर आई थी कि जन्माष्टमी पर थानों में त्योहार की आड़ में आरकेस्ट्रा का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिस पर कार्रवाई अखिलेश सरकार ने थानों में जन्माष्टमी मनाने पर रोक लगा दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Aug 2017 03:32:53 +0530</pubDate>
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