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                <title>Tribal - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>पावन भंडारे पर 21 आदिवासी युगलों ने रचाया विवाह</title>
                                    <description><![CDATA[बरनावा (सच कहूँ न्यूज)। डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज के 131वें पावन अवतार दिवस का भंडारा धूमधाम व हर्षोल्लास से मनाया गया। इस अवसर पर सच्चे दाता रहबर पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पावन दर्श-दीदार करने के लिए शाह सतनाम जी धाम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/21-tribal-couple-got-married-on-the-incarnation-day/article-39697"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/tribal-marriage.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बरनावा (सच कहूँ न्यूज)।</strong> डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज के 131वें पावन अवतार दिवस का भंडारा धूमधाम व हर्षोल्लास से मनाया गया। इस अवसर पर सच्चे दाता रहबर पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पावन दर्श-दीदार करने के लिए शाह सतनाम जी धाम सरसा में लाखों की संख्या में साध-संगत पहुँची। शाह सतनाम जी बरनावा आश्रम में आयोजित पावन भंडारे के शुभ अवसर पर राजस्थान के उदयपुर जिला के कोटड़ा व झाडौल से आए 21 आदिवासी युगल विवाह में बंधे।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी युगल चंद मिनटों में ही डेरे की मर्यादानुसार दिलजोड़ माला पहना परिणय सूत्र में बंधे। एक ही मंच पर कुछ ही मिनटों में 21 शादियों का अद्भुत दृश्य देखते ही बनता था। शादी करने वाले समस्त जोड़ों को डेरा सच्चा सौदा द्वारा गठित ब्लाकों की ओर से घरेलु सामान दिया गया। आपको बता दें कि ये आदिवासी कभी समाज की सभ्यता से कोसों दूर, बुराइयों में लिप्त, नग्न अवस्था में रहते थे। पूज्य गुरु जी इन क्षेत्रों में पधारे और इन्हें रहना-सहना, खान-पान सिखाया एवं इन्हें रोजगार के साधन मुहैया करवाये। पूज्य गुरु जी से प्रेरणा पाकर आज उक्त आदिवासी सभ्य जीवन यापन कर रहे हैं। <strong>आइयें देखते हैं आदिवासियों की शादी….</strong></p>
<p><iframe title="Celebrating the Incarnation Day of Shah Mastana Ji Maharaj | Gurmeet Ram Rahim Singh Insan" width="500" height="281" src="https://www.youtube.com/embed/v7EIqQ4mw4U?start=9086&amp;feature=oembed" frameborder="0" allowfullscreen=""></iframe></p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Nov 2022 12:48:12 +0530</pubDate>
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                <title>आदिवासियों की अस्मिता है जंगल</title>
                                    <description><![CDATA[जंगल जो आदिवासियों की अस्मिता है। जहां उनकी जिन्दगी की गुजर-बसर होती है। उस जंगल और जमीन से (Tribal is the Asmita forest) लाखों आदिवासियों को बेदखल होना पड़ेगा। वजह, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने ‘जंगल का अधिकार’ कानून का मोदी सरकार अदालत में ठीक ढंग से बचाव नहीं कर सकी, जिसके […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">जंगल जो आदिवासियों की अस्मिता है। जहां उनकी जिन्दगी की गुजर-बसर होती है। उस जंगल और जमीन से (Tribal is the Asmita forest) लाखों आदिवासियों को बेदखल होना पड़ेगा। वजह, आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बने ‘जंगल का अधिकार’ कानून का मोदी सरकार अदालत में ठीक ढंग से बचाव नहीं कर सकी, जिसके चलते सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि केन्द्र और राज्य सरकारें, जुलाई तक उन सभी आदिवासियों को बेदखल कर दें, जिनके वनभूमि स्वामित्व के दावे खारिज हो गए हैं। जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ में जिसमें जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस इंदिरा भी शामिल थी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करेंगी कि जहां दावे खारिज करने के आदेश पारित कर दिए गए हैं, वहां सुनवाई की अगली तारीख को या उससे पहले निष्कासन शुरू कर दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर उनका निष्कासन शुरू नहीं होता है, तो अदालत उस मामले को गंभीरता से लेगी। बहरहाल मामले की अगली (Tribal is the Asmita forest) सुनवाई 27 जुलाई को है और इस तारीख तक राज्य सरकारों को अदालत के आदेश से आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल करने का काम शुरू कर देना होगा। अदालत के इस आदेश ने देश के छत्तीसगढ़, ओड़िशा, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, असम, त्रिपुरा समेत 16 राज्यों के 10 लाख से ज्यादा आदिवासियों और जंगल में रहने वाले मूल निवासियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वे इस मुश्किल घड़ी में क्या करें ? जिस जंगल पर वे सदियों से रह रहे हैं, उस जंगल की जमीन से अब उन्हें उजाड़ दिया जाएगा। यदि केन्द्र और राज्य सरकारों ने अभी भी कुछ नहीं किया, तो यह पहला मामला होगा, जब देश में जंगलों से इतने बड़े पैमाने पर जनजाति समुदायों को एक साथ बेदखल होना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">शीर्ष अदालत का यह आदेश, एक एनजीओ ‘वाइल्ड लाइफ फर्स्ट’ और दीगर पर्यावरण संगठनों द्वारा दायर की गई याचिका के संबंध में आया है। जिसमें उन्होंने वन अधिकार अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाते हुए, यह मांग की थी कि वे सभी आदिवासी जिनके पारंपरिक वनभूमि पर दावे कानून के तहत खारिज हो गए हैं, उन्हें राज्य सरकारों द्वारा निष्कासित कर दिया जाना चाहिए। ‘जंगल का अधिकार कानून’, संविधान के खिलाफ है और इसकी वजह से जंगलों की कटाई में तेजी आ रही है। बहरहाल जब अदालत में सुनवाई शुरू हुई, तो केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इस कानून पर सरकार का पक्ष सही तरह से नहीं रखा। कई तथ्यों को अदालत में पेश ही नहीं किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">वन अधिकार कानून को चुनौती देने वाली इस याचिका पर वह मूक दर्शक बनी रही। यहां तक कि मामले की पिछली तीन सुनवाई जो पिछले साल मार्च, मई और दिसंबर में हुईं, उसमें केंद्र सरकार की ओर से अदालत के सामने कोई सशक्त दलील पेश नहीं की गई। आखिरी सुनवाई में तो उसने अपने वकीलों को ही नहीं भेजा। जिसकी वजह से अदालत ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए, उसे आदेश दिया कि वह जंगल की जमीनों से अयोग्य दावेदारों को बेदखल कर दे। कांग्रेस नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले कार्यकाल में पारित होने वाले ‘वन अधिकार अधिनियम-2006’ के तहत सरकार को निर्धारित मानदंडों के विरुद्ध आदिवासियों और अन्य वनवासियों को पारंपरिक वनभूमि वापस सौंपना थी। कानून के तहत वे लोग जिनका 13 दिसम्बर, 2005 से पहले वन भूमि पर कब्जा रहा है और वे वहां खेती कर रहे हैं, उन लोगों को जमीन का अधिकार और पट्टा दिया जाए। उन्हें अपने जीवनयापन के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक वन भूमि को जोतने और उसमें रहने का अधिकार होगा। वे लघु वनोपज का संग्रहण, उसका उपयोग और उसे बेच सकेंगे। वहां की ग्रामसभा उन्हें यह अधिकार दे सकती है। बिना ग्रामसभा की इजाजत के सरकार किसी को भी इस जमीन से हटा नहीं सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन वन भूमि से जनजातीय लोगों को असंवैधानिक तरीके से बिना पुनर्वास के हटा दिया गया हो, उस जमीन पर या उस दूसरी जमीन पर उन्हें अधिकार देना होगा। जाहिर है कि आदिवासियों के लिए यह एक क्रांतिकारी कानून था। कानून का मकसद, आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना था। कानून का फायदा आदिवासी समुदाय को हुआ भी। लेकिन कुछ समय बाद ही इस कानून का विरोध होने लगा। वन अधिकारियों के साथ कुछ वन्यजीव समूहों, पर्यावरणविदों और प्रकृति प्रेमियों ने यह कहकर, इस कानून का विरोध किया कि इससे जंगल और वन्यजीवों का जीवन प्रभावित हो रहा है। जंगल उजड़ रहे हैं। जबकि आदिवासी और जनजाति समूह सदियों से जंगल के पहरेदार रहे हैं। जहां-जहां भी आदिवासी हैं, वहां जंगल आज भी संरक्षित हैं। जंगल को यदि किसी ने नुकसान पहुंचाया है, तो वे वो लोग हैं, जिन्हें इसे बचाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। सरकार की वे नीतियां जिम्मेदार हैं, जो विकास के नाम पर जंगल की जमीनों को लगातार निजी पूंजीपतियों को सौंप रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">‘जंगल का अधिकार कानून’ अमल में आने के बाद देश की तमाम राज्य सरकारों के पास जमीन के अधिकार के लिए तकरीबन 42.19 लाख दावे पहुंचे, जिसमें से सिर्फ 18.89 लाख दावों को ही स्वीकार किया गया। बाकी दावे खारिज कर दिए गए। जनजातीय मामलों के मंत्रालय द्वारा एकत्र आंकड़ों के मुताबिक 30 नवंबर, 2018 तक देश भर में 23 लाख दावों को खारिज कर दिया गया था। जाहिर है कि अदालत के आदेश की वजह से देश के लगभग 20 लाख 30 हजार आदिवासी और वनवासी परिवार प्रभावित हो सकते हैं। जो कि छोटी संख्या नहीं है। केन्द्र सरकार को इसके बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि इतने सारे लोगों को उनकी जमीन और घरों से बिना उचित पुनर्वास के उजाड़ दिया गया, तो वे कहां जाएंगे ? उनकी कौन सुनवाई करेगा ? केन्द्र की मोदी सरकार और तमाम बीजेपीशासित राज्य सरकारों ने आदिवासी समुदाय की हमेशा उपेक्षा की है। आलम यह है कि इतने बड़े जनजातीय समुदाय के सम्यक विकास के लिए उसके पास कोई सुसंगत नीति नहीं है। संप्रग द्वितीय सरकार के दौरान प्रोफेसर वर्गीस खाखा की नेतृत्व में आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति जानने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनी थी, जिसने अपनी रिपोर्ट साल 2014 में सरकार को सौंप दी थी। लेकिन इस रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल करना तो दूर, मोदी सरकार ने इस पर ढंग से बात भी नहीं की है।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी समुदाय और जनजाति समूहों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकतार्ओं का कहना है कि वनाधिकार कानून में दावा निरस्त करने का कोई प्रावधान ही नहीं है। वन अधिकार अधिनियम की धारा 4 (5) के तहत किसी भी आदिवासी को बिना किसी उचित प्रक्रिया के बेदखल नहीं किया जा सकता है। वनाधिकार कानून में ग्रामसभा सर्वोच्च संस्था है। व्यक्तिगत दावे के लिए पहले ग्रामसभा को आवेदन देना होता है। यहां से उसे उपमंडलीय अधिकारी को भेजा जाता है। फिर राजस्व और वन विभागीय अधिकारी तय करते हैं कि किसे अधिकार दिया जाए। कानून कहता है कि आवेदन में कोई कमी या गलती है, तो उसे वापस भेजा जाए और आवेदक को दोबारा आवेदन देने के लिए कहा जाए। आवेदन निरस्त नहीं किया जाए। क्योंकि जब किसी आवेदन को ग्रामसभा ने अपनी स्वीकृति दे दी है, तो उसे निरस्त करने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी आधार पर अपना फैसला दिया है कि जिनके दावे निरस्त हो गए हैं, उन्हें बेदखल किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें दावों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया है। आदिवासी और जनजातीय समुदाय के जल, जंगल और जमीन के अधिकार सुनिश्चित रहें, इसके लिए जरूरी है कि मोदी सरकार और तमाम राज्य सरकारें, शीर्ष अदालत के आदेश के खिलाफ अविलम्ब पुनर्विचार याचिका दाखिल करें। ताकि उनके साथ देश में कहीं कोई नाइंसाफी न हो। वे सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें।<br />
लेखक: जाहिद खान</p>
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                <pubDate>Fri, 01 Mar 2019 12:49:25 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आदिवासी की अनदेखी करना भाजपा को पड़ा भारी</title>
                                    <description><![CDATA[केवल तीन सीटों पर करना पड़ा संतोष | Tribal MP झाबुआ (एजेंसी)। सत्ता में रहते मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आदिवासियों की अंदेखी करना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मंहगा पड़ा और उसे इस चुनाव में इन आदिवासी (Tribal MP) बाहुल्य 29 सीटों में से केवल तीन सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। आदिवासी बाहुल्य […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ignorance-to-tribal-mp-results-in-heavy-loss-to-bjp/article-6934"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/tribal-mp.jpg" alt=""></a><br /><h2>केवल तीन सीटों पर करना पड़ा संतोष | Tribal MP</h2>
<p><strong>झाबुआ (एजेंसी)।</strong> सत्ता में रहते मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में आदिवासियों की अंदेखी करना भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मंहगा पड़ा और उसे इस चुनाव में इन आदिवासी (Tribal MP) बाहुल्य 29 सीटों में से केवल तीन सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।</p>
<p>आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र झाबुआ और आलिराजपुर जिले के अलावा धार, बडवानी, खरगौन और खंडवा में भाजपा की बाजी पलटी। चुनाव से पूर्व ही यह चेतावनी दे दी गई थी कि आदिवासी क्षेत्रों की 29 सीटों पर भाजपा ने अगर अनदेखी की तो उसके हाथ से सत्ता की चाबी छिन जायेगी। साथ ही इन क्षेत्रों में भाजपा के परचम को फहराने वाले आदिवासियों के नेता एवं सांसद स्वर्गीय दिलीप सिंह भूरिया की अनदेखी भी भाजपा के लिये हानिकारक रही है।</p>
<p>आदिवासियों ने झाबुआ जिले की तीन विधानसभा सीटों में से थांदला, पेटलाद तथा अलीराजपुर की दो विधानसभा सीटों में से आलिराजपुर और जोबट दोनों पर कांग्रेस को विजयी बनाया। सिर्फ झाबुआ सीट पर कांग्रेस के बागी जेवियर मेडा ने 32 हजार से अधिक वोट लेकर कांग्रेस का खेल बिगाड दिया। इसके चलते यहां से भाजपा के गुमानसिंह डामोर ने दस हजार से अधिक मतों से जीत दर्ज कर जिले में भाजपा की लाज बचा ली।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Dec 2018 16:30:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का उभार</title>
                                    <description><![CDATA[मध्यप्रदेश में जयस यानी जय आदिवासी युवा शक्ति जैसे संगठन की सक्रियता दोनों पार्टियों को बैचैन कर रही है। डेढ़ साल पहले आदिवासियों के अधिकारों की मांग के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज अबकी बार आदिवासी सरकार के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। जयस द्वारा निकाली […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/tribal-consciousness-emerges-in-madhya-pradesh-politics/article-5915"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/tribal-consciousness-emerges-in-madhya-pradesh-politics.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश में जयस यानी जय आदिवासी युवा शक्ति जैसे संगठन की सक्रियता दोनों पार्टियों को बैचैन कर रही है। डेढ़ साल पहले आदिवासियों के अधिकारों की मांग के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज अबकी बार आदिवासी सरकार के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। जयस द्वारा निकाली जा रही आदिवासी अधिकार संरक्षण यात्रा में उमड़ रही भीड़ इस बात का इशारा है कि बहुत ही कम समय में यह संगठन प्रदेश के आदिवासी सामाज में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा है. जयस ने लम्बे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में अपना वजूद तलाश रहे आदिवासी समाज को स्वर देने का काम किया है। आज इस चुनौती को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां महसूस कर पा रही हैं और उन्हें नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है। 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में भाजपा को 32 तथा कांग्रेस को 15 सीटों मिली थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
2013 में ही डॉ. हीरा लाल अलावा द्वारा जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) का गठन किया गया था जिसके बाद इसने बहुत तेजी से अपने प्रभाव को कायम किया है। पिछले साल हुये छात्रसंघ चुनावों में जयस ने एबीवीपी और एनएसयूआई को बहुत पीछे छोड़ते हुए झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी। आज पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों अलीराजपुर, धार, बड़वानी और रतलाम में जयस की प्रभावी उपस्थिति लगातार है यह क्षेत्र यहां भाजपा और संघ परिवार का गढ़ माना जाता था।</p>
<p style="text-align:justify;">
जयस की विचारधारा आरएसएस के सोच के खिलाफ है, ये खुद को हिन्दू नहीं मानते हंै और इन्हें आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी ऐतराज है। खुद को हिंदुओं से अलग मानने वाला यह संगठन आदिवासियों की परम्परागत संस्कृति के संरक्षण और उनके अधिकारों के नाम पर आदिवासियों को अपने साथ जोड़ने में लगा है। यह संगठन आदिवासियों की परम्परागत पहचान, संस्कृति की संरक्षण व उनके अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता उठता है। जयस का मुख्य जोर 5वीं अनुसूचि के सभी प्रावधानों को लागू कराने में हैं, दरअसल भारतीय पांचवी अनुसूचि की धारा 244(1) के तहत आदिवासियों को विशेषाधिकार दिए गये हैं जिन्हें सरकारों ने लागू नहीं किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
मध्यप्रदेश में आदिवासी की स्थिति खराब है, शिशु मृत्यु और कुपोषण सबसे ज्यादा आदिवासी बाहुल्य जिलों में देखने को मिलता है, इसकी वजह यह है कि सरकार के नीतियों के कारण आदिवासी समाज अपने परम्परागत संसाधनों से लगातार दूर होता गया है, विकास परियोजनाओं की वजह से वे व्यापक रूप से विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हुए हैं और इसके बदले में उन्हें विकास का लाभ भी नहीं मिला, वे लगातार गरीबी व भूख के दलदल में फंसते गये हैं. भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट आफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनामिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस आफ ट्राइबल कम्यूनिटी 2014 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवसी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 113 है, इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है वही प्रदेश में यह दर 175 है, आदिवासी समुदाय में टीकाकरण की स्थिति चिंताजनक है।</p>
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दूसरी तरफ स्थिति ये है कि पिछले चार सालों के दौरान मध्य प्रदेश सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए आवंटित बजट में से 4800 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं कर पायी है। 2015 में कैग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी आदिवासी बाहुल्य राज्यों की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए गए थे। उपरोक्त परिस्थितियों ने जयस जैसे संगठनों के लिये जमीन तैयार करने का काम किया है। इसी परिस्थिति का फायदा उठाते हुए जयस अब आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी में है। इसके लिये वे आदिवासी समूहों के बीच एकता की बात कर रहे हैं जिससे राजनीतिक दबाव समूह के रूप में चुनौती पेश की जा सके। डॉक्टर अलावा कहते है कि जयस एक्सप्रेस का तूफानी कारवां अब नही रुकने वाला है। हमने बदलाव के लिए बगावत की है और किसी भी कीमत पर बदलाव लाकर रहेंगे।</p>
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‘जयस’ ने 29 जुलाई से आदिवासी अधिकार यात्रा शुरू की है जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग जुड़ भी रहे हैं। जाहिर है अब ‘जयस’ को हलके में नहीं लिया जा सकता है, आने वाले समय में अगर वे अपने इस गति को बनाये रखने में कामयाब रहे तो मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वहीं कांग्रेस भी आदिवासियों को अपने खेमे में वापस लाने के लिये रणनीति बना रही है। आने वाले समय में मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का यह उभार नए समीकरणों को जन्म दे सकता है और इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। बस देखना बाकी है कि भाजपा व कांग्रेस में से इसका फायदा कौन उठता है या फिर इन दोनों को पीछे छोड़ते हुये सूबे की सियासत में कोई तीसरी धारा उभरती है। <em>जावेद अनीस</em></p>
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                <pubDate>Fri, 14 Sep 2018 13:25:34 +0530</pubDate>
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                <title>भारत में आदिवासी उपेक्षित क्यों है?</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-is-tribal-neglected-in-india/article-5257"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/adiwasi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस सिर्फ उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व, संघर्ष, हक-अधिकारों और इतिहास को याद करने के साथ-साथ जिम्मेदारियों और कर्तव्यों की समीक्षा करने का भी दिन है। आदिवासियों को उनके अधिकार दिलाने और उनकी समस्याओं का निराकरण, भाषा संस्कृति, इतिहास आदि के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 9 अगस्त 1994 में जेनेवा शहर में विश्व के आदिवासी प्रतिनिधियों का विशाल एवं विश्व का प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन आयोजित किया। इसके बाद विश्व के सभी देशों में अंतरराष्ट्रीय आदिवासी दिवस को मनाया जाने लगा, पर अफसोस भारत के आदिवासी समुदाय आज भी उपेक्षित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासी समाज का अपनी धरोहर, अपने पारंपरिक सामाजिक मूल्यों और अधिकारों के साथ ही विकास हो, इसके लिए भारतीय संविधान ने प्रावधान किये गये हैं। आदिवासी समाज को जल-जंगल-जमीन विहीन होने से बचाने के लिए कानून भी बनाये गये। ये कानून न तो अंग्रेजों का उपहार है और न ही भारत के शासकों की आदिवासी हित-चिंता के प्रमाण हंै। बल्कि यह आदिवासी नायकों जैसे बिरसा मुंडा, तात्या टोपे के संघर्ष की देन है। आजाद भारत में आदिवासी समुदाय को वोट बैंक मानते हुए सरकारें उनके कल्याण की योजनाएं एवं कानून तो बनाती रही हैं, लेकिन हर बार आदिवासी समाज ठगा ही गया है, उसके प्रतिकूल ही हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">जल, जंगल और जमीन के मालिक आदिवासी हैं, इससे इनका अस्तित्व जुड़ा है। यूएनओ ने भी माना है कि इस पर आदिवासियों का हक है। यही नहीं, जमीन के अंदर के खनिज के मालिक भी आदिवासी हैं। भारत सरकार एवं प्रांतों की सरकारें आदिवासियों के हितों की बात तो बहुत करती हैं, लेकिन इनके भविष्य को बचाने के लिए गंभीरता नहीं दिखाती।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी समुदाय की जमीनों पर ही सरकारों की नजरें टिकी रहती हैं। जंगल के जंगल उजड़ रहे हैं। आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल हो रहे हैं सरकार मानने के लिए तैयार ही नहीं है कि आदिवासियों का भविष्य जमीन से जुड़ा है। आजादी के बाद देश का विकास हुआ, विकास होना भी चाहिए, लेकिन इसकी सबसे ज्यादा कीमत आदिवासियों ने चुकायी, बोकारो स्टील हो, एचइसी हो, राउरकेला स्टील प्लांट हो, सभी जगह उस क्षेत्र के आदिवासी विस्थापित हुए, आज इनकी हालत कोई इन गांवों में जाकर देखे, जमीन से बेदखल होने के बाद आदिवासी कहीं के नहीं रहे, विस्थापन का ख्याल सरकारों ने नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">बल्कि सरकारें इसके विपरीत रणनीतियां बना रही हैं। ऐसी ही कुचेष्ठा गुजरात में होती रही है। असंवैधाानिक एवं गलत आधार पर गैर-आदिवासी को आदिवासी सूची में शामिल किये जाने एवं उन्हें लाभ पहुंचाने की गुजरात की वर्तमान एवं पूर्व सरकारों की नीतियों का विरोध इनदिनों गुजरात में आन्दोलन का रूप ले रहा है। सौराष्ट्र के गिर, वरड़ा, आलेच के जंगलों में रहने वाले भरवाड़, चारण, रबारी एवं सिद्धि मुस्लिमों को इनके संगठनों के दवाब में आकर गलत तरीकों से आदिवासी बनाकर उन्हें आदिवासी जाति के प्रमाण-पत्र दिये गये, इस ज्वलंत एवं आदिवासी अस्तित्व एवं अस्मिता के मुद्दे पर सत्याग्रह हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनेक कांग्रेसी एवं भाजपा के आदिवासी नेता भी उसमें शामिल हैं। गुजरात के आदिवासी जनजाति से जुड़े राठवा समुदाय में उनको आदिवासी न मानने को लेकर गहरा आक्रोश है। इन विकराल होती संघर्ष की स्थितियों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह न केवल गुजरात सरकार बल्कि केन्द्र सरकार एवं अन्य प्रांतों की सरकारों के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में सम्पन्न गुजरात विधानसभा के चुनाव में आदिवासी समाज की नाराजगी का साफ असर दिखाई दिया। अन्यथा भाजपा जिस शानदार जीत का दावा कर रही थी, वह संभव हो सकता था। हर बार चुनाव के समय आदिवासी समुदाय को बहला-फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति इस बार असरकारक नहीं रही। क्योंकि गुजरात का आदिवासी समाज बार-बार ठगे जाने के लिए तैयार नहीं है। इस प्रांत की लगभग 23 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है। देश के अन्य हिस्सों की तरह गुजरात के आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन-यापन करने को विवश हैं। यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी समुदाय को बांटने और तोड़ने के व्यापक उपक्रम चल रहे हैं जिनमें अनेक राजनीतिक दल अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तरह-तरह के घिनौने एवं देश को तोड़ने वाले प्रयास कर रहे हैं। आदिवासियों के उज्ज्वल एवं समृद्ध चरित्र को धुंधलाकर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों के खिलाफ हो रहे आन्दोलन को राजनीतिक नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">तेजी से बढ़ते आदिवासी समुदाय को विखण्डित करने का यह बिखरावमूलक दौर देश के लिये गंभीर समस्या बन सकता है। एक समाज और संस्कृति को बचाने की मुहिम के साथ कोई अभिनव योजना या घोषणा अन्तर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस पर केन्द्र सरकार करें जिससे आदिवासी समुदाय के लिये कोई सकारात्मक जमीन तैयार हो सके, ऐसी अपेक्षा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के सात दशक बाद भी देश के आदिवासी उपेक्षित, शोषित और पीड़ित नजर आते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ और नेता आदिवासियों के उत्थान की बात करते हैं, लेकिन उस पर अमल नहीं करते। आज इन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वरोजगार एवं विकास का जो वातावरण निर्मित होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है, इस पर कोई ठोस आश्वासन इन निर्वाचित सरकारों से मिलना चाहिए,</p>
<p style="text-align:justify;">वह भी मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अक्सर आदिवासियों की अनदेखी कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ लेने वाली बातों को हवा देना एक परम्परा बन गयी है। इस परम्परा को बदले बिना देश को वास्तविक उन्नति की ओर अग्रसर नहीं किया जा सकता। देश के विकास में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस भूमिका को सही अर्थों में स्वीकार करना वर्तमान की बड़ी जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">मूल बात है कि आज भी आदिवासी दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवनयापन क्यों करने को विवश हैं। जबकि केंद्र सरकार आदिवासियों के नाम पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान बजट में करती है। इसके बाद भी 7 दशक में उनकी आर्थिक स्थिति, जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं आया है। स्वास्थ्य सुविधाएँ, पीने का साफ पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं आदि मूलभूत सुविधाओं के लिए वे आज भी तरस रहे हैं। जिस प्रांत से प्रधानमंत्री एवं भाजपा अध्यक्ष आते हों, उस प्रांत में आदिवासी समुदाय की उपेक्षा और उनकी स्थिति डांवाडोल होना एक गंभीर चुनौती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आदिवासी जन-जाति के साथ हो रहा सत्ता का उपेक्षापूर्ण व्यवहार गुजरात के समृद्ध एवं विकसित राज्य के तगमे पर एक प्रश्नचिन्ह है। देश में यह कैसी समृद्धि है और यह कैसा विकास है जिसमें आदिवासी अब भी समाज की मुख्य धारा से कटे नजर आते हैं। सरकार आदिवासियों को लाभ पहुंचाने के लिए उनकी संस्कृति और जीवन शैली को समझे बिना ही योजना बना लेती है। ऐसी योजनाओं का आदिवासियों को लाभ नहीं होता, अलबत्ता योजना बनाने वाले जरूर फायदे में रहते हैं। महँगाई के चलते आज आदिवासी दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी नहीं खरीद पा रहे हैं। वे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। अत: देश की बहुसंख्य आबादी आदिवासियों पर विशेष ध्यान देना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">गणि राजेन्द्र विजय</p>
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                <pubDate>Wed, 08 Aug 2018 19:40:58 +0530</pubDate>
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