<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/achievements/tag-8644" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Achievements - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/8644/rss</link>
                <description>Achievements RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>देश का विकास और वास्तविक दशा</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर का यह बयान वास्तव में (Development of country) आश्चर्यचकित करने वाला है कि हम किसी भी विकसित देश के समकक्ष हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो विश्व के किसी भी विकसित देश के पास है। शायद देश के गरीब, […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/development-and-actual-situation-of-the-country/article-61276"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-08/sitchuation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर का यह बयान वास्तव में (Development of country) आश्चर्यचकित करने वाला है कि हम किसी भी विकसित देश के समकक्ष हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि भारत के पास वह सब कुछ है जो विश्व के किसी भी विकसित देश के पास है। शायद देश के गरीब, वंचित, बेरोजगार और नाखुश करोड़ों लोगों को आश्वासन देने के लिए उनका यह बयान सही है जो दिन-रात अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न केवल ठाकुर अपितु प्रधानमंत्री भी देश की उपलब्धियों को गिना रहे हैं किंतु वे इस जमीनी वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि न केवल गरीबी अपितु सामाजिक विद्वेष, हिंसा और घृणा हाल के समय में देश में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ठाकुर के इस बयान के साथ ही 30 मार्च को विश्व हैपिनेस रिपोर्ट जारी हुई (Development of country) जिसमें भारत 137 देशों में 126वें स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र सस्टेनेबल डेवलपमेंट सोलुशन नेटवर्क द्वारा प्रकाशित यह रिपोर्ट 150 देशों के लोगों के बारे में जुटाए गए आंकडों पर आधारित है और इस रिपोर्ट के अनुसार खुशहाली के मामले में भारत, यूक्रेन, इराक, फिलीस्तीन, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे युद्धरत और लगभग दिवालिया देशों से पीछे है। वस्तुत: एशिया में भारत की स्थिति केवल अफगानिस्तान से बेहतर है जो 137वें स्थान पर है। पिछले वर्ष ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 121 देशों में से 107वें स्थान पर था और वह कोरिया, इथोपिया, सूडान, रवांडा, नाइजीरिया और कांगो जैसे देशों से पीछे था। यह किसी विकसित देश का लक्षण नहीं है और यह बताता है कि विकास समाज के सबसे निचले स्तर तक नहीं पहुंचा है।</p>
<h3>खाद्यान्न से वंचित लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">देश में कुछ विशेषज्ञ इस नेटवर्क द्वारा खुशहाली के मापन के बारे में प्रश्न उठाते हैं। यह माना जाता है कि प्रति व्यक्ति आय, भ्रष्टाचार, सामाजिक कल्याण लाभ और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता इत्यादि के आधार पर इस खुशहाली का मापन किया जाता है और इसका कोई कारण नहीं है कि इन मानदंडों पर प्रश्न क्यों उठाए जाए क्योंकि लोगों को खुशहाल रखने में आर्थिक और सामाजिक कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं किंतु देश में असमानता, आय में बढ़ती विषमता, व्यापक भ्रष्टाचार, सामाजिक घृणा, हिंसा आदि सामाजिक संबंधों को अस्थिर कर रहे हैं। इस अध्ययन में यह भी बताया गया है कि खाद्यान्न से वंचित लोगों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है। इसमें पाया गया है कि 6 माह से 23 माह की आयु के बच्चों में पर्याप्त कैलोरी युक्त भोजन की अनुलब्धता वाले बच्चों की संख्या जहां 2016 में 17.2 प्रतिशत थी वह बढ़कर 2021 में 17.8 प्रतिशत पहुंच गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हार्वर्ड स्कूल आॅफ पब्लिक हेल्थ के डॉक्टर डॉ. एसवी सुब्रमणियम के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यह आंकड़ा असामान्य और अनपेक्षित है। अनुसंधानकर्ताओं ने यह आंकड़ा सरकार के परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण से लिया है और जिन्होंने कहा है कि उन बच्चों के बारे में पहला आकलन किया है जिन्हें बिल्कुल भोजन नहीं मिलता है और यह बताता है कि देश के सबसे अधिक गरीब और कमजोर घरों को भोजन उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। अधिकतर राज्यों में ऐसे बच्चों की संख्या में गिरावट आई है किंतु उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या में 10 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 12.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश में ऐसे बच्चों की संख्या 27.4 प्रतिशत और छत्तीसगढ में 24.6 प्रतिशत, झारखंड में 21 प्रतिशत, राजस्थान में 19.8 प्रतिशत और असम में 19.4 प्रतिशत है।</p>
<h3>भारत में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद 80 प्रतिशत लोगों को नुकसान हुआ</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रो. सुब्रमणिम ने कहा है कि यह आंकडा असामान्य और अनपेक्षित है। हमें यह अपेक्षा नहीं है कि छह माह से 23 माह के बच्चों को पूरे 24 घंटे भोजन न मिले। इस संबंध में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा हाल ही में किए गए ट्वीट को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा है कि देश में गरीब लोगों की आय में 50 प्रतिशत, मध्यम वर्ग की आय में 10 प्रतिशत की गिरावट आई है और धनी लोगों की आय में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में कोरोना महामारी शुरू होने के बाद 80 प्रतिशत लोगों को आय का नुकसान हुआ है। राहुल का कहना है कि गरीब और गरीब होते जा रहे हैं और धनी और धनी होते जा रहे हैं तथा आॅक्सफेम की रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की है। ऐसे अनेक मामले देखने को मिल जाएंगे जो गरीब और वंचित वर्गों की स्थिति पर प्रकाश डालते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसा कि मैंने अनेक लेखों में लिखा है कि योजनाकारों द्वारा विकास को सही ढंग से नहीं समझा जा रहा है क्योंकि किसी भी परियोजना के लाभार्थियों की संख्या को ध्यान में नहीं रखा जाता है। बहुप्रचारित ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम का विस्तार नहीं किया जा रहा है और दूसरी ओर इसके लिए बजट में कटौती की जा रही है। इस योजना के लिए उपलब्ध कराया गया बजट साल में 35 दिन से अधिक का रोजगार देने के लिए पर्याप्त नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई ने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक-द पालिटिक्स आॅफ पॉलिटिकल इकोनोमी: हाउ इकोनोमिक्स अबंडन्ड द पूअर में मानवीय मूल्यों पर आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर बल दिया है। वे सभी लोगों के लिए बुनियादी आय के प्रावधान की बात करते हैं और इसे व्यावहारिक बनाने के बारे में अपने कुछ सुझाव देते हैं। सार्वभौम बुनियादी आय के विचार के वितरण के लिए संसाधन जुटाने की वित्तीय कठिनाई और कार्य करने के लिए लोगों को प्रोत्साहन की संभावना के आधार पर विरोध किया जा रहा है।</p>
<h3>दफ्तरों में बैठे हुए राजनेता वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि पूंजीवाद के माध्यम से पूर्ण रोजगार या गरीबी का उन्मूलन संभव नहीं है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता है जो उन निहित स्वार्थों के चंगुल से मुक्त हो जो समाज में गरीबी और असमानता बनाए रखना चाहते हैं। राजनीतिक नेताओं द्वारा बडे-बडे दावों से अशिक्षित और अर्धशिक्षित लोग प्रभावित हो सकते हैं किंतु उनका शिक्षित वर्गों पर कोई प्रभाव नहीं पडता है। कई बार यह देखकर हैरानी होती है कि दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में आलीशान दफ्तरों में बैठे हुए राजनेता या तो जमीनी वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं या वे अनभिज्ञ बने रहना चाहते हैं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए समुचित और संतुलित आहार के अभाव, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण ग्रामीण क्षेत्र के लोग अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। सामाजिक-आर्थिक मानदंडों में गिरावट आ रही है। देश के वास्तविक भविष्य की परवाह किए बिना किसी भी कीमत पर वोट प्राप्त करने की वर्तमान प्रणाली एक बड़ी भूल है और यह कार्य हर सत्तारूढ़ सरकार द्वारा किया जा रहा है। प्रश्न उठता है कि यह स्थिति कब तक जारी रहेगी।</p>
<p style="text-align:right;">धुर्जति मुखर्जी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</p>
<h3 class="entry-title td-module-title"><a title="हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन में तकरार, बचेगी या रहेगी 2024 में भाजपा सरकार?" href="http://10.0.0.122:1245/dispute-has-increased-in-bjp-jjp-alliance-in-haryana/">हरियाणा में बीजेपी-जेजेपी गठबंधन में तकरार, बचेगी या रहेगी 2024 में भाजपा सरकार?</a></h3>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/development-and-actual-situation-of-the-country/article-61276</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/development-and-actual-situation-of-the-country/article-61276</guid>
                <pubDate>Tue, 20 Aug 2024 16:20:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-08/sitchuation.jpg"                         length="112297"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वतंत्रता बाद की उपलब्धियां और चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी के सात दशक बाद भी यह सवाल जेरेबहस है कि आजादी की जंग के दौरान जो सपने बुने-गढ़े गए थे क्या वे पूरे हुए हैं? क्या समाज के अंतिम पांत का अंतिम व्यक्ति आजादी के लक्ष्य को हासिल कर लिया है? दो राय नहीं कि आजादी के बाद इन सात दशकों में देश ने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/later-achievements-and-challenges-of-independence/article-5394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजादी के सात दशक बाद भी यह सवाल जेरेबहस है कि आजादी की जंग के दौरान जो सपने बुने-गढ़े गए थे क्या वे पूरे हुए हैं? क्या समाज के अंतिम पांत का अंतिम व्यक्ति आजादी के लक्ष्य को हासिल कर लिया है? दो राय नहीं कि आजादी के बाद इन सात दशकों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है और वैश्विक जगत में भारत का परचम लहराया है। पर गौर करने वाली बात यह है कि देश आज भी गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से उबर नहीं पाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि इन सात दशकों की उपलब्ध्यिों और चुनौतियों का मूल्यांकन हो। अगर उपलब्धियों की बात करें तो नि:संदेह देश प्रगति की राह पर अग्रसर है। देश की अधिकांश आबादी जो कृषि कार्य से जुड़ी है उनकी जीवन शैली में बदलाव हुआ है और किसानों की हालत सुधरी है। फसलों की उत्पादकता बढ़ी है और राष्ट्रीय आय का लगभग 28 प्रतिशत भाग कृषि आय से प्राप्त हो रहा है। कृषि कार्य हेतु भूमि उपयोग बढ़कर 43.05 प्रतिशत हो गया है। सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और बिचैलियों की भूमिका समाप्त होने से किसानों को उनके उत्पादों की अच्छी आय मिलने लगी है और उत्तम कृषि उत्पादन ने अर्थव्यवस्था और उद्योग-धंधों का विस्तार किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां लघु एवं कुटीर उद्योगों ने हर हाथ को काम दिया है वहीं बड़े पैमाने के उद्योगों ने रोजगार सृजन के साथ तीव्र औद्योगीकरण की नींव को मजबूत की है। औद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने भारतीय शिक्षा, विज्ञान व संचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। आज देश में कई विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और तकनीकी संस्थान हैं जिनकी बदौलत भारतीय छात्र देश-दुनिया में रोज नए-नए इनोवेशन कर रहे हैं। विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन-इसरो ने कीर्तिमान रच दिया है। अब इसरो के जरिए स्वदेशी उपग्रहों के साथ कई विदेशी उपग्रह एक साथ भेजे जा रहे हैं। इन सात दशकों में देश में सामाजिक सुरक्षा व सेवाओं का भी विस्तार हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए आज देश में पोषण सुरक्षा की देखभाल राष्ट्रीय तैयार मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम, समन्वित बाल विकास योजना, किशोरी शक्ति योजना, किशोर लड़कियों के लिए पोषण कार्यक्रम और प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना चलायी जा रही है। राष्ट्रीय तैयार मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम लगभग पूरे भारत में चल रहा है। समन्वित बाल विकास योजना का विस्तार भी चरणबद्ध ढंग से हो रहा है। 11 से 18 वर्ष तक की उम्र की लड़कियों के पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी विकास के लिए सरकार ने किशोरी शक्ति विकास योजना को हर जगह लागू किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अरसे से श्रम आंदोलन के तहत सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम लागू करने की मांग की जाती रही जिसे सरकार ने 2005 के मध्य में लागू कर दिया। इस अधिनियम के तहत कोई भी वयस्क व्यक्ति जो न्यूनतम मजदूरी पर आकस्मिक श्रम करने के लिए इच्छुक है वह 15 दिनों के अंदर स्थानीय जनकार्य में रोजगार पाने के लिए पात्र होगा। इसके अंतर्गत लोगों को वर्ष में उसके निवास से एक किमी के भीतर 100 दिनों का काम दिए जाने का प्रावधान लागू किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्यों के अंतरगत लक्षित जन वितरण प्रणाली के तहत पहचान किए गए गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों में से, अत्यंत ही गरीब एक करोड़ परिवारों की पहचान करने का कार्य अंत्योदय योजना के तहत किया गया है। इन परिवारों को 2 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से गेहूं और 3 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से चावल मुहैया कराया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के तहत रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन रणनीति के तहत सरकार द्वारा स्वरोजगार योजना और दिहाड़ी रोजगार योजना चलाया जा रहा है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग को संशोधित कर लघु एवं ग्रामीण उद्योगों के जरिए ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन करने के लिए सुनिश्चित किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">असंगठित क्षेत्र को सामाजिक सुरक्षा से लैस करने के लिए राश्ट्रीय उद्यम आयोग की स्थापना एक पारदर्शी निकाय के रुप में की गयी है। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि आज भी देश जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी और लैंगिक असमानता से मुक्त नहीं हो पाया है। देश की एक बड़ी आबादी आज भी जीवन की मूलभूत सुविधाओं मसलन रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित है। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि देश में 27 करोड़ लोग गरीब हैं। 68 करोड़ लोग ऐसे हैं जो बुनियादी सुविधाओं से महरुम हैं। आर्थिक विषमता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीका की तुलना में भारत में दोगुने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। कुपोषण के शिकार पांच साल से कम उम्र के चार करोड़ बच्चों का शारीरिक विकास नहीं हो पाया है। शिशु मृत्यु दर की हालात और भयावह है। 2015 में देश में पैदा होने वाले प्रति हजार बच्चों पर 37 बच्चों की मृत्यु हुई। बच्चे किस्म-किस्म की गंभीर बीमारियों की चपेट में हैं। मेटरनल मॉर्टेलिटिी रेशियो (एमएमआर) और इंटरनेशनल प्रेग्नेंसी एडवाइजरी सर्विसेज की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में असुरक्षित गर्भपात से हर दो घंटे में एक स्त्री मर रही है। गांवों में डॉक्टरों की भारी कमी है। 90 फीसद गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर कड़े कानून के बाद भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">लैंगिंक असमानता जस की तस बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र की ह्यद वर्ल्डस वीमेन 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र की लड़कियों की मौत इसी उम्र के लड़कों की तुलना में ज्यादा होती है। लेकिन अगर श्रम बल में महिलाओं की संख्या को पुरुषों की संख्या के समान की जाए तो भारत की जीडीपी 27 फीसद तक बढ़ सकती है। सख्त कानूनों के बावजूद भी इस समय देश में सवा करोड़ से अधिक बाल श्रमिक मौजूद हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं स्वीकार चुका है कि उसके पास बालश्रम के हजारों मामले दर्ज हैं। रोजगार के मामले में भी स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। श्रम मंत्रालय की श्रम ब्यूरो द्वारा जारी सर्वेक्षण के मुताबिक भारत में बेरोजगारी की दर में लगातार वृद्धि हो रही है। 2016 में बेरोजगारों की संख्या 1.77 करोड़ थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस साल यह संख्या 1.78 करोड़ और 2018 में 1.8 करोड़ हो सकती है। यह राहतकारी है कि भारत सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए सन 2022 तक 40 करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। शिक्षा की बात करें तो शिक्षा का अधिकार कानून तथा सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं के बावजूद भी लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर हैं। कुल सरकारी खर्च का 20 फीसद हिस्सा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए। लेकिन इस मद में 4 फीसद तक भी ही खर्च नहीं हो पा रहा। न्यायिक मोर्चे पर भी अपेक्षित सफलता हासिल नहीं हो रही है। शीध्र व सस्ता न्याय की चुनौती जस की तस बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2015 तक सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों सहित देश की सभी अदालतों में 2.64 करोड़ मुकदमें लंबित थे। मुकदमों के निस्तारण में दशकों का वक्त लग रहा है। पर्यावरण के मोर्चे पर भी हालात संतोषजनक नहीं हैं। दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में देश की राजधानी दिल्ली शीर्ष पर है। देश में सालाना 12 लाख से अधिक लोगों की मौत प्रदूषण से होती है। 2015 में वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी 6.3 फीसद रही।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में सड़क हादसे से हर वर्ष लाखों लोग काल के मुंह में जा रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक देश में सड़क नियम का पालन न होने से पिछले एक दशक में 13 लाख से अधिक लोग सड़क हादसों में मारे गए हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि लोकतंत्र का मंदिर संसद भी अपने उत्तरदायित्वों के प्रति गंभीर नहीं है। संसद में कामकाज का समय घटता जा रहा है और गैरजरुरी मसलों पर समय जाया किया जा रहा है। देश के राजनेताओं और जनमानस दोनों को समझना होगा कि देश महान व समृद्ध तभी बनेगा जब आजादी के लक्ष्य को हासिल किया जाएगा।</p>
<p> </p>
<p><strong>अरविंद जयतिलक</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/later-achievements-and-challenges-of-independence/article-5394</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/later-achievements-and-challenges-of-independence/article-5394</guid>
                <pubDate>Thu, 16 Aug 2018 11:56:55 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-08/day.jpg"                         length="50843"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        