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                <title>Language - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>बिना माहौल के अंग्रेजी बोलना कैसे सीखें? गुरु जी ने बताया शानदार तरीका</title>
                                    <description><![CDATA[बरनावा। पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां आॅनलाइन गुरूकुल के माध्यम से युवाओं से रूबरू हुए। इस दौरान पूज्य गुरू जी ने युवाओं द्वारा पूछे गए विभिन्न सवालों के जवाब देकर उनकी जिज्ञासा को शांत किया। इसके साथ ही युवाओं को जीवन में आने वाली परेशानियों से मुक्त जीवन जीने के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/saint-dr-msg-tips-for-english-language/article-40952"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-12/msg-language-tips.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बरनावा।</strong> पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां आॅनलाइन गुरूकुल के माध्यम से युवाओं से रूबरू हुए। इस दौरान पूज्य गुरू जी ने युवाओं द्वारा पूछे गए विभिन्न सवालों के जवाब देकर उनकी जिज्ञासा को शांत किया। इसके साथ ही युवाओं को जीवन में आने वाली परेशानियों से मुक्त जीवन जीने के टिप्स भी दिए।</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>सवाल : गुरू जी मैं इंग्लिश नहीं बोल पाती, क्योंकि बचपन में ऐसा माहौल नहीं मिला। गुरू जी मुझे इंग्लिश आती तो है लेकिन विल पावर कम है तो मैं अपनी इंग्लिश और फ्लूएंसी कैसे इम्प्रूव करूं?</strong></h5>
<p style="text-align:justify;"><strong>पूज्य गुरू जी का जवाब :</strong> हम बच्चों को कहा करते हैं हमेशा कि अगर आपको अपनी माँ की भाषा नहीं आती तो वो दु:ख की बात है। अगर कोई और लैंग्वेज है तो डरो मत, आप अपने यार, दोस्त, मित्रों में फर्राटेदार बोलने की कोशिश करो। कुछ झिझक आएगी, क्योंकि वहां कोई आपकी रिकॉर्डिंग नहीं हो रही है, वहां ऐसा कुछ नहीं है कि इसमें आपकी बेइज्जती हो जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यार, दोस्तों में, परिवार में या कोई अच्छा बोलने वाला है उसके साथ शुरू कर दीजिये, मत झिझकिए, क्योंकि ये आपकी माँ की भाषा नहीं है, मातृभाषा आना बहुत जरूरी है, वो आप सबको आती है, हमें भी आती है। तो रही बात थर्ड लैंग्वेज की, जो किसी और की लैंग्वेज है, हमारी नहीं, हमारी क्योंकि माँ की नहीं, बाप की नहीं। तो उस लैंग्वेज को बोलते टाइम शर्माओ मत अगर आपको आती है, झिझको मत। अपने यार, दोस्तों में, मित्रों में, सहेलियों में, अपने माँ-बाप के साथ, बहन-भाई के साथ धड़ल्ले से बोलो तो यकीनन आपकी झिझक भी खुल जाएगी और यही जब आप किसी समाज में जाएंगे या किसी इंटरव्यू पर जाएंगे तो आपका एक बेस बन जाएगा, वहां आप झिझकेंगे नहीं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 14 Dec 2022 12:36:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजस्थानी मान्यता मुद्दे को लेकर सूरतगढ़ में नड्डा का बहिष्कार करेंगे भाषा प्रेमी</title>
                                    <description><![CDATA[श्रीगंगानगर (लखजीत इन्सां)। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में सूरतगढ़ में राजस्थानी भाषा प्रेमियों ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा के कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करने का ऐलान किया है। सूरतगढ़ में अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के जिलाध्यक्ष परसराम भाटिया एवं प्रदेश मंत्री मनोजकुमार स्वामी ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/language-lovers-will-boycott-nadda-in-suratgarh-over-rajasthani-recognition-issue/article-33150"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/bjp-president-jagat-prakash-nadda-corona-infected.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>श्रीगंगानगर (लखजीत इन्सां)।</strong> राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में सूरतगढ़ में राजस्थानी भाषा प्रेमियों ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा के कार्यक्रमों में शिरकत नहीं करने का ऐलान किया है। सूरतगढ़ में अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता संघर्ष समिति के जिलाध्यक्ष परसराम भाटिया एवं प्रदेश मंत्री मनोजकुमार स्वामी ने संयुक्त रूप से आज प्रेस वार्ता में यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि भाषा मनुष्य की पहचान है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक व्यक्ति को दूसरे से जोड़ने का माध्यम है। भाषा ही सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी है। राज्य सरकार द्वारा राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता के लिए 25 अगस्त 2003 को सर्व सहमति से प्रस्ताव भेज दिया था। केन्द्र सरकार इसकी तरफ ध्यान नहीं दे रही है। करोड़ों राजस्थानियों को भाषाई आजादी से वंचित रखा जा रहा है। केन्द्र सरकार स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देने का केवल ढिंढोरा पीट रही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>क्या है माजरा</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति 2020 के अनुसार बालक की प्राथमिक शिक्षा उसकी मातृभाषा मे होनी चाहिए, फिर राजस्थान के बालकों से भेदभाव क्यों। उन्हें मातृभाषा राजस्थानी में शिक्षा कब मिलेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ,पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे था अनेक सांसदों ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता के लिए पत्र लिखे हैं। क्या इनके पत्रों की कोई अहमियत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथसिंह ने छह मई 2015 को अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा संघर्ष समिति के प्रतिनिमंडल से मुलाकात कर वादा किया था कि आगामी मानसून सत्र में राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता दे दी जायेगी। भाटिया ने कहा कि राजस्थानी भाषा प्रेमी नड्डा का विरोध करते हुए उनके स्वागत में भाग नहीं लेगें। प्रदेश मंत्री मनोज कुमार स्वामी ने कहा, ‘जो राजस्थानी भाषा की बात करेगा, वही प्रदेश पर राज करेगा। म्हारै मन में खोट नी ,भाषा नी तो वोट नी।</p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 May 2022 14:50:34 +0530</pubDate>
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                <title>भाषा की मर्यादा खोते राजनेता&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/politicians-losing-the-dignity-of-language/article-12962"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/dignity-of-language.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने है की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जात हैं? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"><strong>सोनम लववंशी</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">ततत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था पर दृष्टि डालें तो राजनीतिक सरगर्मी उफान पर है। सियासत के सुरमा जिक्र तो लोक कल्याण और समावेशी विकासों का करते है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के बदलते भारत की राजनीति भी करवटें बदल रही है। विपक्ष तो विपक्ष सत्ता पक्ष भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कब राजनीति की नैतिकी और सिद्धांतों को धत्ता बता दे। यह पता ही नहीं चलता। ऐसे में अभिव्यक्ति के नाम पर अनर्गल बयानबाजी ने राजनीति की शुचिता आदि को तार-तार कर दिया हैं। बोल के लब आजाद है तेरे पंक्ति का शोर आजकल राजनैतिक आबोहवा में काफी गुंजित हो रहा… ऐसे में मालूम तो यही पड़ता कि जब मशहूर शायर फैज अहमद फैज ने इन पंक्तियों को लिखा होगा तो शायद ही कभी ये सोचा होगा कि देश के राजनेता उनकी इस पंक्ति के सहारे शब्दों की सारी मर्यादा लांघ जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र अमर्यादित भाषा के वायरस से पीड़ित हो चुका है। जो उसके लिए बहुत बड़ी विडंबना वाली बात है। राजनीति का अर्थ यह तो कतई नहीं होता कि सियासतदां एक-दूसरे के निजी जीवन पर आक्षेप करने लग जाएं। राजनीति सदियों से हमारे समाज का अंग रही है। फिर हमारे सियासत के सूरमा लोकतंत्र के भीतर राजनीति के सिद्धांतों को तिलांजलि क्यों दे रहें। आज जिस दौर में भारतीय राजनीति में भाषा की गिरावट अपने निम्नतम स्तर पर पहुँच गयी है। राजनेताओं के बोल बिगड़ते जा रहे हैं। उन्हें दूसरे राजनीतिक दल के नेताओं को बुरा बोलने में कोई बुराई नजर नहीं आती है। फिर सवालों की एक लंबी फेहरिस्त उत्पन्न होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या उसके उत्तर हमारे लोकतांत्रिक पहरुओं के पास हैं? पहला सवाल अभिव्यक्ति की आजादी ये तो नहीं कहती कि आप किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के मान को भंग करें? फिर आखिर ऐसा क्यों होता है? राजनीति निजी दुश्मनी अदा करने का कोई अखाड़ा भी नहीं। फिर अमर्यादित होने का क्या निहितार्थ? जब संवैधानिक व्यवस्था में राजनीति का जन्म देश को सुचारू रूप से आगे ले जाने के लिए हुआ। फिर मूल उद्देश्य को क्यों बिसार देते है राजनीति के सिपहसालार? इसके अलावा जब भाषा हमारे सामाजिक परिवेश का स्तर तय करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाषा हमारी सोच का पैमाना होती है। तो राष्ट्रीय पार्टियों के सरीखे नेता बदजुबानी करके समाज और वैश्विक परिदृश्य को क्या यह दिखाना चाहते हैं कि हम तो जुबानी रूप से असभ्य हैं ही, इससे ही भारत भूमि के बारे में अंदाजा लगा लीजिए? अगर ऐसे कुछ विचार हमारे नेताओं के हैं तो उन्हें अपने बारे में न सोचकर एक मर्तबा देश की संस्कृति और परम्परा की तो सुध लेनी चाहिए खुले मंचों पर अमर्यादित बयानबाजी करने से, क्योंकि यह हमारे देश की छवि को निकृष्ट करने का कार्य करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानते हैं हमारे संविधान का अनुच्छेद- 19 हमें और हमारे नेताओं को बोलने की आजादी प्रदान करता है, लेकिन हमें क्या बोलना है यह हमारे संस्कार तय करते हैं। साथ ही साथ संविधान का अनुच्छेद- 19(2) हमें कितना और किसके लिए किस लहजे में बोलना यह भी बताता है। फिर आजादी के चक्कर में अपने दायरे को क्यों भूल जाते है? वैसे देखें तो देश में राजनेता न केवल आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपितु राजनीति का अर्थ ही नेतृत्व करना होता। फिर ऐसे में राजनेताओं की देश के मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर उस दायित्व को वे क्यों भूल जाते है? यह समझ से परे है। एक मिनट के लिए राजनीति को दरकिनार करके बात करते हैं। छोटे बड़े का मान-सम्मान करना तो हमारी पुरातन संस्कृति का हिस्सा सदैव रहा है। फिर लोक जीवन में तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। लेकिन हमारे देश के नेताओं को पता नहीं किसकी नजर लग गई है, कि वे एक-दूसरे पर बदजुबानी करने से बाज नहीं आते। इक्कीसवीं सदी में यह वायरस और तेजी से बढ़ रहा, जो काफी चिंताजनक है। आज दूसरे दल के नेताओं के प्रति सम्मान समाप्त हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक राजनीतिक बदजुबानी की बानगी पेश करते हैं। देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष जब देश के प्रधानसेवक को डंडे से मारने की धमकी दे दे, तो यह समझा जा सकता है कि देश किस दिशा में बढ़ रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो कुर्सी का खेल मुगलई दौर का होता जा रहा। बनिस्बत अंतर इतना है, तब तलवार का बोलबाला था और आज संवैधानिक लोकतंत्र में अलोकतांत्रिक बदजुबानी का।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां एक बात स्पष्ट हो। राजनेताओं के बोल बिगड़ने का यह मसला कोई नया नहीं है। देश की आम सड़कों से लेकर चुनावी सभाओं तक राजनेताओं के बोल असंयमित होते जा रहे हैं। राजनेता अब चुनावी वादों से चुनाव जीतने की बजाय विपक्षी दल पर अभद्र टिप्पणी के जरिये चुनावी रण फतह करने की राह में आगे बढ़ रहे हैं और उनके इन सपनों को साकार करने में हर मीडिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। टीवी और सोशल मीडिया इस दुष्प्रचारक का न सिर्फ गवाह बना है, बल्कि इसके विस्तार में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा। सवाल उसके हो जाने के बाद के रिएक्शन का है । डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि ‘‘लोकराज, लोकलाज से चलता है।’’ आज प्रखर समाजवादी नेता के विचारों को उन्हीं के खेवनहार डुबो रहे यह बड़े ताज्जुब की बात है। यहां अतीत के पन्नो में जाकर देखें तो सन 1964 में लोकसभा में आचार्य कृपलानी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि- जवाहरलाल कहते हैं कि चीन ने जो हमारी जमीन छीनी है, वहां कुछ पैदा नहीं होता था। जवाहरलाल के सिर पर भी बाल नहीं तो क्या उनकी गर्दन काट लें?</p>
<p style="text-align:justify;">अगर यहीं से राजनीति में बदजुबानी के युग की शुरूआत मान लें तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगा। ये सिलसिला आज तक चला आ रहा है। पहले समाजवादी पार्टी पर ही आरोप लगते थे कि उनकी भाषा मर्यादित नहीं है , लेकिन वर्तमान समय की बात करें तो हर राजनीतिक दल ने भाषा की सारी मर्यादा को पार कर दिया है। देश की सेना से लेकर देश के प्रधानसेवक तक पर असभ्य टिप्पणियां की जाने लगी हैं। महिलाओं के प्रति तो मर्यादा की सारी सीमाओं को नेता पहले से ही पार करते आएं हैं, लेकिन अफसोस कि उन्हें इसमें न ही कोई बुराई नजर आती और न ही माफी मांगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अगर इक्कीसवीं सदी में राजनेता अपनी राह से भटक गए हैं। तो उन्हें सही राह दिखाने का काम अवाम को उठाना होगा। उन्हें याद दिलाना होगा, कि लोकतंत्र में जुबानी तीर का कोई औचित्य नहीं, बल्कि देश की भलाई का कार्य करना होगा। इसके अलावा अगर चुनाव आयोग शक्ति से ऐसे नेताओं से पेश आएं जो राजनैतिक बदजुबानी करते हैं। उनके चुनावी भविष्य पर विराम आदि लगाने जैसी कुछ व्यवस्था करें तो शायद अमर्यादित बोल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम आने बन्द हो जाएं।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Feb 2020 21:09:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>संयमित भाषा ही उच्च राजनीति का आधार</title>
                                    <description><![CDATA[राजनीति (Politics) और भाषा का गहरा संबंध है। काबिल राजनेता गंभीर से गंभीर बात को भी संयम व संकोच भरे शब्दों में कह देता है लेकिन स्वार्थी और अयोग्य नेता अपनी राजनीति चमकाने व मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए भाषा का प्रयोग इतनी गैर-जिम्मेदारी से करते हैं कि वे समाज में नफरत बढ़ाते हैं। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">राजनीति (<span lang="en" xml:lang="en">Politics</span>) और भाषा का गहरा संबंध है। काबिल राजनेता गंभीर से गंभीर बात को भी संयम व संकोच भरे शब्दों में कह देता है लेकिन स्वार्थी और अयोग्य नेता अपनी राजनीति चमकाने व मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए भाषा का प्रयोग इतनी गैर-जिम्मेदारी से करते हैं कि वे समाज में नफरत बढ़ाते हैं। केंद्रीय मंत्री धर्मेंन्द्र प्रधान ने सख्त शब्दों में कहा है कि भारत में रहना है तो भारत माता की जय कहना ही पड़ेगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ऐसा कुछ ही उत्तर प्रदेश के एक पुलिस अधिकारी ने प्रदर्शन कर रहे युवाओं को पाकिस्तान जाने के लिए कह दिया। सरकार के शब्दों में नागरिकता संशोधन कानून स्पष्ट है जिसमें किसी को भी बाहर नहीं भेजा जा रहा है। न हिंदूओं, न मुस्लमानों को, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रोष प्रदर्शन करने वालों को समझाने के लिए काफी दलीलें दी हैं। उनका उद्देश्य भड़के लोगों को शांत करना है।</h4>
<p style="text-align:justify;">अमन शान्ति देश की ताकत है और विकास के लिए जरूरी है। फिर भी कुछ नेता अपनी ही पार्टी की सरकार की परवाह न कर भड़काऊ बयानबाजी कर रहे हैं जो देश में रहना चाहता है वह भारत माता का शत्रु कैसे हो सकता है? जो भारत में रहना चाहता है उस पर दबाव बनाकर पाकिस्तान का हितैषी बनाने के पीछे भी कोई तुक नहीं। जब छोटे व मझोले नेता अमन व शांति की बातें करेंगे तब जनता में उसका प्रभाव भी अच्छा होता है, इसीलिए यह आवश्यक हो गया है कि वरिष्ठ नेता पंक्ति दो के नेताओं को मर्यादा का पाठ पढ़ाएं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">वास्तव में यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि केवल विवादित बयान से ही राजनीति (<span lang="en" xml:lang="en">Politics</span>)नहीं होती बल्कि यह देश की एकता से खिलवाड़ है। भाजपा के साथ-साथ विरोधी पार्टियों के नेताओं के तीखे प्रहार भी जारी हैं, जो देशहित में नहीं। देश के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा की टिप्पणी भी उनके कद मुताबिक निम्न स्तर की है। देवगौड़ा का कहना है कि बेरोजगारी का कारण घुसपैठियों की मौजूदगी है।</h4>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी का मुद्दा बड़ा पेचीदा है जिसके कई पहलू हैं। 70 वर्ष की बेरोजगारी पर पहले कोई चर्चा नहीं हुई जिसमें घुसपैठियों का जिक्र हो। केवल कुछ कहना ही है इसके लिए बयान देना ठीक नहीं। राजनीति(<span lang="en" xml:lang="en">Politics</span>) में तर्क व तथ्य छोटे पड़ते जा रहे हैं जिसने देश को अनदेखा कर दिया है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कभी राजनेताओं के बोले हुए शब्द कहावत व पथप्रदर्शक बनने की सामर्थ्य रखते थे अब जो बाद में दीवारों, पुस्तकों, मुद्रा, स्तम्भों पर लिखे जाते थे। अब अधिकतर नेताओं को अपने कहे पर या तो माफी मांगनी पड़ती है या फिर कहना पड़ता है कि उसके शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है अर्थात इनके बोल मूल्यहीन होकर कलहकारी हो गए हैं।</h4>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Dec 2019 20:31:03 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>भाषा को लेकर संवेदनशील हो सरकारें</title>
                                    <description><![CDATA[आज संसार में 6809 से अधिक भाषाएं और अनगिनत बोलियां है। जिसमें से एक भाषा हिन्दी भी है। हिन्दी संसार की दूसरी बड़ी भाषा है जिसका उपयोग सर्वाधिक युवा आबादी करती है। हिन्दी का व्यक्तित्व इसकी वर्णमाला के कारण विराट है। निस्संदेह, हिन्दी में सामर्थ्य की सुगंध है। उदाहरणार्थ, हम ‘कोण’ बोलेंगे तो हिन्दी में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/governments-are-sensitive-about-language/article-5935"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/kgjgfjf-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज संसार में 6809 से अधिक भाषाएं और अनगिनत बोलियां है। जिसमें से एक भाषा हिन्दी भी है। हिन्दी संसार की दूसरी बड़ी भाषा है जिसका उपयोग सर्वाधिक युवा आबादी करती है। हिन्दी का व्यक्तित्व इसकी वर्णमाला के कारण विराट है। निस्संदेह, हिन्दी में सामर्थ्य की सुगंध है। उदाहरणार्थ, हम ‘कोण’ बोलेंगे तो हिन्दी में लिखेंगे भी ‘कोण’ ही। ‘ण’ को हम ‘ण’ ही लिखेंगे, ‘न’ नहीं। परंतु उर्दू, अरबी, फ्रेंच और अंग्रेजी भाषा में ‘ण’ को ‘न’ ही लिखा जाएगा। इस प्रकार हिन्दी भाषा का ‘कोण’ अन्य भाषाओं में ‘कोन’ हो जाएगा। परिणामस्वरूप अर्थ में ही अंतर आ जाएगा। इससे सिद्ध है कि सामर्थ्य की जो सुगंध हिन्दी के पास है वह अन्य भाषाओं के पास नहीं। मातृभाषा जब मात्र कुछ लोगों की भाषा बनकर रह जाए तो उसका कैसा और कितना विकास होगा यह सहज चिंतनीय है। हिन्दी भाषा मादक भी है, आकर्षक भी है, मोहक भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि रूस के वरान्निकोव और बेल्जियम के बुल्के भारत आकर हिन्दी को समर्पित हो गये। जाहिर-सी बात है कि गुलाम देश के पास अपनी कोई राज या राष्ट्रभाषा नहीं होती। परतंत्र राष्ट्र बिन भाषा के गूंगे अपाहिज की तरह ही होता है, जो अपनी आंखों के सामने सबकुछ देखता है, पर बोल नहीं सकता। समय की करवट के साथ हिन्दी का आकाश सूना होता गया। लोग अंग्रेजी को भूलाने के बजाय ओर भी इसके दीवाने होते गए। मां के जगह मम्मी और पिता की जगह डैड हो गया। बस, इसी में सब बैड हो गया ! ओर फिर हिन्दी को एक दिन की भाषा बनाकर ऐसे याद किया जाने लगा कि जैसी किसी की पुण्यतिथि हो। दरअसल, हमें अपनी भाषा का गौरव नहीं पता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उसका मूल्य हम भूल चुके है। हालात यह है कि आज हिन्दवासियों को अंग्रेजी की गाली भी प्रिय लगने लगी है। वस्तुत: सौंदर्य और सुगंध से परिपूर्ण हिन्दी का यश मिटता जा रहा है। आलम है कि हम हिन्दी को कुलियों की और अंग्रेजी को कुलीनों की भाषा मानते हैं। देश स्वाधीन है परंतु वैचारिक और मानसिक दृष्टि से हम आज भी दास हैं। इसी कारण हिन्दी को कूड़े-करकट का ढेर और अंग्रेजी को अमृत-सागर समझने की हमारी मान्यता आज भी नहीं बदली है। सवाल है कि हिन्दी के प्रति हीनता का बोध राष्ट्र को क्या उन्नति के शिखर पर ले जायेगा? स्मरण रहे कि कोई राष्ट्र अपनी भाषा का आदर किये बगैर विकसित एवं समृद्धशाली नही हो सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत ही नहीं विदेश भी हिन्दी भाषा को अपना रहे हैं तो फिर हम देश में रहकर भी अपनी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय उसको खत्म करने पर तुले हैं? आज भाषा को लेकर संवेदनशील और गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। इस सवाल पर भी सोचना चाहिए कि क्या अंग्रेजी का कद कम करके ही हिन्दी का गौरव बढ़ाया जा सकता है? और आज आजाद भारत में हिन्दी कर्क रोग पीड़ित से क्यों है? लेकिन, अफसोस इस बात का भी है कि हम हिन्दी का यश बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध तो है पर नवभारत नहीं न्यू इंडिया में। यदि माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का वास्तविक कायाकल्प करना चाहते हैं, तो हिन्दी को उसकी गरिमा पुन: लौटाये। डिजिटल इंडिया के इस युग में चरमराती हिन्दी को चमकाना होगा। तकनीकि और वैज्ञानिक दौर में हिन्दी के लिए अप्रत्यक्ष रुप से बाध्यता अनिवार्य करनी होगी।</p>
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                <pubDate>Fri, 14 Sep 2018 20:21:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>अपनी फिल्म पॉलिसी बनाएगा हरियाणा</title>
                                    <description><![CDATA[योजना। सिल्वर स्क्रीन पर हरियाणा का डंका बजाने को प्रदेश सरकार ने कसी कमर हरियाणा की ओर अधिक है बॉलीवुड का रूझान फिल्मों में धड़ल्ले से हो रहा हरियाणवी बोली का प्रयोग GuruGram, Sanjay Mehra:  वैसे तो हरियाणवी बोली लठमार बोली मानी जाती है। यहां के लोगों की हाजिर जवाबी से कोई खुश होता है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/haryana-make-own-film-policy/article-503"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2016-12/01-22.jpg" alt=""></a><br /><ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>योजना। सिल्वर स्क्रीन पर हरियाणा का डंका बजाने को प्रदेश सरकार ने कसी कमर</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>हरियाणा की ओर अधिक है बॉलीवुड का रूझान </strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong>फिल्मों में धड़ल्ले से हो रहा हरियाणवी बोली का प्रयोग </strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>GuruGram, Sanjay Mehra:</strong>  वैसे तो हरियाणवी बोली लठमार बोली मानी जाती है। यहां के लोगों की हाजिर जवाबी से कोई खुश होता है तो कोई नाखुश। सवालों के सीधे जवाब की बजाय हंसी के अंदाज में यहां दिए जाते हैं। छोटे पर्दे पर बड़े कलाकारों द्वारा हरियाणवी जॉक्स को अभी तक अपने अंदाज में पेश किया जाता रहा है।<br />
यहां तक कि हरियाणा की धरती पर फिल्में बनाकर उसे दूसरे राज्यों की धरती के रूप में परोसा जाता है। अब बॉलीवुड का ध्यान हरियाणा की ओर ज्यादा ही जा रहा है। यहां के एक विषय को लेकर बनाई गई फिल्मों ने बड़े पर्दे पर ध्ूाम मचाई है। प्रदेश की खूबियों को ध्यान में रखते हुए अब हरियाणा सरकार अपनी फिल्म पॉलिसी बनाने को सक्रिय हुई है। दो बैठकों का दौर पूरा हो चुका है।<br />
हरियाणा प्रदेश में हरियाणवी फिल्मों, स्थानीय कलाकारों तथा सिनेमा को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा अपनी पहली फिल्म पॉलिसी तैयार कर रहा है, इसके लिए राज्य सरकार द्वारा पर्यटन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव वीएस कुण्डू की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी की अब तक दो बैठकें हो चुकी हैं।<br />
पहली बैठक चण्डीगढ़ में हुई थी और दूसरी बैठक गुरुग्राम में आयोजित की गई। इस कमेटी की दूसरी बैठक में प्रख्यात फिल्मकार सतीश कौशिक ने कहा कि सिनेमा विश्व भर में अपनी संस्कृति का प्रसार करने के लिए सशक्त माध्यम है। अब भारतीय सिनेमा की विश्व में नई पहचान बनी है। ऐसे में हरियाणवी संस्कृति, प्रदेश के निर्माताओं व कलाकारों को बढ़ावा देने तथा प्रदेश में सिनेमा शूटिंग के स्थलों को विकसित करने के लिए हरियाणा फिल्म पॉलिसी बनाई जानी चाहिए। अब तक प्रदेश में इस प्रकार की कोई पोलिसी नहीं है।<br />
उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे राज्यों में भी अपनी फिल्म पॉलिसी हैं। उदाहरण के तौर पर उड़ीया, तमिल, तेलूगू, मराठी, भोजपुरी, पंजाबी इत्यादि फिल्में बहुत प्रसिद्ध हो रही हैं। हरियाणा में कोई पॉलिसी नहीं है, इसलिए बालीवुड में भी हरियाणा को ईस्ट पंजाब टैरीटरी में माना जाता है। इन दिनों हरियाणवी बोली को फिल्मों में काफी प्रयोग किया जा रहा है, यहीं नहीं सलमान खान और आमिर खान जैसे बडेÞ-बडेÞ कलाकार भी अपनी फिल्मों में हरियाणा की पृष्ठभूमि का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी धरोहर बहुत मजबूत हैं जिसको सिनेमा के माध्यम से हम विश्व मे ं प्रोजेक्ट कर सकते हैं। जिससे प्रदेश के पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ रोजगार सृजन होगा और सामाजिक ताना-बाना मजबूत होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रदेश में फिल्मेें बनाने की अपार संभावनाएं</strong><br />
कमेटी के सदस्य सचिव एवं सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के निदेशक समीरपाल सरो ने कहा कि हरियाणा में सिनेमा शूटिंग के स्थलों की कोई कमी नहीं हैं, जहां भिवानी-महेन्द्रगढ़ के क्षेत्रों में रेगिस्तान, मोरनी में खूबसूरत पहाड़ी क्षेत्र, यमुनानगर में झीलें व नदियां हैं तो वहीं गुरुग्राम भी दुुबई जैसे आधुनिक शहरों से कम नहीं हैं। इन स्थलों पर फिल्में बनाने की काफी संभावनाएं हैं। इसके अलावा हरियाणा में ऐतिहासिक धरोहर भी बहुतायत में है, जिनमें फिल्मकारों की रूचि हो सकती है। इस मौके पर उपस्थित सूरजपाल ने बताया कि गुरुग्राम जिला के सोहना क्षेत्र में हरचंदपुर गांव में एक फार्म हाऊस में कई फिल्मों की शूटिंग की जा चुकी है।</p>
<p><strong>ये बनाए गए हैं फिल्म पॉलिसी कमेटी के सदस्य</strong><br />
फिल्म पॉलिसी का प्रारूप तैयार करने के लिए बनाई गई कमेटी में चेयरमैन पर्यटन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं विजुवल एवं परफोर्मिंग आर्ट, रोहतक विश्वविद्यालय के कुलपति वीएस कुण्डू को बनाया गया है। प्रख्यात फिल्मकार सतीश कौशिक को कमेटी का गैर-सरकारी सदस्य एवं को चेयरमैन नियुक्त किया गया है। कमेटी के अन्य सदस्यों में आबकारी एवं कराधान आयुक्त, शहरी स्थानीय निकाय विभाग के निदेशक, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार, वित्त विभाग का प्रतिनिधि शामिल है। सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग के निदेशक समीरपाल सरो को सदस्य सचिव बनाया गया है और पगड़ी-द आॅनर फिल्म के निर्माता राजीव भाटिया को गैर-सरकारी सदस्य के तौर पर शामिल किया गया है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Dec 2016 23:58:06 +0530</pubDate>
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