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                <title>organic farming - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>organic farming RSS Feed</description>
                
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                <title>पांगी बना हिमाचल का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल, सरकार ने बताया सतत विकास की मिसाल</title>
                                    <description><![CDATA[हिमाचल प्रदेश का पांगी राज्य का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल बन गया है। सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए 5 करोड़ रुपये का फंड, जौ पर ₹60 प्रति किलो एमएसपी और जनजातीय क्षेत्रों के समग्र विकास हेतु कई नई योजनाओं की घोषणा की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/pangi-became-the-first-natural-farming-model-of-himachal-the/article-88380"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/pangi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">शिमला, <strong>(सच कहूँ/डेस्क/एजेंसी)</strong> हिमाचल प्रदेश का दुर्गम पांगी घाटी क्षेत्र राज्य का पहला प्राकृतिक खेती मॉडल उपमंडल बन गया है। राज्य सरकार ने रविवार को कहा कि यह पहल सतत विकास, रसायन मुक्त खेती और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। सरकार ने इस परियोजना के लिए 5 करोड़ रुपये का रिवॉल्विंग फंड उपलब्ध कराया है। साथ ही प्राकृतिक तरीके से उगाई गई जौ (बार्ले) के लिए 60 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय किया गया है, ताकि किसानों को रसायन मुक्त खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का लक्ष्य लाहौल-स्पीति, किन्नौर, पांगी और भरमौर जैसे ऊंचाई वाले जनजातीय क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना है। इन इलाकों में कम आबादी, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां और लंबी सर्दियों के कारण आवागमन और बुनियादी सेवाएं प्रभावित रहती हैं। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने जनजातीय क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता देते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, आजीविका और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में विशेष निवेश किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार के अनुसार, अनुसूचित जनजाति क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 42.49 प्रतिशत हिस्सा हैं, जबकि यहां केवल 3.92 लाख लोग रहते हैं, जो राज्य की कुल आबादी का 5.71 प्रतिशत हैं। इन क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्व महज 7 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि राज्य का औसत 123 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इन चुनौतियों के बावजूद सरकार ने सभी स्थायी और मौसमी जनजातीय बस्तियों में 100 प्रतिशत विद्युतीकरण और सुरक्षित पेयजल की सुविधा सुनिश्चित करने का दावा किया है। जनजातीय क्षेत्रों में 1,000 पुरुषों पर 1,018 महिलाओं का लिंगानुपात भी राज्य के औसत 972 से बेहतर बताया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने बताया कि जनजातीय उपयोजना (एसटीपी) के तहत हर वर्ष कुल विकास बजट का 9 प्रतिशत हिस्सा इन क्षेत्रों के लिए निर्धारित किया जाता है। वर्ष 2024-25 में इस मद में 890.28 करोड़ रुपये और 2025-26 के लिए अनुसूचित जनजाति घटक के तहत 638.73 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में वर्ष 2025-26 के दौरान 3,361 जनजातीय छात्रों को प्री-मैट्रिक, 5,693 छात्रों को पोस्ट-मैट्रिक और 304 छात्रों को मेधावी छात्रवृत्ति का लाभ मिला है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में 2 जिला अस्पताल, 6 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 49 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 123 स्वास्थ्य उपकेंद्र संचालित किए जा रहे हैं। इसके अलावा 568 आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से 5,084 अनुसूचित जनजाति लाभार्थियों को पोषण तथा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने लाहौल-स्पीति और भरमौर में आधुनिक सुविधाओं से लैस आदर्श स्वास्थ्य संस्थान स्थापित किए हैं, जहां विशेषज्ञ डॉक्टर, एमआरआई, सीटी स्कैन, प्रयोगशाला और पर्याप्त नर्सिंग एवं पैरामेडिकल स्टाफ की व्यवस्था की गई है। महिला सशक्तिकरण के तहत जनजातीय क्षेत्रों की 3,234 महिलाएं स्वयं सहायता समूहों और आजीविका कार्यक्रमों के जरिए 'लखपति दीदी' बन चुकी हैं। वहीं, इंदिरा गांधी प्यारी बहना सुख सम्मान निधि योजना के तहत पात्र महिलाओं को 1,500 रुपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जा रही है।]</p>
<p style="text-align:justify;">'राज्य सरकार ने पहली बार हिमाचल प्रदेश के 75 वर्षों के इतिहास में काजा में हिमाचल दिवस मनाने का निर्णय लिया है, जिसे जनजातीय क्षेत्रों तक सुशासन पहुंचाने और समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है। इसके अलावा सरकार जनजातीय क्षेत्रों में पर्यटन और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देकर आजीविका के नए अवसर भी विकसित कर रही है। होमस्टे स्थापित करने, विस्तार करने और उन्नयन के लिए 5 करोड़ रुपये तक के निवेश पर 5 प्रतिशत ब्याज सब्सिडी प्रदान की जा रही है, जिससे रोजगार और आय के नए अवसर सृजित होने की उम्मीद है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 19:26:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Tehdil Arora]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Organic Farming : प्रकृति संतुलन का आधार- जैविक खेती</title>
                                    <description><![CDATA[Organic Farming जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/organic-farming-is-the-basis-of-nature-balance/article-59028"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/organic-farming.jpeg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>Organic Farming</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। मिट्टी में असंख्य लाभदायक जीव रहते हैं जो एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा पौधों की वृद्धि हेतु पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। अत: इस पद्धति में मिट्टी को स्वस्थ एवं जीवित रखते हुए प्रकृति में उपलब्ध अन्य मित्र जीवों के मध्य तालमेल रखकर खेती करनी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए खेत की आवश्यकतानुसार जुताई की जाये क्योंकि अधिक जुताई भी लाभदायक जीवों को नष्ट कर देती है। अच्छी फसल के लिए मिट्टी का स्वस्थ रहना आवश्यक है। मिट्टी की स्वस्थता से मतलब है कि उसमें जितने अधिक जीवाणु होंगे, वह मिट्टी उतनी ही स्वस्थ मानी जावेगी। ये जीवाणु फसल के अवशेष जैसे जड़, डंठल, पत्तियां, कचरे को सड़ा-गलाकर झूमस में परिवर्तित करते हैं और मिट्टी में खनिज को भी घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर फसल को उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ इन जीवों को सड़ने-गलने से भी मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। कृषि का आधार जीवांश है। जीवांश से भूमि जीवित रहती है। जीवांश से भूमि पर विपरीत असर डालने वाले कारक विघटित हो जाते हैं। वे पौधों एवं जीवों के लिए पर्याप्त मुख्य एवं अल्प पोषण तत्व उपलब्ध कराते हैं। भू-क्षरण का बचाव करते हैं, इससे जल के रिसाव व संवर्धन की क्षमता में वृद्धि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रासायनिक खेती के कारण अनेक स्थानों पर मिट्टी की गुणवत्ता व सजीवता तथा सूक्ष्म जीवों की संख्या में कमी आ रही है तथा भुरभुरी मिट्टी का भयावह रूप से क्षरण हुआ है। हरित क्रांति के दौरान भारत वर्ष में कृषि का विकास बहुत तेजी से हुआ है और हमारे देश के खाद्यान्नों के उत्पादन में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। आज की खेती मुख्यत: रासायनिक खादों पर ही निर्भर रहने लगी है। आधुनिक खेती से हमारी कृषि योग्य भूमि में अब अन्य तत्वों की कमी के साथ-साथ मृदा संरचना एवं स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता एवं स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों का प्रयोग भी संतुलित रूप में करने की अत्यंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तरल जैविक उर्वरक लाभकारी जीवाणुओं के वह उत्पाद हैं, जो लम्बी अवधि तक सक्रिय रहकर मिट्टी व हवा से मुख्यत: सूक्ष्म तत्वों का दोहन कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। प्राकृतिक संतुलन कायम रखती है जैविक खेती जिसका आधार जीवांश है। जीवांश को जलाकर नष्ट नहीं करें अन्यथा उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। प्राचीन समय में भारत की कृषि की गौरवशाली उपलब्धियों में गोवंश की अहम भूमिका रही है। पशुधन अर्थ तंत्र की धुरी थी वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है व साथ में पर्यावरण सुरक्षित रखने में सक्षम भी है। ग्रीनपीस के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 98 प्रतिशत कृषक जैविक खाद का उपयोग करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवंश के अतिरिक्त पेड़-पौधों, पक्षी, मेंढक, उल्लू, केंचुए आदि प्राकृतिक संतुलन के साथ उत्पादन स्तर उच्च स्तर पर रखने में सहायक होेते हैं। इस धरती को लाखों पौधों की जातियो ंने संवारा है। मानव सभ्यता के इतिहास में केवल सात हजार जातियों का ही भोजन के रूप में प्रयोग होने का उल्लेख मिलता है। जिनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, आलू सोयाबीन, गन्ना आदि प्रमुख हैं। इन प्रमुख जातियों के अतिरिक्त पौधों की अन्य जंगली किस्में भी हैं। जिन्हें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषत: प्रगतिशील देशों में प्रयोग में लाया जाता है। इन सब पादप जन्य द्रव्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भोजन, चारा, रेशा, र्इंधन आदि की आवश्यकता मानव उपयोग के लिए सदैव बनी रहेगी। उक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए जैविक खेती प्रकृति संतुलन का आधार है। अत: हर व्यक्ति पर्यावरण प्रहरी बने।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 11:23:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अपनाएँ खेती में पटड़ा विधि, अच्छे मुनाफे के साथ बढ़ाएँ निधि</title>
                                    <description><![CDATA[ऑर्गेनिक खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहा ओमप्रकाश | Organic Farming सवा एकड़ में पटड़ा विधि से धान के साथ लगाया धनिया  उन्नत विधि से 80 फीसदी तक बच रहा पानी कम बीज की बिजाई करके ले रहा अच्छी पैदावार यमुनानगर (सच कहूँ/लाजपतराय)। ‘काली रात सिर्फ उन लोगों के लिए होती है, जिन्हें मेहनत वाली […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/omprakash-is-making-good-profits-from-organic-farming/article-48353"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/patda-technech-1.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">ऑर्गेनिक खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहा ओमप्रकाश | Organic Farming</h3>
<ul>
<li style="text-align:left;"><strong>सवा एकड़ में पटड़ा विधि से धान के साथ लगाया धनिया</strong><strong> </strong></li>
<li style="text-align:left;"><strong>उन्नत विधि से 80 फीसदी तक बच रहा पानी</strong></li>
<li style="text-align:left;"><strong>कम बीज की बिजाई करके ले रहा अच्छी पैदावार</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>यमुनानगर (सच कहूँ/लाजपतराय)।</strong> ‘काली रात सिर्फ उन लोगों के लिए होती है, जिन्हें मेहनत वाली मोमबत्ती जलानी नहीं आती। जो मेहनत करते हैं उनको विजयी बनाने में तो कायनात खुद काम करती है।’ ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जिला यमुनानगर के गाँव खेड़कीब्राह्मणान के प्रगतिशील किसान ओमप्रकाश ने। सवा एकड़ भूमि पर 80 फीसदी तक पानी बचाने के साथ ऑर्गेनिक खेती (Organic Farming) को अपनाकर कड़ी मेहनत के बल पर ये किसान पिछले चार सालों से कम लागत में भरपूर पैदावार लेकर अच्छा मुनाफा कमा रहा है। ओमप्रकाश का कहना है कि अगर किसान उन्नत विधियों का इस्तेमाल करके खेती करें तो पानी की बचत के साथ-साथ भारी भरकम लागत से भी बचा जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कम लागत में अच्छा मुनाफा</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रगतिशील किसान ओमप्रकाश ने बताया कि उसके पास सवा एकड़ जमीन है, जिसमें उसने पटड़ा विधि अपनाकर धनिया व धान की बिजाई की हुई है। पटड़ों पर धनिया व नालियों में धान की सीधी बिजाई की गई है, जो कि बहुत ही अच्छे से तैयार खड़ी है। किसान ने बताया कि धनिया की फसल डेढ़ माह में काटकर बेच दी जाएगी। उसके बाद धान तेजी से ग्रोथ करेगी। उन्होंने बताया कि इस तरह से एक समय में वह दो फसल लेकर अच्छा मुनाफा प्राप्त कर रहा है। वहीं धान की बिजाई में 8 किलो बीज के स्थान पर छ: किलो बीज लगता है और सबसे ज्यादा लाभ धान की फसल में पैडी मेथड़ से लगाई धान की अपेक्षा इस विधि में पानी की भी 80 फीसदी तक बचत होती है। जिसको लेकर सरकार लगातार प्रयासरत है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खेती से जुड़ें युवा | Organic Farming</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रगतिशील किसान ओमप्रकाश ने बताया कि अगर किसान इन विधियों का इस्तेमाल कर दोहरी खेती करेंगे तो अच्छा मुनाफा कमा पाएंगे। इसके साथ ही अन्य लोगों के लिए भी खेती में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि देश के युवा कमाई के चक्कर में विदेशों में जाने को तवज्जों दे रहे हैं, जबकि यदि वे अपने देश में उन्नत तकनीकों का प्रयोग करके खेती करें तो यहां भी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। उन्होंने कहा कि पटड़ा विधि बहुत ही कारगर विधि है, यदि सभी किसान इस विधि को अपनाए तो कम बीज लगेगा, कम पानी की खपत होगी व खेत की कम जुताई होगी और पैदावार ज्यादा होगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">घर पर ही तैयार करते हैं तरल खाद | Organic Farming</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रगतिशील किसान ओमप्रकाश ने बताया कि वह घर के कचरे से आॅर्गेनिक विधि से तरल खाद तैयार करता है। उसके बाद इस तरल खाद को पानी के साथ मिलाकर फसलों में डालता है, जिसका सीधा असर पौधों पर पड़ता हैं और अच्छा उत्पादन होता है। उन्होंने बताया कि पटड़ों की दूरी अढ़ाई फुट, गहराई 9 इंच रखी जाती है। खेत जुताई के बाद बीज फैलाना भी विशेष महत्व रखता है। इस विधि से सिर्फ किलो बीज की जरूरत पड़ी जबकि परंपरागत विधि से 8 किलो बीज की जरूरत पड़ती है। किसान ने बताया कि इस विधि से अच्छा मुनाफा होता है। एक एकड़ में लगभग 18 से 20 हजार रुपये लागत आती है जबकि दो फसलों में से एक फसल तो पूरी बचत में रहती है। यानि एक फसल की बिक्री की आमदन बचत रहती है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jun 2023 15:23:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जैविक खेती को बढ़ावा देने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[जैविक खेती पारंपरिक भारतीय पद्धतियों से उद्धृत रासायन मुक्त कृषि की एक विधि है। यह एक अनूठा मॉडल है जो कृषि-पारिस्थितिकी पर निर्भर करता है। इसका उद्देश्य उत्पादन की लागत को कम करना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है। जैविक खेती मिट्टी की सतह पर सूक्ष्मजीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के विखंडन को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/need-to-promote-organic-farming/article-35682"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-07/zero-cost-natural-farming-is-a-boon-for-farmers.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जैविक खेती पारंपरिक भारतीय पद्धतियों से उद्धृत रासायन मुक्त कृषि की एक विधि है। यह एक अनूठा मॉडल है जो कृषि-पारिस्थितिकी पर निर्भर करता है। इसका उद्देश्य उत्पादन की लागत को कम करना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है। जैविक खेती मिट्टी की सतह पर सूक्ष्मजीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के विखंडन को प्रोत्साहित करती है, धीरे-धीरे समय के साथ मिट्टी में पोषक तत्वों को जोड़ती है। हालांकि, जैविक खेती में, जैविक खाद, वर्मी-कम्पोस्ट, और गाय के गोबर की खाद का उपयोग किया जाता है तथा इन्हे कल्टिवेटेड खेत में प्रयोग किया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि जैविक कृषि से बहुत बड़ी संख्या में लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के साथ-साथ लोगों की रक्षा भी होती है क्योंकि इस पद्धति में जानलेवा रसायनों एवं कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैविक तरीके से खेती को बढ़ावा देने का आह्वान करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि यह आर्थिक सफलता का माध्यम भी है। इस विषय पर गुजरात के सूरत में आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने ‘सूरत मॉडल’ से सीख लेने को कहा। वहां हर पंचायत से 75 किसानों को इस पद्धति से खेती करने के लिए चुना गया है। वर्तमान में 550 से अधिक पंचायतों के 40 हजार से ज्यादा किसान जैविक कृषि को अपना चुके हैं। इस पद्धति के तहत किसी तरह के रसायन का उपयोग नहीं होता है और परंपरागत तरीके से खेती की जाती है। व्यावसायिक फसलों का चलन बढ़ने से पानी की खपत भी बढ़ रही है। भूजल के अनियंत्रित दोहन ने जल संकट एक बड़ी समस्या बन चुका है। अत्यधिक मात्रा में कीटनाशकों, खादों और संकर बीजों तथा पानी के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी क्षीण हो रही है। जलवायु परिवर्तन और धरती का बढ़ता तापमान भी पैदावार पर नकारात्मक असर डाल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भले ही भारत खाद्य पदार्थों के मामले में आत्मनिर्भर हो, लेकिन अगर इन समस्याओं का समाधान नहीं निकाला जायेगा, तो भविष्य में हमारी खाद्य सुरक्षा कमजोर हो सकती है। हमारे देश की भौगोलिक विविधता के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में मिट्टी और मौसम की विविधता भी है। इस कारण खेती के परंपरागत तरीकों में भी विभिन्नता है। ऐसे में परंपरागत खेती यानी प्रकृति के अनुकूल खेती से हम मिट्टी, पानी, स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को संरक्षित कर सकेंगे तथा इस कार्य में हमारे कृषि अनुसंधानकर्ता और तकनीक विशेषज्ञ मददगार हो सकते हैं। इसके व्यापक प्रसार के लिए अब तक के अनुभवों को किसानों तक ले जाने की आवश्यकता है। केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर परंपरागत खेती को बढ़ावा देने के लिए अधिक सक्रियता की आवश्यकता है।</p>
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                <pubDate>Wed, 20 Jul 2022 09:49:17 +0530</pubDate>
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                <title>आर्गेनिक कृषि कर अच्छा लाभ कमा रहा किसान जसवंत सिंह थिंद</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/farmers-earning-good-profit-organic-farming/article-5458"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/farmer-jaswant-singh-news.jpg" alt=""></a><br /><h2>किसानों को आर्थिक संकट में से निकालने के लिए आर्गेनिक कृषि (Organic Farming) जरूरी</h2>
<p>ममदोट(बलजीत सिंह)। चाहे ही बड़ी संख्या किसानों की ओर से कृषि को घाटे का सौदा कहा जाता है परंतु ब्लॉक ममदोट के गांव हुसैन शाह वाला के एक किसान की ओर से आर्गेनिक कृषि <strong>Organic Farming</strong> द्वारा अच्छा लाभ कमाया जा रहा है।<br />
विवरणों मुताबिक गांव हुसैन शाह वाला के किसान जसवंत सिंह थिंद चार साल से आर्गेनिक कृषि कर रहा है। बातचीत दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा समय दौरान कोई भी फसल कीटनाशकों से बिना तैयार नहीं हो रही, जिस कारण चमड़ी के रोग, दिल के रोग, शुगर व कैंसर जैसी भयानक बीमारियां पंजाब में बहुत अधिक बढ़ रही हैं और लोगों की सेहत दिन-प्रतिदिन खराब हो रही है।</p>
<p>इन सब बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए आर्गेनिक कृषि <strong>Organic Farming</strong> एक लाभप्रद सौदा है जो कि हर एक किसान को अपनाना चाहिए उन्होंने बताया से कि वह पिछले चार साल से काली गाजर, गन्ना, बासमती की फसलों बिना खाद व जहरों से उगा रहे हैं। इसके अलावा वह अपने घर के लिए खाने वाली सभी सब्जियां ही आॅर्गेनिक उगाते हैं।</p>
<p>उन्होंने किसानों से अपील की कि अधिक से अधिक किसान इस आर्गेनिक कृषि को अपनाएं, जिससे हमें बीमारियों से निजात मिल सके। उन्होंने कहा कि मेरी क्षेत्र के अन्य किसानों को साथ जोड़कर आगामी समय में बड़े स्तर पर बासमती 1121 की काश्त करवाकर उसे एक्सपोर्ट करने की योजना भी बनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि कोई भी किसान यदि आर्गेनिक कृषि करना चाहता है तो वह किसानों को इस संबंधी जानकारी मुहैया करवाने के लिए तैयार हैं।</p>
<h2>सरकार आर्गेनिक कृषि (Organic Farming) के लिए करे उत्साहित</h2>
<p>किसान जसवंत सिंह थिंद ने केंद्र सरकार से मांग की कि किसानों को आर्गेनिक कृषि <strong>Organic Farming</strong> के लिए उत्साहित किया जाये व इसके साथ ही यदि किसानों को इसमें कमी आती है तो उनकी माली सहायता की जाये। उन्होंने बताया कि आर्गेनिक कृषि को अपना कर खत्म होती जा रही कृषि को आर्थिक पक्ष से बचाया जा सकता है।</p>
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                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Aug 2018 19:35:39 +0530</pubDate>
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