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                <title>नेताओं की मानें तब राजनीति का तात्पर्य सरकारी सुविधाएं</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/belongs-to-politicians-then-politics-means-government-facilities/article-5542"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/panjab-sarkar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आखिर नाराजरकार ने विधायकों को अध्यक्ष बनाने का विधायकों को मनाने के लिए पंजाब की कांग्रेस स निर्णय लिया है। कैबिनेट ने इस संंबंध में बिल को मंजूरी दे दी है और विधानसभा में पास होने के बाद बिल कानून में बदल जाएगा। वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल जो अतिरिक्त खर्चों के सख्त विरोधी माने जाते थे और जिन्होंने अकाली-भाजपा सरकार के कार्यकाल में अपना मंत्री का पद भी इसी कारण छोड़ दिया था, आज चुप या बेबस हैं। मनप्रीत इस विचारधारा के सख्त ख्लिाफ रहे हैं कि पंजाब का भला विभिन्न प्रकार की सब्सिीडी को घटाने में है।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस में शामिल होने के वक्त चुनावी मैनीफैस्टो में उनकी छाप भी स्पष्ट थी। कांग्रेस ने वीआईपी कल्चर खत्म करने व खर्च घटाने का नारा दिया था लेकिन धीरे-धीरे कांग्रेस सरकार भी पारम्परिक रंग में लौटती नजर आई। सलाहकार व बोर्डों के अध्यक्षों को सरकारी सुविधाएं देने के लिए नए रास्ते निकाले गए। वैसे यह बात नहीं कि ऐसा केवल कांग्रेस कार्यकाल में हुआ है।पिछली अकाली-भाजपा सरकार ने मुख्य संसदीय सचिवों, अध्यक्षों व सलाहकारों की फौज खड़ी कर नए सभी विधायकों को पदों पर बिठा दिया था। कांग्रेस की भूमिका इसी कारण सवालों के घेरे में आ जाती है कि कांग्रेस ने अकाली दल के फिजूल खर्चों के खिलाफ आवाज बुलंद कर चुनावी मैनीफैस्टो में खर्च घटाने का</p>
<p style="text-align:justify;">वायदा किया था। सरकार बनाने के बाद कांग्रेस ने नींव पत्थर नहीं रखे और उद्घाटन समारोह न करने के फैसले को अमली रूप भी दिया लेकिन जब मंत्रियों की संख्या बढ़ाने की बात आई तब कांग्रेस में ऐसी हलचल हुई कि आधा दर्जन विधायक नाराज होकर बैठ गए। कई विधायक दिल्ली भी पहुंचे। मुख्यमंत्री को बार-बार कहना पड़ा कि नाराज विधायकों को कोई ओर पद दे देंगे। हैरानी की बात है कि जनता को रोजगार देने की बजाय सरकार विधायकों को पद व सरकारी सुविधाएं देने के लिए कोई न कोई कानूनी पेंच खोज रही है। राज्य में बुढ़ापा पैंशन और अन्य अदायगियां लंबित हैं। केंद्र से बार-बार वित्तीय मदद की मांग की जा रही है लेकिन इधर अर्थशास्त्रीय सिद्धांत नजर नहीं आ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल न केवल पंजाब बल्कि देश की राजनीति में यह रीत बन गई है कि राजनीति का दूसरा नाम सरकारी सुविधाएं हैं। अकालियों का ‘राजनीति नहीं, सेवा’ का नारा भी खोखला साबित हुआ था, जिसका कांग्रेस ने उस वक्त कड़ा विरोध किया था। अब कांग्रेस भी उसी राह पर चल पड़ी है। पंजाब के आर्थिक हालात मजबूत सुधरते दिखाई नहीं दे रहे।</p>
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                <pubDate>Fri, 24 Aug 2018 08:37:20 +0530</pubDate>
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