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                <title>सामाजिक विकास का स्तंभ है साक्षरता</title>
                                    <description><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (8 सितम्बर) पर विशेष लोगों को साक्षरता के महत्व के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 8 सितम्बर को विश्वभर में ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाया जाता है। दुनिया से अशिक्षा को समाप्त करने के संकल्प के साथ आज 54वां ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाया जा रहा है। पहली बार यूनेस्को (संयुक्त […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/literacy-is-the-pillar-of-social-development/article-18232"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/literacy-is-the-pillar-of-social-development.gif" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><strong>अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस (8 सितम्बर) पर विशेष</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">लोगों को साक्षरता के महत्व के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 8 सितम्बर को विश्वभर में ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाया जाता है। दुनिया से अशिक्षा को समाप्त करने के संकल्प के साथ आज 54वां ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाया जा रहा है। पहली बार यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) द्वारा 17 नवम्बर 1965 को 8 सितम्बर को ही अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाए जाने की घोषणा की गई थी, जिसके बाद प्रथम बार 8 सितम्बर 1966 से शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने तथा विश्वभर के लोगों का इस ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रतिवर्ष इसी दिन यह दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया। वास्तव में यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों का ही प्रमुख घटक है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">निरक्षरता को खत्म करने के लिए ईरान के तेहरान में शिक्षा मंत्रियों के विश्व सम्मेलन के दौरान वर्ष 1965 में 8 से 19 सितम्बर तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा कार्यक्रम पर चर्चा करने के लिए पहली बार बैठक की गई थी और यूनेस्को ने नवम्बर 1965 में अपने 14वें सत्र में 8 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया। उसके बाद से सदस्य देशों द्वारा प्रतिवर्ष 8 सितम्बर को ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाया जा रहा है। मानव विकास और समाज के लिए उनके अधिकारों को जानने तथा साक्षरता की ओर मानव चेतना को बढ़ावा देने के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। साक्षरता दिवस के अवसर पर निरक्षरता समाप्त करने के लिए जन जागरूकता को बढ़ावा देने तथा प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों के पक्ष में वातावरण तैयार किया जाता है। यह दिवस लगातार शिक्षा को प्राप्त करने की ओर लोगों को बढ़ावा देने के लिए तथा परिवार, समाज और देश के लिए अपनी जिम्मेदारी को सम’ाने के लिए मनाया जाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">दुनियाभर में आज भी अनेक लोग निरक्षर हैं और यह दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत, सामुदायिक तथा सामाजिक रूप से साक्षरता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए विश्व में सभी लोगों को शिक्षित करना ही है। साक्षरता दिवस के माध्यम से यही प्रयास किए जाते हैं कि इसके जरिये तमाम बच्चों, व्यस्कों, महिलाओं तथा वृद्धों को भी साक्षर बनाया जाए। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में फिलहाल करीब चार अरब लोग साक्षर हैं लेकिन विड़म्बना यह है कि आज भी विश्वभर में करीब एक अरब लोग ऐसे हैं, जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते। तमाम प्रयासों के बावजूद दुनियाभर में 77 करोड़ से भी अधिक युवा भी साक्षरता की कमी से प्रभावित हैं अर्थात प्रत्येक पांच में से एक युवा अब तक साक्षर नहीं है, जिनमें से दो तिहाई महिलाएं हैं। आंकड़े बताते हैं कि 6-7 करोड़ बच्चे आज भी ऐसे हैं, जो कभी विद्यालयों तक नहीं पहुंचते जबकि बहुत से बच्चों में नियमितता का अभाव है या फिर वे किसी न किसी कारणवश विद्यालय जाना बीच में ही छोड़ देते हैं। करीब 58 फीसदी के साथ सबसे कम व्यस्क साक्षरता दर के मामले में दक्षिण और पश्चिम एशिया सर्वाधिक पिछड़े हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सामाजिक प्रगति प्राप्ति पर ध्यान देने के लिए 2006 में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का विषय ‘साक्षरता सतत विकास’ रखा गया था। वर्ष 2007 और 2008 में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की विषय-वस्तु ‘साक्षरता और स्वास्थ्य’ थी, जिसके जरिये टीबी, कॉलेरा, एचआईवी, मलेरिया जैसी फैलने वाली बीमारियों से लोगों को बचाने के लिए महामारी के ऊपर ध्यान केन्द्रित करने का लक्ष्य रखा गया था। वर्ष 2009 में लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण पर ध्यान देने के लिए इसका विषय ‘साक्षरता और सशक्तिकरण’ रखा गया था जबकि 2010 की थीम ‘साक्षरता विकास को बनाए रखना’ थी। 2011 में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के लिए थीम ‘साक्षरता और महामारी’ पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए थी। 2012 में लैंगिक समानता और महिलाओं को सशक्त बनाने पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए थीम थी ‘साक्षरता और सशक्तिकरण’। 2013 में शांति के लिए साक्षरता के महत्व पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए ‘साक्षरता और शांति’, 2014 में ‘21वीं शताब्दी के लिए साक्षरता’, 2015 में ‘साक्षरता और सतत विकास’, 2016 में ‘अतीत पढ़ना, भविष्य लिखना’, 2017 में ‘डिजिटल दुनिया में साक्षरता’ तथा 2018 में ‘साक्षरता और कौशल विकास’ अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की थीम थी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना या शिक्षित होना ही नहीं है बल्कि सफलता और जीने के लिए भी साक्षरता बेहद महत्वपूर्ण है। यह लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करते हुए सामाजिक विकास का आधार स्तंभ बन सकती है। भारत हो या दुनिया के अन्य देश, गरीबी मिटाना, बाल मृत्यु दर कम करना, जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करना, लैंगिक समानता प्राप्त करना आदि समस्याओं के समूल विनाश के लिए सभी देशों का पूर्ण साक्षर होना बेहद जरूरी है। साक्षरता में ही वह क्षमता है, जो परिवार और देश की प्रतिष्ठा बढ़ा सकती है। आंकड़े देखें तो दुनिया में 127 देशों में से 101 देश ऐसे हैं, जो पूर्ण साक्षरता हासिल करने के लक्ष्य से अभी दूर हैं और चिंता की बात है कि भारत भी इनमें शामिल है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अगर बात भारत की करें तो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से निरक्षरता समाप्त करना भारत के लिए प्रमुख चिंता का विषय रहा है। हमारे यहां ‘राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्राधिकरण’ राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष एजेंसी है और यह प्राधिकरण वर्ष 1988 से ही लगातार ‘अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस’ मनाता रहा है। हालांकि आजादी के बाद साक्षरता दर देश में काफी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में करीब 74 फीसदी नागरिक साक्षर हैं जबकि ब्रिटिश शासन के दौरान सिर्फ 12 फीसदी लोग ही साक्षर थे। केरल में साक्षरता प्रतिशत सर्वाधिक 93.91 फीसदी जबकि बिहार में सबसे कम 63.82 फीसदी है। देश में विद्यालयों की कमी, विद्यालयों में शौचालयों आदि की कमी, निर्धनता, जातिवाद, लड़कियों के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसी घटनाओं का डर, जागरूकता की कमी इत्यादि साक्षरता का लक्ष्य हासिल न हो पाने के मुख्य कारण हैं। गरीब और अमीर भारत का यह फासला शिक्षा और आर्थिक असमानता में स्पष्ट रूप से देखा जाने लगा है। देश में अमीर और गरीब में बहुत ज्यादा फासला है, बल्कि यह तेजी से बढ़ रहा है। इसका असर शिक्षा पर भी देखने को मिल रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">एक तरफ उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी महिलाएं हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई है तो दूसरी ओर देश में ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्हें प्राथमिक शिक्षा का मूल अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है।न केवल सरकार, बल्कि हर साक्षर नागरिक को निरक्षरता के दानव से जूझने में योगदान करना चाहिए। हमारे आदर्श वाक्य होना चाहिए ‘प्रत्येक एक को सिखाना’, अगर हम एक विकसित देश बनना चाहते हैं। आवश्यकता है कि हमें अशिक्षा को रोग के तौर पर देखना होगा और इसे जड़ से खत्म करना होगा। भारत को आर्थिक संसाधनों के साथ अपने मानव संसाधन को भी विकास की आवश्यकताओं के अनुसार तैयार करना होगा। अनपढ़ और अकुशल भीड़ पर गर्व करने की प्रवृत्ति सरकारों और जिम्मेदारों को त्यागनी होगी। हमारे आदर्श वाक्य होना चाहिए ‘प्रत्येक एक को सिखाना’, अगर हम एक विकसित देश बनना चाहते हैं। अत: इनके निदान के लिए गंभीर प्रयास होने नितांत आवश्यक हैं ताकि भारत एक पूर्ण साक्षर राष्ट्र बनने का गौरव हासिल कर सके।</h6>
<h6 style="text-align:right;"><em>योगेश कुमार गोयल</em></h6>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 07 Sep 2020 20:37:36 +0530</pubDate>
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                <title>साक्षरता की दिशा में कदम बढ़ाये सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[किसी भी देश के साक्षरता प्रतिशत का अच्छा होना उस देश के विकास और सम्पन्नता की स्थिति को प्रदर्शित करता है। साक्षरता का अर्थ पढ़ने लिखने की योग्यता से है जबकि अक्षरों का ज्ञान न होना निरक्षता कहलाता है। पुराना समय साधारण और सरल था। तब न तो जीवन इतना गतिशील था और न ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/government-extend-steps-towards-literacy/article-6401"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/books.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">किसी भी देश के साक्षरता प्रतिशत का अच्छा होना उस देश के विकास और सम्पन्नता की स्थिति को प्रदर्शित करता है। साक्षरता का अर्थ पढ़ने लिखने की योग्यता से है जबकि अक्षरों का ज्ञान न होना निरक्षता कहलाता है। पुराना समय साधारण और सरल था। तब न तो जीवन इतना गतिशील था और न ही जीवन जीने के साधन इतने जटिल थे। जरूरत बहुत सीमित थीं। दो जून की रोटी कमाकर व्यक्ति चैन की नींद सो जाता था। अब इच्छाओं और आकांक्षाओं ने आकाश की सीमाओं को चुनौती दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अनपढ़ व्यक्ति न तो तेज रफतार युग के साथ चल पायेगा और न ही उसकी सोच की सीमा विस्तृत होगी। साक्षरता मानव विकास की आधारशिला है। स्वतंत्रता प्राप्त करने से पूर्व हमारे देश की जनसंख्या में अनपढ़ लोगों की संख्या बहुत अधिक थी। किन्तु सरकार के अथक प्रयासों से आज समाज हर व्यक्ति को शिक्षित करने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। अनपढ़ व्यक्ति ज्ञान और जानकारी के अथाह भंडार से वंचित रह जाता है। और वह कुएँ के मेढक के समान अपनी संकीर्ण दुनिया में ही कैद रह जाता है। वह न तो अधिकारों का सही प्रयोग और न ही जनसामान्य के लिए उपलब्ध सुख-सुविधाओं का लाभ उठा पाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की आधुनिक युग में निरक्षरता एक दुर्गुण बन गया है। घर घर और गांव गांव शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए जिससे की हर व्यक्ति के बौद्धिक स्तर में उन्नति हो। वह अंगूठा छाप न रहे, उसे कोई ठग न सके। हर वर्ग का व्यक्ति अपनी अच्छाई बुराई समझे और अपनी दैनिक जीवनचर्या में सूझ बूझ के साथ फैसला ले। उसे अंधविश्वासों और शोषण से मुक्ति मिले। जहां शिक्षा एक वरदान है तो वही निरक्षरता एक अ​भिशाप की तरह है। इस बात में कोई दो मत नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को अक्षर का ज्ञान होना चाहिए। किसी व्यक्ति के लिए साक्षर होना उतना ही अनिवार्य है जितना एक अंधे के लिए आँखे।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान सभ्यता काफी उन्नत हो चुकी है ईस उन्नति का एक मुलभुत आधार है शिक्षा। शिक्षा के बिना प्रगति का पहिया एक इंच भी नहीं सरक सकता। आज निरक्षर लोगों को ज्ञान-विज्ञान के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है उसे पत्र पढ़ने, बस रेलगाड़ी की सूचनाये पढने के लिए भी लोगो का मुहँ ताकना पड़ता है। निरक्षर होने का सीधा-सरल अर्थ है अनपढ़ होना।</p>
<p style="text-align:justify;">काला अक्षर भैंस बराबर यह कहावत अनपढ़ व्यक्ति के लिए ही प्रयोग की जाती है। अर्थात अनपढ़ व्यक्ति को काले अक्षर और भैंस में कोई अन्तर नजर नहीं आता। आज का युग विज्ञान का युग है। लोग अपने-अपने काम में इतना व्यस्त हो गये हैं कि एक दूसरे को किसी विषय में मौखिक जानकारी देने के लिए उनके पास अधिक समय नहीं है। ऐसे में व्यक्ति को जानकारी देने के लिए हर जगह अनेक बातें लिख दी जाती हैं। वह चाहे दुकानों के साइनबोर्ड हों या रेलवे की समय-सारण का चार्ट।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र शिक्षा और यूनिस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा 287 लाख अशिक्षित वयस्कों की संख्या है। ये आँकड़े देश में शिक्षा के क्षेत्र में चौका देने वाली असमानता की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 1991 से 2006 तक अशिक्षा का स्तर 63 फीसदी तक बढ़ा है। एक उच्च साक्षरता किसी भी राष्ट्र को वैश्विक मंच पर अन्य राष्ट्रों के साथ बराबरी पर लाने के लिये अनिवार्य आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोई भी राष्ट्र नीची साक्षरता दर के साथ होनहार राष्ट्र नहीं माना जाता। इसके अलावा इस पर प्रकाश डालने की आवश्यकता है कि भारत वो देश है जहाँ असमानता इस हद तक है कि एक राज्य ने 90 फीसदी से ज्यादा साक्षरता दर को प्राप्त कर लिया है और वहीं दूसरी तरफ ऐसे राज्य भी है जहाँ साक्षरता दर अभी भी निराशाजनक है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत मे अशिक्षा एक समस्या है जो इससे जटिल आयामों के साथ जुड़ी हुई है। भारत में अशिक्षा उन विभिन्न असमानताओं के आयामों में से एक है जो देश में अस्तित्व में है। यहां लिंग असमानता, आय असमानता, राज्य असंतुलन, जाति असंतुलन और तकनीकी बाधाएं है जो देश में साक्षरता की दर को निर्धारित करती है। भारत के पास सबसे बड़ी निरक्षर आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार पुरुषों की साक्षरता 82.14 फिसदी और महिलाओं की साक्षरता 65.46 फिसदी है।</p>
<p style="text-align:justify;">कम महिला साक्षरता भी लिखने और पढ़ने की गतिविधियों के लिये महिलाओं के पुरुषों पर निर्भर रहने के लिये जिम्मेदार है। इस प्रकार इसने एक दुष्चक्र का रुप ले लिया है। निराशाजनक साक्षरता दर का मुख्य कारणों में से एक स्कूलों की अपर्याप्त सुविधा है। सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षण स्टाफ अक्षम और अयोग्य है।</p>
<p style="text-align:justify;">1993 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा था कि बच्चों को मुफ्त में शिक्षा प्राप्त करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है और इस प्रकार 83वें संवैधानिक संशोधन 2000 के तहत वर्ष 2003 में संविधान में शिक्षा का अधिकार अधिनियम शामिल किया गया। इसके बावजूद भी देश 10-14 साल की आयु वाले बच्चों के लिये मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान नहीं कर सका।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिये बहुत सी अन्य योजनाओं को भी लागू किया गया। जैसे 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा की योजना, 1988 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन, 1992 की शिक्षा नीति और फिर 2001 में 6 से 14 साल तक की आयु वाले सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए और 2010 तक स्कूल में आठ साल पूरे करने के लिये सर्व शिक्षा अभियान शुरू किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">ये सभी ऐसी नीतियाँ हैं जो आज धूल फाँक रही है। क्योंकि ये प्रचलित अशिक्षा और बच्चों को स्कूल में लाने और रोकने में सक्षम नहीं हो पायी हैं। न केवल सरकार परन्तु हर शिक्षित व्यक्ति को निरक्षरता के उन्मूलन को व्यक्तिगत लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है। सभी शिक्षित व्यक्तियों द्वारा किया गया हर एक प्रयास इस खतरे से निजात में सहयोग कर सकता है। इस नेक कार्य में जनता की भागीदारी आवश्यक है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>भरत यादव</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Oct 2018 10:34:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>साक्षरता के साथ ज्ञान एवं कौशल विकास भी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने 17 नवंबर, 1965 के दिन 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाने का फैसला लिया था। निरक्षरता अंधेरे और साक्षरता प्रकाश के समान है। आठ सितंबर 2018 को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस साक्षरता और कौशल विकास विषय के साथ दुनिया भर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/knowledge-and-ill-development-with-literacy-are-also-important/article-5794"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/artical-01.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने 17 नवंबर, 1965 के दिन 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाने का फैसला लिया था। निरक्षरता अंधेरे और साक्षरता प्रकाश के समान है। आठ सितंबर 2018 को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस साक्षरता और कौशल विकास विषय के साथ दुनिया भर में मनाया जाएगा। साक्षरता के साथ ज्ञान एवं कौशल विकास भी जरूरी है। ज्ञान एवं कौशल विकास के लिए साक्षर बनकर आगे बढ़ा जा सकता है। साक्षर, नवसाक्षर व असाक्षरों को साक्षर करने के बाद उन्हें कौशल उन्नयन से जोड़ा जाना और उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करने की महती आवश्यकता है। शिक्षा चाहे जैसी भी हो वह अपने और परिवार के प्रति काम आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कौशल उन्नयन के क्षेत्र में और भी अधिक काम करने की आवश्यकता है कौशल प्रशिक्षण के बाद हितग्राहियों को रोजगार से जोड़ा जाना नितांत आवश्यक है। साक्षरता और कौशल विकास का चोली दामन का साथ है। साक्षरता की सफलता रोजगार से जुड़ी है। हम साक्षर व्यक्ति को रोजी रोटी की सुविधा सुलभ करा कर देश से निरक्षरता के अँधेरे को भगा सकते हंै। हालाँकि केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न स्तरों पर कौशल विकास के कार्यक्रम संचालित कर रही हैं मगर जब तक ऐसे व्यक्ति अपने पैरों पर खड़े नहीं होंगे तब तक साक्षरता अभियान को पूर्ण रूप से सफल नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">
साक्षरता का मतलब केवल पढ़ना-लिखना या शिक्षित होना ही नहीं है। यह लोगों में उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता लाकर सामाजिक विकास का आधार बन सकती है। इसका सामाजिक एवं आर्थिक विकास से गहरा संबंध है। साक्षरता का कौशल मानव में आत्मविश्वास का संचार करता हैै। गरीबी उन्मूलन में इसका महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। महिलाओं एवं पुरुषों के बीच समानता के लिए जरूरी है कि महिलाएं भी साक्षर बनें।<br />
जीने के लिये खाने की तरह ही साक्षरता भी महत्वपूर्णं है। गरीबी को मिटाना, बाल मृत्यु दर को कम करना, जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना, लैंगिक समानता को प्राप्त करना आदि को जड़ से उखाड़ना बहुत जरुरी है। साक्षरता में वो क्षमता है जो परिवार और देश की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का उद्देश्य व्यक्ति, समुदाय तथा समाज के हर वर्ग को साक्षरता का महत्व बताकर उन्हें साक्षर करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">
साक्षरता एवं शिक्षा में बहुत बड़ा अंतर है। साक्षरता का आधार शिक्षा अर्जित करना होता है और शिक्षा का आधार ज्ञान। एक व्यक्ति बिना साक्षर हुए भी शिक्षित हो सकता है। साक्षरता एक मानव अधिकार है, सशक्तिकरण का मार्ग है और समाज तथा व्यक्ति के विकास का साधन है। लोकतंत्र की सुनिश्चितता के लिए साक्षरता आवश्यक है। वर्ष 2010 में जब बच्चों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का कानून 2009 लागू हुआ, यह देश के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। सभी के लिए प्रारंभिक शिक्षा की दिशा में देश के प्रयासों को इस कानून के लागू होने से जबरदस्त बढ़ावा मिला। आज शिक्षा का अर्थ केवल साक्षरता से लिया जाता है, आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी है साक्षरता नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षित व्यक्ति अपनी आय का साधन बढ़ा सकता है और आये हुए धन को सहेज कर अमीर भी बन सकता है परन्तु साक्षर व्यक्ति ये काम नहीं कर सकता। यहाँ शिक्षा और साक्षरता का अंतर समझना बहुत जरुरी है. शिक्षा का अर्थ है किसी उपयोगी कल को सीखना जबकि साक्षरता केवल मात्र अक्षर ज्ञान है।<br />
साक्षरता दक्षता और व्यवहार वे शक्तिशाली साधन है, जो स्वास्थ्य की बेहतर संभावनाएँ निर्मित करने के लिए महिलाओं और पुरुषों में आवश्यक क्षमताओं तथा आत्मविश्वास को विकसित करती है। साक्षरता और स्वास्थ्य में भी गहरा संबंध है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाकर शिशु और मातृ मृत्युदर में कमी लाना, लोगों को जनसंख्या विस्फोट के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना इसके उद्देश्यों में शामिल है। साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ने-लिखने और हिसाब-किताब करने की योग्यता प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि हमें नवसाक्षरों में नैतिक मूल्यों के प्रति आदरभाव रखने की भावना पैदा करना होगी।</p>
<p style="text-align:right;">बाल मुकंद ओझा</p>
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                <pubDate>Sat, 08 Sep 2018 08:41:40 +0530</pubDate>
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