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                <title>Editoral - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>संपादकीय : सभ्य होना है तो प्रकृति के साथी बनो</title>
                                    <description><![CDATA[आज पर्यावरण का सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि पृथ्वी की चिंता किसी को नहीं है। हालात की भयावहता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। (Environment Day) राजनीतिक दलों से तो उम्मीद करना ही बेमानी है, क्योंकि पृथ्वी और पर्यावरण उनके वोट बैंक नहीं हैं। पृथ्वी और पर्यावरण आज जिस स्थिति में हैं, उसके लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/if-you-want-to-be-civilized-then-be-a-companion-of-nature/article-24175"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-06/world-environment-day.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज पर्यावरण का सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि पृथ्वी की चिंता किसी को नहीं है। हालात की भयावहता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। <strong>(Environment Day</strong>) राजनीतिक दलों से तो उम्मीद करना ही बेमानी है, क्योंकि पृथ्वी और पर्यावरण उनके वोट बैंक नहीं हैं। पृथ्वी और पर्यावरण आज जिस स्थिति में हैं, उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। पृथ्वी मानव जीवन के साथ-साथ लाखों-लाख वनस्पतियों, जीव-जंतुओं की आश्रय स्थली है। इसके लिए किसी खास वर्ग को दोषी ठहराना उचित नहीं है, बल्कि सभी जिम्मेदार हैं। हम प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों का अपनी सुविधा की खातिर बेतहाशा इस्तेमाल कर रहे हैं। पर्यावरण विनाश ही बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का मूल है। इन हालातों ने ही पर्यावरण के खतरों को चिंता का विषय बना दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक प्रभाव अब साफ तौर पर दिखने लगा है। देखा जा सकता है कि गर्मियां आग उगलने लगी हैं और सर्दियों में गर्मी का अहसास होने लगा है। इसकी वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघलकर समुद्र का जलस्तर तीव्र गति से बढ़ा रहे हैं। हिमालय में ग्लेशियर का पिघलना कोई नई बात नहीं है। सदियों से ग्लेशियर पिघलकर नदियों के रूप में लोगों को जीवन देते रहे हैं। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में पर्यावरण के बढ़ रहे दुष्परिणामों के कारण इनके पिघलने की गति में जो तेजी आई है, वह चिंताजनक है। पर्यावरण के निरंतर बदलते स्वरूप ने नि:संदेह बढ़ते दुष्परिणामों पर सोचने पर मजबूर किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। हाल के दिनों में हिमालयी राज्यों में जंगलों में आग की जो घटनाएं घटीं, वे ग्लेशियरों के लिए नया खतरा हैं। वनों में आग तो पहले भी लगती रही हैं, पर ऐसी भयानक आग काफी खतरनाक है। आग के धुएं से ग्लेशियर के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके व्यापक दुष्परिणाम होंगे। काला धुआं कार्बन के रूप में ग्लेशियरों पर जम जाएगा, जो भविष्य में उस पर नई बर्फ को टिकने नहीं देगा। केन्या की पर्यावरणविद् और नोबेल पुरस्कार विजेता बंगारी मथाई ने एक समय कहा था कि सभ्य होना है, तो जंगलों का साथी बनो, प्रकृति से जुड़ो, उससे प्रेम करो। असल में बंगारी मथाई ने अपने कहे को जिया भी। उन्होंने लाखों पेड़ लगाये. अपने आसपास जंगल को बरकरार रखने की भरपूर कोशिश की। ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को नजरअंदाज करना बहुत बड़ी भूल होगी, इसलिए अब भी चेतो। अगर अब भी नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Jun 2021 05:02:56 +0530</pubDate>
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                <title>जनता पर भारी पड़ रही नेताओं की लापरवाही</title>
                                    <description><![CDATA[राजनेताओं की लापरवाही लोगों पर भारी पड़ रही है, इसकी एक मिसाल सामने आई है। पश्चिम बंगाल, असम सहित पांच राज्यों में नेताओं ने जमकर कोरोना नियमों की धज्जियां उड़ाई और अब इन्हीं राज्यों में कोरोना बेकाबू हो गया है। रोजाना संक्रमित मरीजों की गिनती बढ़ रही है। विडंबना यह है कि यहां रैलियां उस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/negligence-of-leaders-is-overshadowing-the-public/article-22947"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/negligence-of-leaders-is-overshadowing-the-public.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनेताओं की लापरवाही लोगों पर भारी पड़ रही है, इसकी एक मिसाल सामने आई है। पश्चिम बंगाल, असम सहित पांच राज्यों में नेताओं ने जमकर कोरोना नियमों की धज्जियां उड़ाई और अब इन्हीं राज्यों में कोरोना बेकाबू हो गया है। रोजाना संक्रमित मरीजों की गिनती बढ़ रही है। विडंबना यह है कि यहां रैलियां उस वक्त हुई जब कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने की संभावना स्पष्ट नजर आ रही थी। मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिला अस्पताल में भी एक लापरवाही का मामला सामने आया है, जहां कोरोना से संक्रमित एक मरीज की ऑक्सीजन मशीन वार्ड बॉय ने हटा दी। ऑक्सीजन की कमी के चलते उन्होंने तड़प-तड़पकर बेटे के सामने ही बिस्तर पर दम तोड़ दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राजनीतिक रैलियों के साथ पश्चिम बंगाल में 420 प्रतिशत, असम में 532 प्रतिशत और तामिलनाडु 160 प्रतिशत मामले बढ़े हैं। मृत्यु दर में 45 प्रतिशत बढ़ौतरी हुई है। सत्ता के लालच में चूर हुए नेता यह भूल गए थे कि कोरोना अभी गया नहीं। पार्टियों ने एक-दूसरे से अधिक इक्ट्ठ करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया। दु:खद बात यह है कि जो नेता विगत वर्ष लॉकडाउन में लोगों को सावधानी बरतने के लिए हाथ जोड़कर अपीलें कर रहे थे, वही नेता हजारों, लाखों की भीड़ में भाषण देते नजर आए। बिहार विधान सभा चुनावों के दौरान भी यही सब कुछ घटित हुआ। राजनीतिक दलों ने अपने रोड़ शो पर भारी भीड़ की तस्वीरें अपने अधिकारित सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भी शेयर की।</p>
<p style="text-align:justify;">यही दृश्य कोरोना के कारण सबसे अधिक मृत्यु दर वाले राज्य पंजाब में देखने को मिला, जब फरवरी महीने में हुए निकाय चुनावों में सभी राजनीतिक दल जुटे हुए थे। सड़कों पर मास्क न पहनने वालों के चालान काटने वाली पुलिस ने किसी भी पार्टी के नेता को हाथ तक नहीं लगाया। पंजाब में शिरोमणी अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल एक-दो रैलियां करने के कोरोना संक्रमित हो गए तो पार्टी ने तुरंत रैलियां करने पर रोक लगा दी। अब पंजाब में रोजाना मेयर/प्रधानों के चुनावों को लेकर इक्ट्ठ हो रहे हैं। हालांकि कई राज्यों में रात को कर्फ्यू लगाया गया है। यह काफी हैरतपूर्ण है कि कोरोना भी बुद्धिमान है, जो नेताओं की भीड़ को कुछ नहीं कहता लेकिन रात को फैल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्ता व पदों के दौर में लोगों के स्वास्थ्य से जमकर खिलवाड़ हो रहा है। उनकी जिंदगी से खेला जा रहा है। हम पहले ही उस देश के नागरिक हैं जहां सावधानियां रखने के लिए जनता को सख्ती से समझाना पड़ता है, ऊपर से राजनीतिज्ञ भी लापरवाह हो जाए फिर तो भगवान ही रक्षक है। बढ़ रहे कोरोना मामलों के मद्देनजर स्कूली परीक्षाएं रद्द करना तो दरुस्त कदम है लेकिन कोरोना के लिए सावधानियां लागू करने के लिए केवल शिक्षा ही एकमात्र क्षेत्र नहीं है। नेताओं पर भी बराबर नियम लागू होने चाहिए।</p>
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                <pubDate>Thu, 15 Apr 2021 21:57:24 +0530</pubDate>
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                <title>पाक-भारत के बीच बनती बिगड़ती पेचीदा-स्थितियां</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान की नई सरकार भारत के साथ इतनी दोस्ताना हो रही है कि पंजाब में सिक्खों द्वारा पाकिस्तान स्थित गुरूद्वारों में दर्शनों के लिए रास्ता मांगे जाने पर बिना वीजा प्रवेश देने का प्रस्ताव कर चुकी है। पिछले दिनों पाकिस्तान गए पंजाब के नेता सिद्धू की पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से गले […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/pak-indias-worsening-turbulence/article-5829"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/pak-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की नई सरकार भारत के साथ इतनी दोस्ताना हो रही है कि पंजाब में सिक्खों द्वारा पाकिस्तान स्थित गुरूद्वारों में दर्शनों के लिए रास्ता मांगे जाने पर बिना वीजा प्रवेश देने का प्रस्ताव कर चुकी है। पिछले दिनों पाकिस्तान गए पंजाब के नेता सिद्धू की पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा से गले मिलने की घटना को भारत में बहुत तूल दिया गया था। यहां से इस रास्ते की भी बात निकली। पाकिस्तान अब काफी नरम व्यवहार कर रहा है। यहां भारत सरकार की ओर से कोई जवाब अभी पाकिस्तान को नहीं दिया गया। जबकि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्द्र सिंह भी इस बारे में एक पत्र भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को सौंप चुके हैं। उधर पाकिस्तान प्रधानमंत्री को लग रहा है कि भाजपा फिर से पाकिस्तान को भारत में वोट हासिल करने के लिए उछालेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वजह से करतारपुर साहिब के रास्ते को खोले जाने को लेकर भाजपा अपना ठंडा रूख रखे हुए है। जबकि मामला इससे ज्यादा पेचीदा है। दरअसल भारत में अब यह मामला पंजाब की घरेलू राजनीति में फंस गया है। करतारपुर साहिब व डेरा बाबा नानक के बीच रास्ते को लेकर कांगे्रस सरकार प्रयत्न कर रही है, पंजाब की पंथक पार्टी शिरोमणी अकाली दल इस पर अभी कुछ भी नहीं बोल रही। शिरोमणी अकाली दल केन्द्र में सत्तासीन भाजपा की सहयोगी पार्टी है। भाजपा अभी शायद शिरोमणी अकाली दल की ओर ताक रही कि वह इस रास्ते पर क्या रूख रखे? चूंकि जिस तरह की पंजाब में परिस्थितियों बनी हुई है उसके अनुसार अभी तक पंथक हलकों में कांग्रेस ऊंचाई पर है यहां शिरोमणी अकाली दल बुरी तरह से घिरा हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अगर करतारपुर साहिब व डेरा बाबा नानक के बीच रास्ता खुल जाता है तब वह कांग्रेस की जीत होगी जोकि उसे पंथक हलकों में और ज्यादा मजबूत करेगी। चूंकि इससे पहले पंजाब में शिरोमणी अकाली दल भाजपा सत्तासीन थे, वह इस दिशा में कुछ नहीं कर पाए। यह राजनीतिक मसला शायद तब इस कारण हल नहीं हुआ क्योंकि पहले पाकिस्तान में नवाज शरीफ सरकार व सेना में रास्सकस्सी चल रही थी। घरेलू व अंतरराष्टÑीय राजनीति के कारण पाकिस्तान-भारत बार-बार नजदीक होते है तो वहीं इसी कारण ये बार-बार दूर भी हो रहे हैं। अब अगर वक्त पर भारत सरकार ने पाकिस्तान सरकार का माकूल जवाब नहीं दिया तब पाकिस्तान की चिढ़ बढ़ना स्वभाविक है, जिसका परिणाम फिर भारत-जम्मू कश्मीर में भुगतेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत-पाकिस्तान को अपनी दूरियां मिटाने के लिए क्षेत्रीय व सांप्रदायिक नफे-नुक्सानों को किनारे करना होगा ठीक ऐसे ही जैसे स्वतंत्रता दिवस के वक्त दोनों देश आपसी कैदियों को रिहा कर देते हैं। पाकिस्तान अभी आर्थिक संकट से भी जूझ रही है। ऐसे में वह भारत के लिए एक अच्छा बाजार भी बनने जा रही है। अत: केन्द्र सरकार को चाहिए कि वह छोटे मोटे नफे-नुक्सानों को भुलाकर दोनों देशों में आपसी रिश्तों को मजबूत बनाएं।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Sep 2018 20:30:28 +0530</pubDate>
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