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                <title>nature - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Organic Farming : प्रकृति संतुलन का आधार- जैविक खेती</title>
                                    <description><![CDATA[Organic Farming जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/organic-farming-is-the-basis-of-nature-balance/article-59028"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/organic-farming.jpeg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>Organic Farming</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। मिट्टी में असंख्य लाभदायक जीव रहते हैं जो एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा पौधों की वृद्धि हेतु पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। अत: इस पद्धति में मिट्टी को स्वस्थ एवं जीवित रखते हुए प्रकृति में उपलब्ध अन्य मित्र जीवों के मध्य तालमेल रखकर खेती करनी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए खेत की आवश्यकतानुसार जुताई की जाये क्योंकि अधिक जुताई भी लाभदायक जीवों को नष्ट कर देती है। अच्छी फसल के लिए मिट्टी का स्वस्थ रहना आवश्यक है। मिट्टी की स्वस्थता से मतलब है कि उसमें जितने अधिक जीवाणु होंगे, वह मिट्टी उतनी ही स्वस्थ मानी जावेगी। ये जीवाणु फसल के अवशेष जैसे जड़, डंठल, पत्तियां, कचरे को सड़ा-गलाकर झूमस में परिवर्तित करते हैं और मिट्टी में खनिज को भी घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर फसल को उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ इन जीवों को सड़ने-गलने से भी मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। कृषि का आधार जीवांश है। जीवांश से भूमि जीवित रहती है। जीवांश से भूमि पर विपरीत असर डालने वाले कारक विघटित हो जाते हैं। वे पौधों एवं जीवों के लिए पर्याप्त मुख्य एवं अल्प पोषण तत्व उपलब्ध कराते हैं। भू-क्षरण का बचाव करते हैं, इससे जल के रिसाव व संवर्धन की क्षमता में वृद्धि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रासायनिक खेती के कारण अनेक स्थानों पर मिट्टी की गुणवत्ता व सजीवता तथा सूक्ष्म जीवों की संख्या में कमी आ रही है तथा भुरभुरी मिट्टी का भयावह रूप से क्षरण हुआ है। हरित क्रांति के दौरान भारत वर्ष में कृषि का विकास बहुत तेजी से हुआ है और हमारे देश के खाद्यान्नों के उत्पादन में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। आज की खेती मुख्यत: रासायनिक खादों पर ही निर्भर रहने लगी है। आधुनिक खेती से हमारी कृषि योग्य भूमि में अब अन्य तत्वों की कमी के साथ-साथ मृदा संरचना एवं स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता एवं स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों का प्रयोग भी संतुलित रूप में करने की अत्यंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तरल जैविक उर्वरक लाभकारी जीवाणुओं के वह उत्पाद हैं, जो लम्बी अवधि तक सक्रिय रहकर मिट्टी व हवा से मुख्यत: सूक्ष्म तत्वों का दोहन कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। प्राकृतिक संतुलन कायम रखती है जैविक खेती जिसका आधार जीवांश है। जीवांश को जलाकर नष्ट नहीं करें अन्यथा उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। प्राचीन समय में भारत की कृषि की गौरवशाली उपलब्धियों में गोवंश की अहम भूमिका रही है। पशुधन अर्थ तंत्र की धुरी थी वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है व साथ में पर्यावरण सुरक्षित रखने में सक्षम भी है। ग्रीनपीस के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 98 प्रतिशत कृषक जैविक खाद का उपयोग करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवंश के अतिरिक्त पेड़-पौधों, पक्षी, मेंढक, उल्लू, केंचुए आदि प्राकृतिक संतुलन के साथ उत्पादन स्तर उच्च स्तर पर रखने में सहायक होेते हैं। इस धरती को लाखों पौधों की जातियो ंने संवारा है। मानव सभ्यता के इतिहास में केवल सात हजार जातियों का ही भोजन के रूप में प्रयोग होने का उल्लेख मिलता है। जिनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, आलू सोयाबीन, गन्ना आदि प्रमुख हैं। इन प्रमुख जातियों के अतिरिक्त पौधों की अन्य जंगली किस्में भी हैं। जिन्हें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषत: प्रगतिशील देशों में प्रयोग में लाया जाता है। इन सब पादप जन्य द्रव्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भोजन, चारा, रेशा, र्इंधन आदि की आवश्यकता मानव उपयोग के लिए सदैव बनी रहेगी। उक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए जैविक खेती प्रकृति संतुलन का आधार है। अत: हर व्यक्ति पर्यावरण प्रहरी बने।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 11:23:31 +0530</pubDate>
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                <title>क्या प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम है कोरोना और तूफान, जानें प्रसिद्ध पर्यावरणविद् की जुबानी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी ने मंगलवार को कहा कि विलासितापूर्ण जीवन के लिए पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के कारण ही कोरोना महामारी और बार बार चक्रवाती तूफानों का लोगों को सामना करना पर रहा है। पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित डॉक्टर जोशी ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/are-corona-and-storm-the-result-of-tampering-with-nature-lets-come-to-know-from-a-famous-environmentalist/article-23887"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-05/corona-and-cyclone.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनिल प्रकाश जोशी ने मंगलवार को कहा कि विलासितापूर्ण जीवन के लिए पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ के कारण ही कोरोना महामारी और बार बार चक्रवाती तूफानों का लोगों को सामना करना पर रहा है। पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित डॉक्टर जोशी ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् की ओर से आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि मनुष्य ने अपने जीवन को सरल बनाने और विलासितापूर्ण जीवन के लिए प्रकृति के साथ अत्याचार किया है जिसके कारण बीमारियां तथा प्राकृतिक आपदा बार बार आ रही है। इस अवसर पर परिषद् के महानिदेशक त्रिलोचन महापात्रा भी उपस्थित थे।</p>
<h4 style="text-align:justify;">विकास के नाम पर वनों को समाप्त कर दिया गया</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज इकोलॉजिकल असुरक्षा कि स्थिति पैदा हो गई है। इकोलॉजी को ध्यान में रखकर अर्थ व्यवस्था की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। वन से हमें जीवन, पानी, भोजन और स्वच्छ हवा मिलती है लेकिन विकास के नाम पर वनों को समाप्त कर दिया गया जिसके कारण मिट्टी और हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो गई। कोरोना संक्रमण के दौरान लोगों को जीवन बचाने के लिए प्राकृतिक ऑक्सीजन की जगह कृत्रिम ऑक्सीजन का सहारा लेना पड़ा ।</p>
<h4 style="text-align:justify;">देश में 19 प्रतिशत वन क्षेत्र होने का दावा</h4>
<p style="text-align:justify;">माउंटेन मैन के नाम से विख्यात डॉक्टर जोशी ने कहा कि मनुष्य को सर्वोपरी नहीं समझना चाहिए प्रकृति से ऊपर कुछ भी नहीं है। कोरोना एक जगह फैला और पूरी दुनिया में फैल गया। उन्होंने सवाल किया कि देश में 19 प्रतिशत वन क्षेत्र होने का दावा किया जाता है लेकिन इसमें प्राकृतिक वन कितना है। जिस जंगल में आग लगने से पेड़ जल जाते हैं वह क्षेत्र वन की परिभाषा में नहीं आता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">जोशी ने गलेशियर की स्थिति पर चिंता जाहिर की</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि प्रकृति ने एक केमिकल सिस्टम दिया है जो एक दूसरे पर निर्भर है। अब इसका उल्लंघन हो रहा है । उन्होंने ग्लेशियर की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र में सालाना चार पांच मीटर की दर से ग्लेशियर काम हो रहा है। लद्दाख में तो यह दर पांच छह मीटर सालाना है। पहले ग्लेशियर से 70 प्रतिशत जल मिलता था। नदियां सूख गई है, यमुना रो रही है और गंगा पर सवाल उठाए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरणविद् ने कहा कि समुद्र में ग्लेशियर टूट कर बह रहे हैं। समुद्र में प्लास्टिक कचड़ा विचलित करने वाली है। उन्होंने कहा कि विज्ञान की परिभाषा में विकल्प की तलाश की गई। विज्ञान ने कुछ अविष्कार किए जिससे नई-नई समस्याएं पैदा हुई। लोग चांद और मंगल पर जाने की बात कर रहे हैं और पृथ्वी के साथ अत्याचार किया जा रहा है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 25 May 2021 17:12:41 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>प्रकृति का कहर और हमारी जिम्मेवारी</title>
                                    <description><![CDATA[अरब सागर से उठे ताऊते चक्रवाती तूफान से 26 मौतें हो गई और 49 लोग अभी भी लापता हैं। जल सेना की बहादुरी को सलाम है, जिन्होंने 186 लोगों की जानें बचा ली। समय से पूर्व चेतावनी मिलने के कारण भारी जानी नुक्सान से बचाव हो गया, लेकिन बड़े स्तर पर माली नुक्सान होने से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/natures-havoc-and-our-responsibility/article-23785"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-05/cyclone.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अरब सागर से उठे ताऊते चक्रवाती तूफान से 26 मौतें हो गई और 49 लोग अभी भी लापता हैं। जल सेना की बहादुरी को सलाम है, जिन्होंने 186 लोगों की जानें बचा ली। समय से पूर्व चेतावनी मिलने के कारण भारी जानी नुक्सान से बचाव हो गया, लेकिन बड़े स्तर पर माली नुक्सान होने से जनजीवन प्रभावित हुआ है। यह समस्या केवल भारत के लिए नहीं बल्कि प्रकृति के भयानक रूप का सामना पूरे विश्व को अलग-अलग तूफानों के रूप में करना पड़ रहा है। तकनीकी रूप से विकसित देश अमेरिका भी प्रकृतिक आपदाओं की मार से बच नहीं सके। दरअसल विश्व में विशेष तौर पर विकसित देशों को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी निभाने की आवश्यकता है। प्रकृति से छेड़छाड़ व जलवायु में परिवर्तन ही प्राकृतिक आपदाओं की जड़ है। लंबे समय तक अमेरिका जैसे देशों ने इस मामले में दादागिरी से अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय गरीबी, अशिक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाओं के लिए प्रयास कर रहे देशों को प्रदूषण का कारण बताया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उस समय हद ही कर दी जब अमेरिका पैरिस समझौते से ही बाहर हो गया। अमेरिका की दादागिरी का भारी विरोध हुआ और वातावरण प्रेमियों ने उसकी आलोचना की। विकासशील देशों का उद्योगों के बिना गुजारा नहीं विकसित देश ज्यादा कमाई के लालच में अनावश्यक उद्योगों को बंद करने को तैयार नहीं। ऐसे में प्रदूषण कम करने के लिए तकनीक पर भारी निवेश भी कोई देश नहीं करना चाहता। विकासशील देश अनुदान की कमी के कारण तकनीक खरीदने में असमर्थ हैं, इसीलिए यह आवश्यक बन गया है कि संयुक्त राष्ट्र जहां विकसित देशों को वातावरण संबंधी जिम्मेवारियां निभाने के कहे वहीं विकासशील देशों को वित्तीय मदद भी उपलब्ध करवाई जाए। जिस प्रकार आपदाएं आ रही हैं इनके मद्देनजर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए विश्व भर में मुहिम चलानी होगी। धरती दिवस, विश्व जल दिवस, ओजोन दिवस जैसे दिन मनाने का फिर ही फायदा है यदि सब देश ईमानदारी से ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन रोकने के लिए अपनी भूमिका निभाएं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 May 2021 09:55:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्राकृतिक संसाधनों की हो रक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[वायु प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है। स्विस आॅर्गनाइजेशन द्वारा तैयार वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2020 में बताया गया है कि दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के 22 शहर शामिल हैं। हमारे यहां वायु की गुणवत्ता इतनी खराब है कि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/protecting-natural-resources/article-22891"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/its-time-to-save-nature.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वायु प्रदूषण के मामले में हमारी स्थिति दुनिया में सबसे ज्यादा खराब है। स्विस आॅर्गनाइजेशन द्वारा तैयार वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2020 में बताया गया है कि दुनिया के 30 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में हमारे देश के 22 शहर शामिल हैं। हमारे यहां वायु की गुणवत्ता इतनी खराब है कि अस्थमा, हृदय रोग, फेफड़ों के रोग समेत अनेक जानलेवा बीमारियों से जूझते रोगियों की तादाद दिनों-दिन बढ़ रही है़ यह इस बात का संकेत है कि प्रदूषण के मामले में देश की हालत चिंताजनक है। हमारा देश दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित देशों की सूची में पांचवे स्थान पर है। इस सूची में पहला स्थान बांग्लादेश, दूसरा पाकिस्तान, तीसरा मंगोलिया और चौथा अफगानिस्तान का है। हवा के प्रदूषित होने से इनमें घुलने वाले छोटे-छोटे कण सांस के जरिये हमारे फेफड़ों तक पहुंचते है़ं, फिर हृदय, फेफड़ों, सांस आदि रोगों में वृद्धि करते है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की राजधानी ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी प्रदूषण से बहुत ज्यादा त्रस्त है। दिल्ली विश्व की सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी है। गाजियाबाद तो प्रदूषण में शीर्ष स्थान पर है, जो स्वास्थ्य मानकों के लिहाज से बेहद खतरनाक है। देश के वे 22 शहर, जो विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों में शामिल हैं, वहां वायु प्रदूषण का स्तर भयावह स्तर तक पहुंच गया है। दुखद है कि इस भयावह स्थिति को देखते हुए भी सरकार मौन है़ केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण पर नियंत्रण करनेवाली अन्य संस्थाएं भी इस दिशा में नाकाम साबित हुई हैं। यदि वायु प्रदूषण फैलाने वाले कारकों पर नियंत्रण लगा होता, तो देश को इतनी भयावह स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता। प्रदूषण का यह स्तर हमारी असफलता का सबूत है। वायु प्रदूषण के इतने व्यापक पैमाने पर फैलने का कारण वाहनों की दिनों-दिन बढ़ती संख्या, भवन निर्माण पर प्रतिबंध का नाकाम रहना, भवन निर्माण सामग्री का खुलआम सड़कों पर पड़े रहना और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकलने वाला जहरीला धुआं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसे विडंबना ही कहेंगे कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए अक्सर किसानों द्वारा पराली जलाने को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। जबकि वैज्ञानिक अनुसंधान के आधार पर पराली केवल 2.37 प्रतिशत प्रदूषण के लिए ही जिम्मेदार है। लॉकडाउन से उपजी परेशानियों को छोड़ दें, तो इस दौरान हमारी प्राकृतिक संपदा, पर्यावरण, नदियों और वायु की गुणवत्ता को सबसे ज्यादा लाभ पहुंचा है। चूंकि इस दौरान सड़कों पर वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध थे, जिससे वायु प्रदूषण घटा और प्रकृति की हरियाली लौट आई। नदियों का जल साफ हुआ़ लॉकडाउन पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में अहम कारक साबित हुआ, लेकिन लॉकडाउन के बाद जैसे ही पाबंदियां हटीं, हर तरह के प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">आज से 110 वर्ष पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि मानव यंत्र का गुलाम न हो़ यंत्र एक सहायक की भूमिका में हो। वर्तमान स्थिति उसके एकदम उलट है। यदि हमने अभी इसे नहीं रोका, तो बहुत जल्द हम दाने-दाने को मोहताज हो जायेंगे। समय आ गया है कि हम भौतिक संसाधनों की अंधी चाहत की ओर न दौड़ें, प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा करें क्योंकि ये सीमित हैं। विकास जब-जब मानवीय हितों के विपरीत होता है, उसका दुष्परिणाम आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक स्तर के साथ प्राकृतिक संपदा पर भी होता है। इसलिए हमारा पहला कर्तव्य है कि हम मानवहित और प्रकृतिप्रदत्त संसाधनों की रक्षा की नीतियां बनाएं।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 14 Apr 2021 09:44:16 +0530</pubDate>
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                <title>प्राकृतिक विश्व की हिफाज़त करने 27 मार्च को होगा अर्थ-ऑवर</title>
                                    <description><![CDATA[उदयपुर। प्राकृतिक विश्व की हिफाज़त करने में जन-जन के जुड़ाव को सुनिश्चित करने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की ओर से 27 मार्च को रात्रि 8.30 बजे से 9.30 बजे तक अर्थ-ऑवर का आयोजन रखा गया है। डब्ल्यू डब्ल्यू एफ इंडिया के उदयपुर संभागीय अधिकारी अरूण सोनी ने बताया कि ‘स्विच ऑफ एण्ड स्पीक अप फॉर नेचर’ […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/earth-hour-will-take-place-on-27-march-to-protect-the-natural-world/article-22428"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-03/its-time-to-save-nature1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>उदयपुर।</strong> प्राकृतिक विश्व की हिफाज़त करने में जन-जन के जुड़ाव को सुनिश्चित करने के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की ओर से 27 मार्च को रात्रि 8.30 बजे से 9.30 बजे तक अर्थ-ऑवर का आयोजन रखा गया है। डब्ल्यू डब्ल्यू एफ इंडिया के उदयपुर संभागीय अधिकारी अरूण सोनी ने बताया कि ‘स्विच ऑफ एण्ड स्पीक अप फॉर नेचर’ थीम पर आयोजित होने वाले अर्थ ऑवर में विभिन्न कार्यालयों, संस्थाओं और घरों में एक घंटे तक बिजली को बंद रखते हुए प्रकृति के संरक्षण विषय पर प्रतिबद्धता जताई जाएगी। उन्होंने बताया कि इस वर्ष अर्थ-ऑवर 7 भाषाओं में अपना संदेश लेकर जनसामान्य तक पहुंचेगा और उन्हें उत्साहित करेगा कि अपने छोटे और बडे़ हर कार्य से हमारे अपने घर पृथ्वी के लिए अलग हटकर कार्य करें।</p>
<p style="text-align:justify;">अर्थ-ऑवर को देखते हुए इसके लिए विशेष रूप से तैयार की गई पोस्टर सीरीज का विमोचन कल यहां सिटी पैलेस में अरविन्द सिंह मेवाड़ ने किया और उन्होंने प्रदेशवासियों से 27 मार्च को अपनी सहभागिता निभाते हुये इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने की अपील की। अर्थ-ऑवर विश्व प्रकृति निधि भारत का सर्वोत्कृष्ट पर्यावरण कार्यक्रम है। सिडनी से 2009 में प्रारम्भ हुआ यह अभियान विश्व के सबसे बड़े ज़मीनी स्तर पर जुडे पर्यावरण के कार्यक्रमों में से एक है जो 180 से अधिक देषों के व्यक्तियों, समुदायों, व्यापारियों, संस्थाओं को प्रेरणा देता है और एक दशक से अधिक समय से ठोस पर्यावरण कार्यों को निष्पादित करता है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Mar 2021 12:46:34 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>वक्त है प्राकृति को सहेज लें</title>
                                    <description><![CDATA[अभी भी वक्त है, हम जाग जाएं अन्यथा प्रकृति कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेगी। जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह एक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा। उपरोक्त पंक्तियां पेश हो रहे राष्ट्रीय व प्रादेशिक बजटों में पर्यावरण की अनदेखी को लेकर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/its-time-to-save-nature/article-22285"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-03/its-time-to-save-nature.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अभी भी वक्त है, हम जाग जाएं अन्यथा प्रकृति कब तक अनावृत्त होकर हमारे अनाचार सहती रहेगी। जिस प्रलय का इंतजार हम कर रहे हैं, वह एक दिन इतने चुपके से आयेगी कि हमें सोचने का मौका भी नहीं मिलेगा। उपरोक्त पंक्तियां पेश हो रहे राष्ट्रीय व प्रादेशिक बजटों में पर्यावरण की अनदेखी को लेकर सावधान करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बजट भले ही केंद्र सरकार का हो या राज्य सरकारों का, उनमें ऐसा दिखाया जाता मानो देश में पर्यावरण की कोई समस्या ही नहीं रही। केंद्र सरकार ने इस बार पर्यावरण, वन व जलवायु मंत्रालय को बजट 2020-21 के मुकाबले 230 करोड़ रुपए कम फंड दिया। यही हाल पंजाब और हरियाणा सरकार के बजट का है, वातावारण के लिए फंड आरक्षित किया गया है किंतु जिस प्रकार वातावारण का संकट बढ़ रहा है, उसकी गंभीरता को देखते हुए सरकारों ने वातवारण को अनेदखा कर दिया है। जिस प्रकार सरकारें अन्य विकास प्रोजैक्टों पर पैसा खर्च कर रही हैं, दूसरे छोर पर पर्यावरण के लिए कोई बड़े कदम नहीं उठाए जा रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">पहाड़ी राज्यों में जंगलों की गैर-कानूननी कटाई और माइनिंग की बहुत बड़ी समस्या है। जिन वृक्षों को धरती का आभूषण माना जाता है, उनका खात्मा किया जा रहा है। विकास की इस अंधी दौड़ के पीछे धरती के संसाधनों का जमकर दोहन किया जा रहा है। पानी की उपलब्धता और पानी की गुणवत्ता की समस्या कई अन्य समस्याओं को जन्म दे रही है। हम सभ्यता का गला घोंट रहें हैं। हम जिस धरती की छाती पर बैठकर इस प्रगति व लम्बे-लम्बे विकास की बातें करते हैं, उसी छाती को रोज घायल किये जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पृथ्वी, पर्यावरण, पेड़- पौधे हमारे लिए दिनचर्या नहीं अपितु पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनकर रह गए हैं। राज्य सरकारों के लिए पर्यावरण कोई मुद्दा ही नहीं है और वह हमेशा केंद्र सरकार की तरफ झांकने लगती हैं। यदि केवल पंजाब का हाल जानें तब सतलुज, ब्यास नदी प्रदूषित हो चुकी है। कभी यही पानी स्वच्छ व जीवनदाता था जिसकी वास्तविक्ता लॉकडाउन में कुछ हद तक प्रदूषण कम होने के कारण देखने को मिली थी। लोग नदियों का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर हैं। विकास केवल नई बसों, सड़कों व ऊंची इमारतों का नाम ही नहीं है बल्कि स्वच्छ हवा और पानी जीवन की सर्वप्रथम प्राथमिकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हरियाणा की बात करें तब घग्गर नदी एक गंदा नाला बन चुकी है। विकास भी आवश्यक है लेकिन यह विनाश भी नहीं बनना चाहिए। यदि प्रदूषण के प्रति इसी तरह लापरवाही बढ़ती गई तब वह दिन दूर नहीं जब लोगों को स्वच्छ हवा के लिए आक्सीजन के सिलेंडरों पर निर्भरता बढ़ानी होगी। फैक्ट्रियां भी चलनी चाहिए लेकिन प्रदूषण की रोकथाम के लिए तकनीक पर पैसा खर्च किया जाना चाहिए। हमें अब भली-भांति समझ लेना होगा कि पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यही है कि हम धरती की पर्यावरण संबंधित स्थिति के तालमेल को बनाए रखें।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों की यह सलाह बिल्कुल सही है कि कैंसर के इलाज के लिए केवल अस्पताल खोल देना ही वास्तविक समाधान नहीं बल्कि उनके कारणों को तलाश कर उन्हें समाप्त करने की आवश्यकता है। सूखे वृक्षों को भी तभी काटा जाय, जब उनकी जगह कम से कम दो नए पौधे लगाने का प्रण लिया जाय। अपनी वंशावली को सुरक्षित रखने हेतु ऐसे बगीचे तैयार किये जा सकते हैं, जहाँ हर पीढ़ी द्वारा लगाये गए पौधे मौजूद हों। यह मजेदार भी होगा और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में एक नेक कदम भी।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/its-time-to-save-nature/article-22285</link>
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                <pubDate>Fri, 12 Mar 2021 21:38:17 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>प्रकृति का संदेश, कोरोना का परिवेश</title>
                                    <description><![CDATA[कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) वैश्विक संक्रामक महामारी है। लगभग सम्पूर्ण विश्व की अर्थ.ब्यवस्था इससे प्रभावित हुई है। भारत ने इस संकटकाल में जनता के स्वास्थ्य व दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभी आवश्यक कदम उठाते हुए आत्म.विश्वास व अभूतपूर्व क्षमता का परिचय दिया है। प्राय: विपत्तियाँ आती हैं, और समाज को चेतावनी व संदेश देकर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/message-of-nature-coronas-surroundings/article-17490"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/message-of-nature.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) वैश्विक संक्रामक महामारी है। लगभग सम्पूर्ण विश्व की अर्थ.ब्यवस्था इससे प्रभावित हुई है। भारत ने इस संकटकाल में जनता के स्वास्थ्य व दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु सभी आवश्यक कदम उठाते हुए आत्म.विश्वास व अभूतपूर्व क्षमता का परिचय दिया है। प्राय: विपत्तियाँ आती हैं, और समाज को चेतावनी व संदेश देकर जाती हैं। आवश्यकता है। धैर्य व संकल्प के साथ आगे बढ़ने की। प्रकृति का संदेश समझना आवश्यक है, ताकि जीवनशैली व व्यवस्था में समचित सुधार किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना महामारी से बचाव के लिए सावधानी रखने व कम के कम बाहर निकलने, सामाजिक दूरी बनाकर रखने, पर बल दिया गया है। वास्तव में, पिछले कुछ दशकों में मीडिया से प्रभावित होकर समाज ने आवश्कताएं बहुत बढ़ा ली हैं, और अनावश्यक सैर-सपाटा व दिखावा का महत्व बढ़ गया है। इससे समय व धन की बर्बादी हो रही है, परिवारों में तनाव बढ़ रहा है, व बुजुर्ग उपेक्षित अनुभव कर रहे हैं। परन्तु यह संकटकाल आवश्यकतओं को नियंत्रित कर सादा जीवन अपनाने की सलाह देता है। इससे अनैतिक धनार्जन व जमाखोरी की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा। धन का बहुत बड़ा भंडार जो मुट्ठी भर लोगों के नियंत्रण में रहता है, उसके वितरण का दायरा बढ़ेगा, व समाज में खुशहाली आयेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनैतिक मामलों में सामाजिक शक्ति प्रदर्शन का विशेष महत्व है। प्राय: बड़े राजनेता व अन्य वीआईपी दर्जनों गाड़ियों का काफिला लेकर चलते हैं, और फिजूल खर्ची में धन बर्बाद करते हैं। चुनाव प्रचार में भाड़े की भीड़ जुटाने के आरोप लगते रहे हैं। कोरोना महामारी से इन पर नियंत्रण लगेगा। अब बैठकों के लिए वीडियो कांफ्रेन्सिंग का प्रचार बढ़ेगा। उच्च शिक्षा तथा अन्य सरकारी विभागों के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भी वीडियो कांफ्रेन्सिंग का प्रचार बढ़ेगा। इस संकटकाल का संदेश स्पष्ट है, कि भीड़-भाड़, दिखावा, आवागमन व फिजूल खर्ची पर नियंत्रण हो, व उन्नत तकनीक का यथासम्भव प्रयोग हो, ताकि प्रकृति कम से कम प्रभावित हो।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत लगभग 135 करोड़ की विशाल जनसंख्या वाला देश है। सार्वजनिक स्थलों पर प्राय: भीड़ बनी रहती है। रेल यात्रा के लिए आरक्षित टिकट प्राप्त करना बहुत कठिन होता है। अनारक्षति डिब्बों में खड़े होने व सामान सुरक्षित रखने की गुंजाइश हो जाये, तो सौभाग्य समझा जाता है। बस यात्रा में भी प्राय: यही हाल होता है। अस्पतालों में रोगियों की भीड़ के कारण चिकित्सक व पैरामेडिकल स्टाफ सभी लाचार हो जाते हैं, व इलाज बुरी तरह प्रभावित होता है। भारी संख्या में रोजगार के लिए श्रमिक गावों से शहरों में आते हैं। वहाँ एक छोटे कमरे में 4-5 लोग रहते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में ऐसी ही समस्यायें हैं। निरन्तर बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए इन समस्याओं का कोई हल दिखाई नहीं देता। ऐसी परिस्थिति में सामाजिक दूरी बनाकर रखना सम्भव नहीं है। कोरोना संकटकाल जनसंख्या नियंत्रण के प्रभावकारी उपाय करने लिए शासन व्यवस्था का ध्यान आकृष्ट कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना महामारी पर नियंत्रण करने के लिए आवश्यक सेवाओं को छोड़कर अन्य गतिविधियों पर लॉकडाउन महत्वपूर्ण कदम रहा है। भारत सहित अनेक देशों ने इसका पालन किया है, और कई देशों में यह सफल भी रहा है। देश में लॉकडाउन के समय कारखाने व यातायात ठप हो जाने से जल व वायु प्रदूषण अकल्पनीय निचले स्तर पर आ गया। नदियों का जल निर्मल हो गया, व हिमालय की चोटियाँ सैकड़ों किलोमीटर दूर से दिखाई देने लगीं। हमारे देश में नदियों की सफाई पर सरकारी योजनायों में अरबों रुपयों की धनराशि खर्च होने पर भी सन्तोषजनक परिणाम न मिला। परन्तु लॉकडाउन के समय प्रकृति ने स्वयं को स्वत: दुरुस्तकर स्पष्टकर दिया कि मानव ने विशाल जनसंख्या के भोगवादी सपनों की पूर्ति हेतु प्रकृति का अन्धाधुंध शोषण कर पर्यावरण नष्ट किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी दौरान सुनसान सड़कों पर जंगली जानवर भी स्वच्छन्द विचरण करते देखे गये। सन्देश स्पष्ट है कि जनसंख्या बढ़ने से आबादी का दायरा बढ़ता जा रहा है, व प्राकृतिक संसाधनों पर मानव का अधिकार बढ़ता जा रहा है। इसीलिए प्राय: मानव-पशु संघर्ष की घटनायें मीडिया में आती रहती हैं। भोजन के लिए पशु-पक्षियों पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी है। कुल मिलाकर मानव ने अप्राकृतिक रूप से पशु-पक्षियों के क्षेत्र में अतिक्रमण किया है। चीन के वुहान शहर में कोरोना विषाणु से मानव का संक्रमित होना भी इसी का परिणाम है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ दशक पहले तक बचत करना संस्कार के रूप में सिखाया जाता था। स्कूलों में छात्रों का खाता खोलकर संचायिका नाम से पासबुक जारी की जाती थी। परन्तु समय के साथ सत्ता पर अर्थशास्त्रियों का प्रभाव बढ़ गया। बचत को हतोत्साहित कर अनावश्यक खर्च को बढ़ावा दिया जाने लगा। बैंकों में जमा राशि के ब्याज पर आयकर लगने लगा। बजट-2020 में इससे भी आगे बढ़कर चेप्टर-6, के अंतर्गत बचत राशि पर आयकर में कटौती योजना को वैकल्पिक बना दिया गया। कोरोना संकटकाल आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करने, व बचत-समर्थक नीतियाँ विकसित करने हेतु समाज व विधायिका का ध्यान आकर्षित करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना महामारी के समय विश्व के सभी स्वास्थ्य-सुविधा सम्पन्न देशों की परीक्षा हो गयी, व अधिकांश असफल पाये गये। भारत में स्वास्थ्य सुविधायें संतोषजनक नहीं हैं, व रोगियों को कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। परन्तु यहाँ अधिकांश संक्रमितजन लक्षणविहीन पाये जा रहे हैं, और मृत्युदर भी अपेक्षाकृत कम है। यह भारतीयों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को दर्शाता है। ऐसा अधिकांश भारतीयों की परम्परागत जीवन शैली, नियमित योगाभ्यास, आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार, व आयूष मंत्रालय के प्रयासों के परिणामस्वरूप ही सम्भव हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण कोरोना का प्रभाव बुजुर्गों पर ज्यादा पड़ रहा है। मृतकों के अंतिम संस्कार भीड़ न जुटाने संबंधी दिशानिर्देश जारी किये गये हैं। विदेशों में तो सामूहिक अंतिम संस्कार भी हुए हैं। अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाने से परिजन दुखी हो रहे हैं। परन्तु ऐसा भी देखा गया कि बुजुर्ग ठीक हो चुके हैं, लेकिन परिजन न उन्हें घर लाते हैं, न फोन पर बात करते हैं। देश में करोड़ों बुजुर्ग दयनीय स्थिति में हैं। प्राय: परिजन उनकी उपेक्षा करते हैं, परन्तु उनकी मृत्यु पर भव्य समारोह कर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। कोरोना ने तो समाज को आइना दिखाकर आत्मचिंतन करने का संदेश दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोरोना महामारी के विभिन्न पहलुओं पर वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं। महामारी के सामाजिक पहलू भी शिक्षाप्रद हो सकते हैं। यह बीमारी समदर्शी है, छोटे.बड़े, धन-निर्धन, जनसाधारण-सेलेब्रिटी शक्तिशाली आदि में किसी प्रकार का भेद नहीं करती। यह समाज में भेदभाव रहित व्यवस्था बनाने का सन्देश है। महामारी ने अनुशासन, सामाजिक स्वच्छता व रोग प्रतिरोधक क्षमता को महत्व दिया है। यह संकटकाल सफलता के लिए धैर्य, कर्त्तव्यनिष्ठा, टीम के सदस्यों में सहयोग व समन्वय के महत्व को दशार्ता है। यह आपदा को अवसर में बदलने, व यथासम्भव आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देता है। यह समाज को मानव-मूल्य, स्वास्थ्य व पर्यावरण पर विशेष ध्यान देने के लिए आह्वान करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">                                                                                                         <strong>-डॉ. प्रदीप कुमार सिंह</strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Aug 2020 09:57:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रेरणा स्रोत: प्रकृति से मिली प्रेरणा</title>
                                    <description><![CDATA[तभी उनके मित्र ने उनसे कहा, ‘दोस्त, सागर में ऐसा क्या है जिसे तुम इतना गौर से देख रहे हो।’ कलाम मुस्कुरा कर बोले, ‘सागर का सौंदर्य और उसमें छिपा संदेश मेरे लिए प्रेरणा का केंद्र है और हमेशा रहेगा।’
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/inspiration-from-nature/article-11972"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/apj-abdul-kalam.jpg" alt=""></a><br /><p>डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम अपनी किशोरावस्था के दिनों में एक दिन सागर के किनारे बैठे लहरों के उतार-चढ़ाव देख रहे थे। वह सागर की लहरों में खोए हुए थे कि तभी उनके मित्र ने उनसे कहा, ‘दोस्त, सागर में ऐसा क्या है जिसे तुम इतना गौर से देख रहे हो।’ कलाम मुस्कुरा कर बोले, ‘सागर का सौंदर्य और उसमें छिपा संदेश मेरे लिए प्रेरणा का केंद्र है और हमेशा रहेगा।’ यह सुनकर मित्र बोला, ‘अच्छा, फिर तो विस्तार से जरा सागर की उस सुंदरता का बखान करो जो तुम्हारे लिए प्रेरणा <strong>(Inspiration)</strong> स्रोत बन गई है।’</p>
<h3>‘मेरे लिए सागर ही नहीं, संपूर्ण प्रकृति प्रेरणा का स्रोत</h3>
<p>कलाम बोले, ‘मेरे लिए सागर ही नहीं, संपूर्ण प्रकृति प्रेरणा <strong>Inspiration)</strong> का स्रोत है। दूर तक सागर की गहरी जल राशि को देखो, इससे उपजी ध्वनि को महसूस करो। सागर की यह ध्वनि मन के तारों को झकझोरती है। मन को एकाग्रता के बिंदु पर पहुंचाती है।’ यह सुनकर मित्र बोला, ‘अब यह भी बताओ कि समुद्र की सतह पर उठती-गिरती लहरें क्या कहती हैं।’ कलाम बोले,‘सागर पर उठती-गिरती अनंत लहरों का अविरल सौंदर्य मन में अनेक भावनाओं का संचार करता है। यही नहीं, तुम समुद्र के ऊपर उड़ते पक्षियों को देखो।’</p>
<p>मित्र आसमान में उड़ते पक्षियों की ओर देखने लगा। तभी कलाम बोले, ‘क्या तुम्हारा मन नहीं करता कि तुम भी इन पक्षियों की भांति उड़ो।’ मित्र बोला,‘तुम तो दार्शनिकों जैसी बातें करते हो। भला आसमान में हम कहीं पक्षियों की तरह उड़ सकते हैं।’ इस पर कलाम मुस्कुरा दिए, ‘पक्षियों की भांति न सही, लेकिन ऐसी कोई वस्तु तो अवश्य बना सकते हैं जो उड़ सके और हमें बादलों के उस पार ले जाए।’ कलाम की बातें सुनकर मित्र स्तब्ध रह गया और बोला, ‘दोस्त, तुम जरूर एक न एक दिन इतिहास रचोगे।’ आगे चलकर मित्र की बात सच साबित हुई और कलाम भारत के मिसाइलमैन के रूप में जाने गए।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Dec 2019 20:20:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जीवन के लिए आक्सीजन से ज्यादा जरूरी है ओजोन</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया में हर मनुष्य सुख और आनन्द का जीवन जीना चाहता है। यह प्रकृति का विधान है। मगर मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ पृथ्वी पर विचरण करने वाले प्राणी सुख के साथ दु:ख के भी शिकार हुए है। कहीं रोटी, कपडा और मकान का संकट आ खड़ा हुआ तो कहीं मानव जनित समस्याओं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ozone-far-valuable-than-oxygen-for-life/article-10439"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/ozone-far-valuable-than-oxygen-for-life.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दुनिया में हर मनुष्य सुख और आनन्द का जीवन जीना चाहता है। यह प्रकृति का विधान है। मगर मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ पृथ्वी पर विचरण करने वाले प्राणी सुख के साथ दु:ख के भी शिकार हुए है। कहीं रोटी, कपडा और मकान का संकट आ खड़ा हुआ तो कहीं मानव जनित समस्याओं से खुद को जूझना पड़ रहा है। नई-नई बीमारियों से रूबरू होना पड़ रहा है तो जल ,जंगल और पृथ्वी की विभिन्न समस्याओं से दो-दो हाथ करने पड़ रहे है। विभिन्न वैश्विक संस्थाओं ने इन सभी संकटों से छुटकारा दिलाने के लिए अनेक समुचित प्रबंध कर मानव को जागरूक और सचेत किया है। ऐसा ही एक ज्वलंत मसला ओजोन परत का है। ओजोन परत के बारे में सामान्यत लोग ज्यादा नहीं जानते है।</p>
<p style="text-align:justify;">ओजोन परत ओजोन अणुओं की एक परत है। ओजोन परत हानिकारक पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। बताया जाता है पृथ्वी की सुरक्षा छतरी ओजोन में पर्यावरण प्रदूषण के कारण हो रहे छेद से पृथ्वी पर गहरा संकट उत्पन्न हो गया है। संयुक्त राष्ट्र ने ओजोन परत के खतरे से दुनिया को सचेत किया है। इसी कारण हर साल ओजोन परत संरक्षण दिवस 16 सितंबर को मनाया जाता है। वर्ष 1994 से 16 सितंबर को ओजोन परत के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसे मनाने का मकसद धरती पर ओजोन की परत का संरक्षण करना है। लगभग हर दिवस के पीछे मानव कल्याण की भावना रहती है। ओजोन परत दिवस भी इससे अछूता नहीं है। कहते है पृथ्वी संरक्षित होगी तो मानव जीवन भी सुरक्षित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे पहले यह जानना जरुरी है की यह ओजोन परत है क्या और इससे हमें किस बात का खतरा है। ओजोन आॅक्सीजन का अपर रूप होता है यानि ओजोन एक हल्के नीले रंग की गैस होती है। ओजोन आॅक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है जो कि वातावरण में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है। ओजोन परत सामान्यत धरती से 10 किलोमीटर से 50 किलोमीटर की ऊंचाई के बीच पाई जाती है। जिस प्रकार छाता बारिश से हम को बचाता है वैसे ही यह ओजोन सूर्य के भीषण ताप से पृथ्वी को बचाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पृथ्वी और पर्यावरण के लिए एक सुरक्षा कवच का कार्य करती है और सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी (अल्ट्रा वायलेट) किरणों से हमें बचाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ओजोन परत, गैस की एक नाजुक ढाल है। पृथ्वी को सूर्य की किरणों के हानिकारक प्रभाव से बचाकर हमारे जीवन को संरक्षित रखने में हमारी मदद करती है। बिना ओजोन परत के हम जिंदा नहीं रह सकते क्योंकि इन किरणों के कारण कैंसर जैसी भयावह बीमारी, फसलों को नुकसान और समुद्री जीवों को खतरा पैदा हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना हैं कि ओजोन परत के बिना धरती पर जीवन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। संतुलन बिगड़ता है, सर्दियों की तुलना में अधिक गर्मी होती है, सर्दियां अनियमित रूप से आती हैं और ग्लेशियर पिघलने शुरू हो जाते हैं। ग्लोबलाइजेशन के चलते वातावरण में तापमान बढ़ने से ओजोन परत में छेद हो गया है। ओजोन परत में छेद होने से हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच रहा है। विभिन्न संस्थाओं के अध्ययन के अनुसार फ्रिज, एयरकंडीशनर, इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों की सफाई, अग्निशमन यंत्र, वाहनों और कल कारखानों के धुएं आदि में क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स के उपयोग में लगातार वृद्धि होने से ओजोन परत के क्षरण की दर लगातार बढ़ रही है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के कारण भी ओजोन के सुरक्षा कवच को बहुत बड़ी हानि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">पृथ्वी अनमोल है। इसी पर आकाश है, जल, अग्नि, और हवा है। इन सबके मेल से सुंदर प्रकृति है। आज हमारी पृथ्वी पर जो इतना बड़ा संकट आ खड़ा है यदि समय रहते इसका निदान-निराकरण नहीं हुआ तो हमें बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अगर हमें पृथ्वी को बचाना है तो हमें विश्व ओजोन परत दिवस पर संकल्प लेना चाहिए कि हम पृथ्वी और उसके वातावरण को बचाने का प्रयास करेंगे। धरती को प्रदूषित होने से बचाएंगे। बिजली कि बचत करेंगे और वातावरण को शुद्ध बनाने के हर कार्य को जिम्मेदारी से निभाएंगे ताकि हमारी पृथ्वी और आकाश को हरदृष्टि से सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सके। पृथ्वी को संकट से बचाने के लिए स्वयं अपनी ओर से हमें शुरूआत करनी चाहिए। पानी को नष्ट होने से बचाना चाहिए। वृक्षारोपण को बढ़ावा देना चाहिए। अपने परिवेश को साफ-स्वच्छ रखना चाहिए। पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देने का संकल्प लेना चाहिए।<br />
<strong><em>-बाल मुकुन्द ओझा</em></strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 15 Sep 2019 21:14:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रकृति की चेतावनियों को कब तक अनदेखा करेंगे हम?</title>
                                    <description><![CDATA[देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में पिछले कुछ दिनों के भीतर कुदरत ने अपना जो कहर बरपाया है, वह कुदरत के साथ बड़े पैमाने पर हो रही मानवीय छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है। कुदरत के कहर से हो रही भारी तबाही का आलम यह है कि प्रचण्ड धूल भरी आंधियों, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/how-long-will-we-ignore-the-warnings-of-nature/article-4637"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/alrt.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों में पिछले कुछ दिनों के भीतर कुदरत ने अपना जो कहर बरपाया है, वह कुदरत के साथ बड़े पैमाने पर हो रही मानवीय छेड़छाड़ का ही दुष्परिणाम है। कुदरत के कहर से हो रही भारी तबाही का आलम यह है कि प्रचण्ड धूल भरी आंधियों, बेमौसम बर्फबारी, ओलावृष्टि, बादलों का फटना, भारी बारिश और आसमान से गिरती बिजली ने न केवल सैंकड़ों जिंदगियां लील ली हैं बल्कि हजारों लोग घायल हुए हैं, हजारों मकान बुरी तरह ध्वस्त हुए हैं और हजारों मवेशी मारे गए हैं, अरबों रुपये की सम्पत्ति और फसलें तबाह हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बदरीनाथ-केदारनाथ में बेमौसम बर्फबारी ने हर किसी को हैरत में डाल दिया है, हिमाचल के शिमला, मनाली, रोहतांग सहित कई इलाके सफेद चादर से ढ़क गए, जम्मू कश्मीर में बेमौसम बर्फबारी से कई इलाके एकाएक सर्दी की चपेट में आने से मुसीबतें बढ़ गई और अब मौसम विभाग द्वारा पुन: तूफान की आशंका के मद्देनजर देश के 23 राज्यों के लिए अलर्ट जारी किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">संभवत: देश के इतिहास में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर चेतावनियां जारी हो रही हैं। 9 मई को सायंकाल देश के कई हिस्सों में आए भूकम्प के झटकों ने हर किसी को भयभीत कर डाला है। दूसरी ओर अमेरिका की विख्यात अतंरिक्ष अनुसंधान संस्था ‘नासाझ् द्वारा सौर तूफान पृथ्वी के करीब पहुंचने की पुष्टि की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि सूर्य के पृष्ठ भाग में होने वाले परिवर्तन के कारण इस तरह के सौर तूफान प्राय: 100-200 वर्षों में आते रहे हैं लेकिन इस बार इसे लेकर भयावह स्थिति की आशंका इसलिए जताई जा रही है कि अगर अंतरिक्ष में स्थापित उपग्रहों को सौर तूफान और कॉस्मिक किरणों का झटका लगा तो इन उपग्रहों पर निर्भर मोबाइल, इंटरनेट, दूरसंचार, जीपीएस सरीखे तमाम अत्याधुनिक नेटवर्क ठप्प हो जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक फिलहाल देश में प्रकृति की विनाशलीला की बात है तो अगर हम अतीत में झांककर देखें तो देश में इससे पहले भी कई बड़े तूफान आए हैं, दिल्ली में ही 1974 में आए टोरनाडो तूफान के दौरान तूफानी हवाओं ने डीटीसी बस को भी उड़ा दिया था। उसके बाद भी देश में कई बार बड़े आंधी-तूफान आए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">1990 और 1996 में आंध्र प्रदेश में आया भयानक तूफान हो या 1998 में गुजरात का विनाशकारी तूफान अथवा 1999 में उड़ीसा में आया प्रचण्ड चक्रवात, जिनमें हजारों लोग काल के ग्रास बन गए और गांव के गांव मरघट में तब्दील हो गए थे किन्तु इस बार इतने व्यापक दायरे में मौसम का आकस्मिक बदलाव पहली बार देखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्षा ऋतु में आसमान में बादलों का नामोनिशान तक नजर नहीं आता, वहीं वसंत ऋतु में बादल झमाझम बरसने लगते हैं, सर्दियों में मौसम एकाएक गर्म हो उठता है और गर्मियों में अचानक पारा लुढ़क जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अचानक ज्यादा बारिश होना या एकाएक ज्यादा सर्दी या गर्मी पड?ा और फिर तूफान आना, पिछले कुछ समय से जलवायु परिवर्तन के ये भयावह खतरे बार-बार सामने आ रहे हैं और मौसम वैज्ञानिक अब स्वीकारने भी लगे हैं कि इस तरह की घटनाएं आने वाले समय में और भी जल्दी-जल्दी विकराल रूप में सामने आ सकती हैं।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/how-long-will-we-ignore-the-warnings-of-nature/article-4637</link>
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                <pubDate>Tue, 03 Jul 2018 09:23:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रकृति के रौद्र रूप को कब तक अनदेखा करेंगे हम?</title>
                                    <description><![CDATA[योगेश कुमार गोयल इस साल अप्रैल माह से ही देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग रूपों में प्रकृति का जो प्रकोप देखा जा रहा है, उससे हर कोई चिंतित और बेबस है। कहीं आंधी तूफान में परिवर्तित होकर सैंकड़ों लोगों का काल बन गई तो कहीं भारी बारिश, बर्फबारी, आसमान से गिरती बिजली ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/how-long-will-we-ignore-the-form-of-nature/article-4590"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/artical-11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">योगेश कुमार गोयल</p>
<p style="text-align:justify;">इस साल अप्रैल माह से ही देश के लगभग सभी राज्यों में अलग-अलग रूपों में प्रकृति का जो प्रकोप देखा जा रहा है, उससे हर कोई चिंतित और बेबस है। कहीं आंधी तूफान में परिवर्तित होकर सैंकड़ों लोगों का काल बन गई तो कहीं भारी बारिश, बर्फबारी, आसमान से गिरती बिजली ने खूब तबाही मचाई। इस दौरान मौसम विभाग द्वारा बार-बार कहीं धूल भरी आंधी के साथ तूफान की चेतावनियां दी जाती रही तो कहीं भारी बारिश के कारण बाढ़ के हालात उत्पन्न होने की। मौसम की बेरूखी का आलम यह है कि जहां मानसून की दस्तक के साथ ही पूर्वोत्तर राज्य बाढ़ की भयानक विभीषिका झेलने को अभिशप्त हुए और उससे लाखों लोग प्रभावित हुए, इन राज्यों के कई हिस्सों का सम्पर्क देश से कट गया, वहीं केरल में बाढ़ और भू-स्खलन से जान-माल का काफी नुकसान हुआ, मुम्बई में भारी बारिश के चलते नेवी को राहत बचाव के लिए अलर्ट करना पड़ा, उत्तराखण्ड में भारी बारिश की चेतावनी जारी हुई, दिल्ली, चण्डीगढ़, पंजाब सहित उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों की हालत पिछले दिनों तपती गर्मी में प्रदूषित हवा और धूल के गुबार के चलते गैस चैंबर जैसी हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">
देश की राजधानी दिल्ली पहले से ही दुनिया के सबसे प्रदूषित 20 शहरों में शामिल है और पश्चिमी विक्षोभ के चलते उत्तर भारत का अधिकांश हिस्सा जिस प्रकार धूल-अंधड़ की चपेट में आया, जिससे दिल्ली में प्रदूषण के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए थे। तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली पिछले कई महीनों से दम घोंटू प्रदूषित हवा से बुरी तरह जूझ रही है किन्तु पिछले दिनों दिल्ली की हवा 14 गुना जहरीली दर्ज की गई। जहां गर्द के गुबार ने दिल्ली का दम निकाल दिया, वहीं गत वर्ष नवम्बर माह में भी ऐसे ही भयावह हालात पैदा हुए थे, जब 144 घंटे तक आपात स्थिति बरकरार रही थी। अक्तूबर से दिसम्बर के बीच स्मॉग के चलते दिल्ली का दम घुटता रहा था लेकिन विड़म्बना ही है कि उन हालातों से कोई सबक नहीं लिया गया। न आम नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई और न ही सरकारों ने पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस कदम उठाए। हालांकि अब दिल्ली सहित उत्तर भारत में मानसून की दस्तक के साथ पर्यावरण प्रदूषण की हालत में सुधार हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">
स्मॉग के चलते घुटन भरा माहौल बने या फिर चारों ओर छाई धूल की चादर की वजह से दम घुटने लगे, अक्सर नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वो घर से बाहर न निकलें किन्तु कामकाजी या मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले लोगों के लिए क्या यह संभव है कि वे घर में बैठकर अपनी रोजी-रोटी का बंदोबस्त कर सकें। हालांकि यह बात सही है कि प्रकृति के समक्ष हम बेबस हैं और हमें ऐसी स्थितियों में राहत भी प्रकृति से ही मिल सकती है किन्तु हम प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए पर्यावरण प्रदूषण के स्थानीय कारकों पर तो नियंत्रण कर ही सकते हैं। तमाम प्रतिबंधों के बावजूद आज भी खुले में कचरा जलाते लोग व खेतों में जलती पराली के दृश्य जगह-जगह दिख जाएंगे। बार-बार अदालतों को प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने हेतु निर्देश देने के लिए बाध्य होना पड़ता है लेकिन उससे भी स्थिति नहीं सुधर रही क्योंकि मौसम की बेरूखी देखने-समझने के बावजूद अभी तक हमारी आंखें नहीं खुली हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
वायु गुणवत्ता के मानक आंकड़ों पर नजर डालें तो शून्य से पचास तक का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त माना गया है जबकि इक्यावन से सौ तक संतोषजनक, एक सौ एक से दो सौ के बीच मध्यम, दो सौ एक से तीन सौ के बीच खराब, तीन सौ एक से चार सौ के बीच बहुत खराब और चार सौ एक से पांच सौ के बीच सूचकांक को खतरनाक माना गया है और पिछले कुछ महीनों के आंकड़े देखें तो दिल्ली और उसके आसपास की आबोहवा बहुत खराब है। मार्च में एक्यूआई का स्तर 203, अप्रैल में 222 और मई में 217 दर्ज किया गया जबकि गत 14 जून को यह सारी हदें पार करते हुए 1093 तक जा पहुंचा। वायु में पीएम-10, पीएम-2.5 और नाइट्रोजन की बात करें तो इनकी मात्रा भी सामान्य से कई गुना ज्यादा देखी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गत दिनों पीएम-10 का स्तर 1407 और पीएम-2.5 का स्तर 371 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक जा पहुंचा जबकि मानकों के अनुसार पीएम-10 तथा पीएम-2.5 की मात्रा वातावरण में क्रमश: 100 व 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। वायु में पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर बढ़ जाने से यह प्रदूषित वायु फेफड़ों के अलावा त्वचा तथा आंखों को भी बहुत नुकसान पहुंचाती है। इन हालातों के मद्देनजर यदि कहा जाए कि यहां स्वस्थ जीवन के लिए प्राणवायु अब न के बराबर बची है तो असंगत नहीं होगा। पिछले कुछ ही वर्षों में कैंसर, हृदय रोग, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का संक्रमण, निमोनिया, लकवा इत्यादि के मरीजों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है और लोगों की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा अब इन बिन बुलाई बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार पूरी दुनिया में हर दस में से नौ व्यक्ति विषैली हवा में सांस लेने को विवश हैं और प्रतिवर्ष करीब 70 लाख लोग असमय ही काल का ग्रास बन जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
माना कि पिछले दिनों गर्द के गुबार के चलते दिल्ली और आसपास के इलाकों की हालत बदतर हुई थी किन्तु स्थिति पहले भी अच्छी नहीं थी। कार्बन उत्सर्जन के मामले में दिल्ली दुनिया के 20 शीर्ष शहरों में शामिल है और इस मामले में उसने कोलकाता और मुम्बई को भी पीछे छोड़ दिया है। ऐसे शीर्ष 500 शहरों में 22 भारत के हैं। नार्वे विज्ञान व तकनीकी विश्वविद्यालय द्वारा दुनिया के तेरह हजार शहरों में कराए गए अध्ययन के आधार पर सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले शहरों की सूची जारी की गई और इन तेरह हजार शहरों में से भारत के कोलकाता, मुम्बई, हैदराबाद, चेन्नई, बेंगलुरू, पुणे और अहमदाबाद क्रमश: 49, 70, 90, 108, 110, 130 व 185वें पायदान पर हैं जबकि दिल्ली 20 सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले शहरों में शामिल है। हवा में बढ़ते कार्बन उत्सर्जन को लेकर चाइनीज एकेडमी आॅफ साइंस द्वारा किए गए एक शोध में कहा गया है कि यदि कार्बन उत्सर्जन कम नहीं हुआ तो अगले 50-80 वर्षों में धरती का तापमान चार डिग्री तक बढ़ सकता है और अगर वैश्विक तापमान इतना बढ़ जाता है तो भीषण गर्मी, भयंकर बाढ़ और सूखे की स्थिति पैदा होगी। पहाड़नुमा कूड़े के ढ़ेरों से निकलती जहरीली गैसें, औद्योगिक इकाईयों से निकलते जहरीले धुएं के अलावा सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या भी कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है और कहा जाता रहा है कि अगर दिल्ली जैसे अत्यधिक प्रदूषित शहर में वायु प्रदूषण पर कुछ नियंत्रण पाना है</p>
<p style="text-align:justify;">तो लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना चाहिए किन्तु धरातल पर देखें तो दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन के साधन बहुत सीमित हैं, सड़कों पर बसों की भारी कमी है और जितनी बसें चल रही हैं, उनमें यात्री अक्सर जानवरों की भांति ठूंसे नजर आते हैं। बहरहाल, धरती के गर्म होते जाने और प्रकृति के बढ़ते प्रकोप की जड़ हम स्वयं ही हैं लेकिन बार-बार प्रकृति द्वारा अपना रौद्र रूप दिखाते रहने के बावजूद हम समझना ही नहीं चाहते कि प्रकृति का मिजाज क्यों बदलता जा रहा है। हमें समझना होगा कि प्रकृति हमसे चाहती क्या है। प्रकृति ने शुद्ध हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध वनस्पतियां, फल-फूल इत्यादि हमें बहुत सारी अनमोल चीजें दी हैं किन्तु हमने अपने निहित स्वार्थों के चलते प्रकृति की दी हुई हर चीज का जायका बिगाड़ दिया है। प्राकृतिक सम्पदाओं का बुरी तरह से दोहन कर हमने न हवा को सांस लेने लायक छोड़ा है, रसायन और गंदगी बहा-बहाकर न पावन नदियों को निर्मल व पवित्र छोड़ा है, खेतों में यूरिया सहित अन्य कीटनाशकों का छिड़काव कर अपने ही भोजन को विषाक्त बना लिया है। इसमें भला प्रकृति का क्या दोष? प्रकृति तो हमें समय-समय पर सचेत करती रही है कि हम समय रहते संभल जाएं अन्यथा प्रकृति के साथ खिलवाड़ के परिणाम इतने विनाशकारी होंगे कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।</p>
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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 08:24:34 +0530</pubDate>
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                <title>धर्मों पर रंग का ठप्पा</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/mark-of-color-on-religions/article-2974"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/religions.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सूर्योदय का मनमोहक आनंद पूरी दुनिया लेती है। उगते हुए सूर्य का रंग केसरी होता है। यह मनमोहक दृश्य हिंदू, सिक्ख, ईसाई, मुस्लमान सब धर्मों के लोगों को एक जैसा दिखाई पड़ता है। सूर्य सारी दुनिया में उगता है व अस्त होता है, जिसकी लालिमा एवं केसरिया रंग पूरी दुनिया को ऊर्जा एवं जीवन प्रदान करता है। प्रकृति का अस्तित्व नदियां, वन, पहाड़, मौसम, सागर, मरूस्थल सब सूर्य से ही हैं, फिर भी न जाने क्यों केसरी रंग को हिंदू धर्म से ही जोड़कर देखा जा रहा है। ठीक ऐसे ही पूरी वनस्पति हरीतिमा लिए हुए है, लेकिन हरे रंग को कुछ लोगों ने अपना ठप्पा लगा रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विगत दिनों एक मुस्लमान महिला ने जो कांग्रेस से जुड़ी हैं, ने केसरी रंग के वस्त्र क्या पहन लिए धर्म के ठेकेदारों ने उसे धमकाना शुरू कर दिया। उसके खिलाफ फतवे देने लग गए। फतवा देने वालों ने साफ-साफ धमका दिया कि केसरी रंग पहनना है तो इस्लाम छोड़ दो। किस धर्म ग्रंथ में लिखा है कि इस्लाम, हिंदु, सिक्ख धर्म वाले किस रंग को पहनें किसे नहीं। भारत के हिंदू, सिक्ख, ईसाई हर रंग को पहन लेते है, उन्हें कभी नहीं टोका जाता कि फलां-फलां रंग नहीं पहनना, चूंकि वह जानते है कि रंग से धर्म नहीं बदलता। धर्म के ठेकेदार लोगों को क्यों मिल-जुल कर नहीं रहने देना चाहते। जिस तरह प्रकृति की गोद में हरा-नीला-पीला-लाल सभी रंग रह रहे है।</p>
<p style="text-align:justify;">नदियां, नाले, पहाड़, हरियाली, मिट्टी भी एक-दूसरे के रंग के चलते अपना गुण धर्म नहीं बदलते। रंग कोई बम्ब नहीं कि पहनने से विस्फोट हो जाएगा। धर्म तो गुणों की बात करते है। इस्लाम में ईमान, दया, मुहब्बत की बातें ही इसके असली रंग हैं। फिर 21वीं सदी में पहुंच कर यदि कुछ धर्म के ठेकेदार रंगों की बात करते हैं तो यह अपने-आप में ही बेहद घृणित सोच का परिचय है। अगर किसी को रंगों से नफरत है फिर वह प्रकृति के रंगों का भी बहिष्कार करें सूर्य केसरियां रंग, फूलों का रंग इन सबकों भी बदल दें स्पष्ट है ये बदलें नहीं जा सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां रंगों का विरोध सिर्फ नफरत फैलाने के लिए किया जाता है ताकि धर्म की दुकान चलती रहे। फतवा व धमकी देने वालों को चाहिए कि वह समाज में कुछ बदरंग है उन्हें मिटा दें। गरीबी, नशा,नारी-उत्पीड़न, अनपढ़ता, हिंसा, लूट, चरित्रहीनता, भ्रष्टाचार इन बदरंगों को हटाकर इनकी जगह ईमान, मुहब्बत, सहयोग, शिक्षा, खुशहाली के रंग भरे जाएं। रंग प्रकृति का हिस्सा है इनसे नफरत करने से कुछ हासिल नहीं होगा। रंगों से प्यार करने पर सबके जीवन में रंग भर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 08 Aug 2017 03:58:59 +0530</pubDate>
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