<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/is-all-sporting-politics-bhaiya/tag-9337" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Is all sporting politics bhaiya? - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/9337/rss</link>
                <description>Is all sporting politics bhaiya? RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>क्या सब राजनीति का खेल है भइया?</title>
                                    <description><![CDATA[राजनेता बंद को पसंद करते हैं और विशेषकर तब जब आम चुनाव कुछ माह बाद होने वाले हों और बंद में मोदी राज की अनेकों विफलताओं को गिनाया जा सके और इस बंद में आम आदमी घर या काम पर भी नहीं जा सकता है। उसके बारे में कोई नहीं सोचता है और अन्य लोगों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/is-all-sporting-politics-bhaiya/article-5872"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/unnamed-file.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राजनेता बंद को पसंद करते हैं और विशेषकर तब जब आम चुनाव कुछ माह बाद होने वाले हों और बंद में मोदी राज की अनेकों विफलताओं को गिनाया जा सके और इस बंद में आम आदमी घर या काम पर भी नहीं जा सकता है। उसके बारे में कोई नहीं सोचता है और अन्य लोगों के लिए बंद एक अतिरिक्त छुट्टी बन जाती है। जिसमें वे अपनी पूरी ताकत का प्रयोग करते हैं और इसी क्रम में तेल के दामों में वृद्धि के विरुद्ध कांग्रेस ने भारत बंद बुलाया है जिसमें वे 11 लाख करोड़ रूपए की लूट को उजागर करेंगे किंतु इस बंद के चलते वे अर्थव्यवस्था को लगभग 13 हजार करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है किंतु उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। पिछले सप्ताह भी उच्च जातियों और पिछडेÞ वर्ग के संगठनों ने अनुसूचित जाति/जाति अधिनियम में संशोधनों के विरुद्ध भारत बंद का आह्वान किया। इसके दौरान राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, महाराष्ट्र और दिल्ली में जनजीवन प्रभावित हुआ। दुकानें, व्यावसायिक प्रतिष्ठान, स्कूल और शैक्षिक संस्थान बंद रहे। इसके साथ ही मजदूर किसान संघर्ष रैली का आयोजन किया गया। देश की राजधानी दिल्ली में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर यह रैली आयोजित की गयी। गुजरात में हार्दिक पटेल 25 अगस्त से भूख हड़ताल पर हैं। वे पाटीदार समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर हे हैं। अब हार्दिक पटेल को अस्पताल में भर्ती कर दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सबको देखकर लगता है भारत बंद अर्थात हड़तालों का देश है। इस छोटे से शब्द से लोग आतंकित होते हैं और इसको देखकर लगता है हमारे देश में जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है। आज समाज का प्रत्येक वर्ग किसी न किसी बहाने बंद की योजना बना रहा है। बंद का कारण महत्वपूर्ण नहीं है अपितु अपना विरोध प्रदर्शन करना महत्वपूर्ण है और यह व्यापक हो तो अच्छा है। वस्तुत: कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता जब देश में कहीं न कहीं हड़ताल नहीं होती। चाहे कोई मोहल्ला हो, जिला हो या राज्य हो। कहानी एक जैसी है। स्थिति यह बन गयी है कि लगता है कि हम बंद और हड़ताल के बीच जी रहे हैं।<br />
बंद के दौरान जन संपर्क की कवायद के अलावा इसमें बाहुबल का प्रदर्शन भी होता है। जिसके चलते आम आदमी को आने जाने, व्यवसाय आदि में नुकसान होता है। दैनिक मजदूरी अर्जित करने वालों और निजी उद्यमों को बड़ा नुकसान होता है और जो लोग हड़ताल करते हैं उन्हें भी इससे लाभ नहीं होता है। या इस बंद के चलते देश या राज्य की जनता का कल्याण नहीं होता है। एक चौकाने वाला आंकडा है कि 2017 में हड़ताल के कारण भारत में 11.73 लाख श्रम दिवसों का नुकसान हुआ है। जिसके चलते 130 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ। 2016 की तुलना में 44 प्रतिशत अधिक श्रम दिवसों का नुकसान हुआ है। गुजरात और तमिलनाडू में वस्त्र कामगार, कर्नाटक में आईटी कर्मचारी, केरल में कामगारों का विरोध प्रदर्शन, संसद के बाहर रक्षा कर्मियों का प्रदर्शन और विभिन्न राज्यों में सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन आम बात रही।<br />
उल्लेखनीय है कि अगस्त 2003 में उच्चतम न्यायालय ने हड़ताल के बारे में अपनी नाजरागी व्यक्त की थी। केरल और कोलकाता उच्च न्यायालयों के निर्णयों को वैध ठहराते हुए उच्चतम न्यायालय ने बंद को सामूहिक सौदेबाजी का गैरकानूनी और असंवैधानिक मार्ग बताया था। न्यायालय ने निर्णय दिया था कि सरकारी कर्मचारियों को चाहे कोई भी उचित या अनुचित कारण हो हड़ताल पर जाने का मूल कानूनी नैतिक या साम्यता का अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा था कि पीड़ित कर्मचारियों के पास अन्य विकल्प उपलब्ध हैं और हड़ताल का दुरूपयोग किया जाता रहा है जिसके चलते अव्यवस्था और कुशासन की स्थिति पैदा हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न उठता है कि यदि उच्चतम न्यायालय भी बंद और हड़तालों पर रोक नहीं लगा सका तो फिर भारत में हड़तालों और बंद की परंपरा की आलोचना करना बेकार है। या इसके बारे में यह प्रश्न भी उठाना बेकार है कि इससे लोग कैसे लाभान्वित हुए हैं। क्या बंद करने वाले वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब समझते हैं या वे लोकतंत्र में मौलिक अधिकारों का दमन कर रहे हैं। नेताओं और श्रमिक संघों को हड़ताल करने के लिए कौन प्रेरित करता है। क्या वे अपने सदस्यों को एकजुट रखने के लिए ऐसा करते हैं या अप्रासंगिक बनने से बचने के लिए ऐसा करते हैं? या वे वास्तव में पार्टी के कार्यकतार्ओं या कामगारों के हितों के लिए ऐसा करते हैं या राजनीतिक कारणों से?</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना देखिए। भारत के महानगरों में एक छोर से दूसरे छोर जाने पर आपको भारत के उदारीकरण के अंतरनिहित विरोधाभास दिख जाएंगे। एक ओर गगनचुंबी इमारतें और विश्व की सबसे बडी कंपिनयों के चमचमाते नाम और मॉल देखने को मिलेंगे जो इस बात के प्रतीक हैं कि भारत का व्यावसायिक समुदाय और समाज महत्वाकांक्षी है और उस दिशा में आगे बढ रहा है। दूसरी ओर सडकों पर गड्ढे मिलेंगे, बिजली की आपूर्ति बाधित मिलेगी और शहरी अवसंरचना का अभाव मिलेगा जो बताता है कि सरकार इस मोर्चे पर पूर्णत: विफल है। जिसके चलते श्रमिक संघ बंद और हड़ताल करने के लिए उत्साहित होते हैं। समस्या का एक बडा कारण यह भी है कि अधिकतर श्रमिक संघों के अध्यक्ष नेता हैं जिनकी सरकार के प्रति अपनी नाराजगी होती है। बंद चाहे कितने भी नुकसान पहुंचाएं उन पर रोक लगाना आसान नहीं है और ये एक तरह से छवि बनाने की प्रक्रिया भी बन गए हैं। यह विपक्ष के लिए एक हथियार बन गया है और वह इस हथियार का प्रयोग तब करता है जब वह निराश होता है या सत्ता की चाह रखता है। किंतु बंद की राजनीति अभी फीकी नहीं पड़ी है। यह अधिकतर लोगों के लिए असुविधा का साधन बन गया है। लोग अब इनके विरुद्ध अपना गुस्सा जाहिर करने लग गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक हालिया सर्वेक्षण के अनुसार 78 प्रतिशत लोग बंद के विरुद्ध हैं। 80 प्रतिशत लोग नहीं चाहते कि राजनीतिक दल और धार्मिक संस्थाएं बंद का आयोजन करें। 95 प्रतिशत लोग नहीं चाहते कि नेतागण बंद का आयोजन करें और 75 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि बंद पर कानूनी रोक लगे। 80 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि बंद के दौरान हिंसा पर उनके नेताओं को कठोर दंड मिले।<br />
समय आ गया है कि इस संबंध में हम अमरीकी कानून से प्रेरणा लें। जहां पर किसी भी व्यक्ति को राजमार्ग या उसके निकट भाषण देने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है ताकि राजमार्ग बाधित न हो। सभा करने का अधिकार इस तरह से सीमित कर दिया गया है कि उससे अन्य लोगों के अधिकारों में दखल न पड़े। नि:संदेह ऐसे वातावरण में जहां पर हर कोई जोर-जबरदस्ती कर अपना हिस्सा लेना चाहता हो किसको दोष दें। राजनेता और श्रमिक संघ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रश्न यह नहीं है कि हड़ताल और बंद का आयोजन किस लाभ के लिए कौन करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र न तो भीड़तंत्र है और नही अव्यवस्था करने का लाइसेंस। यह अधिकारों, कर्तव्यों, स्वतंत्रताओं और उत्तरदायित्वों के बीच संतुलन है। अपनी स्वतंत्रता में हमें जिम्मेदारियों और दूसरे की स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना होगा। बंद के कारण सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। तथापि बंद सत्तारूढ़ वर्ग के विरुद्ध अपनी नाराजगी प्रदर्शित करने का एक साधन रहा है किंतु अब इसकी चमक फीकी पड़ गयी है। इस वर्ष अनेक बंद और हड़तालें की गयी हैं। क्या ये बंद और हड़तालें अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल हुई हैं? यदि नहीं तो फिर सामान्य जनजीवन को क्यों अस्त-व्यस्त किया जाए? कुछ लोग कहेंगे कि सब चलता है और कुछ लोग कहेंगे कि की फरक पैंदा है। और नेता लोग वोट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं। समय आ गया है कि आम जनता आगे आए और कहे बंद करो ये नौटंकी।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/is-all-sporting-politics-bhaiya/article-5872</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/is-all-sporting-politics-bhaiya/article-5872</guid>
                <pubDate>Tue, 11 Sep 2018 09:41:32 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2018-09/unnamed-file.jpg"                         length="131229"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        