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                <title>environment - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Electronic Waste : इलेक्ट्रॉनिक कचरे की देन-पारा प्रदूषण </title>
                                    <description><![CDATA[नरेंद्र देवांगन। विद्युत चालित उपकरणों, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने दुनिया का स्वरूप बदल दिया है। इनके कारण लोगों की जीवन शैली और कल-कारखानों की कार्यशैली बदलने के साथ ही बढ़ी है दुनिया की जगमगाहट पर इस जगमगाहट के पीछे एक अंधकार भी है जो अत्यंत खतरनाक है। एक अवधि तक उपयोग के पश्चात ये उपकरण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/electronic-waste-causes-mercury-pollution/article-55900"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/electronic-waste.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नरेंद्र देवांगन।</strong> विद्युत चालित उपकरणों, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों ने दुनिया का स्वरूप बदल दिया है। इनके कारण लोगों की जीवन शैली और कल-कारखानों की कार्यशैली बदलने के साथ ही बढ़ी है दुनिया की जगमगाहट पर इस जगमगाहट के पीछे एक अंधकार भी है जो अत्यंत खतरनाक है। एक अवधि तक उपयोग के पश्चात ये उपकरण खराब या अनुपयोगी (Electronic Waste) हो जाते हैं। उसके बाद इन्हें कचरे के साथ फैंक दिया जाता है। अनेक देशों में व्यवस्था के कारण या मजबूरी के कारण कुछ हद तक इन्हें अलग किया जाता है या रीसाइकिल करके उससे नए उत्पाद तैयार किए जाते हैं। बचा कचरा अन्य जैविक कूड़े के साथ पड़ा रहता है। इनमें मौजूद भारी धातुएं व जहरीले रसायन रिस-रिस कर बाहर आते हैं और भूमि व जल के साथ वायु को भी प्रदूषित करते हैं।</div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>खतरनाक इलेक्ट्रॉनिक कचरा || Electronic Waste</strong></h4>
<div style="text-align:justify;">विभिन्न प्रकार के विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में प्रयुक्त होने वाला पारा यानी मरकरी सबसे खतरनाक तत्व है। मिसाल के तौर पर, लैपटॉप, कंप्यूटर, टेलीफोन, डीवीडी प्लेयर, फैक्स मशीन, फोटो कॉपियर और एलसीडी युक्त उपकरणों में पारे का उपयोग किया जाता है। वैसे तो इनमें मात्र 2 से 10 मिलीग्राम तक ही पारे का उपयोग होता है पर यदि इसे जोड़ा जाए तो विश्व में पारे की कुल खपत का 30 प्रतिशत इन उपकरणों में प्रयुक्त होता है। प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पारा व उसके यौगिक जहां विभिन्न रसायनिक उद्योगों में उत्प्रेरक व अन्य रूपों में प्रयुक्त होते हैं वहीं विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में भी प्रयोग किए जाते हैं।</div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>फ्लोरोसेंट लैंप:-</strong></h4>
<div style="text-align:justify;">पिछले कुछ समय से फ्लोरोसेंट लैंप का उपयोग बेहताशा बढ़ रहा है क्योंकि इनसे मिलने वाली रोशनी खूबसूरत लगती है, साथ ही बिजली और पैसे की बचत भी होती है पर इस रोशनी के पीछे छिपे अंधेरे को हम नहीं देख पाते हैं यानी किसी कारणवश फ्लोरोसेंट लैंप टूटता है या खराब होने के बाद इसे फैंक दिया जाता है तो उसके अंदर स्थित पारे की कुल मात्रा का 6 से 8 प्रतिशत तत्काल वायु में मिल जाता है।</div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>पारे के यौगिक:-</strong></h4>
<div style="text-align:justify;">पारा वायु के अन्य अवयवों के साथ मिलकर पारे के यौगिक बनाता है जो वातावरण के लिए बहुत खतरनाक होते हैं। इस तरह भूमि पर फैलने वाला पारा वायु में भी मिल जाता है और भिन्न-भिन्न माध्यमों से होता हुआ जल स्रोतों में भी मिल जाता है। जल में रहने वाले जीव पारे को ग्रहण कर विषैले हो जाते हैं।</div>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>हानिकारक है पारा:-</strong></h4>
<div style="text-align:justify;">पारा सामान्य तापमान और दाब पर तरल रूप में रहता है लेकिन 0.3 वायुमंडल दाब व 25 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ही भाप में परिवर्तित हो जाता है। यह वाष्पशील होता है। यह गैस रूप में रंगहीन व गंधहीन होता है, जिससे इसका पता कठिनाई से चल पाता है। यदि पारे की भाप सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करती है तो भाप का 80 प्रतिशत शरीर की ऊपरी परत को पार कर जाता है और यह रक्त में मिल जाता है। यह मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। पारे की भाप बच्चों के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के लिए भी हानिकारक होता है।</div>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>बचने के उपाय || Electronic Waste</strong></h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">पारे युक्त पदार्थों का उपयोग करते समय कर्मियों को बचाव जैसे मास्क, दस्तानों, गॉगल्स, सुरक्षात्मक कपड़े (एप्रन) आदि का प्रयोग करना चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">वायु प्रवाह तंत्र को सुरक्षित तथा प्रभावी बनाना चाहिए। पारेयुक्त वायु को सीधे बाहर छोड़ने के स्थान पर फिल्टर के माध्यम से छोड़ा जाना चाहिए।</li>
<li style="text-align:justify;">अवैध रूप से चल रहे पारायुक्त उपकरणों की मरम्मत और रिसाइक्लिंग उद्योग को वैधानिक दायरे में लाना चाहिए तथा शिक्षा और नियमों के माध्यम से उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि वे सुरक्षित तरीकों को ही अपनाएं।</li>
</ul>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Apr 2024 10:35:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बेटी के जन्मदिन पर की अनूठी पहल!</title>
                                    <description><![CDATA[पेड़ बचाओ, सांसें बचाओ संस्था का पंजीयन, रोजाना रोपेंगे एक पौधा हनुमानगढ़ (सच कहूँ न्यूज)। जंक्शन की हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के निवासी व मां आथ आश्रम फाउंडेशन के निदेशक आकाश नायक ने अपनी पुत्री के जन्मदिन पर अनूठी पहल करते हुए पेड़ बचाओ, सांसें बचाओ संस्था का पंजीयन करवाया। इस मौके पर आकाश नायक ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/first-on-my-daughters-birthday/article-55364"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/tree-plantation.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">पेड़ बचाओ, सांसें बचाओ संस्था का पंजीयन, रोजाना रोपेंगे एक पौधा</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>हनुमानगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> जंक्शन की हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के निवासी व मां आथ आश्रम फाउंडेशन के निदेशक आकाश नायक ने अपनी पुत्री के जन्मदिन पर अनूठी पहल करते हुए पेड़ बचाओ, सांसें बचाओ संस्था का पंजीयन करवाया। इस मौके पर आकाश नायक ने अपनी बेटी के हाथों पौधा लगाकर संस्था की विधिवत शुरुआत की। आकाश नायक ने कहा कि हनुमानगढ़ में प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ चुका है। पेड़ बचाओ, सांसें बचाओ संस्था का उद्देश्य अधिक से अधिक पौधे लगाकर प्रदूषण को कम करना है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आने वाली पीढ़ी को संदेश कि पेड़ है तो कल है | Hanumangarh News</h3>
<p style="text-align:justify;">अधिक से अधिक पेड़ होंगे तो शहर व इलाका प्रदूषण मुक्त होगा और हवा स्वच्छ होगी। उन्होंने बताया कि संस्था सदस्यों की ओर से रोजाना एक पौधा लगाया जाएगा। संस्था के साथ अधिक से अधिक सदस्यों को जोडऩे का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने क्षेत्र के युवाओं से पर्यावरण संरक्षण में अधिकाधिक सहयोग की अपील की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मौके पर मौजूद किरण जैन ने जन्मदिन पर बेटी के हाथों पौधा लगवाने की आकाश नायक की पहल को नेक कार्य बताते हुए कहा कि इस कार्य के जरिए आने वाली पीढ़ी को संदेश दिया है कि पेड़ है तो कल है। क्योंकि वर्तमान समय में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से ऑक्सीजन की कमी महसूस की जा रही है। कोरोना काल इसका उदाहरण है। उन्होंने युवाओं से अधिक से अधिक संख्या में पौधे लगाने की अपील करते हुए प्रदूषित हो रहे पर्यावरण के संरक्षण सहयोग की बात कही। Hanumangarh News</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="भालू ने चिड़ियाघर के रखवाले को कुचला, मौत" href="http://10.0.0.122:1245/bear-mauls-zoo-staff-to-death/">भालू ने चिड़ियाघर के रखवाले को कुचला, मौत</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Nov 2023 16:14:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>संशोधन विधेयक बनाम पर्यावरण</title>
                                    <description><![CDATA[Environment:- संसद के मानसून सत्र में विवादास्पद वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 पारित हुआ और इस पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है तथा पर्यावरणवादी और वैज्ञानिक इसका विरोध कर रहे हैं जो पारिस्थितिकीय और प्रकृति के बारे में चिंतित हैं। इस संशोधन के माध्यम से अधिनियम के अधीन वन संरक्षण केवल कतिपय वन भूमि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/amendment-bill-vs-environment/article-53282"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-10/environment.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Environment:- संसद के मानसून सत्र में विवादास्पद वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 पारित हुआ और इस पर एक बड़ी बहस छिड़ गई है तथा पर्यावरणवादी और वैज्ञानिक इसका विरोध कर रहे हैं जो पारिस्थितिकीय और प्रकृति के बारे में चिंतित हैं। इस संशोधन के माध्यम से अधिनियम के अधीन वन संरक्षण केवल कतिपय वन भूमि तक सीमित किया गया है। इस संशोधन के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय महत्व की रणनीतिक परियोजनाओं के निर्माण के लिए वनों की कटाई के लिए अनुमति लेने के दायित्व को समाप्त किया गया है तथा इसके माध्यम से वन भूमि पर चिड़ियाघर चलाने, इको टूरिज्म सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसी कुछ गैर-वन कार्यकलापों की अनुमति दी गई है और यह सब ऐसे समय पर किया जा रहा है जब न केवल भारत में अपितु विश्व भर में धरती के तापमान में निरंतर वृृद्धि हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वन कानून में ये संशोधन अक्तूबर 2021 में पर्यावरण (Environment) मंत्रालय के परामर्श पत्र के आधार पर किए गए हैं जिसमें वन संरक्षण अधिनियम 1980 में महत्वपूर्ण संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया था। वन संरक्षण अधिनियम 1980 में वन भूमि में गैर वानिकी कार्यकलापों के लिए दंड, मानदंड आदि का प्रावधान किया गया था। मंत्रालय ने राज्यों से 15 दिन के भीतर अपने सुझाव और आपत्तियां भेजने के लिए कहा था जिसके बाद इन संशोधनों के प्रारूप को संसद में रखा जाना था तथापि इन संशोधनों ने वन संरक्षण अधिनियम के अधिकार क्षेत्र को सीमित कर दिया है और वन भूमि के गैर-वानिकी प्रयोजनों के लिए उपयोग को आसान बना दिया है तथा रेलवे और सड़क परिवहन मंत्रालयों जैसी कुछ एजेंसियों को रणनीतिक और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए केन्द्र से अनुमति लेने से छूट दी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन संशोधनों में कहा गया है कि केवल वे भूमि जिन्हें भारतीय वन अधिनियम 1927 और अन्य प्रासंगिक कानूनों के अंतर्गत वन के रूप में अधिसूचित किया गया है या जिन्हें सरकारी रिकार्ड में वन दर्ज किया गया है उन्हें ही इस अधिनियम के अंतर्गत वन माना जाएगा। जबकि वर्तमान अधिनियम में किसी भी वन भूमि पर ये नियम लागू होते हैं। उच्चतम न्यायालय ने 1996 में अपने एक निर्णय में वन कानून के ऐसे प्रयोग की पुष्टि की और कहा था कि वन में सरकारी रिकार्ड में दर्ज भूमि शामिल है चाहे उसका स्वामित्व किसी के पास भी हो न कि डीम्ड वन जिन्हें आधिरिक रूप से वन के रूप में वगीकृत न किया गया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">उच्चतम न्यायालय ने राज्यों से यह भी कहा था कि वे अपने डीम्ड वनों की पहचान और उनको अधिसूचित करने का कार्य करें किंतु 30 वर्ष बाद भी राज्यों ने यह कार्य पूरा नहीं किया है और अब इन संशोधनों में सभी प्रकार की भूमि जिन्हें आधिकारिक रूप से वन के रूप में वगीकृत नहीं किया है उन्हें व्यावसायिक कार्यकलापों के लिए खोल दिया है। इससे वर्तमान कानून में वन स्वीकृृति और स्थानीय समुदाय की सहमति की प्रणाली समाप्त हो गई है। इन संशोधनों में राष्ट्रीय सीमाओं की 100 किमी के दायरे में स्थित सड़क या राजमार्ग परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृति लेने से छूट दी गई है। Environment</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों ने इस बारे में चिंता व्यक्त की है कि राष्ट्रीय महत्व की रणनीतिक परियोजनाओं को परिभाषित नहीं किया गया है तथा अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से इसका दुरूपयोग किया जा सकता है जो स्थानीय परितंत्र के लिए विनाशक हो सकता है। उल्लेखनीय है कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष स्पष्ट किया कि विश्लेषक समिति द्वारा 1997 में पहचान किए गए क्षेत्रों के रिकार्ड में लिया गया है और उन्हें वन के रूप में रिकार्ड किया गया है। किंतु संशोधनों के पाठ को पढने से कुछ और तस्वीर सामने आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">1997 के बाद पहचान किए गए वन क्षेत्रों के लिए स्थिति अस्पष्ट है। जिन वन क्षेत्रों की अभी पहचान की जानी है उन्हें संशोधित कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। इन संशोधनों के आलोचकों की वास्तविक चिंता यह है कि इन संशोधनों से रीयल एस्टेट और खनन लॉबी लाभान्वित होगी। हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में वन भूमि की अभी पहचान नहीं की गई है और वहां वन क्षेत्र कम होगा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को इससे और अधिक खतरा होगा क्योंकि इससे अरावली क्षेत्र में रीयल एस्टेट क्षेत्र को लाभ होगा। उदाहरण के लिए फरीदाबाद और गुडगांव में अरावली पहाड़ों के 35 प्रतिक्षत अर्थात 18 हजार एकड़ वन की स्थिति के बारे में अभी निर्णय किया जाना है और इन क्षेत्रों को इन संशोधनों से खतरा पैदा होगा और इनके संरक्षण के लिए विकल्प की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे सबसे बड़ा नुकसान नागरिकों को होगा जो भूमिगत जल के रिचार्ज होने तथा जल प्रवाह आदि के लिए वनों पर निर्भर हैं। साथ ही वन क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय लोग भी प्रभावित होंगे। संशोधन की प्रक्रिया का उद््देश्य वन भूमि को विकास परियोजनाओं और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए मुक्त करना है किंतु बड़ा प्रश्न उठता है कि जो गैर-मान्यता प्राप्त वनों या डीम्ड वनों में रह रहे हैं, उनकी आजीविका का क्या होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू धरती के तापमान में वृृद्धि पर अंकुश लगाने से संबंधित है। धरती के तापमान में वृृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए वन क्षेत्र का विस्तार आवश्यक है। विशेषज्ञ प्रश्न उठा रहे हैं कि ये संशोधन पारिस्थितिकीय और पर्यावरण संरक्षण के राज्य के उद््देश्यों के विपरीत है। इन संशोधनों की आलोचना से प्राकृतिक वनों के पुनर्विकास में योगदान हंी होगा। कुछ लोगों का कहना है कि इन संशोधनों से 1996 के गोदावरमन मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय कमजोर हुआ है। पूर्वाेत्तर राज्यों की चिंता को भी उठाया गया है क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों की वन भूमि को वन स्वीकृति से छूट दी गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 100 किमी के दायरे में परियोजनाओं को अब वन स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इससे वनों की कटाई के बारे में चिंता व्यक्त की जा रही है जिसके चलते पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा। पर्यावरणवादियों का कहना है कि यह दायरा 50 किमी और दो हेक्टेयर तक सीमित रखा जाना चाहिए था ताकि स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित न हो। कुछ लोगों की राय यह भी है कि डीम्ड वनों के लिए केन्द्रीय संरक्षण और प्रतिबंधों से पर्यटन उद्योग और संबंधित कार्यकलापों पर प्रभाव पड़ेगा जिससे स्थानीय लोगों की आय प्रभावित होगी। गत वर्षों में वन भूमि का गैर-वानिकी प्रयोजनों के लिए उपयोग आम बात हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1980 से 10 लाख हेक्टेयर से अधिक सरकारी वन भूमि का उपयोग तथाकथित विकास परियोजनाओं के लिए किया गया है और वर्ष 1950 से ड़ेढ लाख हेक्टेयर भूमि का प्रयोग अन्य कार्यों के लिए किया गया है। वास्तव में यह बहुत दुखद है कि पर्यावरणीय कानून जिन्हें पर्यावरण के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था उनका पालन नहीं किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अनुच्छेद 48 क में कहा गया है कि राज्य पर्यावरण के संरक्षण और सुधार के लिए प्रयास करेगा तथा देश के वन तथा वन्य जीवों की सुरक्षा भी करेगा। अनुच्छेद 51 ए छ के अंतर्गत वनों, झीलों और वन्य जीवों सहित हमारे पर्यावरण का संरक्षण और सुधार हमारा मूल कर्तव्य है। किंतु इन कानूनों का पालन न करने से इनका व्यापक उल्लंघन हुआ है और परिणामस्वरूप पर्यावरण को अलग-अलग तरह से नुकसान पहुंचा है। इसके अलावा जब धरती के तापमान में वृृद्धि से अधिकतर देशों में अनेक आपदाएं आ रही हैं तो वन भूमि को सीमित करने की ऐसी प्रवृृति न केवल भारत में अपितु अन्य देशों में भी वांछित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जनसंख्या का एक बड़ा भाग वनों में रहता है तथा वन उत्पादों से अपनी आजीविका चलाता है। केवल अक्षय उर्जा का उपयोग करने की बातों से आपदाएं नहीं रुकेंगी। वनीकरण पर बल देना होगा तथा यह सुनिश्चित करना होगा कि तथाकथित विकास परियोजनाएं जिनसे समाज का गरीब तथा पिछड़ा वर्ग लाभान्वित न हो उसके लिए वन भूमि को सीमित न किया जाए और और वनों की अत्यधिक कटाई न की जाए। इसे विकास की एक और गलत धरणा पर आधारित रणनीति कहा जा सकता है। सरकार को लोगों के जीवन में सुधार के अपने दावे को सिद्ध करना होगा। Environment</p>
<p style="text-align:right;"> धुर्जति मुखर्जी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Political Party: क्या यही राजनीति है? ओछी मानसिकता का पर्याय बनी राजनीति" href="http://10.0.0.122:1245/is-this-politics-politics-became-synonymous-with-petty-mentality/">Political Party: क्या यही राजनीति है? ओछी मानसिकता का पर्याय बनी राजनीति</a></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Oct 2023 15:56:49 +0530</pubDate>
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                <title>Environment Protection: पर्यावरण संरक्षण में सबकी भागीदारी जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[Environment Protection: विश्व भर में पर्यावरण (Environment) असंतुलन के कारण कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। कहीं ज्यादा गर्मी, तो कहीं ज्यादा सर्दी, बारिश, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना इत्यादि। बढ़ रही मानवीय लापरवाही का परिणाम यह है कि अब देश के कई राज्य बाढ़ के हालातों से जूझ रहे हैं। बारिश में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/everyones-participation-is-necessary-in-environmental-protection/article-50474"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/environment-protection-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Environment Protection: विश्व भर में पर्यावरण (Environment) असंतुलन के कारण कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। कहीं ज्यादा गर्मी, तो कहीं ज्यादा सर्दी, बारिश, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियरों का पिघलना इत्यादि। बढ़ रही मानवीय लापरवाही का परिणाम यह है कि अब देश के कई राज्य बाढ़ के हालातों से जूझ रहे हैं। बारिश में दरकते पहाड़ों के बीच प्राकृतिक आपदा के आने के लिए भी मानव जिम्मेदार है। नदियों नालों का रास्ता रोक कर अवैध निर्माण किए जा रहे हैं और प्रकृति के अत्याधिक दोहन पर आंख मूंदे हुए है। Environment Protection</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यटन के नाम पर आज पहाड़ी राज्यों का जिस कदर शोषण किया जा रहा है और नदी नालों और झरनों को अवरुद्ध किया जा रहा है वह भी पर्यावरण के लिहाज से चिंता का विषय बना हुआ है। मनुष्यों का पर्यावरण के प्रति लापरवाह होने का ही परिणाम है कि निषेध के बावजूद भी ये पहाड़ी पर्यटन स्थल प्लास्टिक के कचरे से अटे पडेÞ हैं। दूसरी ओर गर्मी को लेकर भी चिंताजनक आंकड़ें सामने आए हैं जिसमें बताया गया है कि भारत में गत वर्ष अत्यधिक गर्मी के कारण विभिन्न क्षेत्रों में 159 अरब डॉलर की आय का नुकसान हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">असहनीय तापमान से बाहर काम करने वालों की मानसिक विश्लेषणात्मक व शारीरिक क्षमता पर सीधा प्रभाव तो पड़ा ही, अंदर भवनों में कार्य करने वालों की उत्पादकता भी घटी। अत्यधिक तापमान और गर्मी जल्दी प्रारंभ हो जाने के कारण मवेशियों का दूध उत्पादन घटा है। पर्यावरण से खिलवाड़ का ही नतीजा है कि 2016 से 2021 के मध्य जलवायु की चरम घटनाओं से भारत में 360 लाख हेक्टेयर भूमि में फसल का नुकसान हुआ। वर्ष 2023 में असामान्य तापमान से कटाई के समय बारिश होने पर गेहूं-उत्पादन तो प्रभावित हुआ। इसके साथ-साथ मार्च-अप्रैल में कुछ क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बेमौसम बरसात से प्याज की भी 70 फीसदी फसल खराब हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">अब बाढ़ आने पर सब्जियों व फलों की कीमतों में आग सी लग गई है। पहाड़ों पर ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ अत्याधिक बारिश का अधिकांश जल संचित नहीं हो पा रहा। जिसका परिणाम यह होगा कि कि सिंचाई की जब जरूरत होगी, हमें शायद पर्याप्त जल नहीं मिलेगा। केवल पर्यावरण दिवस पर ही पौधारोपण व हरियाली की चर्चा नहीं होनी चाहिए। ऐसे में आवश्यकता है कि पर्यावरण के हित में सभी लोगों को अपना योगदान देना होगा। सरकार को बारिश के पानी संचय करने के उपाय तलाशने होंगे। पर्यावरण संरक्षण के लिए समाज के सभी लोगों को ईमानदारी दिखानी होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Diabetes Symptoms: …नींद में पेशाब आना है एक बड़ी परेशानी, ये है हाई Blood Sugar की निशानी" href="http://10.0.0.122:1245/urination-in-sleep-is-a-big-problem-this-is-a-sign-of-high-blood-sugar/">Diabetes Symptoms: …नींद में पेशाब आना है एक बड़ी परेशानी, ये है हाई Blood Sugar की निशानी</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Jul 2023 10:03:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण और विकास का स्वरूप</title>
                                    <description><![CDATA[पांच जून को पूरी दुनिया में पर्यावरण (Environment) दिवस मनाया गया। अधिक से अधिक पौधें लगाने का संदेश दिया गया, लेकिन धरती, हवा, पानी को शुद्ध रखने की कोई बात नहीं कही गई। हर वर्ष करोड़ों की संख्या में पौधे लगाए जा रहे हैं जो कि प्रशंसनीय है। पर्यावरण संरक्षण के लिए विकास के साथ-2 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/environment-and-pattern-of-development/article-48508"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/envirement.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पांच जून को पूरी दुनिया में पर्यावरण (Environment) दिवस मनाया गया। अधिक से अधिक पौधें लगाने का संदेश दिया गया, लेकिन धरती, हवा, पानी को शुद्ध रखने की कोई बात नहीं कही गई। हर वर्ष करोड़ों की संख्या में पौधे लगाए जा रहे हैं जो कि प्रशंसनीय है। पर्यावरण संरक्षण के लिए विकास के साथ-2 मनुष्य को जीवन शैली पर भी गंभीर चिंतन करना होगा। इसी तरह जनसंख्या में हो रही वृद्धि भी एक बड़ी समस्या है जब पांच जून को देशभर में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा था तो पहाड़ी प्रदेशों में बाहर से आए लाखों सैलानियों के साधनों से ट्रैफिक प्रबंध बिगड़े हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">शिमला, देहरादून, नेनीताल सहित अन्य सैर सपाटा केन्द्रों की सड़कों पर वाहनों की कतारों से लगे जाम वायु प्रदूषणों में हो रही वृद्धि का सबूत पेश कर रहे थे। ट्रैफिक पुलिस का हाल तो यह है कि धुएं के कारण उनके कपड़े काले हो जाते हैं। मैदानी लोग गर्मियों की छुट्टिया मनाने पहाड़ का रुख कर रहे हैं। शुद्ध हवा वाले पहाड़ी प्रदेश भी प्रदूषित हो रहे हैं। सैलानियों की इतनी बड़ी संख्या भी अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है। दूसरी तरफ पहाड़ी प्रदेशों की आर्थिकता की रीढ़ ही पर्यटन है। पर्यटन रुकने से इन प्रदेशों के करोड़ों लोगों की रोटी का मामला खड़ा हो सकता है। Environment</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यटन रोका नहीं जा सकता है परंतु नियमित किया जा सकता है। ट्रैफिक प्रबंधों में सुधार करके जाम घटाए जा सकते हैं जिससे तेल की फिजूल खपत भी घट सकती है। जहां संभव हो सके इलेक्ट्रिक गाड़ियों का प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ ही सार्वजनिक यातायात में सुधार किया जाना बेहद जरुरी है। अगर सार्वजनिक यातायात का प्रबंध उत्तम हो तो लोग निजी गाड़ियों का प्रयोग करने से परहेज करेंगे। कूड़ा-कर्कट को संभालने के लिए उचित प्रबंध करने पड़ेंगे और सिंगल यूज प्लास्टिक का प्रयोग मुकम्मल बंद होना चाहिए। पर्यावरण (Environment) प्रति जागरुकता भी बढ़ानी होगी। वास्तव में पर्यावरण की स्वच्छता के साथ ही मनुष्य जिदंगी का अस्तित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">डेरा सच्चा सौदा द्वारा इस क्षेत्र में बेमिसाल कार्य किया जा रहा है। पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की प्रेरणा से जहां हर वर्ष लाखों पौधे लगाए जा रहे हैं, वहीं साफ-सफाई रखने और पॉलोथीन का प्रयोग न करने पर जोर दिया जा रहा है। बेशक सरकारें भी पर्यावरण की स्वच्छता के लिए कदम उठा रही हैं परंतु इस संबंधी आमजन को भी व्यक्तिगत तौर पर अपनी भूमिका निभानी पड़ेगी। लोगों को अपनी जीवन शैली में बदलाव करना पड़ेगा ताकि मनुष्य की गतिविधयों प्रदूषण की वृद्धि का कारण न बनें। (Environment)</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Jun 2023 09:44:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>World Environment Day 2023: पर्यावरण संरक्षण में हमारा कितना योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[World Environment Day: हम हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। आने वाले 21 जून को हम विश्व योग दिवस मनाएंगे, पर योग की आवश्यकता क्या एक दिन ही होती है? स्वस्थ रहने के लिए तो नियमित दैनिक योगाभ्यास करना चाहिए। इसी प्रकार से पर्यावरण दिवस एक दिन मनाकर हमारी जिम्मेदारी पूर्ण […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/world-environment-day/article-48470"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/environmental.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">World Environment Day: हम हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं। आने वाले 21 जून को हम विश्व योग दिवस मनाएंगे, पर योग की आवश्यकता क्या एक दिन ही होती है? स्वस्थ रहने के लिए तो नियमित दैनिक योगाभ्यास करना चाहिए। इसी प्रकार से पर्यावरण दिवस एक दिन मनाकर हमारी जिम्मेदारी पूर्ण नहीं होती, अपितु हम अपने दैनिक जीवन में पर्यावरण का महत्व समझें और पर्यावरण संरक्षण की पूरी कोशिश करें।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/plantation-by-dera-sacha-sauda/">World Environment Day:- MSG ने हरियाली से महकाई धरा</a></p>
<p style="text-align:justify;">केवल औपचारिकता मात्र से हम अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते और लक्ष्य है क्या? जहां तक पर्यावरण संरक्षण की बात है तो यह लक्ष्य है कि यह ब्रह्मांड हमें जिस सुन्दर अवस्था में मिला था उससे अधिक सुन्दर बनाकर हम इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़कर जाएं। यदि अधिक सुन्दर न बना सकें तो कम से कम इसे खराब तो न करें। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को देश, विश्व और आने वाली-पीढ़ियों के प्रति अपना सकारात्मक योगदान पर देना होगा। उदाहरण के तौर पर हर कोई मानता है कि पॉलीथीन और प्लास्टिक पर्यावरण के लिए बड़े घातक हैं। सरकारें कानून तो बना सकती हैं परन्तु उनको लागू करने में व्यक्ति का और समाज का योगदान अति आवश्यक है। World Environment Day</p>
<p style="text-align:justify;">हम अक्सर यह चर्चा करते और सुनते हैं कि आने वाले समय में शुद्ध जल की बड़ी गंभीर समस्या होगी और कई बार तो यह कहा जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। परन्तु क्या हम अपने दैनिक जीवन में जल बचाने का प्रयास करते हैं? क्या प्रात: ब्रश करते समय या शेव करते हुए हम पानी का नल व्यर्थ में चलता तो नहीं रहने देते? नहाने में या अन्य उपयोग में थोड़ा-थोड़ा पानी बचाना जल संरक्षण के प्रति हमारा योगदान हो सकता है। World Environment Day</p>
<p style="text-align:justify;">जल संरक्षण के लिए वर्षाजल का संचय करना अनिवार्य होना चाहिए। जल संरक्षण कार्यों के अनुश्रवण और मूल्यांकन करने हेतु एक राज्य स्तरीय टास्क फोर्स होनी चाहिए। सरकारी और गैर-सरकारी भवनों, होटलों, उद्योगों में वर्षा जल को संग्रहण करने के लिए टैंक निर्मित होने चाहिए, यह अनिवार्य हो। इसके बिना किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी भवन का नक्शा स्वीकृत नहीं होना चाहिए। पन-विद्युत परियोजनाओं के लिए जब पानी डायवर्ट किया जाता है तब भी मुख्य नदी की पारस्थितिकी का रखरखात ठीक प्रकार से करने के लिए 15 प्रतिशत पानी का बहाव मुख्य नदी में अनिवार्य हो। World Environment Day</p>
<p>Environment Day: जहां भी प्रोजेक्ट निर्माण हो, भवन निर्माण हो या सड़क निर्माण हो वहां पर पर्यावरण को संरक्षित रखने के लिए डंपिंग साइट चयन का काम शुरू होने से पहले हो और पर्यावरण संरक्षण के लिए बताए गए कदमों को लागू करवाने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों और कर्मचारियों की हो तथा लापरवाही के मामले में उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानी जाए। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कोयले व अन्य र्इंधन, जीवाशम र्इंधन के जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध हो। कुछ छोटे-छोटे सुझाव हैं जो हम व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक तौर पर सहयोग कर के पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। World Environment Day</p>
<p style="text-align:justify;">5 june environment day: जैसे हम स्वयं पॉलीथीन और प्लास्टिक के कैरी बैगज का उपयोग पूर्ण रूप से बन्द कर दें। ‘पॉलीथीन हटाओ, पर्यावरण बचाओ’ अभियान को राष्ट्रीय स्तर तक गंभीरता ता से लागू करके हम बड़ा योगदान कर सकते हैं। हमने हिमाचल प्रदेश में सत्ता में रहते हुए यह करके दिखाया था। पॉलीथीन और प्लास्टिक के कचरे को एकत्रित करके सड़क निर्माण के कार्य में उपयोग किया था। इसके लिए 21 अप्रैल 2011 को लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए प्रधानमंत्री पुरस्कार हिमाचल प्रदेश को हमारी उत्कृष्ट पहल पर ‘हिमाचल प्रदेश में प्लास्टिक कचरे का स्थाई प्रबंध, संकल्पना से नीति तक’ मिला था। World Environment Day</p>
<p style="text-align:justify;">Environment: हमने शुरुआत की थी बच्चों में प्राकृतिक संसाधनों के महत्व तथा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान करने वाले पत्रकारों, लेखकों, मैगजीनों (पत्रिकाओं) समाचार-पत्रों को पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकार और सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जाना चाहिए। हमने बच्चों में प्राकृतिक संसाधनों के महत्व तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने हेतु पर्यावरण संरक्षण संहिता बनाई थी। प्रात:काल विद्यालय में प्रार्थना के बाद भी पर्यावरण संरक्षण की शपथ दिलाई जाती थी। पर्यटन क्षेत्रों में आने वाले पर्यटकों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने हेतु एक पर्यटक आचार संहिता लागू की जानी चाहिए ताकि उनका योगदान भी सुनिश्चित हो सके। World Environment Day</p>
<p style="text-align:justify;">हर व्यक्ति अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए अधिक से अधिक धन संसाधन छोड़ कर जाना चाहता है। जिस प्रकार से पर्यावरण दूषित हो रहा है ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, तथाकथित विकसित देश प्रदूषण फैला रहे हैं उन परिस्थितियों को देखते हुए आने वाली पीढ़ी के लिए हमारी सबसे बड़ी विरासत एक सुन्दर, स्वच्छ, कार्बन न्यूट्रल पर्यावरण उसके लिए छोड़ कर जाना होगा। महात्मा गांधी ने कहा था कि प्रकृति ने हमारी आवश्यकता अनुसार उपयोग के लिये पर्याप्त दिया है पर लोभ के लिए नहीं। इसलिए आवश्यकता के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करें, शोषण नहीं।<br />
कार्बन तटस्थता के लिए हमारा नारा हो :-<br />
हर नागरिक बने पर्यावरण प्रहरी प्रखर,<br />
पर्यावरण संरक्षण में विकास की डगर।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/world-environment-day/article-48470</link>
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                <pubDate>Mon, 05 Jun 2023 12:51:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण आधारित विकास की पहल हो</title>
                                    <description><![CDATA[पर्यावरण (Environment) एवं प्रकृति की दृष्टि से हम बहुत ही खतरनाक दौर में पहुंच गए हैं। मानव की गतिविधियां ही इसके विनाश का कारण बन रही हैं। आज के दौर में समस्या प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने, पर्यावरण विनाश एवं प्राकृतिक आपदाओं की हैं। सरकार की नीतियां, उपेक्षाएं एवं विकास की अवधारणा ने ऐसी स्थितियों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/environment-based-development-initiative/article-48206"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/environmental-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पर्यावरण (Environment) एवं प्रकृति की दृष्टि से हम बहुत ही खतरनाक दौर में पहुंच गए हैं। मानव की गतिविधियां ही इसके विनाश का कारण बन रही हैं। आज के दौर में समस्या प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने, पर्यावरण विनाश एवं प्राकृतिक आपदाओं की हैं। सरकार की नीतियां, उपेक्षाएं एवं विकास की अवधारणा ने ऐसी स्थितियों को पैदा कर दिया है कि सरकार की बजाय न्यायालयों को बार-बार अपने डंडें का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। महानगर में बढ़ते अंधाधुंध विकास के कारण पर्यावरण को भारी क्षति पहुंच रही है। आर्थिक एवं भौतिक तरक्की अक्सर प्रकृति एवं पर्यावरण के विनाश का कारण बनती रही है। हमें विकास की कार्ययोजनाएं पर्यावरणीय आधारित बनानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में मानव की गतिविधियों से जितनी मिट्टी, पत्थर और रेत अपनी जगह से हटाई जाती है, वह सभी प्राकृतिक कारणों से हटने वाली कुल मात्रा से बहुत अधिक है। हरेक वर्ष जितने कंक्रीट का उत्पादन किया जाता है उससे पूरी पृथ्वी पर 2 मिलीमीटर मोटी परत चढ़ाई जा सकती है। प्लास्टिक का उत्पादन कुछ सालों के भीतर ही इतना किया जा चुका है कि इसके अवशेष माउंट एवरेस्ट से लेकर मरिआना ट्रेंच-महासागरों में सबसे गहराई वाला क्षेत्र तक मिलने लगा है। विश्व के आधे पेड़ काटे जा चुके हैं, और बहुत बड़ी संख्या में प्रजातियां मानव की गतिविधियों के कारण विलुप्त हो रही हैं। वायुमंडल से प्राकृतिक कारणों से जितनी नाइट्रोजन हटती है, उससे अधिक औद्योगिक उत्पादन, विकास कार्यों और कृषि से हट जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जोशीमठ में खड़ी हुई प्राकृतिक आपदा एकाएक नहीं हुई है, इस प्राकृतिक संकट को महसूस करते हुए वहां हो रहे भूस्खलन और धंसाव की समस्या को लेकर पिछले पचास वर्षों में कई अध्ययन कराए गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वैज्ञानिकों ने हर बार आगाह किया, लेकिन इसके बाद भौगोलिक-तकनीकी अध्ययन कराने की ओर से आंखें फेर ली गर्इं। यदि बिना पर्यावरण की परवाह किए विकास यूं ही जारी रहा तो पर्यावरण पर इसके नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न होंगे, जिससे यह उस स्थान पर रहने वाले निवासियों पर भी हानिकारक प्रभाव डालेगा। सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, यह काफी जरूरी है कि हम पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठायें। इस तरीके से यह सिर्फ ना वर्तमान के जनसंख्या के लिए लाभकारी होगा बल्कि भविष्य की आने वाले पीढ़ियां भी इसका लाभ ले सकेंगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="नयी दिल्ली से कटरा के लिए तीन विशेष ट्रेनें चलेंगी" href="http://10.0.0.122:1245/three-special-trains-will-run-from-new-delhi-to-katra/">नयी दिल्ली से कटरा के लिए तीन विशेष ट्रेनें चलेंगी</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 May 2023 09:32:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>WMO का ALERT, Saint MSG पहले ही बरनावा आश्रम में दे चुके हैं चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[जलेगी धरती, जलेगा जंगल, दुनिया में होगा इतना अमंगल पेरिस। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अलर्ट किया है कि वर्ष 2027 में धरती का औसतन टैम्प्रेचर 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, जिसका परिणाम ये होगा कि धरती जलेगी, आसमान जलेगा, जंगल जलेंगे, बेमौसमी बरसात, बाढ़, सूखा, धूल भरी आंधी, समुद्री जलस्तर बढ़ना, समुद्री तूफान […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/wmo-alert-saint-msg-has-already-warned-in-barnava-ashram/article-47779"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/wmo.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">जलेगी धरती, जलेगा जंगल, दुनिया में होगा इतना अमंगल</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>पेरिस।</strong> विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अलर्ट किया है कि वर्ष 2027 में धरती का औसतन टैम्प्रेचर 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, जिसका परिणाम ये होगा कि धरती जलेगी, आसमान जलेगा, जंगल जलेंगे, बेमौसमी बरसात, बाढ़, सूखा, धूल भरी आंधी, समुद्री जलस्तर बढ़ना, समुद्री तूफान आएंगे। ऐसे में इंसानों का क्या होगा? इसका अंदाजा लगाना शायद ही दुनिया के लिए मुश्किल होगा। साइंस इसका अलर्ट आज जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर डेरा सच्चा सौदा के संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां पहले ही आॅनलाइन गुरुकुल के माध्यम से दुनिया को आगाह कर चुके हैं कि दुनिया महाप्रलय की ओर जा रही है।</p>
<h3>दुनिया की हालत इतनी खराब होगी कि पूरी दुनिया जलेगी | WMO ALERT</h3>
<p style="text-align:justify;">WMO  ने 30 साल के औसत वैश्विक तापमान के आधार पर ये खुलासा करते हुए दुनिया को चेतावनी दी है कि हर पांच साल में एक साल रिकॉर्डतोड़ गर्मी वाला होगा, जिसका 98 प्रतिशत अनुमान है। यह प्रक्रिया 2016 से शुरू हो चुकी है। यह एक बहुत बड़े स्तर का जलवायु संकट है जिसे दुनिया गंभीरता से नहीं ले रही है। दुनिया की हालत इतनी खराब होगी कि पूरी दुनिया जलेगी, मौसम अपने समय के विपरीत बदल जाएंगे। अचानक आपदाएं आएंगी, धूल भरी आंधियां आएंगी, बेमौसमी बरसात होगी।</p>
<h3>डरावना खुलासा | WMO ALERT</h3>
<p style="text-align:justify;">इस संबंध में ब्रिटेन के मेट आॅफिस हैडली सेंटर के लॉन्ग-रेंज प्रेडिक्शन प्रमुख एडम स्कैफी ने कहा कि यह भी संभव है कि हम अगले चार-पांच सालों में गर्मी का ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर देखें। डेढ़ डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान चला जाए। उन्होंने कहा है कि पिछले वर्ष आई रिपोर्ट के अनुसार इस बात की संभावना 50-50 थी, लेकिन दोबारा की गई स्टडी के अनुसार अब यह 66 प्रतिशत है। स्कैफी के अनुसार ग्लोबल एनुअल टू डिकेडल क्लाइमेट अपडेट (Global Annual to Decadal Climate Update) में यह डरावना खुलासा किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एडम स्कैफी के अनुसार अगर अस्थाई तौर पर भी डेढ़ डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ता है तो भी पूरी दुनिया को प्राकृतिक आपदाएं झेलनी पड़ेंगी। कहने का मतलब कि पूरी दुनिया ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाने में कामयाब नहीं होगी। जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं होगा तब तक बढ़ती गर्मी को रोका नहीं जा सकता, जिसका विभिन्न देशों के मौसम पर फर्क पड़ना लाजमी है। भारत की हालत इसलिए खराब होगी क्योंकि अल-नीनो के साथ जब इंसानों द्वारा किया जा रहा जलवायु परिवर्तन मिलेगा तो स्थितियां और भी बद्तर हो जाएंगी।</p>
<h3>बरनावा आश्रम से पहले ही दे चुके है चेतावनी | WMO ALERT</h3>
<p><iframe title="नशा दुनिया को महाप्रलय की तरफ ले जा रहा है | Drug Addiction Will Result in Global Destruction" width="500" height="281" src="https://www.youtube.com/embed/c-GMiC_Xqtg?feature=oembed" frameborder="0" allowfullscreen=""></iframe></p>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां 40 दिन की रूहानी यात्रा पर बरनावा आश्रम में पधारे थे उस दौरान गुरु जी ने फरमाया कि ऐसे थोड़ी ना बरसात को उड़ीकते रहते हैं लोग। पर बरसात सही समय पर आ जाए लेकिन आजकल तो गड़बड़ हो रही है जब बरसात नहीं चाहिए तब आती है। जब चाहिए तब नहीं आती। यह क्यों होता है ऐसा क्यों हो रहा है इस पर भी बात करेंगे अभी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी वजह है जो हमने अनुभव किया पिछली बार भी हमने कहा था आपको जब पिछली बार आए थे कि शाह सतनाम शाह मस्तान जी ने इस बॉडी से पता नहीं क्या काम लेना है जो इतनी तपस्या करवाई उन्होंने। तो फीलिंग आती है महसूस होता है कि ऐसा तब होता है, मालिक ऐसा करे ना यह मालिक से दुआ है , पर यह परिवर्तन तब आता है जब प्रलय की तरफ दुनिया बढ़ रही होती है। बड़ी दुखद बात है जनसंख्या का विस्फोट होने को तैयार है। इतने बच्चे बढ़ते जा रहे हैं इतनी जनसंख्या होती जा रही है कि पूछो मत। पानी धरती में नीचे गायब होता जा रहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 May 2023 16:30:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण से खिलवाड़ विनाश का सबसे बड़ा कारण</title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन के चलते आज विनाश का जो दौर देखा जा रहा है, उसके लिए काफी हद तक ओजोन परत की कमी मुख्य रूप से जिम्मेदार है और हमें अब यह भी भली-भांति समझ लेना चाहिए कि हमारी लापरवाही और पर्यावरण से बड़े पैमाने पर खिलवाड़ ही पर्यावरण विनाश का सबसे बड़ा कारण है। ओजोन […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/playing-with-the-environment-is-the-biggest-cause-of-destruction/article-40775"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-12/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के चलते आज विनाश का जो दौर देखा जा रहा है, उसके लिए काफी हद तक ओजोन परत की कमी मुख्य रूप से जिम्मेदार है और हमें अब यह भी भली-भांति समझ लेना चाहिए कि हमारी लापरवाही और पर्यावरण से बड़े पैमाने पर खिलवाड़ ही पर्यावरण विनाश का सबसे बड़ा कारण है। ओजोन परत के सुरक्षित न होने से मनुष्यों, पशुओं और यहां तक की वनस्पतियों के जीवन पर भी बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। यही नहीं, अधिकांश वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा और पानी के नीचे का जीवन भी नहीं बचेगा। ओजोन परत की कमी से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, सर्दियां अनियमित रूप से आती हैं, हिमखंड गलना शुरू हो जाते हैं और सर्दी की तुलना में गर्मी अधिक पड़ती है, पर्यावरण का यही हाल पिछले कुछ वर्षों से हम देख और भुगत रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में 35 फीसदी तक कमी लाने का लक्ष्य रखा है किन्तु जी-20 देशों पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों की समीक्षा पर आधारित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सहित जी-20 देशों ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं, वे तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने के दृष्टिगत पर्याप्त नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए इन देशों को अपने उत्सर्जन को आधा करना होगा। दरअसल ओजोन परत में कमी और मोटे होते जा रहे छिद्र के कारण पृथ्वी तक पहुंचने वाली पराबैंगनी किरणें हमारे स्वास्थ्य तथा पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत हानिकारक प्रभाव डालती हैं। ओजोन परत की कमी से हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं। ओजोन परत वातावरण में बनती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणें आॅक्सीजन परमाणुओं को तोड़ती है और ये परमाणु आॅक्सीजन के साथ मिल जाते हैं तो ओजोन अणु बनते हैं। ओजोन परत पृथ्वी के धरातल से 20-30 किमी की ऊंचाई पर वायुमण्डल के समताप मंडल क्षेत्र में ओजोन गैस का एक झीना-सा आवरण है। यह परत पर्यावरण की रक्षक मानी गई है क्योंकि यही वह परत है, जो पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के लिए एक अच्छे फिल्टर के रूप में कार्य करती है। सूर्य विकिरण के साथ आने वाली पराबैंगनी किरणों का लगभग 99 फीसदी भाग ओजोन मंडल द्वारा सोख लिया जाता है, जिससे पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी एवं वनस्पति सूर्य के तेज ताप और विकिरण से सुरक्षित रहते हैं और इसी कारण ओजोन परत को सुरक्षा कवच भी कहा जाता है। इसीलिए प्राय: कहा जाता है कि ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।</p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 10 Dec 2022 09:51:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यावरण के लिए समस्या बन रही जनसंख्या</title>
                                    <description><![CDATA[पूरी दुनिया की आबादी इस समय करीब 7.7 अरब है, जिसमें सबसे ज्यादा चीन की आबादी 1.45 अरब है जबकि भारत आबादी के मामले में 1.4 अरब जनसंख्या के साथ विश्व में दूसरे स्थान पर है। विश्व की कुल आबादी में से करीब 18 फीसदी लोग भारत में रहते हैं और दुनिया के हर 6 […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/population-becoming-a-problem-for-the-environment/article-36334"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/population-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूरी दुनिया की आबादी इस समय करीब 7.7 अरब है, जिसमें सबसे ज्यादा चीन की आबादी 1.45 अरब है जबकि भारत आबादी के मामले में 1.4 अरब जनसंख्या के साथ विश्व में दूसरे स्थान पर है। विश्व की कुल आबादी में से करीब 18 फीसदी लोग भारत में रहते हैं और दुनिया के हर 6 नागरिकों में से एक भारतीय है। अगर भारत में जनसंख्या की सघनता का स्वरूप देखें तो जहां 1991 में देश में जनसंख्या की सघनता 77 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर थी, 1991 में बढ़कर वह 267 और 2011 में 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो गई। भारत में बढ़ती आबादी के बढ़ते खतरों को इसी से बखूबी समझा जा सकता है कि दुनिया की कुल आबादी का करीब छठा हिस्सा विश्व के महज ढ़ाई फीसदी भूभाग पर ही रहने को अभिशप्त है।</p>
<p style="text-align:justify;">जाहिर है कि किसी भी देश की जनसंख्या तेज गति से बढ़ेगी तो वहां उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी उसी के अनुरूप बढ़ता जाएगा। आंकड़ों पर नजर डालें तो आज दुनियाभर में करीब एक अरब लोग भुखमरी के शिकार हैं और अगर वैश्विक आबादी बढ़ती रही तो भुखमरी की समस्या बहुत बड़ी वैश्विक समस्या बन जाएगी, जिससे निपटना इतना आसान नहीं होगा। बढ़ती आबादी के कारण ही दुनियाभर में तेल, प्राकृतिक गैसों, कोयला इत्यादि ऊर्जा के संसाधनों पर दबाव अत्यधिक बढ़ गया है, जो भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत है। जिस अनुपात में भारत में आबादी बढ़ रही है, उस अनुपात में उसके लिए भोजन, पानी, स्वास्थ्य, चिकित्सा इत्यादि सुविधाओं की व्यवस्था करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले कुछ दशकों में देश में शिक्षा और स्वास्थ्य के स्तर में निरन्तर सुधार हुआ है, उसी का असर माना जा सकता है कि धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है लेकिन यह इतनी भी नहीं है, जिस पर खूब जश्न मनाया जा सके। बेरोजगारी और गरीबी ऐसी समस्याएं हैं, जिनके कारण भ्रष्टाचार, चोरी, अनैतिकता, अराजकता और आतंकवाद जैसे अपराध पनपते हैं और जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण किए बिना इन समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। विगत दशकों में यातायात, चिकित्सा, आवास इत्यादि सुविधाओं में व्यापक सुधार हुए हैं लेकिन तेजी से बढ़ती आबादी के कारण ये सभी सुविधाएं भी बहुत कम पड़ रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ती जनसंख्या जहां समूचे विश्व के लिए गहन चिन्ता का विषय बनी है, वहीं बढ़ती आबादी का सर्वाधिक चिंतनीय पहलू यह है कि इसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। विश्व विकास रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों से जितनी भी आमदनी हो रही है, वह किसी भी तरह पूरी नहीं पड़ रही, दशकों से यही स्थिति बनी है और इसे लाख प्रयासों के बावजूद सुधारा नहीं जा पा रहा। अत: जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए हमें कुछ कठोर और कारगर कदम उठाते हुए ठोस जनसंख्या नियंत्रण नीति पर अमल करने हेतु कृतसंकल्प होना होगा ताकि कम से कम हमारी भावी पीढ़ियां तो जनसंख्या विस्फोट के विनाशकारी दुष्परिणामों भुगतने से बच सकें।</p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Aug 2022 09:47:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बढ़ता तापमान विश्व पर्यावरण पर गंभीर खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[कुछ दिनों की राहत के बाद उत्तर व पश्चिम भारत में एक बार फिर गर्म हवाएं चलने का अंदेशा पैदा हो गया है। देश के अन्य हिस्सों में असानी चक्रवात के असर से कुछ राहत है। जहां लू चलने और तापमान बढ़ने की संभावना है, वहां की स्थिति पर मौसम वैज्ञानिकों की नजर है। मौसम […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/rising-temperature-serious-threat-to-the-world-environment/article-33405"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/environmental-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कुछ दिनों की राहत के बाद उत्तर व पश्चिम भारत में एक बार फिर गर्म हवाएं चलने का अंदेशा पैदा हो गया है। देश के अन्य हिस्सों में असानी चक्रवात के असर से कुछ राहत है। जहां लू चलने और तापमान बढ़ने की संभावना है, वहां की स्थिति पर मौसम वैज्ञानिकों की नजर है। मौसम विभाग ने दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में एक बार फिर भीषण गर्मी और लू चलने को लेकर चेतावनी जारी की है। दिल्ली-एनसीआर और आसपास के राज्यों में पांच दिनों तक मौसम झुलसाने वाला रहेगा। राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा के कुछ हिस्सों के लिए रेड और आॅरेंज अलर्ट जारी किया गया है। भारतीय मौसम विभाग ने वीकेंड में राजधानी दिल्ली के लिए भीषण लू की चेतावनी जारी की है क्योंकि दिल्ली में इन दिनों तापमान 40-46 डिग्री सेल्सियस के बीच बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">तापमान में बढ़ोतरी से अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, इसलिए लोगों की भरसक कोशिश होनी चाहिए कि वे गर्मी से बचाव करें। बच्चों को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में केंद्र सरकार की ओर से निर्देश जारी किया गया गया है कि स्कूली पोशाक के बारे में नियमों में ढील दी जाये, बाहर की गतिविधियों को कम किया जाये तथा विद्यालय के समय में बदलाव किया जाये। साल 2022 दुनिया के इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में एक हो सकता है। भारत में इस साल के पहले चार महीने ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक गर्म साबित हुए हैं। आम तौर पर हमारे देश के बहुत बड़े हिस्से में गर्मी का मौसम जुलाई के शुरूआती दिनों तक रहता है, जो मॉनसून के देर से आने से बढ़ भी सकता है। इसलिए हमें अभी दो माह तक अत्यधिक तापमान का सामना करना है। जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति भी बढ़ रही है तथा जलीय स्रोतों पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में हमें प्रकृति के प्रकोप के साथ जीने की आदत भी डालनी चाहिए तथा पर्यावरण संरक्षण पर भी प्राथमिकता के साथ ध्यान देना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लोबल वार्मिंग का खतरनाक प्रभाव अब साफतौर पर दिखने लगा है। पर्यावरण के निरंतर बदलते स्वरूप ने नि:संदेह बढ़ते दुष्परिणामों पर सोचने पर मजबूर किया है। औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। सार्वभौमिक तापमान में लगातार होती इस वृद्धि के कारण विश्व के पर्यावरण पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है, उससे मुक्ति के लिये जागना होगा, संवेदनशील होना होगा एवं विश्व के शक्तिसम्पन्न राष्ट्रों को सहयोग के लिये कमर कसनी होगी तभी हम जलवायु संकट से निपट सकेंगे अन्यथा यह विश्व मानवता के प्रति बड़ा अपराध होगा।</p>
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                <pubDate>Sun, 15 May 2022 09:43:48 +0530</pubDate>
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                <title>मानव वातावरण की करे सार-संभाल</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/take-care-of-human-environment/article-30759"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-02/meaningful-efforts-for-environmental-protection.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पर्यावरण का सवाल अह्म है, क्योंकि पृथ्वी की चिंता किसी को नहीं है। हालात की भयावहता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। राजनीतिक दलों तो बिलकुल बेफिक्र नजर आ रहे हैं, क्योंकि पृथ्वी और पर्यावरण उनके वोट बैंक नहीं हैं। धरती और पर्यावरण आज जिस स्थिति में हैं, उसके लिए विकास की गलत नीतिया और लापरवाही ही जिम्मेदार हैं। पृथ्वी मानव जीवन के साथ-साथ लाखों-लाख वनस्पतियों, जीव-जंतुओं की आश्रय स्थली है। इसके लिए किसी खास वर्ग को दोषी ठहराना उचित नहीं है, बल्कि सभी जिम्मेदार हैं। प्रकृति के संसाधनों का अपनी सुविधा की खातिर बेतहाशा इस्तेमाल हो रहा हैं। पर्यावरण विनाश ही बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का मूल है। इन हालातों ने ही पर्यावरण के खतरों को चिंता का विषय बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ी समस्या बन गई है। गर्मियां आग उगलने लगी हैं और सर्दियों में गर्मी का अहसास होने लगा है। इसकी वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघलकर समुद्र का जलस्तर तीव्र गति से बढ़ा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लेशियर का पिघलना कोई नई बात नहीं है। ग्लेशियर पिघलकर नदियों के रूप में लोगों को खुशहाली देते रहे हैं। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में पर्यावरण के बढ़ रहे दुष्परिणामों के कारण इनके पिघलने की गति में जो तेजी आई है, वह चिंताजनक है। पर्यावरण के निरंतर बदलते स्वरूप ने नि:संदेह बढ़ते दुष्परिणामों पर सोचने पर मजबूर किया है। औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। हाल के दिनों में हिमालयी राज्यों में जंगलों में आग की जो घटनाएं घटीं, वे ग्लेशियरों के लिए नया खतरा हैं। वनों में आग तो पहले भी लगती रही हैं, पर ऐसी भयानक आग काफी खतरनाक है। आग के धुएं से ग्लेशियर के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलने लगी है। इसके व्यापक दुष्परिणाम होंगे। काला धुआं कार्बन के रूप में ग्लेशियरों पर जम जाएगा, जो भविष्य में उस पर नई बर्फ को टिकने नहीं देगा। ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को नजरअंदाज करना बहुत बड़ी भूल होगी, इसलिए अब भी चेतो। अगर अब भी नहीं चेते तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा।</p>
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                <pubDate>Sun, 13 Feb 2022 09:52:38 +0530</pubDate>
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