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                <title>Earth - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Earth RSS Feed</description>
                
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                <title>Earth's Atmosphere: पृथ्वी का वायुमंडल कैसे बचाता है हमारी जान? जानिए इसके हैरान करने वाले राज</title>
                                    <description><![CDATA[धरती से अंतरिक्ष तक का रोमांचक सफर – आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earths-atmosphere/article-87477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/earth&#039;s-atmosphere.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Earth's Atmosphere:  अनु सैनी। </strong>क्या आपने कभी रात के आसमान को देखकर सोचा है कि आखिर अंतरिक्ष शुरू कहाँ से होता है? क्या 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ता हवाई जहाज अंतरिक्ष में होता है? या फिर चाँद तक पहुँचने के बाद ही अंतरिक्ष शुरू माना जाता है? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें धरती के ऊपर मौजूद वायुमंडल की पाँच परतों को समझना होगा। जिस तरह पृथ्वी के अंदर कई परतें होती हैं, उसी तरह पृथ्वी के ऊपर भी गैसों से बनी पाँच मुख्य परतें हैं। इन्हीं परतों की वजह से धरती पर जीवन संभव है। ये हमें साँस लेने के लिए हवा देती हैं, सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती हैं और अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश उल्कापिंडों को धरती तक पहुँचने से पहले ही जला देती हैं।<br />आइए अब एक-एक करके इन पाँचों परतों की यात्रा करते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">1. ट्रोपोस्फियर (Troposphere) – जीवन की परत</h3>
<p style="text-align:justify;">धरती की सतह से लगभग 8 से 12 किलोमीटर तक फैली पहली परत को ट्रोपोस्फियर या क्षोभमंडल कहा जाता है। यही वह परत है जहाँ इंसान, जानवर, पेड़-पौधे और लगभग सभी जीव रहते हैं। धरती के वायुमंडल का लगभग 75 प्रतिशत भाग और लगभग सारा जलवाष्प इसी परत में मौजूद होता है। यही वह जगह है जहाँ बादल बनते हैं, बारिश होती है, आँधी-तूफान आते हैं, बिजली चमकती है और इंद्रधनुष दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो धरती का पूरा मौसम इसी परत में बनता और बदलता है।<br />जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव और ऑक्सीजन कम होने लगती है। लगभग 5 किलोमीटर की ऊँचाई पर साँस लेना कठिन होने लगता है और 8 से 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर बिना ऑक्सीजन के अधिक देर तक जीवित रहना लगभग असंभव हो जाता है। यात्री विमान सामान्यतः 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ते हैं। इस ऊँचाई पर हवा पतली होती है, जिससे ईंधन की बचत होती है और मौसम का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है। यदि ट्रोपोस्फियर न होता, तो न बारिश होती, न नदियाँ बहतीं और न ही धरती पर जीवन संभव होता।</p>
<h4 style="text-align:justify;">2. स्ट्रैटोस्फियर (Stratosphere) – धरती की सुरक्षा ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">ट्रोपोस्फियर के ऊपर लगभग 12 से 50 किलोमीटर तक फैली दूसरी परत स्ट्रैटोस्फियर या समतापमंडल कहलाती है। इस परत में मौसम लगभग शांत रहता है। यहाँ बादल, बारिश और तूफान बहुत कम होते हैं। इसी कारण कुछ विशेष विमान और मौसम संबंधी गुब्बारे इस क्षेत्र तक पहुँचते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की सबसे बड़ी विशेषता है ओज़ोन परत। यही ओज़ोन सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैंगनी (UV) किरणों का अधिकांश भाग रोक लेती है। यदि ओज़ोन परत न होती, तो त्वचा का कैंसर, आँखों की गंभीर बीमारियाँ और पौधों को भारी नुकसान होता। शायद धरती पर जीवन आज जैसा है, वैसा कभी विकसित ही नहीं हो पाता। ट्रोपोस्फियर में ऊपर जाने पर तापमान घटता है, लेकिन स्ट्रैटोस्फियर में इसके विपरीत ऊपर जाते-जाते तापमान बढ़ने लगता है। इसका कारण यही है कि ओज़ोन सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करके वातावरण को गर्म करती है। यदि कोई व्यक्ति बिना स्पेस सूट के यहाँ पहुँच जाए, तो ऑक्सीजन की कमी और बेहद कम वायुदाब के कारण कुछ ही समय में उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">3. मेसोस्फियर (Mesosphere) – धरती की अग्नि ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">लगभग 50 से 85 किलोमीटर तक फैली तीसरी परत मेसोस्फियर या मध्यमंडल कहलाती है। यह पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश छोटे उल्कापिंड इसी परत में प्रवेश करते ही अत्यधिक गति के कारण हवा से टकराकर गर्म हो जाते हैं और जलकर नष्ट हो जाते हैं। रात के समय जो "टूटते तारे" दिखाई देते हैं, वे वास्तव में तारे नहीं बल्कि जलते हुए उल्कापिंड होते हैं।<br />इस परत का तापमान लगभग -90 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है, इसलिए यह पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र माना जाता है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि बिना विशेष स्पेस सूट के साँस लेना असंभव है। हालाँकि हवा बहुत पतली होती है, लेकिन उल्कापिंड लगभग 40 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से प्रवेश करते हैं। इतनी अधिक गति के कारण उनके सामने की हवा अत्यधिक संपीड़ित होती है और वही उन्हें अत्यधिक गर्म कर देती है। इसी वजह से वे जलते हुए दिखाई देते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">4. थर्मोस्फियर (Thermosphere) – जहाँ से अंतरिक्ष का एहसास शुरू होता है</h4>
<p style="text-align:justify;">मेसोस्फियर के ऊपर लगभग 85 किलोमीटर से 600 किलोमीटर तक फैली चौथी परत थर्मोस्फियर कहलाती है। यहीं पर लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर कार्मान रेखा (Kármán Line) मानी जाती है, जिसे अधिकांश वैज्ञानिक अंतरिक्ष की शुरुआत मानते हैं।<br />इस परत में सूर्य की तीव्र ऊर्जा के कारण तापमान 1500 से 2000 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो सकता है। लेकिन यहाँ हवा इतनी विरल होती है कि यदि कोई वस्तु यहाँ हो, तो उसे उतनी गर्मी महसूस नहीं होगी जितनी पृथ्वी पर होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहीं पर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) लगभग 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। कई उपग्रह भी इसी क्षेत्र में मौजूद रहते हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाली अद्भुत रोशनी, जिसे ऑरोरा कहा जाता है, इसी परत में बनती है। यह सूर्य से आने वाले आवेशित कणों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के बीच होने वाली क्रिया का परिणाम है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">5. एक्सोस्फियर (Exosphere) – अंतरिक्ष का द्वार</h4>
<p style="text-align:justify;">थर्मोस्फियर के ऊपर लगभग 600 किलोमीटर से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर तक फैली अंतिम परत एक्सोस्फियर कहलाती है। यह पृथ्वी के वायुमंडल और अंतरिक्ष के बीच की अंतिम सीमा है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि गैसों के कण एक-दूसरे से शायद ही कभी टकराते हैं। यहीं से पृथ्वी का वातावरण धीरे-धीरे समाप्त होकर अंतरिक्ष में मिल जाता है। इस क्षेत्र में कई संचार और मौसम उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। यदि कोई अंतरिक्ष यात्री इस क्षेत्र में बिना स्पेस सूट के पहुँच जाए, तो कुछ ही सेकंड में ऑक्सीजन की कमी और निर्वात के कारण उसका जीवित रहना असंभव होगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?</h4>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित कार्मान रेखा को अंतरिक्ष की शुरुआत माना जाता है। इस ऊँचाई के बाद हवा इतनी कम हो जाती है कि सामान्य विमान उड़ नहीं सकते। इसलिए अंतरिक्ष तक पहुँचने के लिए रॉकेट का उपयोग किया जाता है। रॉकेट पहले ट्रोपोस्फियर, फिर स्ट्रैटोस्फियर, उसके बाद मेसोस्फियर और थर्मोस्फियर को पार करता है। लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पार करते ही वह तकनीकी रूप से अंतरिक्ष में प्रवेश कर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धरती का वायुमंडल केवल गैसों की परत नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा करने वाला एक अद्भुत कवच है। ट्रोपोस्फियर हमें साँस लेने की हवा और मौसम देता है, स्ट्रैटोस्फियर की ओज़ोन परत हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है, मेसोस्फियर उल्कापिंडों को जलाकर पृथ्वी की रक्षा करता है, थर्मोस्फियर अंतरिक्ष स्टेशन और ऑरोरा का घर है, जबकि एक्सोस्फियर हमें धीरे-धीरे अनंत अंतरिक्ष से जोड़ देता है। यही कारण है कि जब कोई रॉकेट पृथ्वी से उड़ान भरता है, तो वह केवल ऊपर नहीं जाता, बल्कि जीवन की रक्षा करने वाली इन पाँचों परतों को पार करके उस विशाल ब्रह्मांड में प्रवेश करता है, जिसे हम अंतरिक्ष कहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 11:44:14 +0530</pubDate>
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                <title>Earth: 20 करोड़ साल बाद 25 घंटे का होगा एक दिन, चंद्रमा के दूर जाने पर वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा</title>
                                    <description><![CDATA[Earth:  अनु सैनी। हाल ही में हुई एक वैज्ञानिक रिसर्च में पता चला है कि चंद्रमा हर साल लगभग 3.8 सेंटीमीटर की दर से पृथ्वी से दूर जा रहा है। यह प्रक्रिया बेहद धीमी है, लेकिन इसके प्रभाव लाखों वर्षों में पृथ्वी के व्यवहार पर गहरा असर डालते हैं।वही विस्कॉन्सिन–मैडिसन विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/200-million-years-later-25-hours-will-be-a-day-scientists-make-a-big-revelation-on-the-moons-movement/article-78125"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/earth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Earth:  अनु सैनी।</strong> हाल ही में हुई एक वैज्ञानिक रिसर्च में पता चला है कि चंद्रमा हर साल लगभग 3.8 सेंटीमीटर की दर से पृथ्वी से दूर जा रहा है। यह प्रक्रिया बेहद धीमी है, लेकिन इसके प्रभाव लाखों वर्षों में पृथ्वी के व्यवहार पर गहरा असर डालते हैं।वही विस्कॉन्सिन–मैडिसन विश्वविद्यालय की रिसर्च टीम ने सावधानीपूर्वक अवलोकन करके बताया कि यह दूरी बढ़ना पृथ्वी के रोटेशन को प्रभावित कर रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">गुरुत्वाकर्षण संबंध बदल रहे हैं पृथ्वी की घूमने की गति | Earth</h3>
<p style="text-align:justify;">पृथ्वी और चंद्रमा के बीच मौजूद गुरुत्वाकर्षण खिंचाव इस पूरे बदलाव की सबसे बड़ी वजह है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जैसे-जैसे चंद्रमा पृथ्वी से दूर जाता है, ग्रह की घूमने की गति धीमी होती जा रही है। यही कारण है कि धीरे-धीरे पृथ्वी पर दिन का समय बढ़ रहा है। यह बदलाव भले ही इंसानी जीवन में महसूस न हो, लेकिन वैज्ञानिक समय-सीमा पर इसका असर बहुत महत्वपूर्ण होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">20 करोड़ साल बाद दिन होगा 25 घंटे का</h3>
<p style="text-align:justify;">रिसर्च के अनुसार, यदि चंद्रमा इसी गति से पृथ्वी से दूर होता रहा तो आने वाले 20 करोड़ साल बाद पृथ्वी पर एक दिन 25 घंटे का हो जाएगा। यानी वर्तमान के मुकाबले पूरा एक घंटा अधिक। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे जारी है और भविष्य में हमारी पृथ्वी के दिन की लंबाई को पूरी तरह बदल सकती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">करोड़ों साल पहले छोटा था पृथ्वी पर एक दिन</h3>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में यह भी सामने आया है कि करीब 1.4 अरब साल पहले पृथ्वी पर एक दिन सिर्फ 18 घंटे से थोड़ा ज्यादा का हुआ करता था। उस समय चंद्रमा आज की तुलना में पृथ्वी के अधिक निकट था, जिसके कारण ग्रह की रोटेशन स्पीड ज्यादा तेज थी। समय के साथ चंद्रमा दूर होता गया और दिन की लंबाई बढ़ती चली गई।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?</h3>
<p style="text-align:justify;">यह शोध पृथ्वी के इतिहास और भविष्य दोनों को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देता है। चंद्रमा के दूर जाने से न केवल दिन की लंबाई बदलती है, बल्कि पृथ्वी के जलवायु चक्र, समुद्री ज्वार-भाटे और ग्रह के आंतरिक गतिशीलता पर भी ये परिवर्तन असर डालते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे अध्ययन ब्रह्मांडीय संबंधों और ग्रहों की गति को बेहतर समझने में मदद करते हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
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                <pubDate>Fri, 14 Nov 2025 14:56:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>कहां है वो पहली जमीन, जो समंदर से सबसे पहले निकली बाहर, जानिये यहां पर&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[Earth: (सच कहूं/अनु सैनी) । एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/where-is-that-first-land-that-came-out-of-the-sea-know-here/article-74397"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-08/earth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Earth: (सच कहूं/अनु सैनी) ।</strong> एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल अब तक हम सब यहीं मानते आ रहे हैं कि सबसे पहले अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला जमीनी हिस्सा है, 13 देशों के 8 रिसर्चर्स 7 साल की रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">रिसर्च खोज की कहानी..Earth</h4>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाल आॅस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, कि हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में वे और उनकी टीम के 1 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, इन सबने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था, ये जगह नक्सल प्रभावित हैं, लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में टेस्ट किया हैं, इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ पत्थर ग्रेनाइट थे, उन्होंने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था, उनका कहना हैं कि नदी या समुद्र का किनार तभी हो सकता हैं, जब आसपास भूखंड हों।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं पीटर ने कहा, कि जब उन्होंने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तो तब उन्हें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था, इसका मतलब यह हुआ कि आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले, लेकिन हमने पाया कि सिंहभूमि क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया, उन्होंने दावा किया कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है ये इलाका</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जब सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जांच की तो यह पता चला, कि सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था, इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है, इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं, पीटर ने बताया, कि शोध के लिए उन्होंने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि समलीपाल, जोड़ा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि… अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था, यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आगे की रिसर्च के लिए खुली राह</h4>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप हैं, जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं, इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी से इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत होगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी, भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए आॅस्ट्रेलिया भेजे जाते थे पत्थर</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उनकी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची, इस दौरान तीन से 4 क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए, उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते आॅस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। उन्होंने बताया कि वे सब होटल या किसी ढाबे में खाना खाते थे, और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों को निकलते थे। उन्होंने बताया कि उनका फिल्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। उन्होंने खासतौर पर बताया कि नक्सल प्रभावित एरिया होने के बावजूद भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सैंपल कलेक्शन करने में स्थानीय लोगों ने की मदद</h3>
<p style="text-align:justify;">वे पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे, जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं, हम अलग-अलग समय में आते थे, कभी बरसात, तो कभी गर्मी के दिनों में फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उनके पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी परिस्थितियां आई, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">5-5 किलो के थैलों में कलेक्ट करते थे सैंपल</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद वे उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते थे। वे 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे, सैंपल कलेक्ट करने के लिए वे पत्थरों को हथौडेÞ से मारकर उनके टुकड़े करते थे, उनका कहना है कि ये काम भी बहुत कठीन था।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उन्हें कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे, वहां यह खोज की जाती थी, कि वे किन-किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे, लोहा, मैग्नीशियम, आॅक्सीजन वगैरह, आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च टीम में ये वैज्ञानिक रहे शामिल</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम पर 7 साल तक रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की टीम में आॅस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिविर्सिटी के पीटर केवुड़, जैकब मल्डर, शुभोजीत राय, प्रियदर्शी चौधरी और आॅलिवर नेबेल, आॅस्ट्रेलिया की ही यूनिवर्सिटी आॅफ मेलबर्न की ऐल्श्री वेनराइट, अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टूट्यूट आॅफ टेकनोलॉजी के सूर्यजेंदु भट्टाचार्यों के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के शुभम मुखर्जी शामिल हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 08 Aug 2025 11:02:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Earth: ताकि धरती बची रहे और हम जीव-जंतु भी</title>
                                    <description><![CDATA[Earth: धरती, जिसने हमें जीवन दिया, आज खुद जीवन की आस में कराह रही है। मनुष्य की अनियंत्रित लालसा, भोगवादी सोच और प्रकृति से दूरी ने इस धरती को संकट में डाल दिया है। जब-जब मानव ने प्रकृति से अधिक लेने की कोशिश की है, तब-तब उसने अपना ही नुकसान किया है। आज स्थिति यह […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/may-the-earth-survive-and-so-do-we-living-creatures/article-70055"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/earth-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Earth: धरती, जिसने हमें जीवन दिया, आज खुद जीवन की आस में कराह रही है। मनुष्य की अनियंत्रित लालसा, भोगवादी सोच और प्रकृति से दूरी ने इस धरती को संकट में डाल दिया है। जब-जब मानव ने प्रकृति से अधिक लेने की कोशिश की है, तब-तब उसने अपना ही नुकसान किया है। आज स्थिति यह है कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, मौसम असंतुलित हो गए हैं, और प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति बढ़ गई है। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछली सदी में धरती का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट तक बढ़ा है। इसका सीधा असर हिमखंडों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर के बढ़ने और चरम मौसमी घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। अंटार्कटिका से हर साल लगभग 148 अरब टन बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्री तटवर्ती और द्वीपीय देशों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">धरती को बचाने के लिए दुनिया भर के देशों ने कई संधियाँ की हैं, जैसे क्योटो प्रोटोकॉल, जिसे 160 देशों ने स्वीकार किया, परन्तु कुछ बड़े प्रदूषक देश इससे पीछे हट गए। परिणामस्वरूप, समस्या और गहरी होती चली गई। आज का युग प्लास्टिक का युग बन गया है। भारत में हर साल 50 मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन होता है। अधिकांश प्लास्टिक रिसायकल नहीं हो पाता और सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी में पड़ा रहता है। अमेरिका और इटली जैसे देश सबसे अधिक प्लास्टिक उत्पादक और उपभोक्ता हैं। प्लास्टिक के जलने से जो गैसें निकलती हैं, वे ओजोन परत को क्षति पहुंचा रही हैं। इसी प्रकार, रेफ्रिजरेटर व अन्य उपकरणों से निकलने वाली क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैसें भी ओजोन में छेद कर रही हैं, जिससे हानिकारक पराबैंगनी किरणें धरती तक पहुंचने लगी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग से न केवल मिट्टी की उपजाऊ शक्ति नष्ट हुई है, बल्कि मिट्टी जहरीली भी हो गई है। केंचुए और अन्य लाभकारी कीट समाप्त हो गए हैं। दूध, सब्जियां, अनाज और पानी प्रदूषित हो चुके हैं, जिससे कैंसर, दमा, त्वचा रोग, टायफायड, मस्तिष्क ज्वर जैसी बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। कारखानों का दूषित जल बिना उपचार के नदियों में डाला जा रहा है। यमुना दिल्ली और आगरा के बीच एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है। गंगा का जल अब पीने योग्य नहीं रह गया है। गोमती, वरुणा और असी जैसी नदियाँ शहरों का कचरा ढोने को विवश हैं। नदियों को जीवनदायिनी से प्रदूषण की धार बना दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हम वाकई धरती को बचाना चाहते हैं, तो हमें अपनी जीवनशैली बदलनी होगी। प्लास्टिक की थैलियों की जगह जूट या कपड़े के थैले अपनाने होंगे। रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद और देसी कीटनाशकों को बढ़ावा देना होगा। किसानों को इको-फ्रेंडली खेती की ओर प्रेरित करना होगा। साथ ही, हमें अपने बच्चों को भी प्रकृति के साथ जुड़ने का पाठ पढ़ाना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हर व्यक्ति को छोटे-छोटे प्रयासों से बदलाव की शुरूआत करनी होगी। हमें अपने दैनिक जीवन में ऐसे निर्णय लेने होंगे जो धरती के हित में हों। सिर्फ 22 अप्रैल को पृथ्वी दिवस मनाना काफी नहीं है, बल्कि हर दिन हमें यह याद रखना होगा कि धरती है तो हम हैं। यदि हमने समय रहते चेतना नहीं दिखाई, तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए केवल संकट और पछतावा ही शेष रह जाएगा। Earth<br />
<strong>                                                                                                  (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद इसरो ने लिया ये बड़ा निर्णय" href="http://10.0.0.122:1245/isro-took-this-big-decision-after-the-terrorist-attack-in-pahalgam/">पहलगाम में आतंकवादी हमले के बाद इसरो ने लिया ये बड़ा निर्णय</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/may-the-earth-survive-and-so-do-we-living-creatures/article-70055</link>
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                <pubDate>Thu, 24 Apr 2025 15:00:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ISRO News: &amp;#8230; तो हम सब मारे जाएंगे, इसरो चीफ सोमनाथ ने धरती वासियों को दी बड़ी चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[ISRO Chief Somnath: इसरो का कहना है कि 370 मीटर व्यास वाला एक खतरनाक क्षुद्रग्रह पृथ्वी के निकट से गुजरने वाला हैं, इसके पृथ्वी से टकराने की भी प्रबल संभावना हैं, इससे पहले 30 जून 1908 को साइबेरिया के एक सुंदूर स्थान तुंगुस्का में एक क्षुद्रग्रह के टकराने के कारण हुए विशाल हवाई विस्फोट ने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/then-we-will-all-be-killed-isro-chief-somnath-gave-a-big-warning-to-the-people-of-the-earth/article-59576"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/isro-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ISRO Chief Somnath: इसरो का कहना है कि 370 मीटर व्यास वाला एक खतरनाक क्षुद्रग्रह पृथ्वी के निकट से गुजरने वाला हैं, इसके पृथ्वी से टकराने की भी प्रबल संभावना हैं, इससे पहले 30 जून 1908 को साइबेरिया के एक सुंदूर स्थान तुंगुस्का में एक क्षुद्रग्रह के टकराने के कारण हुए विशाल हवाई विस्फोट ने लगभग 2200 वर्ग किलीमीटर घने जंगल को तहस-नहस कर दिया था, इसके कारण 8 करोड़ पेड़ नष्ट हो गए थे, अभी जो क्षुद्रग्रह धरती के नजदीक आ रहा है, उसके 13 अप्रैल 2029 को पास से गुजरने की संभावना हैं। ISRO News</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा कहा जता है कि जब-जब यह धरती से टकराती हैं तो कई प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं, इस बात की भी परिकल्पना है कि इसी के कारण धरती से डायनासोर विलुप्त हो गए थे। आपको बता दें कि दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां पृथ्वी को क्षुद्रग्रहों से बचाने के लिए ग्रह रक्षा क्षमताओं का निर्माण करने की दिशा में काम कर रही हैं, इसरो ने भी अपने मजबूत कंधों पर इसकी जिम्मेदारी ले ली हैं, इसरो प्रमुख एक सोमनाथ ने इसकी ताजा जानकारी भी दी है। ISRO News</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/if-you-are-dreaming-of-living-abroad-then-this-country-is-offering-good-jobs-and-full-benefits-of-living-abroad/">Job Opportunities In Foreign: अगर आप देख रहे हैं विदेश में जाकर रहने का सपना, तो ये देश दे रहा है अच्छी नौकरी और रहने का पूरा फायदा</a></p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हमारा जीवनकाल 70-80 साल का होता हैं और हम अपने जीवनकाल में ऐसी कोई आपदा नहीं देखते हैं, इसलिए हम यह मानकर चलते हैं कि ऐसा होने की संभावना नहीं हैं, अगर आप दुनिया और ब्रह्मांड के इतिहास को देखें तों ग्रहों की ओर क्षुद्रग्रह के पहुंचने की घटना अक्सर होती रहती हैं, उन्होंने गुरुवार से टकराने वाले क्षुद्रग्रह को शूमेकर-लेवी से टकराते देखा है, अगर पृथ्वी पर ऐसी कोई घटना होती हैं तो सभी विलुप्त हो जाएंगे।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/which-is-more-poisonous-among-these-poisonous-creatures-scorpion-or-snake-read-full-information-here/#google_vignette">Venom: इन जहरीले जीवों में ज्यादा जहरीला कौन है बिच्छू या सांप? यहां पढ़ें पूरी जानकारी</a></p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा कि ये वास्तविक संभावनाएं हैं, हमें खुद को तैयार करना चाहिए, वे नहीं चाहते कि ये धरती के साथ हो, वे चाहते है कि मानव और सभी जीव इस धऱती पर रहे। लेकिन वे इसे रोक नहीं सकते, उन्हें इसके लिए विकल्प खोजने होंगे। इससे आगे उन्होंने कहा कि उनके पास एक तरीका है जिससे वे इसे विक्षेपित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि वे पृथ्वी के निकट आने वाले क्षुद्रग्रह का पता लगा सकते हैं और उसे दूर ले जा सकते हैं। कभी-कभी यह असंभव भी हो सकता हैं। इसलिए प्रौद्योगिकी विकसित करने की आवश्यकता हैं, भविष्यवाणी करने की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता हैं, इसे विक्षेपित करने के लिए वहां भारी प्रॉप्स भेजने की क्षमता, अवलोकन में सुधार और एक प्रोटोकॉल के लिए अन्य देशों के साथ संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता हैं। ISRO News</p>
<p style="text-align:justify;">इसरो प्रमुख ने कहा कि यह आने वाले दिनों में आकार लेगा, जब खतरा वास्तविक हो जाएगा, तो मानवता एक साथ मिलकर इस पर काम करेगी, एक अग्रणी अंतरिक्ष राष्ट्र के रूप में हमें जिम्मेदारी लेने की जरूरत हैं, यह केवल भारत के लिए ही नहीं हैं, यह पूरी दुनिया के लिए हैं कि हमें तकनीकि क्षमता, प्रोग्रामिंग क्षमता और अन्य एजेंसियों के साथ काम करने की क्षमता तैयार करने और विकसित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। आपको बता दें कि वह विश्व क्षुद्रग्रह दिवस 30 जून पर इसरो द्वारा आयोजित एक कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Jul 2024 17:21:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>OMG News: बह्मांड में नई खोज, पृथ्वी के बाहर जीवन मिलने की संभावना बढ़ी! दावा, इंसानों के जैसे एलियन मिलना असंभव नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[Earth: डॉ. संदीप सिंहमार।  खगोलीय विज्ञान बह्मांड में नई खोजों के लिए जाना जाता है। आए दिनों कोई न कोई खोज सामने आते रहती है,जो एक नई उम्मीद जगाती है। पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश में भी वर्षों से खगोल विज्ञान सक्रिय हैं। अन्तरिक्ष विज्ञान के सहयोग से खगोलशास्त्री इस नई खोज में लगे […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/new-discovery-in-the-universe-chances-of-finding-life-outside-earth-increased/article-57172"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/omg-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Earth: <strong>डॉ. संदीप सिंहमार।</strong>  खगोलीय विज्ञान बह्मांड में नई खोजों के लिए जाना जाता है। आए दिनों कोई न कोई खोज सामने आते रहती है,जो एक नई उम्मीद जगाती है। पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश में भी वर्षों से खगोल विज्ञान सक्रिय हैं। अन्तरिक्ष विज्ञान के सहयोग से खगोलशास्त्री इस नई खोज में लगे हुए हैं। हाल ही में हुई नई खोज ने पृथ्वी से बाहर जीवन के मिलने की संभावना बढ़ा दी है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के जरिए हुई इस खोज के बाद यूएफओ एक्सपर्ट ने दावा कर रहे हैं कि इंसानों के जैसे एलियन मिलना अब असंभव नहीं है, बल्कि एलियन के कई रूप हो सकते हैं। यह भी बात ध्यान रहे कि हमारे धर्म एलियन को पहले ही स्वीकार करते हैं। अब विज्ञान की भी मुहर लगने लगी है। इस नई खोज के बाद धरती से बहत जीवन तलाशने की संभावनाएं पहले से अधिक बढ़ी है,जिस दिशा में लगातार काम चल भी रहा है। OMG News</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/bones-will-be-healthy-and-strong-follow-these-tips/#google_vignette">Healthy Bones: हड्डियाँ होंगी स्वस्थ और मजबूत, अपनाएं ये टिप्स!</a></p>
<p style="text-align:justify;">जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप के जरिए हुई इस खोज को अब तक खोजे गए एलियन जीवन के सबसे दिलचस्प संकेतों में से एक माना जा रहा है। इसकी जांच करने के लिए तकनीक ने दूसरे सौर मंडल में एक दूर के ग्रह की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से हुई खोज ने वेब वैज्ञानिकों को उत्साहित कर दिया है कि अब पृथ्वी से बाहर के एलियन जीवन की तलाश में सफलता मिल सकती है। एलियन के शोधकर्ताओं का मानना है कि एलियन की खोज इतनी असंभव भी नहीं है,जितनी हमें लगती है। प्रयास से सब कुछ संभव है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पृथ्वी की त्रिज्या से 2.6 गुना है एक अनोखी दुनिया! OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">इस नई खोज के मुताबिक यह ग्रह K2-18b पृथ्वी की त्रिज्या से 2.6 गुना अधिक महासागर से ढकी हुई एक अनोखी दुनिया है। वैज्ञानिकों ने इसके वायुमंडल में छिपी डाइमिथाइल सल्फाइड,या डीएमएस,नामक गैस के संकेत देखे हैं। नासा के विशेषज्ञों ने आधिकारिक तौर पर माना है कि गैस मुख्य रूप से समुद्री वातावरण में फाइटोप्लांकटन से आती है। यह गैस केवल जीवन की प्रक्रियाओं से ही पैदा होती है। इसका मतलब धरती के बाहर जीवन से नकारा नहीं जा सकता।</p>
<h3 style="text-align:justify;">शोध अध्ययन के मुखिया के लिए हैरानीजनक है ये खोज</h3>
<p style="text-align:justify;">इस शोध अध्ययन का के मुख वैज्ञानिक कैंब्रिज के खगोलशास्त्री डॉ. निक्कू मधुसूदन ने गैस की खोज के बारे में माना कि यह उनके लिए बहुत हैरानीजनक खोज थी। इस खोज के दौरान वे एक सप्ताह तक सो नहीं सके थे। वैज्ञानिक निक्कू का सिद्धांत है कि K2-18b एक हाइसीन जल जगत है। इस शब्द को उन्होंने हाइड्रोजन और महासागर की उपस्थिति को की ओर इशारा करने के लिए प्रयुक्त किया था। खोज में यूएफओ के शोधकर्ता फिलिप मेंटल ने सुझाव दिया है कि फिल्म और टेलिविज़न में विदेशी जीवन रूपों के चित्रण ने विशेष प्रभावों की सीमाओं के कारण मानवीय रूप ले लिया है। पर एक बात के कारण यह वास्तविकता से बहुत दूर नहीं हो सकता है। फिलिप ने कहा, ह्यूमनॉइड्स को कभी भी बड़े और छोटे स्क्रीन पर देखा जाता है। क्योंकि लंबे समय तक अतिरिक्त स्थलीय लोगों को प्लास्टिक के सिर पहने सूट वाले पुरुषों की तरह पेश किया जाता रहा है। पर अब इस दिशा में एक उम्मीद की किरण बढी है।</p>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ता फिलिप मेन्टल ने पुष्टि करते हुए कहा कि हालांकि एलियंस कई रूप ले सकते हैं। पर एलियन की एक प्रजाति अन्य एलियन प्रजातियों की तुलना में अन्य ग्रहों पर बसने की अधिक संभावना हो सकती है। इन संभावनाओं से कभी भी नकारा नहीं जा सकता।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/new-discovery-in-the-universe-chances-of-finding-life-outside-earth-increased/article-57172</link>
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                <pubDate>Mon, 06 May 2024 12:47:01 +0530</pubDate>
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                <title>Earth: पृथ्वी संकट में? अंतरिक्ष से गिर रहे 3-3 एस्टरॉयड का जानें कैसा होगा असर?</title>
                                    <description><![CDATA[Earth: अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने अलर्ट जारी करते हुए बताया है कि आज 3 बड़े एस्टरॉयड जोकि लघु ग्रह के नाम से भी जाने जाते हैं और जिन्हें क्षुद्र ग्रह भी कहा जाता है, धरती की ओर लगातार बढ़ रहे हैं। ये एस्टरॉयड धरती के बहुत करीब पहुंचने वाले हैं। ऐसा हाल ही में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earth-in-trouble-know-what-will-be-the-effect-of-3-3-asteroids-falling-from-space/article-49542"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/earth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Earth: अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने अलर्ट जारी करते हुए बताया है कि आज 3 बड़े एस्टरॉयड जोकि लघु ग्रह के नाम से भी जाने जाते हैं और जिन्हें क्षुद्र ग्रह भी कहा जाता है, धरती की ओर लगातार बढ़ रहे हैं। ये एस्टरॉयड धरती के बहुत करीब पहुंचने वाले हैं। ऐसा हाल ही में नैनीताल स्थित आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (ARIS) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है। रिपोर्ट की मानें तो अंतरिक्ष से तीन विशालकाय एस्टेरॉइड धरती की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि इनमें से एक एस्टेरॉइड MT-1 का आकार इंडिया गेट जितना बड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान का कहना है कि ये तीनों एस्टेरॉइड पृथ्वी के काफी करीब से गुजरने वाले हैं जिसे लेकर संस्थान के प्रभारी डॉ. वीरेंद्र यादव ने जानकारी दी है। इसे लेकर उन्होंने पब्लिक आउटरीच प्रोग्राम में बात की। हालांकि, उन्होंने ये भी बताया कि इन तीनों एस्टेरॉइड से पृथ्वी को किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा।</p>
<h3>वहीं वैज्ञानिकों ने किया खुलासा | Earth</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि तीनों एस्टेरॉयड जुलाई में पृथ्वी के पास से गुजरेंगे। हालांकि, तीनों घटना अलग-अलग तारीखों पर देखने को मिलेंगी। डॉ. यादव का कहना है कि 2023 MT-1 एस्टेरॉयड और ME-4 एस्टेरॉयड 8 जुलाई को पृथ्वी से 1.36 लाख किलोमीटर की दूरी से गुजरेंगे। ये एस्टेरॉइड पृथ्वी के करीब से 12 किलोमीटर प्रति सेकेंड से गुजरेंगे। अमेरिका और यूरोप के ऊपर से गुजरते हुए नजर आएंगे। वहीं तीसरा यूक्यू 3 एस्टेरॉयड 18 जुलाई को पृथ्वी और चंद्रमा के बीच से गुजरेगा जो करीब 18 से 20 मीटर व्यास का होगा। डॉ. यादव ने बताया कि हर साल पृथ्वी की ओर आते हैं एस्टेरॉइड।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. यादव ने आगे बताया कि एस्टेरॉइड हर साल पृथ्वी (Earth) की ओर आते हैं। कुछ एस्टेरॉइड का पृथ्वी से टकराने का खतरा बना रहता जिन्हें खतरनाक श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि, ये तीनों एस्टेरॉइड पृथ्वी और चंद्रमा के बीच से गुजरने वाले हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस एस्टेरॉयड का व्यास 524 फीट के आसपास होगा जबकि इसकी रफ्तार 11.8 किमी प्रति सेकंड है। ये एस्टेरॉयड एक घंटे में 26 हजार मील से ज्यादा की दूरी तय कर रहे हैं, जो ध्वनि की गति से भी 34 गुना ज्यादा रफ्तार है।</p>
<p style="text-align:justify;">एस्टेरॉयड 2013 WV44 हमारे ग्रह से 2.1 मिलियन मील दूरी से गुजरने वाला है जो अंतरिक्ष के हिसाब से सुरक्षित दूरी मानी जाती है। एक एक्सपर्ट के अनुसार ये दूरी चंद्रमा से लगभग 9 गुना ज्यादा है, फिर भी ये एस्टेरॉयड को नियर अर्थ आॅब्जेक्ट के रूप में वगीर्कृत किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन एस्टेरॉयड का पृथ्वी पर कोई असर नहीं होगा। अगर एक छोटा एस्टेरॉयड हमारे ग्रह से टकराया तो वो वायुमंडल में ही जलकर राख हो जाएगा। हालांकि, अगर कोई बड़ा एस्टेरॉयड टकराया तो उससे नुकसान होने का खतरा हो सकता है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Jul 2023 12:05:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Nasa Warning: क्या जल्द खत्म होने वाली पृथ्वी? नासा ने की चौंकाने वाली भविष्यवाणी!</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। Nasa Warning: आज एक ऐसी खबर वायरल हो रही है जिससे सभी हैरत में पड़ गए है अगर ऐसा होगा तो बहुत बड़ी तबाही आ सकती है?  (earth) जी हां! नासा ने कुछ वर्ष पहले अंतरिक्ष में तूफान की भविष्यवाणी की थी वह अब आ रहा है। जानकारी के अनुसार ऐसी भविष्यवाणियां कई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/is-the-earth-going-to-end-soon-nasas-shocking-prediction/article-49387"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/nasa-warning.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> Nasa Warning: आज एक ऐसी खबर वायरल हो रही है जिससे सभी हैरत में पड़ गए है अगर ऐसा होगा तो बहुत बड़ी तबाही आ सकती है?  (earth) जी हां! नासा ने कुछ वर्ष पहले अंतरिक्ष में तूफान की भविष्यवाणी की थी वह अब आ रहा है। जानकारी के अनुसार ऐसी भविष्यवाणियां कई लोगों, कुछ कैलेंडर और कभी-कभी किसी जानवर की ओर से की जाती हैं। लेकिन जहां कुछ लोग उन पर विश्वास करते हैं, वहीं कई लोग ऐसा नहीं करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अगर नासा कोई चेतावनी जारी करता है तो ज्यादातर लोग उस पर विश्वास कर लेते हैं। अंतरिक्ष में कई वर्षों के बाद नासा की चेतावनियाँ जारी की जाती हैं। इसलिए लोग उन्हें स्वीकार करते हैं। ताजा खबर यह है कि नासा ने जिस अंतरिक्ष तूफान की भविष्यवाणी कुछ साल पहले की थी, वह अब आ रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सौर चक्र क्या है? Nasa Warning</h3>
<p style="text-align:justify;">यह सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र से संचालित होता है और हर 11 साल में सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र पलट जाता है और उत्तर दक्षिण में हो जाता है और इसके विपरीत। सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन सौर सतह पर गतिविधि की मात्रा को प्रभावित करता है। चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव का सौर मंडल पर प्रभाव पड़ता है। शुक्र जैसे सुरक्षात्मक मैग्नेटोस्फीयर के बिना ग्रह पूर्ण प्रभाव महसूस करते हैं। पृथ्वी के चुंबकीय ध्रुव भी पलटते हैं, लेकिन उलटावों के बीच का अंतराल काफी लंबा होता है, जो नासा क्लाइमेट के अनुसार औसतन हर 300,000 साल में होता है। Space.com के अनुसार, आखिरी ध्रुव उलटाव लगभग 780,000 साल पहले हुआ था ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ऊर्जा संरचना को नुकसान पहुंचेगा | Earth</h3>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, वैसे तो अंतरिक्ष में कई तूफान आते रहते हैं लेकिन इस बार जो तूफान आने वाला है उसके गंभीर परिणाम होंगे। इस तूफान का असर धरती पर भी पड़ेगा। इससे पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर विनाश हो सकता है। जब सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में हलचल होती है तो यह अंतरिक्ष में बहुत शक्तिशाली विकिरण छोड़ता है। इसे सौर अधिकतम कहते हैं। और यह पृथ्वी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अंतरिक्ष में आने वाले इस तूफान से पृथ्वी की ऊर्जा संरचना को नुकसान पहुंचेगा। कहा ये भी जा रहा है कि कई उपग्रह भी अंतरिक्ष से दुर्घटनाग्रस्त होकर पृथ्वी पर गिरेंगे।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कई प्राकृतिक आपदाएँ भी आ सकती हैं | Earth</h4>
<p style="text-align:justify;">अब तक मिले सबूतों के मुताबिक जब भी सौर तूफान आता है तो सूर्य में बहुत बड़ा विस्फोट होता है। जेम्स ने कहा कि इस बार तूफान जल्दी आने वाला है। वहीं यह भी नहीं कहा जा सकता कि यह कब तक जारी रहेगा। लेकिन पिछले तूफानों के मुताबिक यह डेढ़ साल पुराना बताया जा रहा है। इस तूफान के कारण पृथ्वी पर कई प्राकृतिक आपदाएँ भी आ सकती हैं। साथ ही कई तरह की परेशानियां भी देखने को मिलेंगी। अभी सिर्फ अटकलें लगाई जा रही हैं। तूफान आने पर असली नुकसान का पता चलेगा।</p>
<h3>सौर गतिविधि पृथ्वी को कैसे प्रभावित कर सकती है?</h3>
<p>बड़ी सौर ज्वालाएँ पृथ्वी पर रेडियो ब्लैकआउट तूफान का कारण बन सकती हैं। सौर तूफान अंतरिक्ष यात्रियों और पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले अंतरिक्ष यान को खतरे में डाल सकता है। सौर तूफान पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर से टकरा सकता है और पृथ्वी पर विद्युत प्रणालियों में धाराएँ उत्पन्न कर सकता है। इस दौरान, पावर ग्रिड कमजोर होते हैं और बड़े ब्लैकआउट का कारण बन सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jun 2023 19:35:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Earth: पूर्व की ओर झुकी पृथ्वी, जिम्मेदार कौन, क्या होगा असर! जानें क्या है मामला</title>
                                    <description><![CDATA[Earth: कहने को तो ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’, ‘जल बिना जीवन नहीं’ ऐसे-ऐसे श्लोगन है पर क्या जल सुरक्षित है? बता दें कि पृथ्वी पर जीवन है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान पानी का है। पानी की वजह से ही प्लैनेट जिंदा है। लेकिन अभी एक अध्ययन के अनुसार पानी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earth-tilted-towards-east-who-is-responsible-what-will-be-the-effect-know-what-is-the-matter/article-49241"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/earth-sun.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Earth: कहने को तो ‘जल ही जीवन है’, ‘जल है तो कल है’, ‘जल बिना जीवन नहीं’ ऐसे-ऐसे श्लोगन है पर क्या जल सुरक्षित है? बता दें कि पृथ्वी पर जीवन है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान पानी का है। पानी की वजह से ही प्लैनेट जिंदा है। लेकिन अभी एक अध्ययन के अनुसार पानी को पृथ्वी से निकाल-निकाल कर इंसानों ने इसे पूर्व की ओर झुका दिया है। सोचिए जिस पृथ्वी का एक तिहाई भाग पानी से ढका है, उसी पृथ्वी को इंसानों की एक हरकत ने एक तरफ ज्यादा झुका दिया है। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको एक ऐसी जानकारी प्रदान करेंगे जिसको जानकार आप हैरान हो जाएंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या है अध्ययन? Earth</h3>
<p style="text-align:justify;">जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इंसानों ने पृथ्वी से इतना ज्यादा ग्राउंडवॉटर पंपिंग किया जिससे कि 20 सालों से भी कम समय में पृथ्वी 4.36 सेंटीमीटर/प्रतिवर्ष की स्पीड से लगभग 80 सेंटीमीटर पूर्व की ओर झुक गई है। दरअसल, जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स एजीयू की पत्रिका है जो पृथ्वी और अंतरिक्ष विज्ञान में फैले प्रभावों के साथ लघु-प्रारूप और उच्च-प्रभाव अनुसंधान पर रिपोर्ट प्रकाशित करती है। जलवायु मॉडल के आधार पर वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया ािा कि लोगों ने 2150 गीगाटन भूजल निकाल लिया था जोकि 1993 से 2010 तक समुद्र के स्तर में 6 मिलीमीटर यानि 0.24 इंच से अधिक वृद्धि के बराबर था। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन के अनुसार पृथ्वी एक बिंदु के समान घूमने वाले ध्रुव के साथ बनी हुई है पृथ्वी इसी के चारों ओर घूमती है। यह एक धु्रवीय गति है जो तब होती है जब पृथ्वी के घुर्णी धु्रव की स्थिति क्रस्ट के सापेक्ष अलग होती है। ग्रह पर पानी का बंटवारा इसे प्रभावित करता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पानी की भारी मात्रा को कैसे वितरित किया जाता है। पृथ्वी थोड़ा विभिन्न तरीके से घूमती है क्योंकि इसके चारों और पानी घूमता है ।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कितना पानी निकाल लिया बाहर? Earth</h4>
<p style="text-align:justify;">इस रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राउंड वाटर का सबसे ज्यादा दोहन अमेरिका के पश्चिम इलाके और उत्तर पश्चिमी क्षेत्र और उत्तर पश्चिमी भारत में हुआ। यहां ना सिर्फ पानी का निकाला गया बल्कि रिडिस्ट्रिब्यूट किया गया। इससे पृथ्वी के रोटेशनल पोल के बहाव पर प्रभाव पड़ा है। मध्य अंकाक्षों से पानी के दोबारा विभाजन का घूमने वाले ध्रुव पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। मध्य अक्षांश पर पश्चिमी उत्तरी अमेरिका और उत्तर पश्चिमी भारत में सबसे ज्यादा पानी का पुनर्वितरण किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों का मानना है कि जमीन से निकालकर जो पानी उपयोग में लिया जाता है और रिडिस्ट्रिब्यूट होता है, वह आखिर में समुद्र में पहुंच जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वो पानी गंदा होता है और हमारी नंदियों को भी प्रदूषित करता है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के एक भूभौतिकीविद् की-वैन सेओ ने कहा कि पृथ्वी का घूर्णन धु्रव वास्तव में बहुत कुछ बदलता है। हमारे अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु से संबंधित कारणों में भूजल का दोबारा विभाजन वास्तव में घूर्णी धु्रव के बहाव पर सबसे अधिक प्रभाव डालता है। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि 2016 में पृथ्वी के घूमने की स्थिति बदलने की पानी की क्षमता की खोज की गई थी। अब तक इन घूमने वाले बदलावों में भूजल के अहम योगदान की खोज नहंी की गई थी। अब एक नए अध्ययन के अनुसार शोधकर्ताओं ने पृथ्वी के घूमने वाले ध्रुव के बहाव और पानी की गतिविधि में देख गए बदलावों को दर्ज किया। पहले तो सिर्फ बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों पर इसे लागू किया जाता था। अब भूतल के दोबारा विभाजन के विभिन्न परिदृश्यों को भी इसमें जोड़ा गया।</p>
<p style="text-align:justify;">रिसर्चकर्ताओं के मुताबिक भूजल के दोबारा विभाजन के लिए 2150 गीगाटन पानी को शामिल गया गया है। इसके बाद मॉडल में उन चीजों को शामिल गया गया जो केवल देखे गए घु्रवीय बहाव से मल खाता था। इसके बिना मॉडल प्रति वर्ष 78.5 सेंटीमीटर यानि 31 इंच या 4.3 सेंटी मीटर यानि 1.7 इंच बहाव से दूर था। सेओं ने कहा कि मैं अजीब तरीके से घूमने के इस अस्पष्ट कारण को देखकर बहुत खुश हूँ। वहीं दूसरी ओर पृथ्वी का निवासी होने के नाते मैं यह देखकर चिंतित और हैरान हूँ कि भूजल को निकालने से समुद्र के स्तर में वृद्धि का यह एक मुख्य स्रोत है। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि दुनियाभर में जिस तेजी से ग्राउंडवाटर का उपयोग बढ़ा है, उससे पता चलता है कि तालाबों और झीलों को पुनर्जीवित करने में कोई भी पक्ष दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। शहरों में तो पोखरों को पाटकर वहां कालोनियों को बसा दिया गया है। बारिश के पानी को सहेजने का काम भी बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा। जिससे भूजल का स्तर लगातार कम हो रहा है। Earth</p>
<p style="text-align:justify;">इस रिसर्च से दुनिया के भविष्य के लिए नए दरवाजे खुल गए हैं। आने वाले वर्षों में वैज्ञानिकों के लिए यह समझ पाना और भी आसान होगा कि भूजल के दोहन के कारण पृथ्वी किस तरह से रिएक्ट कर रही है। अभी तक पृथ्वी के 80 सेंटीमीटर पूर्व की ओर झुकने का पता चला है, क्या यह झुकाव भविष्य में और वृद्धि कर सकता है ऐसे कई सवालों के जवाब आने वाले समय में हमारे सामने आ सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 25 Jun 2023 13:20:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Earth के लिए कर दिखाया अपनी उम्र से बड़ा काम, दुनिया मानेगी लोहा</title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण पर बनाई फिल्में बना कर किया जागरूक नई दिल्ली (एजेंसी)। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के बीच Earth पर सकारात्मक बदलाव लाने वाले छह प्रभावशाली चेंजमेकर्स किशोरों के प्रयासों पर आधारित छह लघु फिल्मों का कल Earth दिवस पर नेशनल ज्योग्राफिक के वन फॉर चेंज अभियान के तहत प्रीमियर किया जायेगा। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/he-has-done-a-great-work-for-the-earth-the-world-will-consider-iron/article-46532"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/earth.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण पर बनाई फिल्में बना कर किया जागरूक</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> जलवायु परिवर्तन और बढ़ते प्रदूषण के बीच Earth पर सकारात्मक बदलाव लाने वाले छह प्रभावशाली चेंजमेकर्स किशोरों के प्रयासों पर आधारित छह लघु फिल्मों का कल Earth दिवस पर नेशनल ज्योग्राफिक के वन फॉर चेंज अभियान के तहत प्रीमियर किया जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कल से शुरू होने वाली लघु फिल्मों में 9 से 17 वर्ष की आयु के उन बच्चों की असाधारण कहानियों के बारे में फिल्में दिखाई जाएंगी जो दुनिया को बेहतर बनाने के लिए बदलाव ला रहे हैं। ये फिल्में नेशनल जियोग्राफिक के टेलीविजन प्लेटफॉर्मों और डिज्नी स्टार नेटवर्क के मनोरंजन चैनलों पर प्रीमियर होंगी इसके अलावा इन फिल्मों को नेशनल जियोग्राफिक इंडिया के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भी रिलीज किया जाएगा, जिनके कुल फॉलोअर एक करोड़ से अधिक हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बदलाव के लिए उम्र नहीं सोच चाहिए</h3>
<p style="text-align:justify;">अपनी पृथ्वी के प्रति प्रेम उम्र की सीमा से नहीं बंधता। किसी भी उम्र का व्यक्ति ऐसा प्रभावशाली कदम उठा सकता है जो पृथ्वी के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है। नेशनल ज्योग्राफिक का ‘वन फॉर चेंज’ वर्तमान में बदलाव लाने वाले ऐसे छह बच्चों की प्रेरणादायक कहानियों और पर्यावरण से प्यार को सम्मानित कर रहा है, जो इस धारणा को निरस्त कर रहे हैं कि बदलाव लाने का कार्य केवल वयस्क ही कर सकते हैं। बदलाव लाने की उत्साह और दृढ़ता से प्रेरित 9 से 17 साल की आयु वाले ये छोटी उम्र के नायक इस धारणा को तोड़ रहे हैं कि बच्चे बदलाव नहीं ला सकते और वे पृथ्वी का संरक्षण करने की दिशा में सजगता से सक्रिय रहे हैं। एक विशेष पृथ्वी दिवस पहल के तहत, इन बच्चों की प्रेरणादायक कहानियों को डिज्नी स्टार नेटवर्क पर सारे दर्शकों के लिए प्रसारित किया जाएगा।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 22 Apr 2023 10:51:53 +0530</pubDate>
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                <title>नेट जीरो के लिए चाहिए पृथ्वी प्रथम की नीति</title>
                                    <description><![CDATA[धरती का तापमान न बढ़े इसके लिए सारी कवायद हो रही है मगर न्यू क्लाइमेट इंस्टिट्यूट और कार्बन मार्केट वॉच के सहयोग से तैयार की गई रिपोर्ट यह बताती है कि 1.5 डिग्री तापमान के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कार्बन उत्सर्जन में 43 फीसदी की कमी लानी होगी जिसकी सम्भावना दूर-दूर तक नहीं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/earth-first-policy-is-needed-for-net-zero/article-43926"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/earth.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">धरती का तापमान न बढ़े इसके लिए सारी कवायद हो रही है मगर न्यू क्लाइमेट इंस्टिट्यूट और कार्बन मार्केट वॉच के सहयोग से तैयार की गई रिपोर्ट यह बताती है कि 1.5 डिग्री तापमान के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कार्बन उत्सर्जन में 43 फीसदी की कमी लानी होगी जिसकी सम्भावना दूर-दूर तक नहीं है। नेट जीरो का दावा करने वाली विश्व की 24 बड़ी कम्पनियों की स्थिति यह बता रही है कि माथे पर चिंता की लकीरें मोटी हो जाएंगी। इन कम्पनियों की हालिया स्थिति जलवायु लक्ष्यों के अनुकूल नहीं है। रिपोर्ट में यह पता चलता है कि केवल 15 प्रतिशत तक ही कमी लाने में यह सक्षम है। यदि कम्पनियों की बात को सही माना जाए तो भी महज 21 फीसदी से ज्यादा कमी लाना असम्भव है। यह आंकड़ा दावे और वायदे की तुलना में आधे से भी कम ठहरता है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले जी-20 समिट में शामिल देशों में 2050 तक पृथ्वी के तापमान की इस बढ़ोत्तरी को डेढ़ डिग्री तक रखने पर सहमति बनी। इस वर्ष का केन्द्रीय बजट ऊर्जा परिवर्तन को तो बढ़ावा देता है लेकिन भारत के विकास लक्ष्यों के साथ जलवायु अनुकूलन का तालमेल स्थापित करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता को सम्बोधित करने में कुछ कम सा रह जाता है। गौरतलब है कि 2023 के बजट का मुख्य ध्यान हरित विकास पर है। कार्बन उत्सर्जन व ग्रीन हाउस गैस के प्रभाव को इस आंकड़े से समझना और सहज होगा कि साल 2022 में भारत ने 88 फीसदी दिनों में गर्म हवाओं, बाढ़ और चक्रवात जैसी विषम मौसमी घटनाओं का सामना किया था जिसके परिणामस्वरूप जन-जीवन और आजीविका भी प्रभावित हुई है साथ ही बीते कई दशकों के विकास कार्यों के लिए यह खतरा बना।</p>
<p style="text-align:justify;">विदित हो कि नेट जीरो का मतलब ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य करना नहीं है बल्कि इन गैसों को दूसरे कामों से संतुलित करना है। ऐसी अर्थव्यवस्था तैयार करना जिसमें जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल न के बराबर हो साथ ही कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली दूसरी चीजों का इस्तेमाल भी अवशोषकों का भी इंतजाम हो जो पर्यावरणीय संरक्षण व पेड़-पौधों को बनाए रखने से ही सम्भव है। गौरतलब है यदि कार्बन उत्सर्जन एक निश्चित मात्रा में होता है और उत्सर्जन करने वाली इकाई उसी अनुपात में पेड़ों को तवज्जो देती है तो कार्बन उत्सर्जन और अवशोषकों की समानता के कारण नेट जीरो एमिशन को पाना सुनिश्चित हो जाएगा। मगर जिस प्रकार प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और पर्यावरण की बर्बादी हो रही है उससे नेट जीरो एमिशन एक सपना सा ही लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पष्ट कर दें कि दुनिया में केवल दो देश भूटान और सूरीनाम ही ऐसे हैं जो नेट जीरो एमिशन के मामले में नकारात्मक श्रेणी में है। इसकी सबसे बड़ी वजह वहां की अल्प आबादी और चौतरफा मौजूद हरियाली है। इसमें कोई दुविधा नहीं कि सुशासन का चश्मा आंखों पर पहनकर बड़े और छोटे देश कितने भी वादे और इरादे जताएं यदि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण निश्चित तौर पर नहीं होता है तो कई समस्याओं के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी अवस्था में बना रहा तो 2050 तक पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री बढ़ जाएगा जो किसी भी सूरत में तबाही का हस्ताक्षर होगा मसलन भीषण सूखा पड़ना, विनाशकारी बाढ़ आना, ग्लेशियर्स का टूटकर पिघलना और समुद्र का जलस्तर उफान लेना। ऐसे में कई सभ्यताएं समाप्त हो जाएंगी, कई डूब जायेंगी, कईयों का नामोंनिशान मिट जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के 192 देश संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का हिस्सा हैं जिसमें से 137 नेट जीरो का समर्थन करते हैं। देखा जाए तो कुल ग्रीन हाउस उत्सर्जन में इनकी हिस्सेदारी 80 फीसदी है जिसमें सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले चीन और अमेरिका भी इसी में आते हैं। चीन ने साल 2026 तक इस मामले में नेट जीरो का लक्ष्य रखा है, उसकी बलवती होती आर्थिक नीति और दुनिया को मुट्ठी में करने वाली नीयत यह इशारा कर रही है कि चीन जो कह रहा है उसमें बिल्कुल खरा नहीं उतरेगा यानी कार्बन उत्सर्जन का सिलसिला उसके चलते बरकरार रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जर्मनी और स्वीडन जैसे देश 2045 तक जबकि आॅस्ट्रिया, फिनलैण्ड, उरूग्वे ने अलग-अलग समय में नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। अमेरिका के अलावा कई ऐसे देश हैं जो इस मामले में कहीं आगे जाकर 2050 तक नेट जीरो उत्सर्जन को अपनी लकीर बनाई हुए है। इस बीच एक सुखद बात यह है कि जलवायु परिवर्तन की इस चुनौती के बीच भारत के वन क्षेत्र में 2011 के मुकाबले 2021 में तीन प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। वैसे भारत जलवायु परिवर्तन की चिंता से कहीं अधिक चिंतित देशों में आता है साथ ही कार्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर पहला कदम उठाने में नहीं कतराता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने नेट जीरो को लेकर अपनी पूरी योजना को पंचामृत नाम से पेश किया। प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लासगो में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कॉप 26) में इसे पेश किया। सिलसिलेवार तरीके से इसे समझें तो 2030 तक गैर जीवाश्म ऊर्जा को 500 गीगाबाइट तक पहुंचाना। दूसरा संदर्भ इसी वर्ष के अंतर्गत अपनी 50 फीसदी ऊर्जा जरूरतों को रिन्यूवल एनर्जी से पूरा करना। तीसरे और चौथे संदर्भ में क्रमश: प्रोजेक्टेड कार्बन उत्सर्जन का एक बिलियन टन कम करना और अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45 फीसदी तक कम करना। इसके अलावा 2070 तक नेट जीरो एमिशन को हासिल करने का लक्ष्य शामिल है। हालांकि वक्त की दहलीज पर कौन, कितना खरा उतरेगा यह तो समय ही बताएगा मगर ग्रीन हाउस गैस व कार्बन उत्सर्जन से पृथ्वी कराह रही है यह खुली आंखों से देखा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुशासन की परिपाटी यदि वैश्विक पृष्ठभूमि को अंगीकृत कर ले तो पृथ्वी का भला हो सकता है मगर असुविधा यह है कि प्रत्येक देश प्रथम की नीति ग्रहण किए हुए है। नतीजन कार्बन उत्सर्जन को लेकर दुनिया के देशों में कागजी एकजुटता तो कम-ज्यादा देखने को मिलती है मगर वास्तविकता में पृथ्वी इसके बोझ से तप रही है। विकसित और विकासशील देशों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी व्यापक रूप लेते रहे हैं। इस सुलगते सवाल को नजरअंदाज करते हुए कि धरती एक है, इसकी जरूरत एक है और इसे बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। फिलहाल भारत की अपनी चिंताएं हैं और अपनी चुनौतियां हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया में आबादी के मामले में भारत अच्छी खासी स्थिति रखता है यदि हालिया आंकड़े को सही माना जाए तो यह चीन से आगे निकलकर पहले स्थान पर है जहां गरीबी और भुखमरी से ऊपर उठना कमोबेश चुनौती है। यदि भारत कार्बन उत्सर्जन और नेट जीरो पर बहुत सशक्त कदम उठाता भी है तो उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर हो सकती है मगर एक सच यह है कि अन्य विकसित और विकासशील देशों की तुलना में भारत कार्बन उत्सर्जन के मामले में संयमित देश है और अपने कथन को पूरा करने की जी-तोड़ कोशिश भी करता है। बावजूद इसके दुनिया को यह सोचना पड़ेगा कि पृथ्वी की तपिश को कम करने के लिए प्रथम की नीति नहीं बल्कि वैश्विक सुशासन की नीयत से काम करना होगा।<br />
­(यह लेखक के अपने विचार हैं)</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Feb 2023 12:46:36 +0530</pubDate>
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                <title>पृथ्वी बुधवार को सूर्य के सबसे निकट पहुंचेगी: पीएसआई</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/know-interesting-things-about-earth-and-sun/article-41850"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-01/earth-sun.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>हैदराबाद (एजेंसी)।</strong> प्लैनेटरी सोसाइटी आॅफ इंडिया (पीएसआई) ने मंगलवार को कहा कि पृथ्वी बुधवार की रात सूर्य के सबसे निकटतम बिंदु पर पहुंचेगी। पीएसआई के निदेशक एन रघुनंदन कुमार ने एक विज्ञप्ति में कहा कि पृथ्वी बुधवार रात नौ बजकर 44 मिनट पर अपनी वार्षिक दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य के निकटतम बिंदु पर 0.98329एयू यानी सूर्य से 14,70,98,928 किलोमीटर दूर पहुंचेगी। उन्होंने कहा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्तीय कक्षा में चक्कर लगाती है, जिसके कारण एक वर्ष में एक समय पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है और एक समय सबसे दूर होती है। खगोलीय रूप से इस घटना को ‘उपसौर’ कहा जाता है, जबकि सात जुलाई, 2023 को सुबह 01:16 बजे पृथ्वी सूर्य से 1.016एयू (15,20,93,253 किमी) पर होगी यानी सूर्य से सबसे दूर बिंदु पर, जिसे ‘अपसौर’ कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरे शब्दों में, चार जनवरी को उपसौर के कारण, पृथ्वी अपनी कक्षा में सात जुलाई, 2023 की तुलना में सूर्य से 49,94,325 किमी नजदीक होगी। कुमार ने कहा कि आमतौर पर माना जाता है कि पृथ्वी से सूर्य की दूरी के कारण पृथ्वी पर मौसम या तापमान में बदलाव होता है लेकिन यह सच नहीं है। सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हुए पृथ्वी का अक्षीय झुकाव (लगभग 23.5 डिग्री) पृथ्वी पर मौसम और तापमान निर्धारित करता है, जिसमें से एक गोलार्ध सूर्य की ओर और दूसरा उसके विपरित होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जुलाई में जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि वर्ष की शुरूआत में जनवरी महीने में उत्तरी गोलार्ध के अधिकांश देशों में ठंड होती है जबकि पृथ्वी सूर्य के सबसे निकट होती है। जबकि दक्षिणी गोलार्ध के देशों में गर्मी होती है। साथ ही, जुलाई में जब पृथ्वी सूर्य से सबसे दूर होती है तो जनवरी की तुलना में भारत और पड़ोस देशों में बहुत गर्मी पड़ती है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि सूर्य से पृथ्वी की दूरी से मौसम निर्धारित नहीं होता है बल्कि सूर्य के चारों ओर अपनी वार्षिक चक्कर के दौरान इसके झुकाव से मौसम तय होता है। पीएसआई निदेशक ने कहा कि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में 365.25 दिन लगते हैं। पृथ्वी की तुलना में, बृहस्पति ग्रह को सूर्य की एक परिक्रमा पूरा करने में 11.862 वर्ष लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुमार ने कहा कि पृथ्वी की तरह ही बृहस्पति का भी सूर्य की परिक्रमा के दौरान उपसौर और अपसौर होता है। इस प्रकार से, 20 जनवरी, 2023 को, बृहस्पति सूर्य के निकटतम बिंदु पर होगा जबकि बृहस्पति 28 दिसंबर, 2028 को सूर्य से सबसे दूरस्थ बिंदु पर होगा। पिछली बार बृहस्पति 17 मार्च, 2011 को सूर्य के निकटतम बिंदु पर था। अन्य ग्रहों की तरह सूर्य के चारों ओर बृहस्पति की कक्षा भी अण्डाकार है लेकिन यह गोलाकार के बहुत करीब है। इसलिए जब बृहस्पति ग्रह उपसौर या अपसौर अवस्था में होता है तो दूरी में लगभग 10.2 प्रतिशत का अंतर होता है। बृहस्पति 20 जनवरी को हालांकि, सूर्य के सबसे निकट होगा लेकिन वह पृथ्वी के निकटतम बिंदु पर नहीं होगा क्योंकि बृहस्पति पृथ्वी के सबसे निकट 27 सितंबर, 2022 को आया था।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>सूर्य के चारों ओर चक्कर</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">बृहस्पति प्रत्येक 13 महीने में एक बार पृथ्वी के सबसे करीब पहुंचना है जो कि खगोलीय घटना के कारण होता है जिसे ‘बृहस्पति विपक्ष’ कहते हैं। पीएसआई निदेशक ने कहा कि जनवरी में होने वाले इस दो उपसौर की खगोलीय घटनाओं में आम लोग किसी भी महत्वपूर्ण घटना को नोटिस या निरीक्षण नहीं कर पाएंगे क्योंकि इसके लिए उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक जागरूकता की आवश्यकता होती है। लोग महत्वपूर्ण रूप से यह समझ सकते हैं कि पृथ्वी पर तापमान या मौसम सूर्य से उसकी दूरी पर निर्भर नहीं करता है बल्कि सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने के दौरान उसके अक्षीय झुकाव पर निर्भर करता है।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Jan 2023 16:12:57 +0530</pubDate>
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