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                <title>फसलों के भाव में नाम मात्र वृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[सरकार तकनीकी तरीके व चतुराई से रेट तय करती है केंद्र सरकार ने रबी की फसलों के भाव में वृद्धि का ऐलान करते हुए गेहूँ का भाव 1840 रुपए तय किया है, जो पिछले साल के भाव मुताबिक 105 रुपए अधिक है। इसके अलावा सरसों के भाव में 200, चने में 220 व सूरजमुखी में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/nominal-increase-in-prices-of-crops/article-6137"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/kishan-2.jpg" alt=""></a><br /><h2>सरकार तकनीकी तरीके व चतुराई से रेट तय करती है</h2>
<p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार ने रबी की फसलों के भाव में वृद्धि का ऐलान करते हुए गेहूँ का भाव 1840 रुपए तय किया है, जो पिछले साल के भाव मुताबिक 105 रुपए अधिक है। इसके अलावा सरसों के भाव में 200, चने में 220 व सूरजमुखी में 845 रुपए का विस्तार किया है। सरकार तकनीकी तरीके व चतुराई से रेट तय करती है। जिस फसल (गेहूँ) का उत्पादन ज्यादा है उसका रेट सबसे कम बढ़ाया गया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पिछले साल मध्य प्रदेश व कर्नाटक में चुनावों के कारण जमकर सरकारी खरीद हुई थी</h2>
<p style="text-align:justify;">सूरजमुखी की काश्त कम होती है, जिसके रेट 1000 तक बढ़ा दिए। सूरजमुखी के रेट के पीछे सरकार की दलील तेलीय फसलों को बढ़ावा देना है, लेकिन पहले भी किसानों ने सरकारी व्यवस्था की खामियों व मंडीकरण न होने के कारण सूरजमुखी की बिजाई से तौबा कर ली थी। जहां तक चने के भाव का संबंध है, पिछले साल चने के भाव 4400 रुपए थे लेकिन मध्य प्रदेश व कर्नाटक को छोड़कर किसी भी राज्य में चने का पूरा भाव किसानों को नहीं मिला। मध्य प्रदेश व कर्नाटक में चुनावों के कारण जमकर सरकारी खरीद हुई थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">राजस्थान में चने व सरसों 3500 रुपए से अधिक नहीं बिक सके</h2>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान में चने व सरसों 3500 रुपए से अधिक नहीं बिक सके। अब जहां तक गेहूँ, सरसों व चने के भाव का संबंध है, डीजल-पेट्रोल की बढ़ रही कीमतों के मुताबिक यह भाव बिल्कुल गैर-वाजिब है। 80 रुपए लीटर डीजल फूंककर किसान की आमदन कैसे दोगुनी होगी? दरअसल सरकार कृषि को उत्साहित करने की बजाय इससे पिंड छुड़ाने का रास्ता अपना रही है। कम-से-कम समर्थन मूल्य वाली फसलों की सरकारी खरीद घटने व तय मूल्य पर फसलों का न बिकना किसानों के लिए खतरे की घंटी है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अमेरिका व आर्थिक रूप से मजबूत देशों के दबाव में फसलों की सरकारी खरीद से कन्नी कतरा रही है</h2>
<p style="text-align:justify;">दरअसल सरकार विश्व व्यापार संस्था का सदस्य होने के कारण अमेरिका व आर्थिक रूप से मजबूत देशों के दबाव में फसलों की सरकारी खरीद से कन्नी कतरा रही है। यह तो देश की चुनावी राजनीति का वरदान है कि जिन्सों की सरकारी खरीद सत्ता प्राप्ति में अपना प्रभाव रखती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत को टैक्सों का राजा कहकर अमेरिकी वस्तुओं की बिक्री के रास्ते में आ रही रुकावटों के लिए भारत को कोस रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस जटिल कहानी से करोड़ों किसान अनजान है व सरकारी खरीद के लिए केंद्र व राज्य सरकारों पर ही दबाव बनाते हैं। स्पष्ट तौर पर केंद्र सरकार किसानों के हित में काम करने के दावे करती है लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण किसान मंडियों में परेशान हो रहे हंै। सरकारी खरीद न होने के कारण किसानों को अपनी फसल कम भाव पर व्यापारियों को बेचनी पड़ती है। केंद्र सरकार फसलों के भाव तय करने के साथ-साथ उसी भाव पर खरीद सुनिश्चित भी करे व अंतरराष्ट्रीय समस्या से निपटने के लिए ठोस रणनीति बनाए।</p>
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                <pubDate>Fri, 05 Oct 2018 09:27:43 +0530</pubDate>
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