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                <title>स्त्री सम्मान को लेकर शिक्षक की अनूठी पहल</title>
                                    <description><![CDATA[सामान्य भारतीय जीवन में स्त्री को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है। यहां तक कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी का सम्मान और पूजन होता हैं, वहां देवता भी निवास करते हैं। हमारे भारतीय समाज में तो कन्याओं को साक्षात्तदेवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती रही है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/teachers-unique-initiative-to-honor-women/article-6198"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/child.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सामान्य भारतीय जीवन में स्त्री को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है। यहां तक कहा गया कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता:’ अर्थात जहां नारी का सम्मान और पूजन होता हैं, वहां देवता भी निवास करते हैं। हमारे भारतीय समाज में तो कन्याओं को साक्षात्तदेवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती रही है। कोई भी समाज अथवा कोई भी काल कभी भी सौ प्रतिशत आदर्श नहीं हो सकता हंै, किंतु वैसा बनने का प्रयत्न करने में कोई बुराई नहीं है। अनादि काल से हमारी सांस्कृतिक परंपरा में ऐसी तमाम बातें रही है, जिन्होंने मानव मन की विकृतियों को मनोवैज्ञानिक ढंग से ठीक करने का कार्य किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकांश भारतीय पर्व एवं त्योहार मानव के मन एवं प्रकृति से जुड़े हैं। मानव जीवन में जिन सोलह संस्कारों की कल्पना रखी गई, उनका भी अपना वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक आधार है। रक्षा बंधन, भाई दूज, कन्या पूजन, संयुक्त परिवार व्यवस्था, विवाह संस्कार, करवा चौथ, कजरी तीज यह सब परंपराएं मानव के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देने वाली परंपराएं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संस्कृति में कन्या पूजन हमारी सनातन परम्परा का एक अंग है। हजार-बारह सौ वर्षों की गुलामी के कालखंड के दौरान भारतीय जनमानस संघर्षरत रहा। इसका प्रभाव हमारी विभिन्न सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं पर भी पड़ा। काल के प्रवाह में कन्या पूजन की परंपरा कुछ शिथिल हुई, विज्ञापनों और टीवी चैनलों ने स्त्री का विकृत स्वरूप दर्शाना शुरू किया, पश्चिमी देशों की आधुनिकता सिर चढ़ी तो परिणाम सब देख ही रहे हैं, भुगत भी रहे हैं। कहते हैं जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यक्ति का देखने और सोचने का नजरिया यदि ठीक होगा तो वह कोई भी गलत कार्य करने से पहले सौ बार सोचेगा। नारी के प्रति, लड़कियों के प्रति दृष्टि में सकारात्मक बदलाव लाया जाए तो इस प्रकार की घटनाओं पर एक सीमा तक नियंत्रण किया जा सकता है और उसका उपाय है विद्यालय और गली मोहल्लों में कन्या पूजन जैसे सार्वजनिक आयोजन।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आयोजन नारी सम्मान की दिशा में एक बड़ी लाइन खींचने का प्रयास हैं। मनुष्य और पशु में बड़ा अंतर भावनाओं और समझ का ही है। आदिकाल से हम गाय को मां मानते हैं तो वैसी ही पवित्र सोच गाय के प्रति जन सामान्य की बन गयी। ऐसे ही लगातार कन्या पूजन कार्यक्रमों के आयोजनों से ही स्त्री के प्रति, सहपाठी छात्राओं के प्रति भी अच्छी दृष्टि बनने लगेगी। तब ही ‘मातृवत परदारेषु पर द्ब्येर्षु लोश्ठ्वत’ चरितार्थ होगा, ये सब घटनाएं रुकेगी। ”मातृवत परदारेषु” यदि सिद्धांत है तो कन्या पूजन उसका प्रायोगिक स्वरूप है। कन्या पूजन के इस एक कार्यक्रम से कई संदेश मिलेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी ही सोच है राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक संदीप जोशी की, जो पिछले कई वर्षों से स्कूल में ”कन्या पूजन कार्यक्रम” का आयोजन कर समाज में बालिका सम्मान व शिक्षा का संदेश देने का काम कर रहे हैं। शिक्षक संदीप जोशी बताते है कि उन्होंने अपने स्कूल में कुछ वर्ष पूर्व कन्या पूजन कार्यक्रम का आयोजन प्रारम्भ किया था, जो कि आज सभी के सहयोग से प्रदेश के 18 जिलों में 500 से अधिक विद्यालयों में बिना किसी सरकारी आदेश व सरकारी बजट के इस कार्यक्रम का सफल आयोजन किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनका मानना है कि स्त्री के पूज्या भाव का जागरण होने से समाज की दृष्टि बदलेगी और इस प्रकार की घटनाओं पर रोक लगेगी। कन्या पूजन का कार्यक्रम केवल छात्रों को ही संस्कारित नहीं करता है, वरन उन छोटी बच्चियों के मन में भी आत्मविश्वास का संचार करता है। उनका मानना है कि समाज में व्यापक परिवर्तन का केंद्र विद्यालय ही बनेंगे। शिक्षण केवल वृत्ति नहीं है, एक दायित्व है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह एक माध्यम है समाज और देश के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का। इसलिए निरंतर कुछ न कुछ अच्छा करने का प्रयास जारी रहना ही चाहिए। सामान्य अनुभव की बात यह भी है कि हम किसी भी कार्य अथवा विषय में जितना गहरा उतरते हैं, उससे संबंधित नए विचार, नए प्रयोग अपने आप हमारे सामने आते रहते हैं। इसमें आध्यात्मिकता के भाव भी देख सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने काम में तल्लीन होना, अपने कार्य के साथ एकाकार होना, उसी में डूब जाना, प्रतिपल उसी का चिन्तन, उसी दिशा में बढ़ना, यहां तक कि उस काम का पर्याय बनना, यह भी ईश्वर की अनुभूति करने जैसा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 09 Oct 2018 13:50:46 +0530</pubDate>
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