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                <title>nation - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>सबका साथ-सबका विकास’ से देश कर रहा है प्रगति : मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[दरभंगा l प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘सब का साथ सब का विकास’ मंत्र को देश के विकास का आधार बताया और कहा कि करीब 130 करोड़ आबादी वाले राष्ट्र में अब इसी मंत्र पर काम हो रहा है। मोदी ने दरभंगा के राज मैदान में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) उम्मीदवारों के पक्ष में बुधवार को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/nation-is-progressing-through-sabka-saath-sabka-vikas-modi/article-19552"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/nation-is-progressing-through-sabka-saath-sabka-vikas-modi.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;"><strong>दरभंगा</strong> l प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘सब का साथ सब का विकास’ मंत्र को देश के विकास का आधार बताया और कहा कि करीब 130 करोड़ आबादी वाले राष्ट्र में अब इसी मंत्र पर काम हो रहा है। मोदी ने दरभंगा के राज मैदान में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) उम्मीदवारों के पक्ष में बुधवार को आयोजित चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि ‘सबका साथ सब का विकास’ देश के विकास का आधार है। केंद्र की पहल के कारण 40 करोड़ से ज्यादा गरीबों के बैंक खाते खुले हैं वहीं 90 लाख से अधिक महिलाओं को उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस का कनेक्शन दिया गया है। उन्होंने कहा कि 130 करोड़ आबादी वाले इस देश मे सबका साथ सबका विकास के मंत्र पर काम हो रहा है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने कहा, “हमने कहा था कि हर किसान के बैंक खाते में सीधी मदद भेजेंगे। आज करीब-करीब एक लाख करोड़ रुपये की सीधी मदद किसान के खाते में जमा कराई जा चुकी है। हमने कहा था कि हर गरीब का बैंक खाता खोलेंगे। आज 40 करोड़ से ज्यादा गरीबों का बैंक खाता खुल चुका है। हर गरीब बहन-बेटी की रसोई में मुफ्त गैस कनेक्शन पहुंचाएंगे। उज्ज्वला योजना ने बिहार की भी करीब 90 लाख महिलाओं को लकड़ी के धुएं से मुक्त किया है। हर गरीब को पांच लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा देंगे। आज बिहार के भी हर गरीब को ये सुविधा मिल रहा है।”</h6>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Oct 2020 14:40:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राष्ट्र निर्माण में युवा शक्ति की अहम भूमिका : मुख्यमंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[12 जनवरी को रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत प्रदेश में होगी मैराथन | Youth power रोहतक (सच कहूँ न्यूज)। मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में 12 जनवरी को पूरे हरियाणा में रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत मैराथन का आयोजन किया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/youth-power-plays-an-important-role-in-nation-building-chief-minister/article-12055"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/youth-power.jpg" alt=""></a><br /><h2>12 जनवरी को रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत प्रदेश में होगी मैराथन | Youth power</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>रोहतक (सच कहूँ न्यूज)।</strong> मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में 12 जनवरी को पूरे हरियाणा में रन फॉर यूथ एंड यूथ फॉर नेशन के तहत मैराथन का आयोजन किया जाएगा। एक साथ युवा शक्ति (Youth power) नए संकल्प व सकारात्मक ऊर्जा के साथ मैराथन में भागीदार बनेगी। साथ ही राष्ट्र हित की दिशा में बेहतर करने का संकल्प लेगी। मुख्यमंत्री शनिवार को बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय सभागार में आयोजित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 51वें प्रांत अधिवेशन में बोल रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्र निर्माण में युवा शक्ति की अहम भूमिका है।</p>
<h3>शिक्षा व संस्कारों के आधार पर ही श्रेष्ठ नागरिक बनते हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद युवाओं में संस्कारों का समावेश करते हुए अपना दायित्व बखूबी निभा रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षा व संस्कारों के आधार पर ही श्रेष्ठ नागरिक बनते हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थाएं जहां युवा वर्ग को शैक्षणिक माहौल प्रदान कर रहे हैं। वहीं एबीवीपी जैसे सामाजिक संगठन संस्कार देने में अग्रणी हैं। मुख्यमंत्री ने हरियाणा सरकार की ओर से जल्द ही वोलेंटिरिजम कार्यक्रम शुरू करने की बात भी कही।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ये भी बोले सीएम</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li><strong>युवा वर्ग के साथ हर वर्ग सामाजिक जिम्मेवारी स्वयंसेवक के रूप में निभाए </strong></li>
<li><strong>बिना लोभ, लालच के कोई भी व्यक्ति राष्ट्र हित की योजनाओं में सुझाव दे। </strong></li>
<li><strong> बेटियों के हितों को सुरक्षित व उन्हें सुरक्षित माहौल प्रदान करने के लिए उठाए जा रहे कदम </strong></li>
<li><strong>सभी छात्र संगठन यदि अनुशासनात्मक स्वरूप के साथ आगे बढ़ें</strong></li>
<li><strong> एबीवीपी जैसे सामाजिक संगठन संस्कार देने में अग्रणी</strong></li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">जोश के साथ होश भी रखें युवा : बालक नाथ</h3>
<p style="text-align:justify;">बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं अलवर से सांसद महंत बाबा बालक नाथ ने भी युवाओं को पूरे जोश के साथ होश रखते हुए सामाजिक रूप से अपना योगदान देने के लिए प्रेरित किया। एबीवीपी की राष्ट्र महामंत्री निधि त्रिपाठी ने हरियाणा सरकार की ओर से महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना की। इस अवसर पर सांसद डॉ. अरविंद शर्मा, मेयर मनमोहन गोयल, सांसद संजय भाटिया, संगठन मंत्री सुरेश भट्ट, भूपेंद्र मलिक, राजेंद्र धीमान, सुमित जागलान, डा.लखविंद लोहानी, सीताराम व्यास, एलपीएस बोसार्ड के चेयरमैन राजेश जैन, विजय, डॉ. लाकेश शेखावत, राजेश गहलावत, डा.रीटा शर्मा प्रमुख रूप से मौजूद रहे।</p>
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                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Dec 2019 07:00:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डॉ. लोहिया और राष्ट्र की मौजूदा समस्याएं</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्र व्यवस्था में बेहतर बदलाव के लिए डॉ. लोहिया ने सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही थी। उनका स्पष्ट कहना था कि गैर-बराबरी को खत्म किए बिना समतामूलक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद की स्थापना पर बल दिया। उन्होंने पूंजीवाद की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/current-problems-of-dr-lohia-and-nation/article-6230"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/dr-lohia.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राष्ट्र व्यवस्था में बेहतर बदलाव के लिए डॉ. लोहिया ने सामाजिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन की बात कही थी। उनका स्पष्ट कहना था कि गैर-बराबरी को खत्म किए बिना समतामूलक समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसके लिए उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद की स्थापना पर बल दिया। उन्होंने पूंजीवाद की आलोचना करते हुए कहा था कि पूंजीवाद कम्युनिज्म की तरह ही जुआ, अपव्यय और बुराई है और दो तिहाई विश्व में पूंजीवाद पूंजी का निर्माण नहीं कर सकता। वह केवल खरीद-फरोख्त ही कर सकता है जो हमारी स्थितियों में महज मुनाफाखोरी और कालाबाजारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. लोहिया ने यह भी कहा था कि मैं फोर्ड और स्टालिन में कोई फर्क नहीं देखता। दोनों बड़े पैमाने के उत्पादन, बड़े पैमाने के प्रौद्योगिकी और केंद्रीकरण पर विश्वास करते हैं जिसका मतलब है दोनों एक ही सभ्यता के पुजारी हैं। लोहिया ने गरीबी और युद्ध को पूंजीवाद की दो संतानें कहा। साम्यवाद पर कटाक्ष करते हुए कहा कि साम्यवाद दो-तिहाई दुनिया को रोटी नहीं दे सकता। उन्होंने आदर्श समाज व राष्ट्र के लिए एक तीसरा रास्ता सुझाया-वह है समाजवाद का। उन्होंने देश के सामने समाजवाद का सगुण और ठोस रुप प्रस्तुत किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि समाजवाद गरीबी के समान बंटवारें का नाम नहीं बल्कि समृद्धि के अधिकाधिक वितरण का नाम है। बिना समता के समृद्धि असंभव है और बिना समृद्धि के समता व्यर्थ है। डॉ. लोहिया का स्पष्ट मानना था कि आर्थिक बराबरी होने पर जाति व्यवस्था अपने आप खत्म हो जाएगी और सामाजिक बराबरी स्थापित होगी। उन्होंने सुझाव दिया कि जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए सामाजिक समता पर आधारित दुष्टिकोण अपनाना होगा। सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए जाति व्यवस्था के विरुद्ध लड़ाई द्वेष के वातावरण में नहीं, विश्वास के वातावरण में होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जाति व्यवस्था पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि जाति प्रणाली परिवर्तन के खिलाफ स्थिरता की जबर्दस्त शक्ति है। यह शक्ति वर्ततान क्षुद्रता और झुठ को स्थिरता प्रदान करती है। लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आज इक्कीसवीं सदी में भारत की राजनीति जाति व्यवस्था पर केन्द्रित है। डॉ. लोहिया अक्सर चिंतित रहा करते थे कि आजादी के उपरांत भारतीय समाज का स्वरुप क्या होगा। उन्हें आशंका थी कि सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में समाज के वंचित, दलित और पिछड़े तबके को समुचित भागीदारी मिलेगी या नहीं। उनकी उत्कट आकांक्षा हाशिए पर खड़े लोगों को राष्ट्र की मुख्य धारा में सम्मिलित करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">वे समाज के अंतिम पांत के अंतिम व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों के हिमायती थे। आजादी के बाद पंडित नेहरु के नेतृत्व में गठित सरकार के खिलाफ वे आम जनता की आवाज बनते देखे गए। उन्होंने नेहरु सरकार की समाजनीति की जमकर आलोचना की। नेहरु सरकार को जाति-परस्ती और कुनबा-परस्ती का पोषक बताया। लोहिया ने नाइंसाफी और गैर-बराबरी खत्म करने के लिए देश के समक्ष सप्तक्रांति का दर्शन प्रस्तुत किया। नर-नारी समानता, रंगभेद पर आधारित विषमता की समाप्ति, जन्म तथा जाति पर आधारित समानता का अंत, विदेशी जुल्म का खात्मा तथा विश्व सरकार का निर्माण, निजी संपत्ति से जुड़ी आर्थिक असमानता का नाश तथा संभव बराबरी की प्राप्ति, हथियारों के इस्तेमाल पर रोक और सिविल नाफरमानी के सिद्धांत की प्रतिष्ठापना तथा निजी स्वतंत्रताओं पर होने वाले अतिक्रमण का मुकाबला।</p>
<p style="text-align:justify;">इस सप्तक्रांति में लोहिया के वैचारिक और दार्शनिक तत्वों का पुट है। साथ ही भारत को वर्तमान संकट से उबरने का मूलमंत्र भी। लोहिया स्त्री-पुरुष की बराबरी और समानता के प्रबल हिमायती थे। वे अक्सर स्त्रियों को पुरुष पराधीनता के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत देते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देकर ही एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज का निर्माण किया जा सकता है। स्त्री-पुरुष, अमीरी-गरीबी और सामाजिक भेदभाव के लिए वे सिर्फ सरकारों को ही जिम्मेदार ठहराते थे। वे सरकारों द्वारा आम आदमी की उपेक्षा पर अक्सर कहा करते थे कि सत्ता सदैव जड़ता की ओर बढ़ती है और निरंतर निहित स्वार्थों और भ्रष्टाचारों को पनपाती है। विदेशी सत्ता भी यही करती है। अंतर केवल इतना है कि वह विदेशी होती है,</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए उसके शोषण के तरीके अलग होते हैं। किंतु जहां तक चरित्र का सवाल है, चाहे विदेशी शासन हो या देशी शासन, दोनों की प्रवृत्ति भ्रष्टाचार को विकसित करने में व्यक्त होती है। उन्होंने जनता का आह्नान करते हुए कहा था कि देशी शासन को निरंतर जागरुक और चौकस बनाना है तो प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपने राजनीतिक अधिकारों को समझे और जहां कहीं भी उस पर चोट होती हो, या हमले होते हों उसके विरुद्ध अपनी आवाज उठाए। गौर करें तो डॉ. लोहिया की कही बातें वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था पर सटीक बैठती हंै। आज देश में गैर-बराबरी, भ्रष्टाचार, भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण, जातिवाद, क्षेत्रवाद और आतंकवाद जैसी समस्याएं गहरायी हैं। यह सही है कि देश तरक्की का आसमान छू रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन नैतिक और राष्ट्रीय मूल्यों में व्यापक गिरावट के कारण अमीरी-गरीबी की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। जनवादी होने का मुखौटा चढ़ा रखी सरकारें बुनियादी कसौटी पर विफल हैं। और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने में नाकाम हैं। नागरिक समाज के प्रति रवैया संवेदनहीन है। लोहिया ने बेहतरीन समाज निर्माण के लिए सत्तातंत्र को चरित्रवान होना जरुरी बताया था। उनका निष्कर्ष था कि सत्यनिष्ठा और न्यायप्रियता पर आधारित शासनतंत्र ही लोक व्यवस्था के लिए श्रेयस्कर साबित हो सकता है। लोहिया भारतीय भाषाओं को समृद्ध होते देखना चाहते थे। उन्हें विश्वास था कि भारतीय भाषाओं के समृद्ध होने से देश में एकता मजबूत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोहिया का दृष्टिकोण विश्वव्यापी था। उन्होंने भारत पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधारने के लिए महासंघ बनाने का सुझाव दिया। आज भी यदा-कदा उस पर बहस चलती रहती है। उन्होंने भारत की सुरक्षा को लेकर हिमालय नीति बनाई जिसका उद्देश्य था नेपाल, भूटान, सिक्किम (तब) आदि उत्तर-पूर्व के छोटे-छोटे देशों में बसने वाली आबादी के साथ भाईचारे के संबंध बनाना तथा भारत की उत्तर सीमा पर स्थित प्रदेशों में लोकतांत्रिक आंदोलनों को मजबूत कर भारतीय सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने चीन द्वारा तिब्बत पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में लेने की घटना को शिशु हत्या करार दिया। नागरिक अधिकारों को लेकर लोहिया का दृष्टिकोण साफ था। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र में सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा को अनुचित मानने का मतलब होगा भक्त प्रहलाद, चार्वाक, सुकरात, थोरो और गांधी जैसे महान सत्याग्रहियों की परंपरा को नकारना। सिविल नाफरमानी को न मानना सशस्त्र विद्रोह को आमंत्रित करना। लेकिन बिडंबना यह है कि भारत की मौजूदा सरकारें लोहिया के उच्च आदर्शो को अपनाने के बजाए तानाशाही पर आमादा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के बाद से ही नागरिक अधिकारों का पुलिसिया दमन जारी है। सत्ता की रक्षा के लिए देश, समाज और संविधान से घात कर रही हैं। लोहिया ने राजनीति में तिकड़म और तात्कालिक स्वार्थ को हेय बताया। जबकि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में यह नीतियां सत्ता प्राप्ति की आधार बन रही हैं। सत्तातंत्र द्वारा जनता की गाढ़ी कमाई की बर्बादी पर लोहिया ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि जिस गति से हम लोग अपने प्रधानमंत्रियों के लिए समाधि-स्थल बना रहे हैं, यह शहर जल्दी ही, जिंदा लोगों के बजाए मुर्दों का शहर हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">भविष्य की पीढ़ियों को इन मूर्तियों, संग्रहालयों और चबूतरों में से बहुतेरों को हटाना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई आदमी मरे तो तीन सौ बरस तक उसका सिक्का या स्मारक मत बनाओं और तब फैसला हो जाएगा कि वह आदमी वक्ती था या इतिहास का था। लेकिन दुर्भाग्य है कि देश के रहनुमा यह समझने को तैयार नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वे अपने-अपने राजनीतिक पुरोधाओं की मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण पर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च कर रहे हैं। सार्वजनिक हित की योजनाओं का नामकरण भी राजनेता विशेष के नाम पर किया जा रहा है। यह लोकतंत्र की प्रवृत्ति के अनुरुप नहीं है। इससे समाज व राष्ट्र की एकता-अखण्डता और पंथनिरपेक्षता प्रभावित होगी। समस्याओं के निराकरण के बजाए अराजकता बढ़ेगी। भारत के वर्तमान संकट का हल लोहिया के सिद्धांतो में तलाशा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अरविंद जयतिलक</strong></p>
<p> </p>
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                <pubDate>Fri, 12 Oct 2018 15:27:01 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>देश निर्माण में एनसीसी का योगदान</title>
                                    <description><![CDATA[भारत दुनिया का सबसे सुनहरी और गौरवशाली इतिहास वाला देश है। भारत की सुरक्षा जहां एक और विशाल हिमालय और गहरे सागर करते हैं वहीं दूसरी और हमारी सेना दुश्मन के लिए बुलन्द हौंसलों के साथ एक मजबूत दीवार बन कर खड़ी है। भारतीय सेना के गौरवमई इतिहास को आगे भी जारी रखता है दुनिया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/nccs-contribution-in-nation-building/article-4127"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/nnc.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत दुनिया का सबसे सुनहरी और गौरवशाली इतिहास वाला देश है। भारत की सुरक्षा जहां एक और विशाल हिमालय और गहरे सागर करते हैं वहीं दूसरी और हमारी सेना दुश्मन के लिए बुलन्द हौंसलों के साथ एक मजबूत दीवार बन कर खड़ी है। भारतीय सेना के गौरवमई इतिहास को आगे भी जारी रखता है दुनिया का सबसे बड़ा अनुशासित युवा संगठन एनसीसी भारतीय नौजवानों को बचपन से ही अनुशासन और देशभक्ति से लबरेज करने के उद्देश्य हेतु एन सी सी के लिए पार्लियामेंट एक्ट एक्सएक्सएक्सआई 16 अप्रैल 1948 को पास किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूलों और कॉलेजों में एन सी सी भर्ती की औपचारिक शुरूआत 15 जुलाई 1948 को की गई। एन सी सी में गर्ल डिवीजन जुलाई 1949, एयर विंग 1 अप्रैल 1950 और नेवल विंग का आरम्भ जुलाई 1952 में हुआ। इन सभी में जूनियर विंग में भर्ती स्कूलों में और सीनियर डिवीजन की भर्ती कॉलेजों में की जाती है। पूरे भारत में आज 13.5 लाख से भी ज्यादा एन सी सी केडेट्स हैं। एन सी सी कैडेट्स पूरे भारतवर्ष के 670 जिलों के 3600 प्राइवेट स्कूलों, 12102 सरकारी स्कूलों और 5377 कालिजों में से आतें हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एन सी सी संगठन डिफेंस सेक्रेटरी के तहत मिनिस्ट्री आॅफ डिफेंस के अधीन आता है। संगठन का विस्तार देशभर में 17 डायरेक्टरेट द्वारा किया गया है। हर डायरेक्टरेट 14 ग्रुप में, हर ग्रुप 5-7 यूनिट/बटालियन में और बटालियन आगे कंपनी और ट्रूप में विस्तृत है। हैड क्वार्टर लेवल पर इसे लेफ्टीनेंट जनरल, डायरेक्टरेट लेवल पर मेजर जनरल/ब्रिगेडियर, ग्रुप लेवल पर ब्रिगेडियर/कर्नल और यूनिट लेवल पर कर्नल/लेफ्टीनेंट कर्नल अपने दिशा निर्देश से संचालित करते हैं। कॉलेज लेवल पर कंपनी को लेफ्टीनेंट, कैप्टेन और मेजर रैंक के ए एन ओ चलाते हैं जबकि स्कूल लेवल पर ट्रूप को थर्ड आॅफिसर, सेकंड आॅफिसर, फर्स्ट आॅफिसर व चीफ आॅफीसर रैंक के ए एन ओ सम्भालतें हैं। पूरे देश में एन सी सी के 95 ग्रुप हैड क्वार्टर हैं जिनमें 667 आर्मी विंग यूनिट, 61 नेवल और 61 एयर विंग यूनिट हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">1974 में इसे भारतीय युवा उम्मीदों के अनुसार ‘हम सब हिंदी हैं’ किया गया और आखिरकार 1980 में एन सी सी सॉन्ग हुआ ‘हम सब भारतीय हैं’ जो आज भी केडेट्स में गजब का जोश भरता है। 12 अक्टूबर 1980 को 12वीं सी ए सी मीटिंग में एन सी सी के मोटो को भी बड़े सोच विचार के बाद “एकता व अनुशाशन”चुना गया। हर साल नवंबर महीने के चौथे रविवार को एन सी सी दिवस मनाया जाता है। एन सी सी का लक्ष्य अथवा उद्देश्य है युवाओं में चरित्र निर्माण करना, अनुशासन, भविष्य की लीडरशिप तैयार करना, धर्मनिरपेक्षता के गुण भरना, युवाओं को संगठित, दक्ष और प्रेरित मानव स्रोत के रूप में ढालना और उनके लिए शस्त्रधारी सेना में भर्ती के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करना।</p>
<p style="text-align:justify;">एन सी सी में जूनियर डिवीजन में एनरोलमेंट के लिए स्कूल के विद्यार्थियों को जो 13 से 18.5 साल की उम्र के हों और सीनियर डिवीजन में कॉलेज के 26 साल तक के विद्यार्थी आवेदन दे सकते हैं। अच्छे नैतिक चरित्र और शारीरिक रूप से फिट विद्यार्थिओं को एन सी सी में भर्ती किया जाता है। जिन संस्थाओं में एन सी सी नहीं हैं उनके विद्यार्थी दूसरी एन सी सी संस्थाओं में ओपन कैटेगरी में भर्ती हो सकते हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Jun 2018 08:05:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राष्ट्र तब और अब</title>
                                    <description><![CDATA[इतिहास व राजनीति शास्त्र के छात्रों को पढ़ाया जाता है कि इतिहास अपने आपको दुहराता है और यह सही भी है, अन्यथा इतिहास व राजनीति शास्त्र के विद्वानों की खोज एक आरंभिक स्तर पर आकर समाप्त हो जाती और इस सच्चाई को पुष्ट करने के लिए आइए हम कुछ बिंदुओं पर भारत के परिप्रेक्ष्य में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/nation-then-and-now/article-3423"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/panic-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इतिहास व राजनीति शास्त्र के छात्रों को पढ़ाया जाता है कि इतिहास अपने आपको दुहराता है और यह सही भी है, अन्यथा इतिहास व राजनीति शास्त्र के विद्वानों की खोज एक आरंभिक स्तर पर आकर समाप्त हो जाती और इस सच्चाई को पुष्ट करने के लिए आइए हम कुछ बिंदुओं पर भारत के परिप्रेक्ष्य में चर्चा करते हैं। भारत पर विदेशी आक्रमण के संदर्भ में विचार करें तब भी आक्रमणकारी सुदूरवर्ती क्षेत्रों से आए थे और आज भी ये दूरवर्ती क्षेत्रों से आ रहे हैं। ईराक, सीरिया ऐसे देशों से ही तब भी आक्रमणकारी भारत आए थे तो आज भी भारत को खतरे में डालने वाले आक्रमणकारी आतंकवाद का चोला पहनकर इन्हीं क्षेत्रों से आकर हमारे लिए खतरे की घण्टी बन रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तब के आक्रमणकारियों की दृष्टि भी भारत की धन-संपत्ति पर टिकी थी और आज के आतंकी भी काला धंधा चला रहे हैं। तब के आक्रमणकारी भारत से काफी सोना-चांदी वगैरह लूटकर अपने साथ ले गए थे और जिन्होंने यहां की गद्दी पर सवार होने में कामयाबी पाई थी, उन्होंने सोने-चांदी की अशर्फियों से खिलवाड़ किया, हीरा-मोती, मणि-माणिक्यों से दरबार सजाया और अय्याशी की। तब के आक्रमणकारियों ने भारत में लाखों लोगों का सरेआम कत्ल कर दिया था। फांसी पर चढ़ा दिया था और आज के आतंकवादियों ने भी सिर कलम करने में महारत हासिल की। दोनों की रक्त पिपासा भयंकर रही है। तब और अब- दोनों कालों के आततातियों व आतंकियों का मूल उद्देश्य साम्राज्यवाद ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">तब के आक्रमणकारियों का मुख्य उद्देश्य क्रमश: इस्लामी व ईसाई साम्राज्य की स्थापना करना था। अपना आधिपत्य स्थापित करना था। भारत की मूल सभ्यता व संस्कृति को नेस्तनाबूद कर देना था और आज के अन्तर्राष्ट्रीय इस्लामी आतंकवादी चाहते हैं कि भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बना दिया जाए और शरिया कानून लागू कर दिया जाए और आज भी ईसाई मिशनरियां चाहती हैं कि भारत एक ईसाई राष्ट्र में तब्दील हो जाए। इस्लामी आतंकवादी हथियार का सहारा लेते हैं तो ईसाई मिशनरियां छद्म प्रेम-भाव का सहारा लेती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तब भी भारत की आजादी के लिए निरन्तर लड़ने वाले और अपने प्राणों की आहुति देकर भी देश के लिए मर-मिटने का संकल्प लेने वाले क्रान्तिकारी व देशभक्त थे तो आज की तारीख में भी भारत में देश प्रेमियों व देश के लिए मर-मिटने वाले कम नहीं हैं। देशभक्तों की फेहरिस्त काफी लंबी है और इसी वजह से आतंकवादियों को नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। जब सिकंदर का भारत-आक्रमण हुआ था, तब कमजोर क्षेत्रीय शासकों ने उस विदेशी का स्वागत किया था। देशप्रेमी महाराणा प्रताप को अकेले छोड़कर अकबर का लोहा मानने वाले देशद्रोही के सिवाय कुछ और नहीं हो सकते और आज भी ऐसे देशद्रोही हैं। आतंकवादी संगठनों से पैसा लेकर देश के अन्दर त्रासदी खड़ी करने जैसा कार्य करने वाले देशद्रोही आए दिन सामने आते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तब भी रसूखदार थे और आज भी रसूखदार हैं। तब के जमींदार गरीब, पीड़ित, असहाय व मजबूर महिलाओं का शारीरिक व मानसिक शोषण करते थे तो आज के रसूखदार माफिया के रूप में गरीब, पीड़ित, असहाय व मजबूर महिलाओं का शारीरिक व मानसिक शोषण करते हैं। तब भी भ्रष्टाचार था, आज भी भ्रष्टाचार है। तब भारतीयों के एक छोटे से हिस्से में भी भ्रष्टाचार व्याप्त था। पैसा लेकर, पुलिस व सेना में रहकर भ्रष्ट भारतीय अधिकारी व कर्मचारी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते में ही गड्ढे खोदते थे और आज भी भ्रष्ट लोग अपने ही देश की गरिमा व मर्यादा को ताक पर रखकर लाखों-करोड़ों की संपत्ति बनाते हैं। तब भी अमीर-गरीब थे, आज भी अमीर-गरीब हैं। हाईटैक सभ्यता में इस शैतानिक काम पर विराम नहीं लग पाया और इतिहास के इस दोहराव की स्थिति में अब भारतीय जनमानस में यह बात गहराई में बैठ गई है कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब देश की स्वतंत्रता व संप्रभुता को खोने नहीं दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-आर. सूर्य कुमारी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Oct 2017 04:01:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>एक और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय बाजारों में जिस प्रकार से चीनी वस्तुओं का आधिपत्य दिखाई दे रहा है, उससे यही लगता है कि देश में एक और भारत छोड़ो आंदोलन की महत्ती आवश्यकता है। यह बात सही है कि आज देश में अंगे्रज नहीं हैं, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के समय जिस देश भाव का प्रकटीकरण किया गया, आज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-for-another-quit-india-andolan/article-2995"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/raised-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय बाजारों में जिस प्रकार से चीनी वस्तुओं का आधिपत्य दिखाई दे रहा है, उससे यही लगता है कि देश में एक और भारत छोड़ो आंदोलन की महत्ती आवश्यकता है। यह बात सही है कि आज देश में अंगे्रज नहीं हैं, लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के समय जिस देश भाव का प्रकटीकरण किया गया, आज भी वैसे ही देश भाव के प्रकटीकरण की आवश्यकता दिखाई देने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">हम सभी चीनी वस्तुओं का त्याग करके चीन को सबक सिखा सकते हैं। यह समय की मांग भी है और देश को सुरक्षित करने का तरीका भी है। हम देश की सीमा पर जाकर राष्ट्र की सुरक्षा नहीं कर सकते तो चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करके सैनिकों का उत्साह वर्धन तो कर ही सकते हैं। तो क्यों न हम आज ही इस बात का संकल्प लें कि हम जितना भी और जैसे भी हो सकेगा, देश की रक्षा के लिए कुछ न कुछ अवश्य ही करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए जिन महापुरुषों ने जैसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की थी, वर्तमान में वह कल्पना धूमिल होती दिखाई दे रही है। महात्मा गांधी ने सीधे तौर पर स्वदेशी वस्तुओं के प्रति देश भाव के प्रकटीकरण करने की बात कही थी, पर क्या यह भाव हमारे विचारों में दिखाई देता है। कदाचित नहीं। वर्तमान में राजनीतिक दल भी महात्मा गांधी के नाम के सहारे जिन्दा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उन राजनीतिक दलों के अंदर देश भाव का अंश दिखाई नहीं देता। देश में जितने भी महापुरुष हुए हैं, सभी ने देश भाव को जन जन में प्रवाहित किया। इसी के कारण ही अंग्रेज और अंगे्रजी मानसिकता के लोगों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। सभी महापुरुषों का एक ही ध्येय था कि कैसे भी हो देश में स्वदेशी भावना का विस्तार होना चाहिए,</p>
<p style="text-align:justify;">फिर चाहे हमारे दैनिक जीवन में उपयोग आने वाली वस्तुओं का मामला हो या फिर शिक्षा पद्धति का। सभी में स्वदेशी का भाव प्रकट होना चाहिए। वास्तव में देश धर्म क्या होता है, इसे जानना है तो हमें किसी सैनिक से पूछना चाहिए। वह यही जवाब देगा कि देश धर्म का मूल्य प्राण देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। इसके लिए सुख सुविधाओं का त्याग करना पड़ेगा। सुविधाओं का त्याग करने वाला समाज ही अपनी और अपने समाज की रक्षा कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज जाने अनजाने में हमारे घरों में स्वदेशी की जगह विदेशी वस्तुओं ने ले ली है। चीनी वस्तुएं हमारे घरों की शोभा बन रही हैं। जरा सोचिए कि जो देश हमारे देश पर आक्रमण करने की भूमिका में दिखाई दे रहा है, उसी देश का सामान हम अपने घरों में लाकर उसको महत्व दे रहे हैं। हम अपने घर में चीनी सामान को देखकर खुश हो रहे हैं और चीन हमसे ही कमाए गए पैसे की दम पर हमारे देश को आंख दिखा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में देखा जाए तो वर्तमान में हम मतिभ्रम का शिकार हो गए हैं। विदेशी सामानों की अच्छाई के बारे में कोई झूठा भी प्रचार कर दे तो हम उस पर विश्वास कर लेते हैं, लेकिन हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं। यह बात सत्य है कि भारत एक ऐसा देश है जहां विश्व को भी शिक्षा दी जा सकती है, लेकिन इस सबके लिए हमें अपने अंदर विश्वास जगाना होगा, तभी हम देश का भला कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जनता अगर एक बार संकल्प करले तो वह दिन दूर नहीं, जब हम चीन को पछाड़ सकते हैं। आज चीन द्वारा निर्मित वस्तुओं का पूरी तरह से त्याग करने की आवश्यकता है। बहुत से लोग यह तर्क भी कर सकते हैं कि सरकार चीन की वस्तुओं पर रोक क्यों नहीं लगा देती? इसका एक ही उत्तर है, जब जनता विरोध करेगी तो सरकार को भी बात माननी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें पहले इस बात का अध्ययन करना होगा कि हमारा देश गुलामी की जंजीरों में कैसे जकड़ा। इसका सीधा सा जवाब यही होगा कि हमारे देश में अंग्रेजों द्वारा संचालित की जा जाने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी के उत्पादों को खरीदना प्रारंभ कर दिया। उससे स्वावलंबी भारत आर्थिक तौर से परावलंबी होता गया और देश की आर्थिक प्रगति पूरी तरह से अंगे्रजों पर निर्भर हो गई। इसके परिणाम स्वरुप हम आर्थिक रूप से परतंत्र हो चुके थे।</p>
<p style="text-align:justify;">अब जरा सोचिए कि जब एक विदेशी कंपनी ने भारत को गुलाम बना दिया था, तब आज तो देश में हजारों विदेशी कंपनियां व्यापार कर रही हैं। देश किस दिशा की ओर जा रहा है। हम जानते हैं कि अंग्रेजों की परतंत्रता की जकड़न से मुक्त होने के लिए हमारे देश के महापुरूषों ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया। इस आंदोलन के मूल में अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करना था, इसके साथ ही अंग्रेजियत को भी भारत से भगाने की संकल्पना भी इसमें समाहित थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस आंदोलन में जहां विदेशियों के प्रति देश के जनमानस में नकारात्मक भाव जाग्रत हुआ, वहीं स्वदेशी यानी देश भक्ति की भावना का प्रकटीकरण हुआ। इस आंदोलन के सफल होने के बाद आज यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि देश के नागरिकों में देश भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है, लेकिन आज उसे प्रकट करने की महत्ती आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे ही आंदोलनों के चलते देश भाव को प्रकट करने के लिए विदेशी वस्तुओं की होली जलाई जाती थी जिसके पीछे एक मात्र उद्देश्य यही था कि भारतीय जन स्वदेशी भाव को हमेशा जागृत रखें और अपने देश में निर्मित सामानों का ही उपयोेग करें। लेकिन आज के वातावरण का अध्ययन करने से पता चलता है कि आज हमारे देश में सैंकड़ों बहुराष्टÑीय कंपनियां व्यापार के माध्यम से हमारे देश को लूट रहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हम अनजाने में विदेशी वस्तुओं को खरीदकर अपने आपको आर्थिक गुलामी की ओर धकेल रहे हैं। इससे ऐसा लगता है कि भारत में एक और भारत छोड़ो आंदोलन की आवश्यकता है। जैसा कि हम जानते हैं कि वर्तमान में भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं। उसे भारतीय लोग खरीद भी रहे हैं, लेकिन क्या हम जानते हैं कि इन वस्तुओं से प्राप्त आय का बहुत बड़ा भाग चीन को आर्थिक संपन्नता प्रदान कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के पैसे से जहां चीन आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर रहा है, वहीं भारत कमजोर होता जा रहा है। यह सारा काम भारत की ऐसी जनता कर रही है, जो अपने आप को प्रबुद्ध कहती है। वर्तमान में हम सभी का एक ही उद्देश्य है, चीनी वस्तुएं भारत छोड़ो। इसके लिए जिस प्रकार से जनांदोलन खड़ा करके अंग्रेजों को देश से बाहर किया, उसी प्रकार से देशवासियों को चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करके देश से बाहर करना है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Aug 2017 00:36:59 +0530</pubDate>
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                <title>इससे लोकतंत्र का बागवां महकेगा</title>
                                    <description><![CDATA[देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, देश की तरक्की उसके शासक की नीति एवं नियत पर आधारित होती है। कोई भी बड़ा बदलाव प्रारंभ में तकलीफ देता ही है, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम सुखद एवं स्वस्थ समाज निर्माण के प्रेरक बनते है। विमुद्रीकरण के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब मोदी सरकार चुनाव सुधार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, देश की तरक्की उसके शासक की नीति एवं नियत पर आधारित होती है। कोई भी बड़ा बदलाव प्रारंभ में तकलीफ देता ही है, लेकिन उसके दूरगामी परिणाम सुखद एवं स्वस्थ समाज निर्माण के प्रेरक बनते है। विमुद्रीकरण के ऐतिहासिक फैसले के बाद अब मोदी सरकार चुनाव सुधार की दिशा में भी बड़ा निर्णय लेने की तैयारी में है। संभव है सारे राष्ट्र में एक ही समय चुनाव हो- वे चाहे लोकसभा हो या विधानसभा। इन चुनाव सुधारों में दागदार नेताओं पर तो चुनाव लड़ने की पाबंदी लग ही सकती है, वहीं शायद एक व्यक्ति एक साथ दो सीटों पर भी चुनाव नहीं लड़ पाएगा? ऐसी व्यवस्था समेत कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव केंद्रीय चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार को भेजकर सिफारिश की है। चुनाव आयोग के प्रस्तावों और विधि आयोग की सिफारिशों पर देश में चुनाव सुधार के लिए यदि सरकार ने ऐसे सख्त निर्णय लिये, तो नोटबंदी के बाद मोदी सरकार का लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव सुधार की दिशा में यह भी एक नीतिगत ऐतिहासिक फैसला बनकर सामने आएगा।<br />
एक महत्वपूर्ण बिन्दु प्रसिद्ध लोकोक्त्ति से मिलता है कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’। प्रजा राजा के आचरण को अपने में ढ़ालती है। आदर्श सदैव ऊपर से नीचे आते है। लोकतंत्र में जनमत ही सर्वोच्च है। मत का अधिकार गिना गया है, वह भी सबको बराबर। जब मत देने वाला एक बार ही अपने मताधिकार का उपयोग कर सकता है तो उम्मीदवार कैसे दो या दो से अधिक स्थानों पर चुनाव लड़ने की पात्रता पा सकता है? यह हमारे चुनाव प्रक्रिया की एक बड़ी विसंगति चली आ रही है। चुनाव आयोग ने इस बड़ी खामी को दूर करने के लिये एक बार फिर सरकार से राजनेताओं को एक साथ दो सीटों पर चुनाव लड़ने से रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव की सिफारिश की है। लोकतंत्र की मजबूती एवं चुनाव प्रक्रिया की विसंगति को दूर करने के लिये इस सिफारिश को लागू करना जरूरी है।<br />
चुनाव आयोग इससे पहले 2004 में भी इस तरह की सिफारिश कर चुका है। मगर उस पर कोई पहल नहीं हो पाई। न्यायमूर्ति ए. पी. शाह की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने भी एक उम्मीदवार के दो सीटों से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने संबंधी सिफारिश की थी। चुनाव आयोग ने 2004 में सुझाव दिया था कि अगर कोई उम्मीदवार विधानसभा के लिए दो सीटों से चुनाव लड़ता और जीतता है, तो खाली की गई सीट के लिए उससे पांच लाख रुपए वसूले जाएं। इसी तरह लोकसभा की खाली की जाने वाली सीट के लिए दस लाख रुपए जमा कराए जाएं। अब चुनाव आयोग ने कहा है कि 2004 में प्रस्तावित राशि में उचित बढ़ोतरी की जानी चाहिए।<br />
आयोग का मानना है कि इस कानून से लोगों के एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। चुनाव आयोग ने जब एक उम्मीदवार के दो या उससे अधिक स्थान पर चुनाव लड़ने पर ही रोक का सुझाव दिया है तो खाली हुई सीट के लिये राशि वसूले जाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है। अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिये दो या अधिक स्थानों पर चुनाव लड़ना- एक तरह की अनैतिकता ही है। अपने स्वार्थ की सोचना एवं येन-केन-प्रकारेण जीत को सुनिश्चित करने की यह तरकीब चुनाव प्रक्रिया की बड़ी खामी रही है, जिस पर रोक का सुझाव लोकतंत्र की मजबूती का सबब बनेगा और चुनाव सुधार की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।<br />
अब तक देखने में यही आता रहा है कि बड़े दल और बड़े राजनीतिक चेहरे ही एक साथ दो सीटों से चुनाव लड़ते रहे हैं। इसकी बड़ी वजह असुरक्षा की भावना होती है। वर्तमान लोकसभा के लिए हुए चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था। समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने भी दो सीटों से चुनाव लड़ा। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी को भी दो सीटों से चुनाव लड़ाया जाता रहा है। विधानसभा चुनाव में भी पार्टियों के प्रमुख चेहरे अक्सर दो सीटों से चुनाव लड़ना सुरक्षित समझते हैं। राजनीतिक दल या उसके उम्मीदवार के लिये इस तरह दो जगह से चुनाव लड़ना जायज हो सकता है लेकिन नीति एवं नियमों की दृष्टि से इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं माना जा सकता है। प्रश्न यह भी है कि अगर कोई उम्मीदवार दो में से किसी एक सीट पर चुनाव हार जाता है, तो उसे सरकार में किसी अहम पद की जिम्मेदारी सौंपना कहां तक उचित है?<br />
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस तरह की कमजोरियों एवं विसंगतियों पर नियंत्रण करना जरूरी है। क्योंकि चुनाव लोकतंत्र का प्राण है। लोकतंत्र में सबसे बड़ा अधिकार है- मताधिकार। और यह अधिकार सबको बराबर है। पर अब तक देख रहे हैं कि अधिकार का झण्डा सब उठा लेते हैं, दायित्व का कोई नहीं। अधिकार का सदुपयोग ही दायित्व का निर्वाह है। इसलिये मतदाताओं को भी जागरूक होना होगा।<br />
लोकतंत्र में चुनाव संकल्प और विकल्प दोनों देता है। चुनाव में मुद्दे कुछ भी हों, आरोप-प्रत्यारोप कुछ भी हों, पर किसी भी पक्ष या पार्टी को मतदाता को भ्रमित नहीं करना चाहिए। दो स्थानों पर चुनाव लड़ना मतदाता को भ्रमाने की ही कुचेष्टा है। ‘युद्ध और चुनाव में सब जायज है’। इस तर्क की ओट में चुनाव प्रक्रिया की खामियों पर लगातार पर्दा डालना हितकारी नहीं कहा जा सकता। अपने स्वार्थ हेतु, प्रतिष्ठा हेतु, राजनीति की ओट में नेतृत्व झूठा श्रेय लेता रहा और भीड़ आरती उतारती रही। लेकिन अब पवित्र मत का पवित्र उपयोग पवित्र उम्मीदवार के लिये हो। देश के भाल पर लोकतंत्र का तिलक शुद्ध कुंकुम और अक्षत का हो। सही एवं शुद्ध चुनाव ही चमन को सही बागवां देगा।<br />
<em>Lalit Garg</em></p>
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                <pubDate>Sat, 17 Dec 2016 05:18:26 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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