ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन व कीटनाशकों से बीमार हो रही धरा…

Greenhouse Gas Emissions

जिस प्रकार बिना चिकित्सक की सलाह से ली गई दवाइयाँ व्यक्ति के शरीर को स्वस्थ बनाने की बजाय बीमार बना देती हैं। इस प्रकार बिना कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के बिना कीटनाशकों का प्रयोग धरती की उर्वरा शक्ति कम कर देती है। ऐसे कीटनाशकों का प्रयोग आजकल किसान अपनी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए धड़ल्ले से कर रहे हैं। हालांकि बार-बार कृषि मंत्रालय व कृषि वैज्ञानिकों की तरफ से कीटनाशकों के लिए व उन्नत बीजों के लिए एडवाइजरी जारी की जाती है। लेकिन इस तरफ देश का किसान ध्यान नहीं दे रहा है। Greenhouse Gas Emissions

भविष्य में इसके परिणाम बड़े ही घातक दिखाई देंगे। यदि ऐसा ही चला रहा तो एक दिन ऐसा आ जाएगा की उत्पादन लेने के लिए किसानों को सिर्फ भाग्य के सहारे ही बैठना पड़ेगा। विश्वभर में तेजी से बढ़नी आबादी की वजह से खाद्यान्न उत्पादन एक चुनौती बनता जा रहा है। लेकिन किसान खाद्यान उत्पादन की बढ़ोतरी कीटनाशकों के प्रयोग से देख रहा है। पर ऐसा संभव नहीं है। हमें ऐसी कृषि तकनीक अपनानी होंगी जो आधुनिक भी हो और तकनीक से लैश हो। इसके लिए व्यक्ति किसानों को कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार काम करना होगा। नहीं तो हमारी जमीन सिर्फ जमीन ही बनकर रह जाएगी।

बंजर जमीन से कैसे होगा उत्पादन? | Greenhouse Gas Emissions

ऐसी बंजर जमीन से उत्पादन कैसे होगा? बल्कि उत्पादन शक्ति बिल्कुल कमजोर हो जाएगी। हालांकि इसके पीछे बाजारों में विभिन्न कंपनियों की मार्केटिंग किसानों को अपनी तरफ लुभा रही है। पर किसानों को किसी भी कंपनी के कीटनाशक पर दवाई लेने से पहले कृषि वैज्ञानिकों की सलाह माननी चाहिए। क्योंकि वर्तमान दौर कृषि के क्षेत्र में संकट का दौर कहा जा सकता है। यह नहीं है कि इसके लिए सिर्फ कीटनाशकों का प्रयोग ही जिम्मेदार है। कम उत्पादन के लिए ग्लोबल वार्मिंग, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन व वायुमंडलीय प्रदूषण का बढ़ना यह सभी कारक जिम्मेदार है। इन सभी विषयों पर कृषि वैज्ञानिक समय-समय पर चिंतन करते रहते हैं।

किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी | Pesticides Effects

राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मेलनों का आयोजन कर किसानों को जागरूक करने का काम किया जाता है। पर किसान जागरूक कितने होते हैं? इसका अंदाजा किसी को नहीं है। इसे महज़ खानापूर्ति कहा जा सकता है। क्योंकि ऐसी कॉन्फ्रेंस में सिर्फ दुनिया भर से कृषि वैज्ञानिक ही भाग लेते हैं। किसानों की भागीदारी इनमें बहुत कम होती है। वास्तविक स्तर पर अपने खेत में काम किसानों को करना होता है, ना कि कृषि वैज्ञानिकों को। कृषि वैज्ञानिक सिर्फ सलाह देकर इतिश्री कर लेते हैं। लेकिन यह सलाह किसानों तक उचित माध्यम से नहीं पहुंच पाती। संचार व जनसंचार के माध्यम से ऐसी एडवाइजरी जारी की जाती है, लेकिन किसान उनकी तरफ कभी भी ध्यान नहीं देते।

बढ़ती आबादी भी प्रमुख समस्या

बढ़ती आबादी की वजह से कृषि योग्य भूमि भी लगातार कम होती जा रही है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इस दिशा में त्वरित काम करने की जरूरत है। जीवाश्म इंधनों का प्रयोग वायुमंडल का स्वास्थ्य बिगाड़ रहे हैं। वायुमंडल का स्वास्थ्य खराब होगा तो कृषि योग्य भूमि का स्वास्थ्य भी खराब होगा। उत्पादन अपने आप गिरता चला जाएगा। इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र सहित दुनिया भर के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय मंथन कर रहे हैं।

बढ़ते तापमान को लेकर विश्व मौसम विभाग के साथ-साथ भारत मौसम विभाग भी चेतावनी जारी कर रहा है। लेकिन इसके बावजूद भी पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। बढ़ते तापमान की वजह से मानव जाति के साथ-साथ कृषि पर भी गंभीर असर पड़ रहा है। ग्लोबल वार्मिंग,जलवायु परिवर्तन व ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन हाल के दिनों में काफी चर्चा का विषय रहा है। पर्यावरण और वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर इसके प्रभाव पर चिंता बढ़ रही है। हालाँकि, कृषि क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जो विशेष रूप से इन उत्सर्जनों के प्रभावों के प्रति संवेदनशील है।

कृषि क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित

ग्रीन हाउस उत्सर्जन से कृषि क्षेत्र पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता दिखाई दे रहा है। कृषि पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के प्रभाव और खाद्य उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के संभावित परिणामों का पता लगाएगा। वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है, पशुधन खेती, वनों की कटाई, और उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग जैसी गतिविधियों से वातावरण में पर्याप्त मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। इन उत्सर्जनों का कृषि क्षेत्र पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है, जिससे तापमान, वर्षा पैटर्न और चरम मौसम की घटनाओं में बदलाव होता है जो फसल की पैदावार और पशुधन उत्पादन को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है। कृषि पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव बदलता जलवायु पैटर्न है। बढ़ते वैश्विक तापमान से फसलों और पशुधन पर गर्मी का तनाव बढ़ सकता है, जिससे पैदावार के साथ-साथ गुणवत्ता भी कम हो सकती है।

मौसम भी हाल-बेहाल

वर्षा के पैटर्न में बदलाव के परिणामस्वरूप सूखा या बाढ़ भी आ सकती है, जिससे कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर और असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, तूफान और टाइफून जैसी चरम मौसम की घटनाएं फसलों और बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचा सकती हैं, खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर सकती हैं और भोजन की कमी पैदा कर सकती हैं। इसके अलावा, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग की घटना में योगदान देता है, जिससे कृषि उत्पादन को खतरे में डालने वाले कीटों और बीमारियों का विस्तार हो सकता है। कीटों और बीमारियों के फैलने से फसलों और पशुधन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है, पैदावार कम हो सकती है और इन खतरों को नियंत्रित करने के लिए रासायनिक आदानों की आवश्यकता बढ़ सकती है, जिससे कृषि पद्धतियों से उत्सर्जन और बढ़ सकता है।

इन प्रभावों के निहितार्थ वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ती जा रही है,वैसे ही कृषि क्षेत्र पर अधिक भोजन पैदा करने का अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। हालाँकि, कृषि उत्पादन पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के प्रभाव से किसानों की इस मांग को पूरा करने की क्षमता खतरे में पड़ जाती है, जिससे संभावित भोजन की कमी हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं। कृषि पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रभाव एक गंभीर मुद्दा है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। बदलते जलवायु पैटर्न,कीटों और बीमारियों का बढ़ता प्रसार और चरम मौसम की घटनाएं सभी कृषि उत्पादन और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण खतरा पैदा करती हैं।

टिकाऊ कृषि तकनीक पर देना होगा बल

इन चुनौतियों से निपटने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने, कृषि पद्धतियों में सुधार करने और लचीली और टिकाऊ खाद्य उत्पादन प्रणाली विकसित करने के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता होगी। केवल प्रभावी कार्रवाई के माध्यम से ही हम कृषि पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने और भविष्य के लिए एक सुरक्षित और टिकाऊ खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने की उम्मीद कर सकते हैं।

क्या हो सकते है उपाय

वैश्विक खाद्य संकट एक गंभीर खतरा है, जो दुनिया भर के लोगों को प्रभावित करता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि एक वैश्विक समुदाय के रूप में हम इस संकट को बदतर होने से रोकने के लिए कार्रवाई करें। ऐसे कई तरीके हैं जिनसे हम वैश्विक खाद्य संकट से बच सकते हैं।यह जरूरी है कि हम भावी पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इन उपायों को गंभीरता से लें। वैश्विक खाद्य संकट से बचने का एक प्रमुख उपाय कृषि पद्धतियों में निवेश करना है। इसमें जैविक खेती को बढ़ावा देना, कम पानी वाली फसलों का उपयोग करना और रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम करना शामिल है। नवीनतम कृषि पद्धतियों को अपनाकर, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को कम किए बिना बढ़ती वैश्विक आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन का उत्पादन करने में सक्षम हैं।

रोकनी होगी भोजन की बर्बादी

वैश्विक खाद्य संकट से बचने का एक अन्य महत्वपूर्ण उपाय भोजन की बर्बादी को कम करना है। भोजन की बर्बादी को कम करके, हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जरूरतमंद लोगों तक अधिक भोजन पहुंचे और हमारी खाद्य आपूर्ति पर दबाव कम हो। इसके अलावा, नई कृषि प्रौद्योगिकी के अनुसंधान और विकास में निवेश करने से खाद्य उत्पादन बढ़ाने और फसल की पैदावार में सुधार करने में मदद मिल सकती है।

फसलों की नई किस्मों पर आस

इसमें नई फसल किस्मों को विकसित करना शामिल है जो कीटों और बीमारियों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हैं, साथ ही सटीक कृषि खेती जैसी प्रौद्योगिकियों में निवेश करना भी शामिल है। विकासशील देशों में खाद्य असुरक्षा के मुद्दे का समाधान करना भी महत्वपूर्ण है। इसे ग्रामीण विकास में लक्षित सहायता और निवेश के साथ-साथ निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं को बढ़ावा देने के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है,जो छोटे पैमाने के किसानों के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करते हैं।

जलवायु परिवर्तन के अनुरूप चलना होगा

वैश्विक खाद्य संकट से बचने के लिए कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझना महत्वपूर्ण है। किसानों को बदलती जलवायु से निपटने में मदद करने के लिए अनुकूलन रणनीतियों में निवेश करना शामिल है। ऐसे कई तरीके हैं जिनसे हम वैश्विक खाद्य संकट से बच सकते हैं। टिकाऊ कृषि में निवेश करके,अनुसंधान और विकास में निवेश करके, विकासशील देशों में खाद्य असुरक्षा को आपसी समझ से और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करके, हम सभी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर सकते हैं। यह जरूरी है कि हम ऐसे भविष्य को रोकने के लिए अभी से इस दिशा में काम करना होगा। Greenhouse Gas Emissions

डॉ. संदीप सिंहमार, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार।

यह भी पढ़ें:– Fire in Handloom Factory: पानीपत-हैंडलूम फैक्ट्री में लगी भीषण आग