Farmers Protest: क्या है एमएसपी व डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट?

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Farmers Protest: क्या है एमएसपी व डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट?

Farmers Protest: डॉ. संदीप सिंहमार। वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार। किसान जिस मुख्य मांग को लेकर एक बार दोबारा फिर दिल्ली कूच की तैयारी कर रहे हैं, वह मांग है मिनिमम सपोर्ट प्राइस यानी एमएसपी। यह भारत सरकार द्वारा किसानों के हित के लिए चलाई जाने वाली एक योजना है जिसके तहत भारत सरकार देश के सभी किसानों से उनकी फसल की खरीद करती है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को उनकी फसल की कीमत में उतार चढ़ाव से बचाना है। जब भी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर जाती है। तब भी सरकार इस एसपी पर ही किसने की फसल खरीदनी है, ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके। यह योजना किसानों के हित के लिए वर्षों से चल रही है, लेकिन किसान अब एसपी पर गारंटी बिल चाहते हैं।

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इसी मुख्य मांग व तीन कृषि कानून को रद्द करने की मांग को लेकर पहले भी 13 माह तक किसान आंदोलन कर चुके हैं। आखिर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी की तीन कृषि कानून को स्थगित करने की घोषणा के बाद किसानों ने अपना आंदोलन वापस लिया था। पर अब किसानों का कहना है कि अब तक उन्हें एसपी गारंटी बिल नहीं मिला है और नहीं अब तक डॉ. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू की गई है। स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट से किसान सहमत हैं और इस देश भर में लागू करवाने की मांग करते आ रहे हैं। डॉ.स्वामीनाथन को देश भर में किसानों का हितकारी माना जाता है। शायद कृषि के दिशा में किए गए कार्यों को देखते हुए ही केंद्र सरकार ने डॉ. स्वामीनाथन को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न देने की घोषणा भी कर दी है। जिस एमएसपी की बात हम कर रहे हैं, इसका जिक्र भी डॉ.स्वामीनाथन ने अपनी रिपोर्ट में किया हुआ है।

2004 गठित हुआ था राष्ट्रीय किसान आयोग | Farmers Protest

कृषि सुधारों को लेकर प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में वर्ष 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग (NCF) का गठन किया गया था। आयोग ने 2004 और 2006 के बीच पांच रिपोर्टें पेश की थी। इस रिपोर्ट में भारत में मेजर फार्मिंग सिस्टम की उत्पादकता, फसल से किसानों को मिलने वाला लाभ और स्थिरता को बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार को सुझाव दिए गाए थे। इन सभी रिपोर्ट्स को स्वामीनाथन रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है। स्वामीनाथन रिपार्ट से सरकार सहमत हुई या नहीं किसान जरूर सहमत हुए थे। क्योंकि इस रिपोर्ट में किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया है। तब से लेकर अब तक भारत के किसान विभिन्न प्रकार के आंदोलनों के द्वारा इस रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर चुके है। हालांकि वर्तमान में किसानों का जो आंदोलन प्रस्तावित है,उन मांगों में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट के अलावा विभिन्न प्रकार की मांगे शामिल है। विशेकर किसान अपने फसलों पर एमएसपी की मांग कर रहे हैं। साथ ही पिछले आंदोलन में जान गंवाने वाले परिवारों को उचित मुआवजा व परिवार के एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी मांग रहे है। कुछ दूसरी मांगे भी है ,जिनको लेकर आंदोलन प्रस्तावित है।

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स्वामीनाथन आयोग ने ये दिए थे सुझाव | Farmers Protest

अपनी रिपोर्ट्स में डॉ. स्वामीनाथन ने देश में खाद्य और न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के लिए रणनीति बनाई जाने, फार्मिंग सिस्टम की प्रोडक्टिविटी और स्थिरता में सुधार किए जाने,किसानों को मिलने वाले कर्ज का फ्लो बढ़ाने के लिए सुधार करने की बात कही थी। इसके अलावा शुष्क भूमि के साथ-साथ पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में किसानों के लिए फार्मिंग प्रोग्राम लागू करने, कृषि से जुड़े सामान की गुणवत्ता और लागत में सुधार करने, वैश्विक कीमतें गिरने पर किसानों को आयात से बचाने, बेहतर कृषि के लिए स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने व साथ ही उन्होंने किसानों की फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनश्चित करने का सुझाव भी दिया। इसे C2+50% फार्मूला भी कहा जाता है। रिपोर्ट में किसानों को उनकी फसल की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक एमएसपी देना का सुझाव दिया था। उनकी रिपोर्ट सम्पूर्ण तौर पर किसानों के हित में है,तभी किसान अपने हर आंदोलन में स्वामीनाथन आयोग की रिपार्ट लागू करने की मांग करते ही हैं।

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क्यों नहीं लागू हो रही रिपोर्ट

स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों को राष्ट्रीय किसान नीति 2007 में शामिल नहीं किया गया था। तब केंद्र में राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार थी व डॉ. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। हालांकि, रिपोर्ट पेश किए जाने के बाद मनमोहन सिंह सरकार 8 साल तक सत्ता में रही,फिर भी इस रिपोर्ट पर कोई विचार नहीं किया गया। तब भी विभिन्न किसान संगठन आयोग की रिपोर्ट में की गई सिफारिशें लागू करने की मांग करते रहे। पर पहला बड़ा किसान आंदोलन तब हुआ जब केंद्र सरकार 2020 में तीन कृषि कानून लेकर आई। इन कृषि कानूनों का देशभर के किसानों ने विरोध करते हुए साथ ही डॉ. स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की मांग की। इसी बीच 2014 में केंद्र में सरकार बदलकर भाजपा सरकार आ गई। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने दावा किया कि उनकी सरकार ने 2018-19 के लिए सभी खरीफ और रबी फसलों और अन्य वाणिज्यिक फसलों के लिए एमएसपी में वृद्धि की है। जिसमें उत्पादन लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत का रिटर्न मिलेगा। वहीं, किसानों का दावा है कि सरकार अपना फॉर्मूला लागू करती है, जिससे एमएसपी काफी कम हो जाती है। किसान संगठनों की मांग है कि जैसा स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है उसी फार्मूले का प्रयोग करते हुए एमएसपी लागू किया जाए। इसी बात को लेकर सरकार व किसानों के बीच मतभेद बना आ रहा है।

भारत कृषि प्रधान देश

भारत देश कृषि प्रधान देश है ,जिसमे 70 फीसदी लोग कृषि कार्यों पर निर्भर हैं। जिनमें जमींदार,किसान व मजदूर सभी शामिल है। दूसरी तरफ किसान सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं। इसलिए कोई भी राजनीतिक दल किसानों को नाराज़ भी नहीं करना चाहता, क्योंकि लोकतंत्र में एक-एक मत की महत्वपूर्ण है। तभी सभी राजनीतिक दल किसानों का विरोध नहीं कर पाते।कृषि परिवारों की औसत मासिक आय की बात करें तो सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2002-03 में किसान के परिवार की कुल आय औसतन 2115 रुपये महीने थी. जो अगले 10 साल में बढ़कर 6426 हो गई। वहीं, 2015-16 में किसान परिवार की औसतन आय 8059 रुपये महीना हो हुई। जो 2018-19 में 10,218 रुपये प्रति माह पहुंच गई। इसके बाद कि रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कि गई है। दूसरी तरफ मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने की बात पर बल दिया था। पर वास्तव में ऐसा अभी तक हुआ नहीं है।

इसी बात को लेकर किसान मांग करते आ रहे हैं और कृषि वैज्ञानिक व सरकार किसानों की आय बढ़ाने के फार्मूले पर काम कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिक किसानों को वर्तमान कृषि तकनीक को अपनाने पर बल दे रहे हैं। जिसके लिए समय-समय पर कृषि विकास मेलों का आयोजन भी होता है। पर विभिन्न प्रयासों के बावजूद भी इस फार्मूले पर नहीं पहुंचा जा सका है। इसमें सीधे तौर पर सरकार का भी कसूर नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पिछले कई वर्षों से वायुमंडलीय परिवर्तन फसलों को प्रभावित कर रहे हैं। ग्लोबल वार्मिग का कृषि कार्यों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा है। यदि ग्लोबल वार्मिंग व मॉनसून की यही स्थिति बनी रही तो किसानों की आय पर संकट के बादल मंडराते रहेंगे। किसानों को भी मौसम के अनुरूप अपने कृषि कार्यों में बदलाव लाना होगा तभी आय बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। सरकार सिर्फ अपनी योजनाएं लागू कर सकती है। कुछ मांगे ऐसी है जिनको मानने से सरकार को भी पीछे नहीं हटना चाहिए ताकि देश का अन्नदाता अपना भरण पौषण कर सके। दूसरों का पेट भरने वाले किसान के बच्चों का भी पेट खाली नहीं रहना चाहिए।

क्या है एमएसपी का फार्मूला? Farmers Protest

किसानों के लोग एमएसपी कोई नया नाम नहीं है। 1966 में एमएसपी प्रचलन में आया था। अभी तक केंद्र सरकार 22 अनिवार्य कृषि फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करती है। इसमें CACP की सिफारिशों के आधार पर गन्ने के लिए उचित मूल्य तय किए जाते हैं। इसे राज्य सरकारों और संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों के साथ विचार करने के बाद लागू किया जाता है। साल 1966-67 में यह पहली बार था कि केंद्र सरकार ने एमएसपी लागू किया गया था। पहली बार गेहूं की कीमत 54 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी तय की गई थी।

हरित क्रांति के लिए भारतीय नीति निर्माताओं ने महसूस किया कि किसानों को खाद्य फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता है। खाद्य फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई भी। तब से लेकर अब तक लगातार एमएसपी विवादों के घेरे में रहा है। आज के महंगाई के दौर में एमएसपी पर एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है,ताकि किसानों की आमदनी बढ़ाई जा सके। दूसरी तरफ किसानों को भी सरकार का सहयोग करना चाहिए। सहयोग से ही नीति-निर्माण हो सकते हैं। कोई भी सरकार अपनी प्रजा का बुरा नहीं चाहती पर नजरिया अपना-अपना हो सकता है। निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि वर्तमान परिदृश्यों को देखते हुए किसानों की आय बढ़ाने पर जोर देना चाहिए,ताकि अन्नदाता किसी भी प्रकार के संकट में ना रहे।

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