हंगामेदार होगा संसद का मानसून सत्र

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 18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलेगा सत्र

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राजेश माहेश्वरी

छले कई वर्षों से ये परम्परा सी बन गई है कि संसद के मानसून सत्र में बाहर के मौसम की तरह ही भीतर भी गरज के साथ छींटे पड़ते हैं। छींटे सत्ताधारी पक्ष पर पड़ते हैं और पूरा सत्र हंगामे की भेंट पिचढ़ जाता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही होने की उम्मीद है। सत्र 18 जुलाई से 10 अगस्त तक चलेगा। कश्मीर में बिगड़ते हालातों के बीच अब संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। इस सत्र के हंगामेदार होने की पूरी संभावना है। इस सत्र में कुल 18 बैठकें भी की जाएंगी। बजट सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच मची खींचतान और रस्साकशी का नजारा सारे देश ने देखा, कि किस तरह संसद का कामकाज ठप रहा।जिसके चलते कई महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो पाये। वहीं देश की जनता की खून पसीने की कमाई का करोड़ों रुपया भी बेकार गया। देश की राजनीति में बजट सत्र के बाद से तेजी से परिवर्तन देखने को मिला है। कर्नाटक चुनाव में भाजपा का बहुमत का आंकड़ा न छू पाने के मलाल से लेकर, उत्तर प्रदेश में लोकसभा की तीन और विधानसभा की एक सीट पर हुए उप चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद देश में तीसरा मोर्चा सिर उठाने लगा है।

सत्र में  मोदी सरकार तीन तलाक बिल, ट्रांसजेंडर बिल को पास कराने पर विशेष जोर देगी

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वहीं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जो राजनीतिक हलचल देखने को मिल रही है, उसका सारा गुस्सा, प्रतिरोध और आक्रोश आगामी मानसून सत्र में देखने को मिलेगा। अगर ये कहा जाए कि मानसून सत्र हंगामेदार होगा तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस सत्र में केंद्र की मोदी सरकार तीन तलाक बिल, ट्रांसजेंडर बिल, ओबीसी के लिए राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक दर्जा का बिल को पास कराने पर विशेष जोर देगी, इस बात की पूरी संभावना है।यह भाजपा नीत एनडीए सरकार के कार्यकाल का आखिरी मानसून सत्र होगा, जिसके हंगामेदार रहने की पूरी उम्मीद है! माना जा रहा है कि विपक्ष कश्मीर समस्या, डीजल पेट्रोल की आसमान छूती कीमतें, किसानों के मुद्दे और सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए सदन में विपक्ष अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने की कोशिश भी कर सकता है। ताकि सदन के साथ-साथ पूरे देश में यह संदेश पहुंच सके कि विपक्ष अब मोदी सरकार के खिलाफ संगठित हो चुका है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी के गठबंधन टूटने और राज्य में राज्यपाल शासन लगने को लेकर विरोधी दल संसद में सरकार को घेरने की कोशिश कर सकते हैं।

विरोधी दल एकजुट होकर बीजेपी पर साध सकते हैं निशाना

माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर सभी विरोधी दल एकजुट होकर बीजेपी पर निशाना साध सकते हैं। इतना ही नहीं, विपक्ष के तरकश में कई और तीर हैं जिनके सहारे सरकार पर हमला बोला जाएगा। जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन के अलावा किसानों, दलितों व आम आदमी के मुद्दे पर विपक्ष हमलावर हो सकता है। हालांकि हमेशा की तरह सत्र से पहले सरकार और स्पीकर की तरफ से सर्वदलीय बैठक बुला कर सदन चलाने के लिए सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी लेकिन ऐसी बैठकों का असर कुछ खास नहीं होता।कई बार देखा गया है कि बैठक में विपक्ष का रवैया कुछ और रहता है लेकिन संसद सत्र शुरू होने के बाद सदन में तेवर कुछ और दिखते हैं। बारिश के दिनों में बाहर का मौसम भले ही ठंडक देने वाला रहे लेकिन संसद के भीतर का सियासी पारा गर्म रहने की संभावना ज्यादा है। वहीं, सरकार ने तीन तलाक विधेयक पर विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने की योजना बनाई है। इन सबके बीच केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, बसपा प्रमुख मायावती और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से तीन तलाक विधेयक का समर्थन करने की अपील की है।बजट सत्र विपक्ष के हंगामे के कारण पूरी तरह से धुल गया था। जिसके कारण बहुत से महत्वपूर्ण बिल संसद में पास नहीं हो पाए थे।

बीते बजट सत्र में विपक्ष ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों, आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग और पंजाब नेशनल बैंक के घोटाले जैसे मुद्दों पर हंगामे के चलते कई अन्य मुद्दों को लेकर संसद में जोरदार हंगामा किया था। जिसके कारण इन बिलों पर संसद के भीतर चर्चा नहीं हो पाई। और ये सभी बिल अधर में ही लटक गए। संसद का पिछला सत्र काफी हंगामेदार रहा था। विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच टकराव के चलते लोक सभा में केवल 34 घंटे ही कामकाज हो पाया था।वित्त विधयेक को छोड़कर लोक सभा में एक भी दिन कोई विधायी काम नहीं हो पाया था। बजट सत्र में ही टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास सत्र लाना चाहते थे। हालांकि, लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने सदन में लगातार हंगामे का तर्क देते हुए उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था। पिछले सत्र में विपक्ष रवैये को देखते हुए माना जा रहा है कि मानसूत्र सत्र में भी विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को आक्रामक तरीके से घेरेगा। चूंकि यह सत्र मोदी सरकार को आखिरी मानसून सत्र है ऐसे में विपक्ष ज्यादा से ज्यादा मुद्दों पर मोदी सरकार को सारे देश के सामने नाकाम और फेल साबित करनाा चाहेगा, जिससे उसे लोकसभा चुनाव में सियासी लाभ मिल सके। यहां यह बात दीगर है कि तीन तलाक विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है और राज्यसभा में लंबित है।

यह विधेयक सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में रहेगा। वहीं मोदी सरकार राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने पर जोर देगी। मेडिकल शिक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग विधेयक और ट्रांसजेंडर विधेयक को भी लिया जाएगा। वहीं राज्य सभा के उपसभापति के तौर पर पीजे कुरियन का कार्यकाल इसी महीने समाप्त हो रहा है। राज्यसभा का उपाध्यक्ष चुनने के लिए चुनाव भी इसी सत्र में होगा। आखिरी साल में प्रवेश कर चुकी नरेंद्र मोदी सरकार इस सत्र को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने का प्रयास करेगी, जिसमें वह कई अहम विधेयक को पारित करवाना चाहेगी। मानसून सत्र के बाद मौजूदा लोकसभा के दो ही सत्र शेष रह जाएंगे-शीत सत्र व बजट सत्र। बजट सत्र के पहले हिस्से के बाद ही देश में लोकसभा चुनाव है।यानी नरेंद्र मोदी सरकार के पास कम संसदीय समय बचा है और वह अपनी विधायी कार्य योजनाओं का अधिक से अधिक कार्यान्वयन करवाने का भरसक प्रयास करेगी। हर साल की तरह कुछ अच्छे बिल पारित होने की उम्मीद में सबकी निगाहें आगामी सत्र पर टिकी हुई। ऐसा माना जा रहा है कि वर्तमान सरकार ऐसा कोई बिल का प्रस्ताव रखने से बचेगी जिस पर लम्बी बहस हो। संसद का मानसून सत्र 18 जुलाई से, तीन तलाक सहित कई विधेयकों के पास होने की उम्मीद है। वहीं उपभोक्ता संरक्षण नियम 2018’ से जुड़े एक बिल पर बात हो सकती है।

जो कि ‘उपभोक्ता संरक्षण नियम 1986’ की जगह ले सकता है और नए बिल में ‘ई-कोमर्स’ से जुड़ी तमाम चीजें शामिल होंगी। इसके अलावा ‘इण्डियन आर्बिटिरेशन कांउसिल एक्ट-2017’से जुड़े एक बिल पर भी चर्चा हो सकती है जिसमें भारत को आर्बिटिरेशन का वैश्विक केंद्र बनाने पर जोर होगा। इसके अलावा ‘स्पेसिफिक रिलिफ एमडमेंट एक्ट-2018’ पर भी उच्च सदन में चर्चा हो सकती है। मूल रूप से आर्थिक अनुदान के सहारे आर्थिक सुधार करने वाला यह बिल के आने से न्यायालय के कुछ अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा। लेकिन यह तो संभावित बिल है। जिन पर चर्चा हो सकती है। इस सत्र में यह बहुत जरूरी है कि बिलों की चर्चा में अधिक से अधिक समय दिया जाए क्योंकि बीते सत्र में सरकारी बिलों की चर्चा के दौरान शोरगुल और आरोप-प्रत्यारोप में बहुत समय बेकार हुआ था।

संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में विपक्ष के हंगामे के कारण कई कामकाज अटक गये थे। उन अटके काम को सरकार इस बार निबटाने का वह कोशिश करेगी। तो ऐसे में लाजिमी है कि मानसून सत्र हंगामेदार और छिंटाकशी के नए मापदण्डों को स्थापित करने वाला होगा। सत्तापक्ष अपनी बात रखना चाहेगा तो वहीं विपक्षी खेमा पुरजोर कोशिश कर सत्र को चलने नहीं देगा। राजनीति संसद के भीतर और बाहर अपने रंग में होगी। इस्तीफे की मांग और उसे नामंजूर करने की रणनीति को नए कलेवर में पेश करने का क्रम पूरे सत्र में बदस्तूर चलता रहेगा। अब यह देखना अहम होगा कि मोदी सरकार किस प्रकार विपक्ष की चुनौतियों से निबटती है। और किस तरह वो अपने कई महत्वपूर्ण बिलों पर संसद की मोहर लगवा पाती है। बजट सत्र की भांति अगर इस बार भी विपक्ष संसद ठप करने की चाल में कामयाब हो गया तो, यह तय है कि आने वाले दिनों में मोदी सरकार की मुशिकलें तो बढ़ेगी ही वही उसके लिए 2019 का चुनावी सफर भी आसान नहीं रहेगा।

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