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    रूसो का सिद्धांत ‘लैसिते’ धर्म निरपेक्ष है न कि धर्म विरोधी

    फ्रांस के राष्टÑपति मैक्रों की इस्लाम संबंधी विवादिक टिप्पणियों से मुस्लिम जगत में काफी ज्यादा रोष हो गया है। कई मुस्लिम देशों ने फ्र ांसीसी सामान के बायकाट का ऐलान भी कर दिया है। यह घटना जलती पर तेल डालने के समान है, क्योंकि पहले ही आतंकी संगठन इस्लाम के नाम पर युवाओं को गुमराह कर गैर मुस्लिमों के खिलाफ भड़का रहे हैं, वहीं दूसरी ओर मैक्रों की टिप्पणियां इस चलन के लिए और ज्यादा सहायक बनेंगी। घटना फ्रांस के सिद्धांत, ‘लैसिते’ के साथ जुड़ी हुई है। लैसिते को ‘धर्म से मुक्ति’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जिसमें असल में धर्म निरपेक्षता को गलत तरीके से दर्शाया गया है। फ्रांस की क्र ान्ति की जमीन रूसो जैसे दार्शनिकों ने तैयार की थी जो लोगों की आजादी के समर्थक थे। फ्रांस के इस सिद्धांत का प्रभाव मार्क्सवादी चिंतन व रूसी क्रान्ति पर भी पड़ा। दरअसल न तो रूसो धर्म के खिलाफ थे और न ही रूस का समाजवादी शासन धर्म के विरूद्ध था।

    मुद्दा केवल इतना ही था कि स्टेट किसी धर्म या धर्म प्रचार के लिए काम नहीं करेगा। सोवियत यूनियन के दौरान भी चर्च कायम रहे। अब जहां तक फ्रांसीसी राष्टÑपति की ओर से धर्म के खिलाफ टिप्पणियां की जा रही हैं उनका कोई मानवीय या सामाजिक आधार नहीं। फ्रांसीसी शासन धार्मिक मामलों से दूर रहकर अपनी प्रशासनिक गतिविधियां चला सकता है। फ्रांस सरकार को अंतरराष्टÑीय स्तर पर अमन शांति की स्थिति को देखते हुए नाजुक मामलों के प्रति पूरी सर्तकता से काम करना चाहिए। भले ही राष्टÑपति सरकोजी के समय भी धर्म निरपेक्षता को जोरदार तरीके से लागू करने की चर्चा हुई थी, लेकिन वर्तमान राष्टÑपति मैक्रों की ओर से जिस तरह से एक धर्म विशेष के खिलाफ गतिविधियों को मान्यता दी जा रही है, वह फ्रांस से बाहर तनाव का कारण बन रही है।

    यह चिंताजनक है कि फ्रांस जैसे धर्म निष्पक्ष देशों में सत्ता हासिल करने के लिए धर्माें का विरोध चुनावी प्रपंच बन गए हैं। फ्रांस के राष्टÑपति चुनावों में डेढ़ वर्ष का समय रह गया है। सत्ताधारी पार्टी के साथ-साथ विपक्षी पार्टी के नेता मारीन ले पैन धार्मिक मुुद्दे पर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मुद्दा मारीन के लिए सत्ता प्राप्ति का रास्ता खोल सकता है। फ्रांसीसी राजनीति के इतिहास में धर्म निरपेक्षता का जिक्र तो रहा है लेकिन किसी धर्म के विरोध का कोई इतिहास नहीं रहा। वर्तमान मानववादी व लोकतांत्रिक युग में सद्भावना, प्रेम व दूसरों के प्रति सम्मान जैसे गुणों के बिना एक आदर्श समाज की कल्पना असंभव है।

     

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