Dairy Farming: चोपटा सच कहूँ/भगत सिंह। हरियाणा के सरसा जिले के गांव माखोसरानी के दो किसान भाइयों ने 8 साल पहले 6 देसी गायों को पालकर शुरू किया काम, आज 60 देशी गायों के दूध से बने उत्पाद और केंचुआ खाद बनाकर मालामाल हो रहे हैं। दोनों भाइयों दिनेश कुमार और पवन कुमार पुत्र धर्मपाल पूनिया द्वारा घर में ही पूर्णतया देसी और बिना मिलावट के तैयार किए गए देसी गायों के दूध से बने उत्पाद पनीर, खोया, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, कलाकंद, बिलोना घी के साथ-साथ केंचुआ खाद की डिमांड देश के दूसरे राज्यों में भी हो रही है। डॉ. पवन ने बताया कि उनके द्वारा तैयार किये गए अधिकतर खाद्य उत्पाद उनके प्रतिष्ठान से ही बिक जाते हैं। हालांकि दोनों भाई नौकरी करते हैं और परंपरागत खेती के साथ-साथ गायों को पालकर एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं।
आईए जानते हैं दिनेश कुमार और पवन कुमार पुनियां की सफलता की कहानी। हरियाणा के सरसा जिले के अंतिम छोर पर पड़ने वाले राजस्थान की सीमा से सटे गांव में किसान परंपरागत खेती करते हैं। पिछले कई सालों से सिंचाई पानी की कमी, बारिश की अनियमितता, प्राकृतिक आपदाओं आदि के कारण परंपरागत खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जा रही है। ऐसे में किसानों ने खेती के साथ-साथ अन्य व्यवसायों को अपनाना शुरू कर दिया है। अधिकतर किसान खेती के साथ-साथ बागवानी और पशुपालन कर अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बना रहे हैं। इसी कड़ी में गांव माखोसरानी के दो किसान भाई दिनेश कुमार और पवन कुमार पूनियां दोनों ही सरकारी नौकरी करते हैं। दिनेश कुमार बीटेक की पढ़ाई के बाद एयरफोर्स में सर्विस करते हैं और पवन कुमार पशुपालन की डिग्री लेकर पशु चिकित्सक के तौर पर कार्य कर रहे हैं।
इसके साथ-साथ घर की परंपरागत खेती में भी हाथ बटाते हैं और 6 साल पहले पांच देसी गायों से नया कार्य शुरू किया। जिसके तहत देसी गायों के दूध से बने उत्पाद घी, खोया, पनीर इत्यादि बेचना शुरू किया। दिनेश और पवन ने बताया कि उन्होंने गायों की रक्षा और पूर्णतया शुद्ध देसी उत्पाद बनाकर लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए खेती और नौकरी के साथ-साथ कार्य शुरू किया। जिसमें उन्हें दिन प्रतिदिन सफलता मिलती गई और वर्तमान में 70 साहीवाल नस्ल राठी और अन्य देसी गायों की को पालते हैं और उनके दूध से बने पनीर, खोया, रसगुल्ला, गुलाब जामुन, कलाकंद व पेड़े इत्यादि की अच्छी बिक्री हो रही है। उन्हें सालाना करीब 2 लाख से अधिक की बचत हो रही है।
गायों की नस्ल सुधार में कर रहे सराहनीय कार्य | Dairy Farming
पशु चिकित्सक डॉ. पवन कुमार ने बताया कि गायों की नस्ल सुधार के लिए कार्य किया जाता है। इस दौरान कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा गायों की साहीवाल नस्ल के बच्छे व बच्छियाँ तैयार की जाती है। जो आगे चलकर अधिक दूध देती है। इन्होंने बताया कि गोविंदम देसी गाय फार्म के नाम से गांव माखोसरानी में अपना व्यवसाय शुरू कर रखा है। जिसमें सभी परिजनों के साथ-साथ खुद मेहनत करके देसी और बिना मिलावट के दूध के बने उत्पाद तैयार किये जा रहे हैं। इनका कहना है कि लोकल का स्वर के सिद्धांत पर चलते हुए सरसा जिले के आसपास के गांव के साथ-साथ उनके उत्पाद दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब सहित कई राज्यों में खूब पसंद किया जा रहे हैं। इनका कहना है कि गायों के गोबर से देसी खाद बनाई जाती है और इसके साथ-साथ केंचुआ खाद का भी व्यवसाय शुरू कर रखा है। जिससे फसलों में डालने पर रासायनिक खादों का प्रयोग नहीं करना पड़ता। इस कारण दूध के साथ-साथ अन्न भी बढ़िया पैदा होता है।
2018 में शुरू किया था व्यवसाय
दिनेश और पवन ने बताया कि साल 2018 में उन्होंने यह व्यवसाय शुरू किया और धीरे-धीरे व्यवसाय में गायों की सेवा के साथ-साथ कमाई का जरिया भी बढ़ता गया। उन्होंने बताया कि त्यौहार तीज व दीवाली इत्यादि के अवसर पर पूर्णतया देसी और बिना मिलावट के दूध के बने उत्पादों की डिमांड बहुत ज्यादा होती है तथा आसपास के बाजारों में स्टाल लगाकर उत्पादक बेचे जाते हैं। उन्होंने बताया कि अभी तक सरकार से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं ली है लेकिन सरकार को खेती के साथ-साथ अन्य प्रकार के व्यवसाय जैसे बागवानी, पशुपालन, डेयरी इत्यादि पर लोन व अन्य सुविधाओं को देने के लिए योजनाओं का सरलीकरण करना चाहिए, ताकि नए किसान खेती, पशुपालन और बागवानी के जरिए अपने आर्थिक स्थिति को मजबूत बना सके।















