Lal Bahadur Shastri: भारतीय राजनीति के अमूल्य रत्न: लाल बहादुर शास्त्री

Lal Bahadur Shastri
Lal Bahadur Shastri: भारतीय राजनीति के अमूल्य रत्न: लाल बहादुर शास्त्री

श्वेता गोयल। Lal Bahadur Shastri: भारत के इतिहास में ऐसे अनेक नेता हुए हैं जिन्होंने अपने जीवन से देशवासियों को प्रेरित किया। उनमें से एक नाम है लाल बहादुर शास्त्री, जो अपनी ईमानदारी, सादगी और नैतिकता के लिए आज भी याद किए जाते हैं। 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में जन्मे शास्त्री जी ने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया और बाद में देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनकी पुण्यतिथि 11 जनवरी को हमें यह अवसर देती है कि हम उनके जीवन और आदर्शों को फिर से स्मरण करें।

प्रधानमंत्री बनने से पहले शास्त्री जी विदेश मंत्री, गृहमंत्री और रेल मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके थे। हर पद पर उन्होंने अपनी सादगी और ईमानदारी से लोगों का विश्वास जीता। जब वे प्रधानमंत्री बने, तो उन्हें सरकारी आवास और इंपाला शेवरले कार मिली। परंतु उन्होंने उस कार का उपयोग केवल राजकीय अतिथियों के स्वागत के समय ही किया। एक बार उनके बेटे सुनील शास्त्री ने निजी कार्य के लिए वही कार ले ली। जब शास्त्री जी को यह पता चला तो उन्होंने तुरंत ड्राइवर से दूरी पूछी और रिकॉर्ड में लिखवाया कि चौदह किलोमीटर निजी उपयोग हुआ है। इसके बाद उन्होंने पत्नी ललिता को निर्देश दिया कि सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में राशि जमा कर दी जाए।  प्रधानमंत्री बनने के बाद जब वे पहली बार अपने घर काशी लौटे, तो प्रशासन ने स्वागत की तैयारियां महीनों पहले शुरू कर दीं। उनके घर तक जाने वाली गलियां संकरी थीं, इसलिए प्रशासन ने उन्हें चौड़ा करने का निर्णय लिया। शास्त्री जी को जब यह जानकारी मिली तो उन्होंने स्पष्ट संदेश भेजा कि किसी भी मकान को तोड़ा न जाए, वे पैदल ही घर जाएंगे।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में लाला लाजपत राय की संस्था ‘सर्वेंट्स आॅफ इंडिया सोसायटी’ गरीब स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को आर्थिक मदद देती थी। उस समय शास्त्री जी जेल में थे। उन्होंने अपनी पत्नी को पत्र लिखकर पूछा कि क्या उन्हें संस्था से समय पर पैसे मिल रहे हैं और क्या वह पर्याप्त हैं। पत्नी ने उत्तर दिया कि उन्हें पचास रुपये मिलते हैं, जिनमें से चालीस रुपये ही खर्च होते हैं और दस रुपये बच जाते हैं। यह सुनकर शास्त्री जी ने संस्था को पत्र लिखकर कहा कि उनके परिवार को केवल चालीस रुपये ही भेजे जाएं और शेष राशि किसी अन्य जरूरतमंद को दी जाए।  रेल मंत्री रहते हुए शास्त्री जी ने यात्रियों की समस्याओं को समझने के लिए जनरल डिब्बे में सफर किया। वहां उन्होंने देखा कि यात्रियों को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि जनरल डिब्बों में भी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। पहली बार जनरल डिब्बों में पंखे लगवाए गए और यात्रियों के लिए खानपान की व्यवस्था करने हेतु पैंट्री सेवा शुरू की गई। Lal Bahadur Shastri

11 जनवरी 1966 को रूस यात्रा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना पूरे देश के लिए गहरा आघात थी, परंतु उनका जीवन प्रेरणादायक बन गया। वे आज भी अपने आदर्शों और नेतृत्व क्षमता के कारण अमर हैं।  लाल बहादुर शास्त्री जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सत्ता में बने रहने का नाम नहीं है, बल्कि जनता के प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प है। उनकी सादगी, ईमानदारी और जनसेवा की भावना आज भी हमारे लिए प्रेरणा है। उनकी पुण्यतिथि पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम उनके पदचिन्हों पर चलकर देश और समाज की सेवा करेंगे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)