पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज की सतगुरु के प्रति असीम श्रद्धा भक्ति को देखते हुए पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज गांव श्री जलालआणा साहिब में कई बार पधारे। एक बार बेपरवाह जी इस पवित्र गांव में सत्संग के बाद नाम-शब्द की युक्ति प्राप्त करने आए नए जीवों को बुराईयां त्यागने के बारे में समझा रहे थे। किसी-किसी नाम अभिलाषी से परिचय प्राप्त कर रहे थे। किसी-किसी से पूछ भी रहे थे कि तुम नाम-रास्ता क्यों लेना चाहते हो? सभी अपने-अपने तरीके से उत्तर दे रहे थे। इस प्रकार भान सिंह नामक भक्त से बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने पूछा, ‘‘वरी! तू नाम क्यों लेना चाहता है?’’ उसने बताया कि सांई जी, मेरे यहां संतान नहीं है। MSG Bhandara Month
‘‘असी बच्चे थोड़े ही वंडदे हां’’
संतान प्राप्त करने के लिए नाम लेना चाहता हूं। सांई जी ने भान सिंह को बताया, ‘‘असी बच्चे थोड़े ही वंडदे हां’’ यह कहकर उसे बाहर भिजवा दिया। भान सिंह ने शाह सतनाम जी महाराज जी के पास जाकर उन्हें सारी बात बताई। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘अब तूने जाकर पूजनीय साईं शाह मस्ताना जी महाराज के चरणों में अरदास करनी है कि मैंने अपनी आत्मा के कल्याण के लिए नाम लेना है।’’ फिर उस भक्त ने वैसा ही किया। बेपरवाह जी ने फिर उसे नाम लेने वालों में बैठने का इशारा करते हुए फरमाया, ‘‘वरी! हमारी बात सुन। एक आदमी की कारीगर (लकड़ी का मिस्त्री) से यारी है।
कारीगर रोज शाम को उस आदमी के पास आता है। उस आदमी के पास मंजी (चारपाई) नहीं है। उस आदमी को क्या जरूरत है कि वह कारीगर को कहे कि मुझे एक मंजी बनाकर दे। कारीगर खुद ही देखता है कि मेरा यार नीचे जमीन पर सोता है क्यों न इसे मंजी बनाकर दूं। इसी प्रकार जब तुमने नाम शब्द ले लिया है तो उसे जपो। वह मालिक तुम्हारी सभी जरूरतों को समझता है और वह बिन मांगें ही जायज मांगें पूरी करेगा। ’’ MSG Bhandara Month















