नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा है कि दुनिया के सामने आज लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाने के लिए जो चुनौतियां हैं उनका समाधान जनता की भागीदारी से किया जाना चाहिए और इस बारे में राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों (सीएसपीओसी) के 28वें सम्मेलन के गहन विचार किया जाना चाहिए।
बिरला ने गुरुवार को यहां संसद भवन में संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रमंडल देशों की संसदों के अध्यक्षों तथा पीठासीन अधिकारियों (सीएसपीओसी) के 28वें सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को सम्बोधित करते हुए कहा कि दुनिया आज अभूतपूर्व तकनीकी दौर से गुजर रही है और लोकतंत्र के सामने जो चुनौतियां आ रही है उनके समाधान के लिए इस सम्मेलन के जरिए गहन विचार विमर्श कर महत्वपूर्ण निर्णय दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो निर्णय लिए जा रहे हैं वे लोकतांत्रिक चुनौतियां के समाधान की दिशा में अहम साबित हो रहे है। मोदी के नेतृत्व में जन कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं और लोकतंत्र के साथ जन भागीदारी को महत्व दिया जा रहा है जिससे लोगों की लोकतंत्र की प्रति आस्था बढ़ी है।
इससे पहले राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने अपने स्वागत भाषण में सम्मेलन में हिस्सा ले रहे सदस्यों का अभिवादन किया और कहा कि एसपीओसी के इस मंच से राष्ट्रमंडल के विभिन्न देशों की संसदों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की जानकारी एक दूसरे को मिलेगी। राष्ट्रमंडल संसदीय संगठन की चेयरपर्सन डॉक्टर क्रिस्टोफर कलिला ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और इसे लोकतंत्र की जननी भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल देशों के सामने लोकतंत्र की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जो चुनौतियां हैं उन्हें उम्मीद है कि रिकार्ड संख्या में मौजूद सदस्य यहां उन पर सब पर गहनता और रचनात्मकता के साथ विचार करेंगे और संसदीय सहभागिता को मजबूती से और आगे बढ़ाएंगे।
इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन की अध्यक्ष डॉ तुलिया अक्सन ने कहा कि संस्थाओं को लेकर जो भी चुनौतियां लोकतंत्र के सामने आ रही हैं उनका समाधान लोकतांत्रिक तरीके से किया जाना चाहिए। हमारे संसदीय क्षेत्रों में लोगों की जो समस्याएं हैं उनका तकनीकी आधार पर निराकरण हमारे संसदों में ही किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि सोशल मीडिया की भूमिका और सदस्यों की सुरक्षा वर्तमान परिवेश में महत्वपूर्ण बनी हुई है और लोकतांत्रिक चुनौतियों के साथ ही इन सब समस्याओं पर भी इस सम्मेलन में विचार किया जाना चाहिए।















