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    जेलों में कैदियों का बोझ कम करने को क्या कदम उठाएंगे?

    Suprme-court

    सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से मांगा जवाब  | Perisoners

    नई दिल्ली (एजेंसी)। जेलों (Prison) में कैदियों (Prisoners) के मानवाधिकार को लेकर देश का शीर्ष न्यायालय गंभीर है। इसी को लेकर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र से जवाब मांगा है। कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा कि देश भर की जेलों में रिक्तियों और कैदियों के बोझ से निपटने के लिए वह क्या कदम उठाएगी। मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने केंद्र सरकार को न्यायमूर्ति अमिताव रॉय कमेटी की रिपोर्ट पर दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश भी दिया। न्यायमूर्ति बोबडे ने कहा, ‘हम जानते हैं कि जेलों में कैदियों का अतिरिक्त बोझ सीधे-सीधे अदालतों में लंबित मामलों से जुड़ा है। और जेलों में रिक्तियों तथा क्षमता से अधिक कैदियों के मामले से हमें निपटना जरूरी भी है।

    एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार

    • एनसीआरबी के मुताबिक, 2017 के अंत तक विभिन्न जेलों में 4.50 लाख कैदी थे।
    • जिनमें 431823 पुरूष और 18873 महिलाएं शामिल
    • सभी जेलों की कुल क्षमता से करीब 60,000 अधिक कैदी थे।

    ये सुधार भी नाकाम

    जेलों में कैदियों के रहने की क्षमता 2015 में 3.66 लाख से बढ़कर 2016 में 3.80 लाख और 2017 में 3,91,574 होने के बावजूद कैदियों की संख्या पार कर गई। इस अवधि में जेलों की क्षमता में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जेल की क्षमता में बढ़ोत्तरी के बावजूद कैदियों की संख्या 2015 में 4.19 लाख से 2016 में 4.33 लाख और 2017 में 4.50 लाख हो गई। इस तरह 2015-17 में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। रिपोर्ट के मुताबिक, जेल में सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ उत्तर प्रदेश में है, जबकि सभी राज्यों की तुलना में यहां सबसे ज्यादा जेल की क्षमता है। उत्तर प्रदेश की जेलों में सबसे ज्यादा कैदी भी हैं।

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