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    आयुर्वेद से स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसी लाईलाज बीमारी में भी मिल रहा लाभ

    Kurukshetra
    Kurukshetra आयुर्वेद से स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसी लाईलाज बीमारी में भी मिल रहा लाभ

    कुरुक्षेत्र, सच कहूँ/देवीलाल बारना। आयुर्वेद, जिसे जीवन का विज्ञान भी कहा जाता है। यह न केवल बीमारियों का इलाज करता है, बल्कि रोगों को रोकने और जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाने में भी मदद करता है। ऐसी ही एक बीमारी आज कल काफी लोगों में हो रही है, स्जोग्रेन सिंड्रोम। इस बीमारी में व्यक्ति के मुंह की लार बनना बंद हो जाती है व आंखों में पानी आना बंद हो जाता है। आज 23 जुलाई को विश्व स्जोग्रेन सिंड्रोम दिवस है। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के पंचकर्म विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजा सिंगला कई वर्षोंं से इस बीमारी पर शोध व उपचार कार्य कर रहे हैं। डा. राजा सिंगला का कहना है कि स्जोग्रेन सिंड्रोम एक चुनौतीपूर्ण रोग है, लेकिन असाध्य नहीं। इसलिए रोगी उम्मीद न छोड़ें क्योंकि आयुर्वेद में इसका समाधान है। इस बीमारी के रोगी सही मार्गदर्शन, समर्पण और धैर्य से फिर से स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। ऐसे कई प्रेरणादायक मामले हैं जहां मरीज एलोपैथिक दवाइयों पर निर्भर थे, लेकिन आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज करने के बाद वह स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। दैनिक सच कहूँ के विशेष संवाददाता देवीलाल बारना ने डा. राजा सिंगला से स्जोग्रेन सिंड्रोम के बारे में विस्तार से चर्चा की। हरियाणा के विभिन्न हिस्सों के अलावा राजस्थान, दिल्ली, यूपी, पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र व असम समेत पूरे भारत से ही मरीज आयुष विवि के पंचकर्म विभाग में इलाज कराने पहुंच रहे हैं।

    प्रश्न : स्जोग्रेन सिंड्रोम क्या है?

    उत्तर : स्जोग्रेन सिंड्रोम एक एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर अपनी ही ग्रंथियों को नुकसान पहुंचाता है। यह जटिल लेकिन उपेक्षित ऑटोइम्यून रोग है। इससे लार और आंसू बनाने वाली ग्रंथियां सबसे पहले प्रभावित होती हैं। इसी कारण मुंह में सूखापन, खाना निगलने या बोलने में कठिनाई, आंखों में जलन, थकान, जोड़ों में दर्द और सूजन जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। यह बीमारी अक्सर 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में पाई जाती है। ऐसे में समय रहते ध्यान न दिया जाए, यह फेफड़े, किडनी और नसों को भी प्रभावित कर सकती है। एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति में इस रोग का इलाज आमतौर पर स्टेरॉयड से शुरू किया जाता है, जो कई बार अन्य बीमारियों की जड़ बन जाते हैं। आयुर्वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह रोग के मूल कारण को पहचान कर उसका समग्र समाधान करता है। इसी दृष्टिकोण से हमने श्रोगेन सिंड्र्रोम पर कार्य करना प्रारंभ किया। आयुर्वेद में स्जोग्रेन सिंड्रोम को वातरक्त नामक व्याधि के रूप में समझा जा सकता है। इसके निदान के लिए नाड़ी परीक्षा भी एक महत्वपूर्ण जरिया है। इसके अलावा एएनए, एंटी एसएसए, एंटी एसएसबी जैसी जांच तथा लक्षणों के आधार पर किया जाता है।

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    आयुर्वेद की बड़ी ताकत, स्जोग्रेन सिंड्रोम जैसी लाईलाज बीमारी भी हो रही ठीक

    प्रश्न : आयुर्वेद में किस प्रकार इलाज संभव है?

    उत्तर : श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में पंचकर्म के माध्यम से इस बीमारी का सफल इलाज संभव हो पाया है। कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान के मार्गदर्शन में रोगियों को अच्छा उपचार मिल रहा है। अब तक 250 से अधिक स्जोग्रेन सिंड्र्रोम के रोगी पंचकर्म विभाग में उपचार के लिए पहुंचे। हर रोगी का इलाज उसके लक्षणों और एंटीबॉडी स्तर के अनुसार किया जाता है। मुख्य रूप से पंचकर्म चिकित्सा जिसमें बस्ती व अक्षितर्पण और यष्टिमधु, गुडूची, गूगल कल्प जैसी हर्बल औषधियों, रसायन चिकित्सा का प्रयोग किया जाता है। साथ ही योग, ध्यान और आहार-विहार पर भी जोर दिया जाता है। अधिकांश मामलों में एलोपैथिक दवाएं धीरे-धीरे कम कर दी जाती हैं और कई बार पूरी तरह बंद भी हो जाती हैं।

    प्रश्न : क्या आयुर्वेद में इलाज धीमा चलता है?

    उत्तर : लोग सोचते हैं कि आयुर्वेद धीमा है या केवल हेल्थ सप्लीमेंट जैसा है। जो पूरी तरह गलत है। पंचकर्म चिकित्सा से लोगों में काफी जल्दी आराम देखने को मिलता है। आयुर्वेद समयबद्ध और गहराई से काम करता है। विशेषत: क्रॉनिक रोगों में। इसके अलावा लोग इसे केवल जड़ी-बूटी तक सीमित समझते हैं, जबकि यह एक संपूर्ण जीवनशैली विज्ञान है। स्जोग्रेन सिंड्रोम के कई मरीज हमारे पास आने से पहले ही स्टेरॉयड ले रहे होते हैं। ऐसे मामलों में सावधानीपूर्वक आयुर्वेदिक दवाएं शुरू की जाती हैं और धीरे-धीरे स्टेरॉयड की खुराक कम की जाती है। बाद में मरीज पूरी तरह आयुर्वेदिक दवाओं पर स्थानांतरित हो जाता है। कई मरीजों में बाद में आयुर्वेदिक दवाएं भी बंद हो जाती हैं और मरीज कुछ परहेज के साथ बिना किसी दवा के पूरी तरह स्वस्थ जीवन जीने लगता है।