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    अनुकूल जलवायु और बेहतर मैनेजमेंट के चलते केले का उत्पादन बढ़ा, 14 इंच का केला भी पैदा हुआ

    बड़वानी (एजेंसी)। मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में अनुकूल जलवायु और बेहतर मैनेजमेंट के जरिए जहां केले का उत्पादन (Banana Production) बढ़ा है, वहीं 14 इंच लंबाई तक का केला पैदा करने में सफलता प्राप्त की गई है। बड़वानी जिले में राजाओं के काल से पपीता, केला, अमरूद आदि फलों की खेती को बढ़ावा दिया गया और इस परंपरा कोकिसानों में जारी रखा, उन्होंने जहां अन्य फलों के साथ केले की फसल का रकबा और उत्पादन बढ़ाया वहीं पहली बार 14 इंच लंबा केला उगाने में सफलता प्राप्त की है।

    बड़वानी के उद्यानिकी विभाग के उपसंचालक विजय सिंह ने बताया कि बड़वानी जिले में उन्नत किस्म का ग्रांड नाइन टिशू कल्चर केला ही उत्पादित किया जा रहा है, जिसके भाव भी अच्छे मिल रहे हैं। ये केले विभिन्न कंपनियों के माध्यम से देश के महानगरों समेत इराक, ईरान, दुबई समेत आधे दर्जन देशों में भी निर्यात हो रहा है। उन्होंने बताया कि बुरहानपुर जिले में केले का रकबा जरूर ज्यादा है, लेकिन वहां 50 प्रतिशत क्षेत्रफल में पारंपरिक रूप से सकर्स (जड़ के समीप उगे पौधे) या गठान के माध्यम से केले लगाए जाते हैं, शेष स्थान पर आधुनिक तकनीक के टिशु कल्चर केले लगाए एवं उत्पादित किए जा रहे हैं।

    उन्होंने बताया कि वर्ष 2018-19 में बड़वानी जिले में केले का रकबा 1481 हेक्टेयर था और इसका उत्पादन 111075 मीट्रिक टन था, 2019-20 में रकबा 1597 हेक्टेयर और उत्पादन 119775 मीट्रिक टन हुआ, यह बढ़कर 2021-22 में 2121 हैक्टेयर हो गया और उत्पादन 159075 मीट्रिक टन है।

    करीब 35 वर्षों से खेती कर रहे 14 इंच लंबा केला पैदा कर चर्चा में आये बड़वानी जिले के बगूद के किसान अरविंद जाट ने बताया कि उन्होंने रिलायंस मार्ट दिल्ली को 10 टन केला बेचने के अलावा हाल ही में विभिन्न कंपनियों के माध्यम से राक और ईरान भी केला बेचा है।

    उन्होंने बताया कि अपने सवा छह एकड़ खेत में जी-9 टिशु कल्चर केले के 9600 पौधे लगाए, जिस में औसतन प्रति पौधा 30 किलो फल आया। उन्होंने बताया कि वे विशेषज्ञों की राय लेकर बड़ी जतन से जमीन तैयार करते हैं और उसके बाद नियमित पोषण, फसल चक्र, ड्रिप इरिगेशन के माध्यम से सिंचाई और देखरेख से केले का उत्पादन करते हैं।

    जाट ने बताया कि उनके खेत में 13 से 14 इंच लंबे केलों के सैकड़ों पौधे हैं, और इस बार उनके केले (Banana Production) की औसतन लंबाई 12 इंच प्रति रही है, जो निर्यात के मापदंडों से बहुत बेहतर है। उन्होंने बताया कि 2017-18 से लगाए गए प्रत्येक केले के पौधे का रिकॉर्ड भी दर्ज कर रखा है, जिसमें उसमें लगने वाले फल की संख्या, वजन, लंबाई, वृक्ष की ऊंचाई आदि शामिल है। उन्होंने बताया कि कोरोना काल में प्रति वृक्ष 40 किलो उत्पादन प्राप्त किया था, लेकिन उक्त केले अभी उत्पादित के लोगों के मुकाबले कमजोर थे और ज्यादा मुनाफा नहीं बना था।

    उन्होंने बताया कि वर्तमान में अच्छे केले का भाव 1700 प्रति क्विंटल है और उन्हें प्रति एकड़ एक लाख की लागत के एवज में दो से तीन लाख का मुनाफा हो जाता है। उन्होंने उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों के साथ साथ कृषि विज्ञान केंद्र बजट्टा (बड़वानी) के वैज्ञानिकों को भी अपनी फसल का निरीक्षण कराने के अलावा 14 इंच लंबे केले को दिखाया। कृषक ने दावा किया कि इस क्षेत्र में अभी तक इतना लंबा केला पैदा नहीं हुआ।

    पहले महाराष्ट्र से गठान या सकर से केला उत्पादन किया जाता था

    कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ डीके जैन ने बताया कि बड़वानी जिले में पहले महाराष्ट्र से गठान या सकर से केला उत्पादन किया जाता था, लेकिन उस में लगी मिट्टी के जरिए माइक्रोब, फंगस व अन्य रोगजनक कीटाणुओं के आने की संभावना के चलते अब ॠ-9 टिशू कल्चर केला ही उत्पादित किया जा रहा है।

    उन्होंने किसान द्वारा 14 इंच के केले के उत्पादन (Banana Production) की पुष्टि करते हुए बताया कि सामान्य तौर पर ऐसी लंबाई देखने में नहीं आती, यह 8 से 10 इंच की ही होती है। उन्होंने बताया कि समय से पोषक तत्व (फर्टिगेशन), फलों की छटाई (थिनिंग), क्षेत्र में नर्मदा नदी का पानी, अनुकूल जलवायु और फसल चक्र इस उपलब्धि के लिए जिम्मेदार है।

    उन्होंने कहा उन्नत किसान केले की एक तथा शेष किसान दो या तीन फसल लेते हैं। पहली फसल करीब 11 महीने में तैयार होती है और सकर के सहायता से दूसरी व तीसरी फसल 9 से 10 महीने में तैयार हो जाती है, लेकिन उसके फल पहले के मुकाबले कमजोर होते हैं।

    उन्होंने बताया कि बड़वानी जिले में फल उत्पादन का परिदृश्य बदल रहा है और अब सबसे ज्यादा केला लगाया जाने लगा है। दूसरे स्थान पर अमरुद तथा तीसरे स्थान पर सीताफल है। उन्होंने बताया कि केले की फसल से शर्तिया फायदा होता है और गन्ने की तरह इसकी तीन फसलें ली जा सकती है। उन्नत किसान समझदारी से खेती कर प्रति एकड़ तीन लाख तक मुनाफा कमा रहे हैं।

    उन्होंने बताया कि तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में नेशनल रिसर्च सेंटर फार बनाना है। उनके वैज्ञानिकों के मुताबिक तमिलनाडु में 16 से 17 इंच का केला भी पैदा किया जा रहा है। कृषि विज्ञान केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डॉ आर एस बडोनिया ने बताया कि पूर्व में भी अच्छी लंबाई के केले हुए हैं, लेकिन हमारे पास उसका रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने बताया कि इजरायल के द्वारा रिसर्च के बाद तैयार की गई की गयी जी-9 वैरायटी को जलगांव स्थित जैन पाइप व ड्रिप इरिगेशन ने और उन्नत किया है।

    उन्होंने कहा कि जिले में इस बार तेज ठंड और तेज गर्मी की वजह से केले के वृक्ष पर कीटाणुओं का आक्रमण नहीं हो पाया, जिसके चलते उन्हें अच्छी ग्रोथ रही और फल भी पुष्ट लगे। उन्होंने कहा कि सही मैनेजमेंट और फर्टिगेशन से 14 इंच से अधिक लंबाई और बेहतर मोटाई भी प्राप्त की जा सकती है।

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