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    बढ़ते राकोषीय अवरोध की चुनौतियां एवं प्रबंधन योजना

    Challenges and management plan of growing fiscal blockade
    चालू वित्त वर्ष में केंद्र के राजकोषीय घाटे ने पहले के सभी अनुमानों को ध्वस्त कर दिया है। सरकार ने स्वीकार किया है कि राजकोषीय घाटा 2020-21 में भारी बढ़ोतरी के साथ सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 9.5 फीसदी पर पहुँच गया है।

    ज्ञात हो पूर्व में चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे का अनुमान 3.5 फीसदी लगाया गया था। वृद्धि में संकुचन, कमजोर राजस्व प्रवाह और कोरोना काल में सरकार की ओर से घोषित मझोले आकार के कई प्रोत्साहन पैकेजों को देखते हुए राजकोषीय खाके में बदलाव किया गया है। सरकार ने बजट में राजकोषीय घाटे के लिए नए लक्ष्य निर्धारित किए हैं। वित्त वर्ष 2022 के लिए केंद्र सरकार ने राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.8 प्रतिशत रखने का लक्ष्य बनाया है, जो धीरे-धीरे कम होकर अगले 4 साल में वित्त वर्ष 26 तक 4.5 प्रतिशत के नीचे पहुँच जाएगा।

    दूसरे शब्दों में एक साल में घाटे में 2.7 फीसदी अंक और पाँच साल में पाँच फीसदी अंक की कमी। सरकार के राजकोषीय घाटे में कमी लाने की योजना को व्यवहारिक तौर पर हासिल करना कितना संभव है? पिछली आधी सदी में केंद्र सरकार राजकोषीय घाटे में कभी भी एक साल में 2.7 फीसदी अंक या 5 साल में पाँच फीसदी अंक की कमी नहीं कर पाई है। स्पष्ट है कि उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति आसान नहीं है।

    यहां तक कि वैश्विक वित्तीय संकट के बाद के वर्षों में भी सरकार का राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2007-08 में जीडीपी के 2.54 फीसदी से बढ़कर 2008-09 में 6.1 फीसदी और 2009-10 में 6.6 फीसदी पर पहुंच गया था। वित्त वर्ष 2010-11 में राजकोषीय घाटा 4.9 फीसदी रहा यानी इसमें 1.7 फीसदी अंक की कमी आई। 2020-21 में भी राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी पिछले वित्त वर्ष से 4.9 फीसदी अधिक रही।

    अगर सरकार 2021-22 में अपने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.8 फीसदी पर लाने में सफल रही तो घाटे में कमी का स्तर 2.7 फीसदी अंक रहेगा। चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे का 9.5 फीसदी रहने का जो अनुमान बजट 2021-22 में लगाया, उससे स्पष्ट है कि ये छोटे आँकड़े नहीं हैं और इन्हें सार्वजनिक कर्ज में अहम बढ़ोतरी के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सार्वजनिक कर्ज चालू वित्त वर्ष में जीडीपी के करीब 90 फीसदी पर पहुँचने के आसार हैं।

    इस चीज पर गौर करना महत्वपूर्ण है कि घाटा आगामी वर्षों में भी ऊँचे स्तरों पर रहेगा क्योंकि नई राजकोषीय राह काफी उदार है। 15वें वित्त आयोग के अनुमानों के मुताबिक सरकारी कर्ज निकट भविष्य में अधिक रहेगा और यह वर्ष 2025-26 में 87.7 फीसदी अनुमानित है। कर्ज का ऊंचा स्तर वृहद आर्थिक जोखिम बढ़ाएगा। हालांकि यह सही है कि कर्ज का स्तर काफी हद तक कोविड के बाद भारत में वृद्धि पर निर्भर करेगा। अगर राजकोषीय घाटे के वास्तविक आँकड़ों के हिसाब से देखा जाए तो इसमें कमी का स्तर तेज रहेगा। अब सरकार के बजट दस्तावेज दिखाते हैं कि कम से कम 2016-17 में उसके राजकोषीय घाटे के आँकड़ों को कम दिखाया गया।

    उदाहरण के लिए 2016-17 और 2017-18 में प्रत्येक वर्ष में आधिकारिक आंकड़े जीडीपी के 3.5 फीसदी थे। मगर इन दोनों वर्षों में बजट से इतर उधारी के असर समेत वास्तविक आंकड़ा जीडीपी का 4.01 फीसदी रहा। बाद के दो वर्षों में राजकोषीय घाटे के मुख्य आधिकारिक आंकड़े और वास्तविक घाटे के बीच खाई चौड़ी हो गई। वित्त वर्ष 2018-19 में दिखाया गया कि आधिकारिक मुख्य राजकोषीय घाटा घटकर जीडीपी के 3.4 फीसदी पर आ गया, लेकिन अब वास्तविक आँकड़े दशार्ते हैं कि यह बढ़कर जीडीपी का 4.26 फीसदी रहा।

    कुछ विशेषज्ञ यह भी तर्क दे रहे हैं कि अगले वर्ष अर्थव्यवस्था के उबरने से सरकार के राजस्व में अप्रत्याशित वृद्धि होगी। इसमें 14.4 फीसदी की नॉमिनल बढ़ोतरी का अनुमान है। अगर यह मानकर चलते हैं कि महंगाई करीब 4 फीसदी रहेगी,तो वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 10 फीसदी से थोड़ी अधिक रहेगी। लेकिन सरकार के राजस्व अनुमान इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। इनमें कहा गया है कि सकल राजस्व संग्रह 2021-22 के दौरान मामूली बढ़ोतरी के साथ जीडीपी का 9.9 फीसदी रहेगा,जो चालू वित्त वर्ष में 9.8 फीसदी अनुमानित है। अनुमानित दर पर भी अगले वर्ष कर उछाल का लक्ष्य 1.16 फीसदी है,लेकिन यह मुश्किल लक्ष्य है। गैर कर राजस्व भी जीडीपी का महज एक फीसदी बना रहेगा।

    असल में कर और गैर कर राजस्व बढ़ाने के सरकार के प्रयास पिछले 5 साल में अपर्याप्त रहे हैं। आगामी वर्ष में राजस्व व्यय में संकुचन तेज रहेगा। इस तरह पूँजीगत व्यय में बढ़ोतरी के बावजूद जीडीपी में सरकार के कुल व्यय का हिस्सा चालू वर्ष में 18 फीसदी से घटकर अगले साल करीब 16 फीसदी रहेगा। यह व्यय में अप्रत्याशित संकुचन है। यह चालू वर्ष में सरकार के कुल व्यय में रिकॉर्ड 28 फीसदी बढ़ोतरी के मुकाबले महज करीब एक फीसदी बढ़ोतरी साबित होगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अगले साल अपने राजस्व व्यय को घटाने में सक्षम है। अभी मांग में वृद्धि के लिए सरकार को अपने खर्च मेंं वृद्धि लगातार जारी रखनी होगी।

    निष्कर्ष: इस बात के आसार हैं कि राजकोषीय अवरोध अंतत: सार्वजनिक कर्ज में भी वृद्धि करेंगे। संभावित जोखिमों के मद्देनजर रखते हुए सरकार ने सतर्क रूख अपनाया है। ज्यादा कर्ज भार और ब्याज देनदारी बढ़ने से पूँजीगत और सामाजिक क्षेत्र व्यय कम हो जाएगा। इसका वृद्धि की संभावनाओं पर सीधा असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए वित्त वर्ष 2022 में केंद्र सरकार के कर राजस्व का 52 फीसदी हिस्सा ब्याज चुकाने में चला जाएगा। कर्ज और बजट घाटे के ऊँचे स्तर से सरकार की किसी आर्थिक झटके से उबरने के उपायों की क्षमता सीमित हो जाएगी। इसके अलावा सरकार के लगातार उधारी लेने से ब्याज की दरें प्रभावित होंगी। ऊँची ब्याज दरों का आर्थिक सुधार पर असर पड़ सकता है। वैश्विक स्तर पर कम ब्याज दरों के चलते विकसित अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा उदार राजकोषीय नीति अपना रही हैं।

    भारत उच्च ब्याज दर के कारण उसी रास्ते को अपनाने में सक्षम नहीं है। उदाहरण के लिए महंगाई अब भी एक चिंंता है और मोटा कर्ज किसी विकासशील देश में जल्द अस्थिरता पैदा कर सकता है। इस तरह ऊँचे सार्वजनिक कर्ज को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए स्थायी अवरोध बनाने के बजाए सरकार को राजस्व जुटाने की अपनी अक्षमता का हल निकालना चाहिए। भारत का कर जीडीपी अनुपात वर्षों से स्थिर बना हुआ है। राजकोषीय घाटे के प्रबंधन की कुँजी मूलत: सरकार के राजस्व वृद्धि पर आधारित है।

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