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    नौकरशाही आकर्षित करती है परन्तु उसका भ्रष्ट आचरण पीड़ाजनक

    Corruption

    सफलताएं दुनिया को आकर्षित ही नहीं, प्रेरित भी करती हैं। माता-पिता की कॉलर ऊंची तभी होती है, जब उनका बेटा या बेटी सिविल सेवा में जाता है। इन अर्थों में संघ लोक सेवा आयोग की 2020 की परीक्षा में शीर्ष पर रहे बिहार के कटिहार निवासी शुभम की कहानियों से युवाओं का प्रभावित होना स्वाभाविक है। बिहार में नागरिक सेवा के प्रति अरसे से उत्साह रहा है। यदि बच्चा सिविल सेवा में नहीं जा सका, तो दूसरी सरकारी नौकरियां उसके गर्वबोध का जरिया बनती हैं। बिहार में सिविल सेवा और सरकारी नौकरियों के प्रति रुझान ज्यादा है। हर साल बिहार के बहुत सारे लड़के-लड़कियां सिविल सेवा, पुलिस सेवा, विदेश सेवा, अन्य सेवा अ­ादि में शामिल होते हैं। यहां याद आती है संविधान सभा में अनुच्छेद-310 और 311 को लेकर हुई बहस। पहले अनुच्छेद के तहत सिविल सेवकों के अधिकार तय किये गये हैं।

    दूसरे अनुच्छेद के तहत उन्हें चुनने वाले लोक सेवा आयोग की व्यवस्था है। बहस में संविधान सभा के कई सदस्यों ने आशंका जतायी थी कि सिविल सेवकों को गांधी जी के सपनों के मुताबिक लोक सेवक बनाने के लिए संवैधानिक संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे भी अंग्रेज अधिकारियों जैसा तानाशाही रुख अपनायेंगे। नौकरशाही को जर्मन विचारक मैक्सवेबर ने व्यवस्था का स्टील फ्रेम कहा है। सरदार की वकालत पर नौकरशाही को मिले संवैधानिक संरक्षण ने कहीं ज्यादा मजबूत बना दिया है। हमारी शासन प्रणाली काफी हद तक ब्रिटिश संसदीय पद्धति की फोटोस्टेट प्रति जैसी है। ब्रिटेन में नौकरशाही के बारे में कहा जाता है, येस मिनिस्टर। भारत में भी कुछ ऐसा ही है। आम धारणा भी बन गयी है कि राजनीतिकों को बिगाड़ने में नौकरशाही ने ज्यादा भूमिका निभायी है।

    गांधी की लोकसेवक बनने की धारणा अब सिर्फ किताबों की बातें हैं। सफलताओं की कहानियों पर प्रभावित होना भी चाहिए। इससे भावी पीढ़ियों का उत्साह वर्धन होता है, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सफलता की ये कहानियां अपने रचे जाने के दौर में कैसे सपने दिखाती हैं और बाद में वे कैसी हो जाती हैं। संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोगों की परीक्षाओं से उभरी सफल गाथाएं अक्सर किताबी ही क्यों रह जाती हैं, इस पर भी चर्चा होनी चाहिए। नौकरशाहों के घरों पर पड़ने वाले छापों और वहां से निकलने वाली अकूत संपत्तियों की कहानियां भी याद रखनी होगी। तभी सफलता की कहानियों को उन लक्ष्यों के प्रति जागरूक रखा जा सकेगा, जिनका जिक्र आयोग के साक्षात्कार बोर्ड के सामने किया गया है।

     

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