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    चिंता का सबब है भीड़ की हिंसा

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    सुप्रीमकोर्ट अलवर जिले में हाल ही में गौ तस्करी के संदेह में एक व्यक्ति की पीटकर हत्या के मामले में राजनीति उबाल पर है। पिछले कुछ समय में ऐसी घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। वास्तव में भीड़ की हिंसा एक ऐसा अपराध है, जो अलग-अलग कारणों से अंजाम दिया जाता है। कभी भीड़ अनायास उग्र होकर हिंसा पर आमादा हो जाती है तो कभी उसे सुनियोजित तरीके से भड़काया जाता है। अक्सर ऐसी अराजकता में राजनीतिक दलों के लोग भी शामिल होते हैं। इधर, किस्म-किस्म के स्वयंभू संगठन भी बेलगाम हो रहे हैं। यह किसी से छिपी नहीं कि अक्सर ऐसे संगठनों को किसी न किसी राजनीतिक दल का समर्थन हासिल होता है। कई बार अफवाह के चलते भी भीड़ का हिंसक और बर्बर रूप देखने को मिलता है भारत में भीड़ की हिंसा एक पुरानी समस्या है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उससे निबटने के नये उपाय न किये जायें। भीड़ की हिंसा के खिलाफ सख्ती की जरूरत है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया सेवा प्रदाताओं को फर्जी खबरों और अफवाहों पर रोक लगाने का तंत्र बनाने को कहा है, क्योंकि उस मानसिकता को भी दूर करने की जरूरत है, जिसके चलते लोग कानून हाथ में लेने को तैयार रहते हैं।

    भीड़ की हिंसा किसी की हत्या करे, उसकी सजा फांसी होनी चाहिए। भीड़तंत्र आतंकवाद के शासन की तरह है। असहिष्णुता, वैचारिक प्रभुत्व और पूर्वाग्रह को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं, बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कानून को नागरिक अपने हाथों में नहीं ले सकता। जीने का मौलिक अधिकार भी कोई छीन नहीं सकता। भीड़तंत्र को देश का कानून रौंदने की इजाजत नहीं दी जा सकती। भीड़ की हिंसा से देश प्रभावित हो रहा है। किसी भी दूसरे के सम्मान को चोट पहुंचाने का किसी का भी अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने ये कठोर टिप्पणियां हिंदू-मुसलमान के मद्देनजर नहीं, बल्कि इंसानियत की हिफाजत के संदर्भ में की हैं। शीर्ष अदालत ने सिर्फ चार सप्ताह का वक्त दिया है। उसने संसद को कानून बनाने का निर्देश दिया है और इसी अवधि में केंद्र-राज्य सरकारों को भीड़ की हिंसा के खिलाफ कानून लागू करने को कहा है।

    संसद का मानसून सत्र शुरू हो चुका है, लिहाजा प्रत्येक सांसद पर दबाव होगा कि भीड़तंत्र को काबू करने के मद्देनजर कानून बनाया जाए। अभी तक असम में 15, झारखंड में 11, महाराष्ट्र में 10, आंध्र-तेलंगाना में 8, त्रिपुरा में 3, मेघालय में 8, नगालैंड में 2, बंगाल में 4, उप्र में 4, राजस्थान में 4 मौतें सिर्फ भीड़ की हिंसा के कारण हुई हैं। ये कुछ आंकड़े बताने का मकसद है कि लगभग पूरे देश में हत्यारी भीड़ के उग्र प्रदर्शन जारी हैं। किसी राज्य-विशेष पर उंगली नहीं उठाई जा सकती।

    हमें यकीन है कि हम न तो भेड़ियातंत्र का हिस्सा हैं, न ही हिंदुस्तान को ‘तालिबान’ बनाया जा सकता है और न कोई सरकार या राजनीतिक पार्टी ‘कत्ल के लाइसेंस’ बांट सकती है। हम महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी और गांधी का महान अहिंसक देश हैं। भीड़ का कोई चरित्र और चेहरा नहीं होता। भीड़ और अफवाहों के आधार पर हिंसक होना और इनसानियत को लहूलुहान करना एक प्रवृत्ति है, जो बीते कुछ सालों में बढ़ी है। इसके लिए सिर्फ भाजपा-संघ परिवार पर दोष नहीं मढ़ा जा सकता, क्योंकि कानून-व्यवस्था राज्य का मामला है। बीते एक दशक के दौरान हिंसक भीड़ ने 86 से ज्यादा हत्याएं की हैं और करीब 300 लोग घायल हुए हैं। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप कर हमारे देश और समाज पर मेहरबानी की है, लेकिन अफसोस है कि भीड़तंत्र पर कानून बनाना सरकार की तय विधायी सूची में नहीं है।

    अलबत्ता कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने भीड़ की हिंसा पर चर्चा करने का आग्रह जरूर किया है। यदि संसद में इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा होती है, तो क्या उसी आधार पर बिल तैयार किया जा सकता है? देश और विषय के विशेषज्ञों और अपार जनसमूह के अभिमत को जाने बिना एक सर्वसम्मत कानून कैसे बनाया जा सकता है? सवाल यह भी है कि सिर्फ कानून के जरिए हिंसक भीड़ पर काबू पाया जा सकता है? क्या ऐसे कानून का खौफ भीड़तंत्र या भेड़ियातंत्र के लिए संभव होगा? कर्नाटक में किसी को पीट-पीट कर मार दिया जाता है, महाराष्ट्र में धुले, असम की गुवाहाटी, औरंगाबाद, तमिलनाडु यानी देश के हिस्से-हिस्से में किसी को बच्चा चोर के शक में, किसी को गोमांस के आरोप में या किसी को लव जेहाद के मद्देनजर पीट-पीट कर मार दिया जाता रहा है। क्या एक केंद्रीय कानून ऐसी प्रवृत्तियों वाली भीड़ को रोक सकता है?

    आईपीसी में अब भी कुछ धाराएं हैं, जिनके तहत कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन सैकड़ों की भीड़ के सामने पुलिस के कुछ ही जवान क्या कर सकते हैं? अधिकांश मामलों में हत्या होने के बाद पता चलता है। पुलिस या कोई भी बल भीड़ के आगे-पीछे नहीं चल सकता। इन हत्याओं की नाजुकता को लेकर राज्य सरकारों के दृष्टिकोण भी भिन्न रहे हैं। कानून के बावजूद क्या किया जा सकता है? बहरहाल संसद कानून बनाने की पहल तो करे। कांग्रेस समेत विपक्ष मोदी सरकार का सहयोग करे, संसद में गतिरोध न हो और कमोबेश इस मुद्दे पर बहिष्कार या बहिर्गमन न हो। ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना भी नहीं की जा सकती।

    गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बीते सोमवार को लोकसभा में यह जानकारी दी।  लोकतंत्र में आम जनता को विरोध और प्रदर्शन करने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन जब यही भीड़ हिंसक रूप धारण कर किसी की हत्या कर दे या सार्वजनिक संपत्तियों को क्षति पहुंचाये तो यह सामाजिक अपराध समझा जाना चाहिए। भीड़ का उपयोग कर राजनीतिक दल तथा शक्ति संपन्न लोग समाज में दंगा-फसाद करवा कर अपना काम निकलवाते हैं और सोचनेवाली बात तो यह है कि भीड़ पर कोई दंडात्मक कार्रवाई भी नहीं की जा सकती है। इस नियम में सुधार करने की सख्त जरूरत है, क्योंकि भीडतंत्र कब आपराधिक रूप धारण कर ले कहना मुश्किल है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भीड़तंत्र से निपटने के लिए गाइडलाइन जारी किया और सरकार को इसके लिए कानून बनाने को कहा है। जनतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन एक सीमा में रहकर।

    सर्वोच्च न्यायालय का केंद्र सरकार को भीड़ की गुंडागर्दी पर शिकंजा कसने और इससे निपटने के लिए उपचारात्मक और दंडात्मक दिशा-निर्देश जारी करना सराहनीय कदम है। पिछले कुछ सालों से भीड़ की करतूतों की वजह से कुछ बेगुनाह लोग भी मारे जा रहे हैं। देश में गुंडागर्दी इस कदर बढ़ रही है कि आम आदमी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। इस आशंका को रद्द नहीं किया जा सकता है कि गुंडागर्दी फैलाने वाले तत्त्वों को नेताओं का संरक्षण न मिलता हो। हाल में हुए बच्चा चोर शक में दिव्यांग महिला की पिटाई दुखद घटना है। हाल में ही स्वामी अग्निवेश का भीड़ की पिटाई का शिकार होना और इसमें किसी दल के कार्यकतार्ओं एवं उस दल के विद्यार्थी संगठन का हाथ होना दुर्भाग्य की बात है। इन वारदातों की निंदा होनी चाहिए और ऐसे दलों को उनके किए की सजा भी मिलनी चाहिए। कथित राजनीतिक दलों को शर्म आनी चाहिए, जो ऐसी हरकतें करके राजनीति को चमकाने की होड़ में होते हैं। सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह इस तरह के तमाम मामलों में सख्त कार्रवाई करे, ताकि फिर से किसी निर्दोष को इसका शिकार न होना पड़े।

    राजेश माहेश्वरी

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