मुजफ्फरनगर (सच कहूँ न्यूज़ )। मुजफ्फरनगर के गांव सिसौली स्थित किसान भवन में चल रही चार दिवसीय कृषि कार्यशाला के तीसरे दिन पद्मश्री कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुभाष पालेकर ने प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों और तकनीकों पर किसानों को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी जीवित प्राणी,मानव, पशु-पक्षी या पौधे में बाहरी मानव निर्मित तत्वों को अपनाने की क्षमता नहीं होती, और रासायनिक खेती में डाली गई दवाइयां पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर करती हैं।
डॉ. पालेकर ने शत्रु और मित्र कीटों के संतुलन की प्राकृतिक व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा कि मित्र कीट परभक्षी और परजीवी कीटों की संख्या नियंत्रित कर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
प्राकृतिक कृषि (एसपीके ) पद्धति के बारे में भी जानकारी
उन्होंने किसानों को जैविक कृषि, वैदिक कृषि, योगिक कृषि और सुभाष पालेकर प्राकृतिक कृषि (एसपीके ) पद्धति के बारे में भी जानकारी दी। एसपीके के मुख्य घटक में बीजामृत, जीवामृत, घन जीवामृत, आच्छादन, वाफसा और अंतरफसलों की जैव विविधता शामिल हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि ट्रैक्टर से जुताई करने पर मिट्टी के लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जबकि लकड़ी के हल से जुताई करने पर जीवाणु सुरक्षित रहते हैं।
जीवामृत बनाने की विधि भी विस्तार से बताई
कार्यशाला में डॉ. पालेकर ने जीवामृत बनाने की विधि भी विस्तार से बताई। इसके लिए देसी गाय का गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन या दाल का आटा, खेत की मिट्टी और पानी का उपयोग किया जाता है। 48 घंटे तक छाया में रखने के बाद जीवामृत तैयार हो जाता है और हर 15 दिन में इसके प्रयोग से फसल की वृद्धि में सुधार देखा जाता है। उन्होंने देसी गाय के महत्व पर विशेष बल दिया, क्योंकि भारतीय कृषि और पर्यावरण के लिए यह सबसे अनुकूल है।
प्राकृतिक खेती ही किसानों का भविष्य:युद्धवीर सिंह
कार्यक्रम में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह ने कहा कि प्राकृतिक खेती ही किसानों का भविष्य है, जिससे लागत कम और आय बढ़ाई जा सकती है। कार्यशाला में पंजाब से आए किसान हरिंदर सिंह लाखोवाल सहित विभिन्न राज्यों के किसान, पदाधिकारी और कृषि विशेषज्ञ बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने प्राकृतिक खेती को अपनाने और इसे गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया।















