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Saturday, February 7, 2026
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    सरकारी कोष नेताओं की निजी जागीर नहीं

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    लगता है वोट की राजनीति देश को बर्बाद करके ही छोड़ने वाली है। इसने तो अपराधी और कानून के मानने वालों में अंतर समझना ही बंद कर दिया। अपराधियों और कुपात्र की मदद के नाम पर सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने के लिए देश की दूसरी संस्थाओं को आगे आना होगा। गत दिवस पंजाब की चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार ने निर्णय लिया है कि 26 जनवरी को लाल किले पर हुए उपद्रव में गिरफ्तार 83 लोगों को वह दो-दो लाख रुपये की मदद करेगी। केंद्र द्वारा संसद में पारित तीनों कृषि कानून को उसने लागू न करने का भी निर्णय लिया है। पंजाब सरकार इस उपद्रव में मरने वाले दो लोगों को पहले ही पांच-पांच लाख रुपये दे चुकी है। यह सब क्या हो रहा है?

    राजनीति में यह बहुत बुरा चलन शुरू हो गया है। मदद के लिए दिया जाने वाला धन किसी मुख्यमंत्री की निजी संपत्ति नहीं होती, राजकीय कोष होता है। प्रदेश और देश के जिम्मेदार नागरिकों द्वारा दिए गए टैक्स से संग्रह हुआ धन है, इसको इस तरह से लुटाने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। मुख्यमंत्री या किसी मंत्री के निर्णय को उचित-अनुचित बताने वाली कार्य पालिका मौजूद है। संबंधित अधिकारी हैं। उन्हें इसे रोकना चाहिए। क्योंकि जिम्मेदारी उनकी बनती है, किसी मंत्री या मुख्यमंत्री की नहीं। केंद्र द्वारा प्रदेश में राज्यपाल इसीलिए बैठाए जाते हैं कि वह सरकार के गलत और सही निर्णय पर विचार करें। गलत निर्णय पर रोक लगाएं। इसके ऊपर संसद और राष्ट्रपति हैं। न्यायपालिका गलत और सही निर्णय का परीक्षण करने के लिए है।

    लखीमपुर खीरी में हुए प्रदर्शन के दौरान हुई मौत में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रत्येक मरने वाले के परिवार को 45-45 लाख रुपये दिये। फिर इनको पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने क्यों 50-50 लाख रुपए अपने प्रदेश के कोष से दिया? पंजाब और छत्तीसगढ़ के प्रदेश का धन दूसरे प्रदेशों में लुटाने का अधिकार इन प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को किसने दिया? स्वत: संज्ञान लेने वाली न्यायपालिका को इस पर विचार करना चाहिए। पंजाब समेत पांच प्रदेशों में चुनाव होने वाले हैं। मदद करनी है तब नेता अपनी जेब से करें। अपने निजी पैसे से करें। किसी उपद्रवी की मदद करनी है तब प्रदेश के आम नागरिकों के नुक्सान पर दिये जाने वाले मुआवजे की राशि पीड़ित नागरिक को उपद्रवियों की राशि से दुगनी राशि दी जाए, नहीं दी जाती तब आमजन द्वारा स्वार्थी नेताओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए।

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