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    रूस पर प्रतिबन्धों से भारत पर भी पड़ेगा असर

    व्लादिमीर पुतिन के यूक्रेन के दोनबास क्षेत्र के दोनेत्सक और लुहांस्क को अलग देश के रूप में मान्यता देने के बाद अमेरिका, यूरोपीय देशों, जापान, आॅस्ट्रेलिया और कनाडा ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा की है। इन पाबंदियों के कारण रूस के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से फंड जुटाना मुश्किल हो गया है। जर्मनी ने रूस के साथ एक अहम गैस पाइपलाइन पर काम रोक दिया है। इन पाबंदियों का असर भारत पर भी पड़ेगा। खासतौर पर, हथियारों की खरीद पर। भारत के लिए रूस 60 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है। अब अमेरिका, भारत पर रूस से हथियार ना खरीदने का दबाव बढ़ा सकता है।

    इसकी आंच एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम सौदे पर भी पड़ सकती है। वहीं दूसरी तरफ ब्रेंट ब्लेंड क्रूड आॅइल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है, जो वर्ष 2014 के बाद सर्वाधिक है। इस युद्ध का प्रभाव भारत में भी कच्चे तेलों पर दिखेगा, क्योंकि भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग पूरी तरह से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। भारत में कुछ राज्यों में फिलहाल चुनाव चल रहा है, जिसके कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जा रही है, लेकिन चुनाव के बाद इनकी कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिल सकती है। कच्चे तेल की कीमत में तेजी का राजकोषीय घाटा पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अब पेट्रोलियम सब्सिडी गैस सिलेंडर तक सीमित रह गई है। वित्त वर्ष 2023 के लिए रसोई गैस सिलेंडर पर 5,812 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि चालू वित्त वर्ष में यह 6,517 करोड़ रुपये था। मौजूदा संकट से इतर, केवल वर्ष 2021 में भारत में कच्चे तेल की कीमत में 21 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है।

    वैसे, भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत में वृद्धि का कारण सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ज्यादा कीमत नहीं है। इसके अलावा, भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने रूस में करीब 14 अरब डॉलर का निवेश किया हुआ है, जिसके इस प्रतिबंध से प्रभावित होने की आशंका है। इन पाबंदियों से रूस और भारत के बीच 10 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार पर भी आंच आ सकती है, जिसे 2025 तक दोनों देशों ने बढ़ाकर 25 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। अभी तक पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल नहीं किया है। जीएसटी में शामिल करने से इनकी कीमत में एकरूपता आ सकती है। इस तरह,पेट्रोल-डीजल की कीमत को कम करना पूरी तरह से केंद्र, राज्य सरकार, विपणन कंपनियां, डीलर आदि के हाथों में है, लेकिन फिलवक्त, कोई अपने हिस्से की कमाई को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है और ऊपर से मुद्रास्फीति में भी इजाफा हो रहा है। इधर, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है।

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