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    भाग्यशाली को मिलता है सच्चा गुरु: पूज्य गुरु जी

    Anmol Vachan, True Saint

    सरसा। पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि पीर-फकीर, गुरु, मुर्शिदे-कामिल, जो प्रभु से मेल करवा दे, सच्ची बात बता दे, वो बहुत ही भाग्यशाली को मिलता है। वरना इस घोर कलियुग में हर इन्सान किसी न किसी का गुरु बना फिरता है। गुरु, पीर-फकीर की महिमा हमारे सभी पवित्र ग्रंथों में खूब बढ़-चढ़कर बताई गई है, जोकि 100 प्रसेंट सच है। पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि गुरु शब्द में, ‘गु’ का मतलब है ‘अंधकार’ और ‘रु’ का मतलब है ‘प्रकाश’। यानी जो अज्ञानता रूपी अंधकार में ज्ञान रूपी दीपक जला दे, वही सच्चा गुरू होता है। सच्चा गुरु आपसे आपकी जमीन-जायदाद, रूतबा, शोहरत आदि किसी भी तरह का कोई गर्ज नहीं रखता। गुरु को आपसे सिर्फ यही गर्ज होती है कि आपको कोई दु:ख, परेशानी न आए, आप जन्म-मरण में न उलझे रहें, निंदा-चुगली तकरार में ही जीवन न गुजार दें।

    संत जीवों को यही समझाते हैं कि कैसे जीवन की तमाम परेशानियों से बचा जा सकता है और वो भी ऐसे समय में जिसे घोर कलियुग कहते हैं। आप जी ने फरमाया कि घोर कलियुग में लोग सुमिरन करना फिजूल समझते हैं। निंदा, चुगली, झूठ बोलना हो, गपशप मारना हो तो सारा-सारा दिन लोग करते रहते हैं, लेकिन राम का नाम लेना हो, भक्ति-इबादत करनी हो, तो उसके लिए घंटा भर में ऐसे लगता है कि जैसे कोई बोझ उठाना हो। ऐसे दौर में पीर-फकीर अपने सतगुरु, मौला से हमेशा दुआएं करते रहते हैं सारी सृष्टि के लिए, मालिक की औलाद के लिए और मुरीद सबसे ऊपर होते हैं। जो मालिक को मानने वाले हैं, उनके लिए फकीर दुआएं करते हैं कि हे मालिक! पता नहीं ये कब से तेरे से बिछुड़े हैं। इनका दोष यही रहा कि इन्होंने आपका हुक्म नहीं माना, आपको नहीं पहचाना, पर इसका फल भी इनको मिल चुका है।

    पता नहीं कितनी सदियां, युग हो गए तड़पते हुए, भटकते हुए, काल की मार सहते हुए। हे दयाल! हे दया के सागर! अब ये तेरे से जुड़े हैं। अब ये लोग तेरी भक्ति करने लगे हैं। ठीक है, ये कलियुग जीव हैं, उतने वचन नहीं मान पाते, उतना सुमिरन नहीं कर पाते! पर तुझे लाज है अपनी औलाद की, क्योंकि तू इनका रूप है और ये तेरे रूप हैं! इनको वापिस ले जाने का सब तेरा ही जिम्मा है। हे परवरदिगार! इन्हें क्षमा कर! इनकी खताओं को माफ कर दे! और अपनी दया-मेहर, रहमत से इनको मालामाल कर दे! गुरु, पीर-फकीर डायरेक्ट-इनडायरेक्ट मालिक से दुआ करते रहते हैं और ऐसा होता नहीं कि मालिक दुआ को न सुने। वो पीर-फकीर की बात को जरूर सुना करते हैं।

     

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