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Tuesday, February 24, 2026
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    अनुच्छेद 370: संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर पर 55 साल बाद आज बैठक, पाक की शिकायत पर चीन ने चर्चा की मांग की थी

    United Nations

    कश्मीर मुद्दे को दुनिया के सामने उठाने के लिए पाक के विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिखा था

    चीन ने पाक का समर्थन करते हुए यूएनएससी से बंद कमरे में बैठक कराने का अनुरोध किया

    न्यूयॉर्क। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के भारत के फैसले पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में आज चर्चा होगी। यूएनएससी की अध्यक्ष जोआना रोनेका ने बुधवार को बताया था कि भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से विशेष दर्जा वापस लिए जाने के बाद चीन ने इस सत्र को कराने के लिए औपचारिक निवेदन किया। चीन सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।

    रोनेका ने बताया था कि अगर परिषद के सभी सदस्य मौजूद रहते हैं तो सत्र शुक्रवार यानी 16 अगस्त को बुलाया जा सकता है। इससे पहले पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने यूएन को पत्र लिखकर भारत के कश्मीर को लेकर लिए गए निर्णय पर तत्काल एक सत्र बुलाने का अनुरोध किया था। चीन ने पाक का साथ देते हुए इस मामले पर गुप्त बैठक की बात कही।

    यूएन में कश्मीर पर 55 साल पहले हुई थी चर्चा

    यूएन रिकॉर्ड्स के मुताबिक, सुरक्षा परिषद ने पिछली बार जम्मू कश्मीर मुद्दे पर 1964 में चर्चा की थी। 16 जनवरी 1964 के एक पत्र में यूएन में पाक के प्रतिनिधि ने कश्मीर पर तत्काल बैठक बुलाने के लिए कहा था। इसमें भी कश्मीर के विशेष दर्जे को लेकर ही शिकायत की गई थी।

    भारत के कदम को संवैधानिक बता चुका है रूस

    चीन की यात्रा से लौटने के बाद पाकिस्तानी विदेश मंत्री कुरैशी ने कहा था कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने यूएनएससी में पूरा समर्थन देने का भरोसा दिया था। दूसरी तरफ परिषद के एक और स्थायी सदस्य रूस ने भारत के कदम को संवैधानिक बताया था। उसने कहा था कि कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है और इसी तरह से सुलझाया जाना चाहिए। संयुक्त अरब अमीरात ने भी इसे भारत का आंतरिक मामला कहा था।

    किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन नहीं किया: भारत

    पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे को सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की लगातार कोशिश करता रहा है और वह इस मामले में विश्व समुदाय को शामिल करने का प्रयास करता रहा है। पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि भारत के अनुच्छेद 370 हटाने के कदम से न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति को खतरा उत्पन्न हुआ है। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया था कि यह उसका आंतरिक मामला है और उसने किसी भी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया है।