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    भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक

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    भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक लगातार जारी है। ताजा घटनाक्रम में केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड यानी सीबीआईसी ने भ्रष्टाचार और अन्य आरोपों के चलते 22 सीनियर अफसरों को जबरन सेवानिवृत्त किया है। सीबीआईसी वैश्विक स्तर पर जीएसटी और आयात कर संग्रह की निगरानी करता है। इस साल जून से तीसरी बार भ्रष्ट कर अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है। भारत में वैसे तो अनेक समस्याएं विद्यमान हैं जिसके कारण देश में विकास की रफ्तार धीमी है। लेकिन तमाम समस्याओं में से भ्रष्टाचार की समस्या देश के विकास को सर्वाधिक बाधित कर रही है। भ्रष्टाचार की समस्या से सारा देश परेशान है। वास्तव में पिछले 70 सालों से भ्रष्टाचार का कीड़ा लोकतंत्र की जड़ो को खोखला करने का काम कर रहा है। अब मोदी सरकार ने इस कीड़े को मारने की कार्रवाई शुरू कर दी है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार पर प्रहार का वादा देशवासियों से किया था और कहा था कि ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार यह बयान दोहराया था-जिन्होंने देश को लूटा है, उन्हें पाई-पाई लौटानी पड़ेगी। 2014 से अब तक कइयों को जेल के दरवाजे तक भेज चुका हूं। कुछ जमानत पर हैं या कुछ कोशिश में इधर-उधर भाग रहे हैं, लेकिन अगले पांच साल में उन्हें जेल में डालने का वक्त है।

    देश की जनता से किये इस वादे पर आगे बढ़ते हुए अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। पिछले महीने एक बड़े खुलासे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में यह जानकारी देते हुए बताया है कि सरकार ने एफआर 56 (जे) के तहत ग्रुप ए के 36,756 और ग्रुप बी के 82,654 अधिकारियों के व्यवहार और कामकाज की पड़ताल की थी। लगभग 1.20 लाख अधिकारियों की यह समीक्षा जुलाई 2014 से मई 2019 के कार्यकाल के लिए की गई थी। इनमें से 312 के खिलाफ कार्रवाई की गई।

    बीते जून में अभूतपूर्व कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने इनकम टैक्स विभाग के 12 वरिष्ठ अफसरों को जबरन रिटायरमेंट दे दिया है। डिपार्टमेंट आॅफ पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स के नियम 56 के तहत वित्त मंत्रालय ने इन अफसरों को समय से पहले ही रिटायरमेंट दे दिया है। इनमें चीफ कमिश्नर और प्रिंसिपल कमिश्नर स्तर के अफसर थे। उन पर सामान्य भ्रष्टाचार, अवैध संपत्ति, कारोबारी से दबाव डाल कर धन उगाही, घूस और महिला सहयोगियों के यौन उत्पीड़न तक के आरोप थे। सरकार के इस कदम का देश भर में स्वागत किया जा रहा है।

    सीबीआईसी के जिन 22 अधिकारियों को समय से पहले सेवानिवृत्त किया गया है उनमें 11 नागपुर और भोपाल क्षेत्र के हैं। इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने इंदौर की एक कंपनी द्वारा गैरकानूनी तरीके से सिगरेट विनिर्माण को मंजूरी दी थी। इनके अलावा चेन्नई, दिल्ली, कोलकाता, मेरठ और चंडीगढ़ क्षेत्र के एक-एक और मुंबई, जयपुर और बेंगलुरु के दो-दो अधिकारियों को सेवानिवृत्त किया गया है।

    सरकार के तमाम उपायों व कठोर के कदमों के बावजूद भ्रष्टाचार को लेकर भारत के सरकारी क्षेत्र की छवि दुनिया की निगाह में अब भी खराब है। अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजा रिपोर्ट ग्लोबल करप्शन इंडेक्स-2017 में देश को 81वें स्थान पर रखा गया है। भारत को इस सूचकांक में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भ्रष्टाचार और प्रेस स्वतंत्रता के मामले में सबसे खराब स्थिति वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है।

    2016 की अपेक्षा 2017 में भारत की रैंक में गिरावट भी दर्ज की गई है। 2017 में 176 देशों की सूची में भारत 79वें स्थान पर था, वहीं 2016 में भारत 76वें स्थान पर था। जहां तक भारत के पड़ोसी देशों की बात की जाए तो इस सूची में पाकिस्तान को 117वें, बांग्लादेश को 143वें, म्यांमार को 130वें तथा श्रीलंका को 91वें स्थान पर रखा गया है। भारत के पड़ोसी देशों में भूटान का स्कोर सबसे अच्छा 67 अंक रहा है। वह सूची में 26वें स्थान पर है. चीन 41 अंक के साथ इस सूची में 77वें स्थान पर है।

    भ्रष्ट अधिकारियों को जबरन रिटायर करना भ्रष्टाचार पर मोदी सरकार का सर्जिकल स्ट्राइक जैसा प्रहार है। कदाचित इससे पहले हमने किसी भी प्रधानमंत्री को इतनी व्यापक और कड़ी कार्रवाई करते नहीं देखा। ये कोई एक दिन, महीना या साल भर के मामले नहीं है। हमारी व्यवस्था ऐसे भ्रष्टों को ढोती आ रही थी। एक आयकर आयुक्त पर आय से ज्यादा संपत्ति के आरोप थे। उसे करीब 10 साल पहले निलंबित किया गया था और भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत केस दर्ज किया गया था। केस आज भी जारी है। यह मामला ही स्पष्ट कर देता है कि भ्रष्टाचार से निपटने के कानून और हमारी व्यवस्था में कितने छिद्र हैं। बहरहाल भ्रष्टाचार पर अभी तो प्रक्रिया शुरू हुई है। न जाने कितने दागी और भ्रष्ट सरकारी अफसरों की नौकरी पर गाज गिरेगी।

    भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम 2014 से ही मोदी सरकार का बुनियादी सरोकार रहा है। सचिव स्तर के अधिकारियों और वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ बातचीत करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बिलकुल स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार किसी भी सूरत में किसी भी आधार और स्तर पर बर्दाश्त नहीं होगा। अलबत्ता अधिकारी खुद को ही पीएम समझें और आगामी पांच सालों का एजेंडा तैयार करें।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि भ्रष्टाचार इसमें बहुत बड़ा व्यवधान है, लिहाजा मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक से शुरू की है। अपने बीते कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 3 लाख फर्जी कंपनियों पर ढक्कन लगवाए थे। बेनामी संपत्ति और भगौड़ा आर्थिक अपराधी कानून बनाए। करीब 1.25 लाख संदिग्धों के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांचात्मक कार्रवाई की जा रही है। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि ज्यादातर संदिग्धों को जेल की हवा खानी ही पड़ेगी। बैंकों में भ्रष्ट लेन-देन की भी जांच जारी है। संपत्ति की खरीद-बेच में नकदी की सीमा तय कर दी गई है। अब काला-सफेद की गुंजाइश बहुत कम रह गई है।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि आम जनता की अपेक्षा यह है कि अंतत: भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन, सरकार ही होनी चाहिए। 22 अफसरों की नौकरी से छुट्टी और जबरन सेवानिवृत्ति वाकई एक क्रांतिकारी और सराहनीय कदम है। यह शुरूआत भर है, जबकि भ्रष्टाचार की जड़ें हमारे मानस और समाज में बेहद गहरे फैली हैं। इन मामलों ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन को भ्रष्टाचार और यौन उत्पीड़न से मुक्त करना कितना जटिल और मुश्किल काम है। प्रधानमंत्री से ही उम्मीदें हैं, क्योंकि केंद्र सरकार ने यह करने की शुरूआत की है। चूंकि हमारे सिस्टम में भ्रष्टाचार पूरी तरह धंसा हुआ है, ऐसे में मोदी सरकार को समस्या को जड़ से खत्म करने के लिये दूसरे विभागों में भी भ्रष्टाचारी अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए, तभी देश का बेड़ा पार हो पाएगा।
    राजेश माहेश्वरी