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    वरना लाइलाज बीमारी बन जाएंगे रोहिंग्या

    Otherwise Rohingya will become incurable disease

    भारत सरकार अवैध रूप से रह रहे हर विदेशी का पूरा हिसाब किताब कर उसे वापस भेजना चाहती है। इसी कड़ी में कश्मीर प्रशासन महाअभियान चलाकर रोहिंग्या मुसलमानों की बायोमेट्रिक जानकारी और दूसरे विवरण जुटाने में जुटी है। खासतौर से अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्याओं की पहचान कर रही है। जिनके पास पासपोर्ट अधिनियम की धारा तीन के मुताबिक, वैध यात्रा दस्तावेज नहीं है। उन्हें हीरानगर के ‘होल्डिंग सेंटर’ भेजा जा रहा है।

    म्यांमार में राष्ट्रविरोधी गतिविधयों के कारण भगाये गये रोहिंग्या मुस्लिम मूलत: बांग्लादेश के हैं लेकिन बजाय वहां जाने के वे अवैध रूप से भारत में घुस आये और बांग्ला देशी शरणार्थियों की तरह से ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेरा जमाकर बैठ गये। इस कार्रवाई के बीच यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ कि म्यांमार से चलकर ये जम्मू कैसे जा पहुंचे और पिछली केंद्र सरकार ने आतंकवादी छवि वाले इन विदेशी मुस्लिमों को पाकिस्तान की सीमा के नजदीक बसाने की गलती क्या सोचकर की थी?

    रोहिंग्या के विरुद्ध वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा दिखाई गई सख्ती का भी उन लोगों ने विरोध किया जो नागरिकता कानून के विरुद्ध आसमान सिर पर उठाये घूमते रहे। 1971 में बांग्ला देश से आये शरणार्थियों के पास तो वहां छिड़े गृह युद्ध का बहाना था लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों को म्यांमार ने जिस कारण से निकाल बाहर किया था उस पर ध्यान दिए बिना ही भारत में उन्हें मानवीयता के आधार पर क्यों स्वीकार किया गया ये बड़ा सवाल है।

    13 अक्टूबर 2017 को अवैध रूप से देश में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि, ‘देश की सुरक्षा, आर्थिक हितों की रक्षा जरूरी है। लेकिन इसे मानवत के आधार से भी देखना चाहिए. हमारा संविधान मानवता के आधार पर बना है।’ वर्ष 2017 में ही देश की 51 मशहूर हस्तियों की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला खत लिखा गया था। इस खत में केंद्र सरकार से म्यांमार में जारी हिंसा के बीच रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस उनके देश नहीं भेजने की अपील की गई थी।

    संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 14,000 रोहिंग्या मुसलमान ही शरणार्थी के रूप से रह रहें है। भारत सरकार इन्हें संयुक्त राष्ट्र के जरिये शरणार्थी कहे जाने पर आपत्ति जताती है। यहीं जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूख अब्दुल्लाह का दर्द है। फारूख अब्दुल्ला के अलावा कांग्रेस संसद शशि थरूर ने तो अखबारों में लेख लिखकर रोहिंग्या के पक्ष में ये दलील दे डाली कि शरणार्थी को पनाह देना प्राचीन भारतीय परम्परा रही है।

    जम्मू कश्मीर के गृह विभाग की फरवरी 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक 6523 रोहिंग्या पांच जिलों में 39 कैंप्स में रहते हैं। पुलिस ने रोहिंग्या के खिलाफ यह कार्रवाई ऐसे समय की है, जब उनमें से कुछ के पास से फर्जी दस्तावेज, जिनमें आधार कार्ड और पासपोर्ट शामिल हुए हैं, बरामद हुए थे। रोहिंग्याओं पर की जा रही कार्रवाई को लेकर राजनीति भी शुरू हो गयी है। केंद्र जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री सरकार की इस कार्रवाई से बेहद नाराज हैं। और अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति करते आ रहे फारुख अब यूएन चार्टर की दुहाई क्यों दे रहे हैं। ये आसानी से समझा जा सकता है।

    गौरतलब है कि बीते वर्ष नवंबर में बांग्लादेश की सरकार ने सैकड़ों की संख्या में इन रोहिंग्या शरणार्थियों को उनकी मर्जी के बिना एक द्वीप ‘भाषन चैर’ भेजना शुरू कर दिया है। बांग्लादेश के तट से 60 किलोमीटर की दूरी पर भाषन चैर द्वीप मौजूद है। पिछले तीन सालों से बांग्लादेश सरकार 350 मिलियन डॉलर की लागत से नया शहर बना रही है। उनका मकसद 100,000 से ज्यादा शरणार्थियों को यहां शिफ्ट करने का है ताकि कॉक्स बाजार के शरणार्थी कैंप पर दबाव कम किया जा सके। जम्मू से उनके निकाले जाने के दौरान ये खबर भी आ गयी कि उप्र के अनेक इलाकों में रोहिंग्या मुसलमान फैल गए हैं और भ्रष्ट शासन तंत्र का लाभ उठाते हुए आधार कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल करने में सफल हो गए। यही नहीं बांग्लादेश से अपने बाकी परिजनों को बुलाने की व्यवस्था भी वे कर रहे हैं।

    जम्मू कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलामानों की पहचान कर उन्हें होल्डिंग सेंटर में डाला जा रहा है, अब ये मसला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, वकील प्रशांत भूषण के जरिये रोहिंग्या शरणार्थी मोहम्मद सलीमुल्लाह ने सर्वोच्च अदालत में दायर की गई याचिका में कई मांग की गई है, याचिका में रोहिंग्याओं के न सिर्फ भारत में रहने की मांग की गई है बल्कि इन्हें शरणार्थी का दर्जा देने की भी मांग की गई है। वही खबर ये भी है कि यूएनएचआरसी की एक टीम भी जम्मू कश्मीर पहुंचकर मामले की पड़ताल कर रही है।

    कड़वी सच्चाई यह है कि वोट बैंक की राजनीति और भ्रष्ट व्वस्था के चलते भारत में करोड़ों बांग्ला देशी पहले ही नागरिकता ले चुके हैं। बंगाल की वामपंथी सरकार ने भी उनको मतदाता बनाने में मदद की जिसके कारण असम, बंगाल, बिहार, उड़ीसा जैसे राज्यों के अनेक इलाकों में ये चुनाव को प्रभावित करने की हैसियत हासिल कर चुके हैं। रोहिंग्या को लेकर भी वही गलती दोहराने से बचना चाहिए क्योंकि उनका अभी तक का आचरण दशार्ता है कि वे पूरी तरह से विघटनकारी और मानवीय संवेदनाओं से परे हैं।

    केंद्र सरकार ने 16 सितंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था और देश में अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या मुसलमानों से देश को खतरा बताया था। 16 पन्ने के इस हलफनामे में केंद्र ने कहा कि कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क हैं। ऐसे में ये देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं और इन अवैध शरणार्थियों को भारत से जाना ही होगा।

    बीते 1 मार्च को तीन रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में अवैध रूप से रहने के उद्देश्य से जाली दस्तावेजों का उपयोग करने के लिए उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया गया था। इन लोगों ने बांग्लादेश और म्यांमार से भारत आने के लिए अन्य लोगों की मदद भी की थी। रोहिंग्या मुस्लिमों के हमदर्दों से भी अपेक्षा है कि वे भारत को धर्मशाला बनने से रोकने में सहायक बनें न कि क्षणिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों की अन्देखी करें। बंगला देशी शरणार्थी जिस तरह पूरे देश के लिए लाईलाज बीमारी ओर समस्या बन गये उसकी पुनरावृत्ति न हो ये ध्यान रखना बहुत जरूरी है वरना हमें भी फ्रांस जैसे हालातों का सामना करना पड़ सकता है।

    आशीष वशिष्ठ

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