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    बीज पर अधिकार खोता किसान

    #India, Farmer, patents lead farmers to lose rights on seeds

     भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें नौकरशाही की लापरवाही और बहुराश्ट्रीय जीएम बीज कंपनियों की मनमानी का खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है। गुजरात के किसान हीराभाई पटेल दशकों से अपने चार एकड़ खेत में परंपरागत आलू के बीजों से खेती कर रहे हैं। हीराभाई ने खेत में एफसी-5 आलू की फसल बोई, किंतु पेप्सिको कंपनी ने इस बीज को अपना बताकर पेटेंट के दावे के साथ एक करोड़ रुपए का मुआवजा भी मांग लिया। हीराभाई के पास खेत, घर और गहने मिलाकर भी इतनी संपत्ति नहीं है, कि वे इस मुआवजे को भर सकें ? हालांकि यहां सवाल मुआवजे से कहीं ज्यादा बीजों का वास्तविक अधिकारी कौन है, यह है। इसी तरह हरियाणा के एक खेत में प्रतिबंधित बीटी बैंगन के 1300 पौधे लगाकर तैयार की गई फसल को नष्ट किया गया है।

    यह फसल हिसार के किसान जीवन सैनी ने तैयार की थी। उसने जब हिसार की सड़कों के किनारे बैंगन की इस पौध को खरीदा तो उसे पता नहीं था कि यह पौध प्रतिबंधित है। जीवन ने सात हजार रुपए की दर से पौधे खरीदे थे। उसने ही नहीं हिसार के फतेहाबाद, डबवाली के अनेक किसानों ने ये पौधे खरीदे थे। ढाई एकड़ में लगी जब यह फसल पकने लग गई तब कृशि एवं बागवानी अधिकारियों ने यह फसल यह कहकर नष्ट करा दी कि यह प्रतिबंधित आनुवंशिक बीज से तैयार की गई है। इसे नष्ट करने की सिफारिश नेशनल ब्यूरो फॉर प्लांट जैनेटिक रिसोर्स ने की थी। परीक्षण में दावा किया गया कि खेत से लिए नमूनों का आनुवंशिक रूप से संशोधित किया गया हैं। जबकि इन अधिकारियों ने मूल रूप से बैंगन की पौध तैयार कर बेचने वाली कंपनियों पर कोई कार्रवाही नहीं की ? उत्पादक किसान और उसके श्रम के साथ किया गया यह एक बड़ा अन्याय है। क्योंकि बाजार पर निर्भर किसान यह नहीं जान सकता कि उसे दी जा रही पौध या बीज आनुवंशिक रूप से परिवर्धित किए गए हैं अथवा पेटेंट के बहाने उन पर हक किसी विदेशी कंपनी का हक है।

    भारत में बीजों का कारोबार 2018 में 4.30 लाख करोड़ का था, जिसके 2024 में बढ़कर 6.45 लाख करोड़ हो जाने की उम्मीद है। 50 प्रतिशत वैश्विक बीज बाजार पर मोेनसेंटो, पेप्सिको, सिनजेंटा और ड्यूपोंट का कब्जा है। इसमें हैरानी की बात यह भी है कि बीज परागकर्ण हवा और पानी से भी फैलकर दूसरे खेतों में चले जाते हैं, जिन्हें कंपनी अपना बताकर पेटेंट का दावा ठोक देती है। दरअसल जैव तकनीक बीज के डीएनए यानी जैविक सरंचना में बदलाव कर उनमें ऐसी क्षमता भर देता है, जिससे उन पर कीटाणुओं, रोगों और विपरीत पर्यावरण का असर नहीं होता। बीटी की खेती और इससे पैदा फसलें मनुष्य और मवोशियों की सेहत के लिए कितनी खतरनाक हैं इसकी जानकारी निरंतर आ रही है। बावजूद देश में सरकार को धता बताते हुए इनके बीज और पौधे तैयार किए जा रहे हैं। भारत में 2010 में केंद्र सरकार द्वारा केवल बीटी कपास की अनुमति दी गई है। इसके परिणाम भी खतरनाक साबित हुए हैं।

    एक जांच के मुताबिक जिन भेड़ो और मेमनो को बीटी कपास के बीज खिलाए गए, उनके शरीर पर रोंए कम आए और बालों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ। इनके शरीर का भी संपूर्ण विकास नहीं हुआ। जिसका असर ऊन के उत्पादन पर पड़ा। बीटी बीजों का सबसे दुखद पहलू है कि ये बीज एक बार चलन में आ जाते हैं तो परंपगत बीजों का वजूद ही समाप्त कर देते हैं। बीटी कपास के बीज पिछले एक ड़ेढ़ दशक से चलन में हंै। जांचों से तय हुआ है कि कपास की 93 फीसदी परंपरागत खेती को कपास के ये बीटी बीज लील चुके हैं। सात फीसदी कपास की जो परंपरागत खेती बची भी है, तो वह उन दूरदराज के इलाकों में है, जहां बीटी कपास की अभी महामारी पहुंची नहीं है। नए परिक्षणों से यह आशंका बड़ी है कि मनुष्य पर भी इसके बीजों से बनने वाला खाद्य तेल बुरा असर छोड़ रहा है।

    जिस बीटी बैंगन के बतौर प्रयोग उत्पादन की मंजूरी जीईएसी ने दी थी, उसके परिवर्धित कर नए रूप में लाने की शुरूआत कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय धारवाड़ में हुई थी। इसके तहत बीटी बैंगन, यानी बोसिलस थुरिनजिनसिस जीन मिला हुआ बैंगन खेतों में बोया गया था। इसके प्रयोग के वक्त जीएम बीज निमार्ता कंपनी माहिको ने दावा किया था कि जीएम बैंगन के अंकुरित होने के वक्त इसमें बीटी जीन इंजेक्शन प्रवेश कराएंगे तो बैंगन में जो कीड़ा होगा वह उसी में भीतर मर जाएगा। मसलन, जहर बैंगन के भीतर ही रहेगा और यह आहार बनाए जाने के साथ मनुष्य के पेट में चला जाएगा। बीटी जीन में एक हजार गुना बीटी कोशिकाओं की मात्रा अधिक है, जो मनुष्य या अन्य प्राणियों के शरीर में जाकर आहार तंत्र की प्रकृति को प्रभावित कर देती है। इसलिए इसकी मंजूरी से पहले स्वास्थ पर इसके असर का प्रभावी परीक्षण जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

    दरअसल भारत के कृषि और डेयरी उधोग को काबू में लेना अमेरिका की प्राथमिकताओं में शामिल है। जिससे यहां के बडे और बुनियादी जरूरत वाले बाजार पर उसका कब्जा हो जाए। इसलिए जिएम प्रौद्योगिकि से जुड़ी कंपनियां और धन के लालची चंद कृषि वैज्ञानिक भारत समेत दुनिया में बढ़ती आबादी का बहाना बनाकर इस तकनीक के मार्फत खाद्य सुरक्षा की गारंटी का भरोसा जताते हैं। परंतु इस परिप्रेक्ष्य भारत को सोचने की जरूरत है कि बिना जीएम बीजों का इस्तेमाल किए ही पिछले दो दशक में हमारे खाद्यान्नों के उत्पादन में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है।

    मध्य-प्रदेश में बिना जीएम बीजों के ही अनाज व फल-सब्जियों का उत्पादन बेतहाशा बढ़ा है। इसीलिए मध्य-प्रदेश को पिछले पांच साल से लगातार कृषि कर्मण सम्ममान से सम्मानित किया जा रहा है। जाहिर है, हमारे परंपरागत बीज उन्नत किस्म के हैं और वे भरपूर फसल पैदा करने में सक्षम हैं। इसीलिए अब कपास के परंपरागत बीजों से खेती करने के लिए किसानों को कहा जा रहा है। हमें भण्डारण की समुचित व्यवस्था दुरुस्त करने की जरूरत है। ऐसा न होने के कारण हर साल लाखों टन खाद्यान्न खुले में पड़ा रहने की वजह से सड़ जाता है। लिहाजा हमें संदिग्ध जीएम बीजों के प्रयोग से बचने की जरूरत है। इन सब तथ्यों को रेखांकित करते हुए डॉ स्वामीनाथन ने कहा है कि तकनीक को अपनाने से पहले उसके नफा-नुकसान को ईमानदारी से आंकने की जरूरत है।
    -प्रमोद भार्गव

     

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