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    सावण शाही मौज की बख्शिश: बागड़ तारने का आदेश

    mastana

    पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने अपना सर्वस्व अपने सतगुरु बाबा सावन सिंह जी महाराज के चरणों में अर्पित कर दिया। बेपरवाह शाह मस्ताना जी का अपने मुर्शिद से इतना ज्यादा प्रेम था कि उनके प्यार, वैराग्य में हर समय आँखों से आँसू बहते रहते और जब दर्श-दीदार करते तो मस्ती में आकर खूब नाचते। जैसे-जैसे समय बीतता गया मुर्शिद-ए-प्रेम और ज्यादा बढ़ता गया। आप जी के प्यार-मोहब्बत को देखकर बाबा सावण सिंह जी महाराज ने हुक्म फरमाया, ‘‘हे मस्ताना! तू बागड़ में जा। हम तो इधर पंजाब में हैं, तू वहाँ जाकर राम नाम का डंका बजा लोगों को सच्चाई का आभास करवा और रूहों को इस भवसागर से पार लंघाने का परोपकार कर।’’ इस सम्बन्ध में आप जी ने अपने मुखारबिंद से निम्नलिखित वचन किए:-

    ‘‘असीं अपने प्यारे मुर्शिद दाता सावन सिंह जी महाराज के हुक्म से साध-संगत में घुँघरू बाँधकर उनके सामने नाचते थे। हमारा मुर्शिद आवाज देता था, जा संगे जा, पीर बण।’’ सबके मुँह पर छक्कड़ी चढ़ गई। कोई बोल न सका। हमारे खुदा सावण शाह ने हुक्म फरमाया, ‘‘हमने मस्ताना तुम्हारे को सब काम करने वाला जिन्दाराम दिया। पीर भी बनाया और अपना स्वरूप भी दिया। तुम्हारे को वो राम बख्शिश में दिया जो किसी और को न दिया। तू जा और बेधड़क होकर दुनिया को मालिक का नाम जपा कुछ और माँगता है तो सामने आकर बोल, दोनों हाथों से देंगे। खुले दिल से मांग। हमनें तुम्हें देना है, तूने लेना है।’’ इस पर असीं अपने प्यारे मुर्शिद से अर्ज की, ‘‘मेरे सोहणे मक्खण मलाई दाता! असीं तेरे से ही माँगना है और किसी से नहीं माँगना।’’

    असीं अपने मुर्शिद के चरणों में अर्ज की, ‘‘सांई जी! ये जो शरीर है, इतना पढ़ा-लिखा नहीं है। कैसे ग्रन्थ पढ़ेंगे? कैसे लोगों को समझाएंगे? असीं केवल सिन्धी बोली ही जानते हैं। इधर के लोग हमारी बोली कैसे समझेंगे? कैसे कोई हमारे पीछे लगेगा। इस पर दाता सावण शाह जी ने फरमाया, ‘‘तुझे किसी ग्रंथ की जरूरत नहीं। तेरी आवाज मालिक की आवाज होगी। जो आवाज सुनेंगे, समझ आए न आए, तुझ पर मोहित हो जाएंगे। दुनिया तुम्हारी आवाज की आशिक होगी। दुनिया तुम्हारी आवाज पर ऐसे मस्त हो जाया करेगी जैसे साँप, बीन की धुन पर मस्त हो जाता है। जो लोग सत्संग में आएंगे वे राम का नाम लेंगे, उनका बेड़ा पार हो जाएगा।

    फिर असीं दाता सावण शाह जी के चरणों में अर्ज की, ‘‘सांई जी रास्ते में बड़ी चढ़ाइयाँ हैं, बड़ी गहराइयाँ हैं। कहीं त्रिकुटी, कहीं भंवर गुफा, अनेक मंजिलें हैं। असीं कैसे समझाएंगे? अभ्यासी तो इन्हीं में फँस जाएंगे। कैसे निकलेंगे? इन चक्करों में न फँसाओ। हमें तो कुछ ऐसा नाम दीजिए, जिसे भी हम नाम देवें, उसका एक पैर यहाँ (धरती पर) और दूसरा सचखण्ड में हो। बीच वाले चक्करों को खत्म करो। अगर जीव लगन से नाम सुमिरन करे तो कहीं उसे रुकावट न आए और मालिक के दर्श-दीदार तक पहुँच जाए। रास्ते में किसी स्टेशन पर गाड़ी रोकनी न पड़े, एक्सप्रेस ही बन जाए।’’ इस पर पूज्य बाबा जी ने कहा, ठीक है भाई, ‘‘तेरी यह बात भी मंजूर है।’’

    फिर असीं कहा, ‘‘सांई जी आप हमें जिधर भेज रहे हैं, वो इलाका गरीब है। वो राम-नाम जपेंगे या मजदूरी करेंगे? उनका ध्यान तो राम नाम की बजाए पेट पालने में अटका रहेगा। हमें कुछ ऐसा भी दीजिए कि जो जीव वचनों पर पक्का रहे, दृढ़ निश्चय व विश्वास रखे, सुमिरन का अभ्यास करे तो उसे अंदर-बाहर से किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। वह भक्त गरीब न रहे और लोग उसकी निंदा न करें कि फलां भक्त पैसे-पैसे के लिए हाथ फैलाता फिरता है। वह भक्त हाथी की तरह मस्त होकर अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ता जाए।’’ इस पर दाता सावण शाह जी ने कहा कि हे मस्ताना! तेरा यह वचन भी हमें मंजूर है।

    फिर असीं कहा, ‘‘सांई जी! असीं कोई नया धर्म नहीं चलाना चाहते। ‘‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’’ नारा बोलना चाहते हैं, जिसको सभी धर्म वाले मानें। हर कोई अपने मालिक का धन्य धन्य करे।’’ इस पर दाता सावण शाह जी ने फरमाया, अच्छा हे मस्ताना! तुम्हारी मौज ! जा तुम्हारे लिए जो नारा ‘‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’’ मंजूर किया है वह सारी दुनिया में ही नहीं अपितु दोनों जहानों में भी काम करेगा।’’

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