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    भाषा की मर्यादा को तार-तार करती राजनीति

    Telegraphic Politics

    भारत की राजनीति में नैतिकता, स्वच्छंदता में भारी गिरावट तथा बेशर्मी व बड़बोलेपन में एकाएक वृद्धि हुई है, जो कि चिंतनीय एवं निंदनीय विषय है। उत्तरप्रदेश में सपा नेता आजम खां पर एक बार फिर चुनाव आयोग ने 48 घंटों का प्रतिबंध लगा दिया है। उनके साथ गुजरात भाजपा के अध्यक्ष जीतू वाघानी पर भी आयोग ने सख्ती दिखाई है। वहीं भोपाल से भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर को भी चुनाव आयोग ने 72 घंटे के लिये चुनाव प्रचार से वंचित कर दिया है। समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां पहले भी विवादित बयान दे चुके हैं और इसकी वजह से निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी उठाने वाले आयोग ने उन्हें दंडित किया था। चुनाव आयोग बसपा सुप्रीमो मायावती और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी पर भी ऐसे ही प्रतिबंध लगा चुका है। इन आम चुनावों की घोषणा के साथ ही देश में 10 मार्च से आचार संहिता लागू है।यानी राजनैतिक दलों और नेताओं को एक निश्चित दायरे में रहकर काम करने और बयान देने की अनुमति है। अगर वे इसके बाहर जाते हैं तो उनके खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की जा सकती है। खबरों के मुताबिक इस बार आचार संहिता लागू होने के एक महीने के अंदर ही आयोग को इसकी अवहेलना की 40 हजार से ज्यादा शिकायतें मिलीं जिनमें से ज्यादातर शिकायतों का निपटारा कर दिया गया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को ये अधिकार है कि वो शिकायतों के बाद आरोपियों को खुद दण्डित करे। आज एक चलन सा बन गया है। सस्ती लोकप्रियता के लिए कुछ छोटे-मोटे नेता भी उल्टे-सीधे बयान दे देते हैं। बयान के बाद वे मीडिया के लिए फोकस प्वाइंट हो जाते हैं।

    अक्सर ये वैसे नेता ही होते हैं जो आम तौर पर जन सरोकारों से दूर होते हैं। न तो उनका कोई ठोस आधार होता है, न ही व्यापक नजरिया। सिर्फ अपने बयान के आधार पर सुर्खियों में रहना चाहते हैं। आचार संहिता के मामले चुनाव आयोग ही सुनता है, उसकी सुनवाई भी खुद करता है और उसका निपटारा भी खुद करता है। यानि किसी को दण्डित करने या दोषमुक्त करने के लिए चुनाव आयोग को ही जिम्मेदार माना जाएगा। अब इतनी बड़ी जिम्मेदारी है, तो उसका निर्वहन भी निष्पक्ष तरीके से होना चाहिए। ऊपर अलग-अलग दलों के नेताओं का उदाहरण है, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि चुनाव आयोग किसी एक पार्टी का समर्थक नहीं है और पंच परमेश्वर की तरह ही न्याय कर रहा है। चूंकि उसे यह गहन-गंभीर जिम्मेदारी निभानी है, तो वह आनन-फानन में किसी शिकायत पर फैसला भी नहीं ले सकता। भले ही आजम खां या मायावती पर कार्रवाई में उसने वक्त नहीं लगाया, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ शिकायत पर तो पूरे एक महीने बाद ही उसने फैसला सुनाया है। चुनाव आयोग के इस फैसले को क्लीन चिट कहा जा रहा है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र के वर्धा में 1 अप्रैल को मोदीजी ने राहुल गांधी के वायनाड से चुनाव लड़ने पर कहा था-अब कांग्रेस भी समझ रही है कि देश ने उसे सजा देने का मन बना लिया है।

    उनके नेता अब मैदान छोड़ कर भागने लगे हैं। आतंकवादी हिंदू की सजा उनको मिल चुकी है और इसलिए भाग कर के जहां देश का बहुसंख्यक अल्पसंख्यक वर्ग है, वहां शरण लेने के लिए मजबूर हो गए हैं। आचार संहिता कहती है कि कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले। यह निर्देश भी है कि राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों। इस आधार पर विश्लेषण करें तो अपने भाषण में हिंदू आतंकवाद, अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक का जिक्र आचार संहिता को तार-तार करता नजर आता है। वास्तव में चुनाव की भाषा डराने लगी है-धमकाने लगी है और शायद कल हिसाब भी करेगी, इसलिए बुद्धिजीवी अब तार्किक नहीं, मौखिक रूप से सत्ता समर्थक है। यह कैसा लोकतंत्र जो आम मतदाता के सामने अपनी भाषा, अपना इरादा खो रहा है। क्या हम दो पार्टियों के बीच केवल ‘जुआ’ हैं, ताकि जो जीत गई उसी के कब्जे में हमारा मनोबल और सोच की दिशा गिरवी हो जाएगी। लड़ने की यह परिपाटी शायद तालियां बटोर ले या ऐसे मुकाम तक पहुंच कर सियासत सफल हो जाए, मगर चुनाव के बीच रसीद होता वैमनस्य समाज के लिए अति खतरनाक होता जा रहा है। राजनीतिक मंच केवल एक संबोधन भर नहीं, प्रदेश के प्रति प्रतिज्ञा का दस्तूर भी बने। राजनीति केवल चुनाव का दाना पानी चुनने की महारत नहीं, बल्कि जनता की आशाओं से निकले आदर्श वादों की फेहरिस्त भी है।

    नेता होने का हक जनता देती है, तो उसके सामने इतनी भी नंगई न हो कि सारे दर्पण राजनीति के लायक न रहें। चुनावी मौसम में नेताओं की फिसलती जुबान पर आयोग से लेकर अदालत तक संज्ञान ले रही है। नेताओं की बदजुबानी मतदाताओं के बीच भी ज्वलंत मुद्दा बनी है। नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने के लिए निर्वाचन आयोग को सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। देश में फिलहाल लोकसभा चुनाव का दौर चल रहा है, जिसमें राजनीतिक दलों के द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान शब्दों की सबसे अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद चुनाव आयोग हरकत में आया और आनन-फानन में कुछ नेताओं पर कुछ घंटों के लिए चुनाव प्रचार पर प्रतिबंध लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।

    जबकि चुनाव आयोग को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी। राजनेताओं को भी समझना चाहिए कि जनता मौन है, पर सब कुछ समझती है। वास्तविक मुद्दों से जनता को भटका कर सद्भाव बिगाड़ने के राजनेताओं के मंसूबे कभी पूरे नहीं होंगे। देश के पढ़े-लिखे युवा ही अपने मत का सही दान करके इन सबकी अक्ल को ठिकाने लगा सकते हैं। नेताओं की जुबान पर लगाम लगाने में सबसे बड़ी भूमिका निर्वाचन आयोग की है। कुछ घंटों का प्रतिबंध नहीं, कठोर कदम उठाने होंगे। आज भी लोग जिस टीएन शेषण और जेएम लिंगदोह को चुनाव सुधार के लिए याद करते हैं, उनसे आयोग को सीख लेने की आवश्यकता है।

    शकील सिद्दीकी

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