भिवानी (इन्द्रवेश)। हरियाणा के भिवानी जिले को मुक्केबाजों का शहर कहा जाता है, जिसके चलते इस शहर को मिनी क्यूबा के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे कहानी यह है कि इस शहर ने देश व दुनिया को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सैंकड़ों मुक्केबाज दिए है। जिसके चलते इस शहर के मुक्केबाजों को राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन अवॉर्ड, कॉमनवेल्थ, एशियन गेम्स, वर्ल्ड कप सहित विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मैडल प्राप्त करने का गौरव प्राप्त रहा है। भिवानी में मुक्केबाजी की शुरूआत एक ऐसे मुक्केबाज फैमिली द्वारा शुरू की गई थी। जिसकी आज तीसरी पीढ़ी भी अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी में पहचान बनाए हुए है। यह परिवार है, कैप्टन हवा सिंह श्योराण का। जिनके नाम से भिवानी में बॉक्सिंग का रिंग भी स्थापित है तथा उनकी प्रतिमा भिवानी के भीम स्टेडियम में भी लगाई गई है।
भिवानी ही नहीं, देश में मुक्केबाजी की शुरूआत के लिए जाने जाने वाले हवा सिंह श्योराण के परिवार को अब तक 60 से अधिक मैडल प्राप्त हो चुके है। उन्होंने 1956 में मुक्केबाजी की शुरूआत की। वे 11 वर्ष तक राष्ट्रीय चैंपियन रहे। उन्हे मुक्केबाजी मे अपने सहयोग के लिए 1988 में अर्जुन अवॉर्ड तथा मुक्केबाजों को तैयार करने के लिए मरणोपरांत वर्ष 2000 में द्रोणाचार्य अवॉर्ड तक से नवाजे गए। वे दो बार के एशियन चैंपियन रहे। उन्होंने 1986 में भिवानी में बॉक्सिंग की शुरूआत की, जिनके चेलों ने मुक्केबाजी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं में मैडल भी प्राप्त किए।
कैप्टन हवासिंह श्योराण के बाद उसके बाद उनकी दूसरी पीढ़ी ने उनके बेटे संजय श्योराण ने मुक्केबाजी की इस परंपरा को कायम रखा। वे अपने समय में एशियन मैडलिस्ट तथा भीम अवॉर्डी रहे तथा उन्होंने नई पीढ़ी के मुक्केबाज ओलंपियन पूजा बोहरा, वर्ल्ड चैंपियन सचिन, एशियन मैडलिस्ट दीया, कॉमनवेल्थ मैडलिस्ट नमन व अक्षय जैसे मुक्केबाज देश को दिए। उनकी तीसरी पीढ़ी में कैप्टन हवा सिंह की पौती व मुक्केबाज संजय श्योराण की बेटी नुपुर श्योराण अब मुक्केबाजी की इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वे ओलंपियन रहने के साथ ही विश्व चैंपियन भी मुक्केबाज रही है। इन दिनों वे लीवरपुल में वर्ल्ड चैंपियनशिप की तैयारियों में जुटी हुई है।
मुक्केबाजी की इस यात्रा के बारे में भीम अवॉर्डी कोच संजय श्योराण बताते है कि उनके पिता कैप्टन हवा सिंह ने मुक्केबाजी की शुरूआत 1986 में भिवानी में प्रशिक्षक के तौर पर की। जिसके चलते यह शहर मिनी क्यूबा बन पाया। इसमें कई बड़े मुक्केबाजों व प्रशिक्षकों ने भी अपना सहयोग दिया। आज उनकी तीन पीढियां मुक्केबाजी से जुड़ी है। उन्होंने वर्ष 2007 में अपने बॉक्सिंग कैरियर पूरा करने के बाद बतौर प्रशिक्षक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों को तैयार करना शुरू किया। जिसके चलते अब तक भिवानी के एक हजार 1200 के लगभग अलग-अलग सरकारी नौकरियों में खेल कोटे के तहत नौकरी पाए हुए है। वह खुद भी टाटा स्टील जमशेदपुर में खेल कोटे में नौकरी कर चुके है। यह मिनी क्यूबा भिवानी की उपलब्धि है। अब तीसरी पीढ़ी में उनकी बेटी नुपुर श्योराण इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। वे 80 किलोग्राम भार वर्ग की हैवी वेट खिलाड़ी है। उन्होंने बताया कि तीन पीढ़ियों की इस मुक्केबाजी यात्रा के दौरान उनके परिवार को कई प्रकार के संघर्षो से गुजरना पड़ा।
तीन पीढ़ियों की इस मुक्केबाज परिवार में भीम अवॉर्डी संजय श्योराण की धर्मपत्नी मुकेश की भी अहम भूमिका है। वे बताती है कि वे बॉस्केटबॉल की खिलाड़ी रही। वे इंडिया टीम तथा जूनियर एशियन स्तर पर अपनी पहचान बॉस्केटबॉल में बना चुकी थी, जब उनकी शादी हुई। शादी के बाद जब वे संजय श्योराण की पत्नी के रूप में कैप्टन हवा सिह के परिवार में आई तो उन्हे यहां आने के बाद मुक्केबाजी का माहौल मिला। उनका खेल बैकग्राऊंड होने के चलते उन्होंने इस परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाने में अपने पति व बच्चों का सहयोग दिया। उनके ससुर कैप्टन हवा सिंह श्योराण ने उस समय उन्हे पर्दे या कहे मुंह ढकने से भी मना कर दिया था तथा कहा था कि आप मेरी बेटी हो।
खेल की इस परंपरा को आगे बढ़ाने में परिवार का सहयोग करे। आज वे अपने पति के साथ मुक्केबाजों की फौज तैयार करने में कंधे से कंधा मिलाकर साथ लगी रहती है। उनके पति संजय श्योराण कड़े अनुशासन के बीच खिलाड़ियों को प्रशिक्षण में लगाए रखते है। इसी का परिणाम है कि भिवानी के मुक्केबाज बड़ी संख्या में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाए हुए है। खुद उनकी बेटी भी मुक्केबाजी में वर्ल्ड चैंपियन है। वही तीसरी पीढ़ी की बेटी नुपुर श्योराण कहती है कि उन्हे बचपन से ही मुक्केबाजी का माहौल मिला। पहले उनके दादा फिर उनके पिता मुक्केबाजी करते थे। उन्ही के बीच रहकर वे आज वर्ल्ड चैंपियन के मुकाम तक पहुंची है। उन्हे गर्व है कि भिवानी शहर को मिनी क्यूबा बनाने में उनके परिवार की भी बड़ी भूमिका रही है।
अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाज अमित व अंजली बताते है कि उन्होंने खेल कोटे में नौकरी पाई है। कैप्टन हवा सिंह श्योराण परिवार ने मुक्केबाजी खेल को आगे बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है। आज उन जैसे बहुत से खिलाड़ी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में इस मुक्केबाज परिवार का सहयोग मानते है तथा यहां प्रशिक्षण भी प्राप्त करे है।