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    खड़गे के सामने कड़ी चुनौतियां

    तकरीबन अढ़ाई दशक के बाद यह पहला मौका है, जब देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस की कमान गांधी परिवार के बाहर 80 वर्षीय नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के हाथ में होगी। दो दशक के बाद हुए चुनाव में खड़गे को 7897 और पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. शशि थरूर को 1072 वोट प्राप्त हुए। इससे पहले वर्ष 2000 में हुए चुनाव में सोनिया गांधी को 7448 और जितेन्द्र प्रसाद को 94 वोट मिले थे। अध्यक्ष पद की रेस में खड़गे का पलड़ा शुरू से ही भारी नजर आ रहा था। इस बात से थरूर नाराज भी थे। हालांकि जीत के बाद थरूर ने ट्वीट कर कहा कि खड़गे का अध्यक्ष बनना सम्मान की बात है।

    कांग्रेस पार्टी के 137 वर्ष के इतिहास में यह छठा अवसर है, जब अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुआ है। इससे पहले 1939, 1950, 1977, 1997 और 2000 में काग्रेंस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए थे। करीब अढ़ाई दशक के बाद खड़गे ऐसे पहले व्यक्ति हैं, जो गांधी परिवार से बाहर पार्टी के अध्यक्ष बने हैं। इससे पहले सीताराम केसरी गैर-गांधी अध्यक्ष थे। जिस तरह से कांग्रेस के एक धड़े की ओर से खड़गे को गांधी परिवार के घोषित उम्मीदवार के रूप में प्रचारित किया गया था अब चुनाव के बाद क्या खड़गे उस छवि से बाहर निकल पाएंगे। कांगेस आलाकमान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पार्टी की कमान सौंपना चाहता था। लेकिन एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत गहलोत के आड़े आ गया।

    गहलोत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो बनना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री का पद नहीं छोड़ना चाहते थे। इसके बाद जो हुआ वह पूरे देश ने देखा। गहलोत के इनकार और पार्टी के भीतर उठे सियासी भूचाल के बाद आनन-फानन में खड़गे को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया गया। हालांकि, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समर्थन के बूते खड़गे बड़े अंतराल से चुनाव जीत गए हैं लेकिन चुनाव के दौरान जिस तरह से खड़गे के मुख्यप्रतिद्वंद्वी डॉ. शशि थरूर ने आक्रामक तेवर दिखाए उसके बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि खड़गे किस तरह पार्टी को एकजुट रख पाते हैं। चुनाव परिणाम से साफ है कि खड़गे को पार्टी के भीतर कई मोर्चों पर जूझना होगा।

    इस समय कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पंजाब हारने के बाद वह केवल दो राज्यों राजस्थान व छत्तीसगढ़ तक सिमटकर रह गई है। इन राज्यों में स्थिति बहुत ज्यादा अच्छी नहीं हैं। राजस्थान का मामला कब तक सुर्खियों में रहता है? छत्तीसगढ में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव के बीच मतभेद की खबरे आती रहती हैं। इसके अलावा एक के बाद एक कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ देने से कार्यकतार्ओं का मनोबल लगातार कम हो रहा है। ऐसे में यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि लगभग रसातल में जा चुकी काग्रेंस को खड़गे कैसे उबार पाते हैं?

    खड़गे गरीब किसान परिवार से आते हंै और दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। सामाजिक समीकरणों के लिहाज से कांग्रेस उनके बैक ग्रांउड को भुनाना चाहेगी लेकिन अभी दलित नेता के तौर खड़गे की ऐसी पहचान नहीं बन पाई है कि वे देश के एक बड़े तबके को प्रभावित कर सके। खड़गे के सामने पहली चुनौती अपनी सामाजिक पहचान के जरिए कांग्रेस के जनाधार को बढ़ाने की होगी। गुजरात और हिमाचल के चुनाव सामने हैं। दोनों राज्यों में पार्टी सत्तारूढ़ को भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ आम आदमी पार्टी की चुनौतियों से भी निबटना होगा।

    पंजाब चुनाव में आप के हाथों कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। दिल्ली में तो बीते दो विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के लिए संकट पैदा कर दिया है। अब गुजरात और हिमाचल के चुनाव में भी उसकी नजर कांग्रेस के वोट बैंक पर है। अरविन्द केजरीवाल कह भी चुके हैं कि कांग्रेस के विधायक विश्वसनीय नहीं है, जीतने के बाद उनको आसानी से खरीदा जा सकता हैं। अभी दोनों राज्यों में पार्टी का प्रचार अभियान भी तेजी नहीं पकड़ पाया है। गुटबाजी की समस्या भी चरम पर है। ऐसे में पार्टी के प्रति जनता के मन में विश्वास पैदा करना खड़गे के सामने दूसरी सबसे बड़ी चुनौती होगी।

    तृतीय, उदयपुर घोषणा के संकल्प अंडर-50 (आधे पद 50 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए ) जैसे फॉमूर्ले को लागू करने की कड़ी चुनौती भी खड़गे के सामने होगी। उदयपुर घोषणा में युवाओं को आगे लाने की बात कही गई?थी। यह चुनौती इस लिए अहम हो जाती है क्योंकि खड़गे खुद इस संकल्प पर खरा नहीं उतरते हैं। वे खुद 80 वर्ष के हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें ब्लॉक स्तर, जिला स्तर और प्रदेश स्तर पर कांग्रेस कमेटियों को मजबूत करने तथा सीडब्ल्यूसी व संसदीय बोर्ड में गुटबाजी को खत्म करने के प्रयास करने होगे। इतना ही नहीं सभी स्तरों पर पार्र्टी तंत्र को मजबूत करने, टीम वर्क पर जोर देने व लंबित नियुक्तियां करने जैसे प्रयास करने होंगे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पार्टी को दोबारा खड़ा करने व कार्यकतार्ओं में उत्साह पैदा करने की चुनौती खड़गे के सामने है।

    कर्नाटक के बीदर जिले के वारावती में एक किसान परिवार में जन्मे खड़गे ने गुलबर्गा के नूतन विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी की और फिर यहां के सरकारी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली। 1969 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी के प्रति समर्पण भाव के चलते जल्द ही उन्हें गुलबर्गा कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया। 1972 में वे पहली बार कर्नाटक की गुरमीतकल विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद वे नौ बार इस सीट से विधायक बने। 2005 में उन्हें कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। 2009 में वे पहली बार सांसद चुने गए।

    खड़गे गांधी परिवार के भरोसेमंद माने जाते हंै। इसका समय-समय पर उनको फायदा भी मिला है। 2014 में वे लोकसभा में पार्टी के नेता बनाए गए। 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद 2020 में उन्हें राज्य सभा भेजा गया। पिछले वर्ष गुलामनबी आजाद का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।?नि:संदेह, खड़गे कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेता हैं। वे नौ बार विधायक रह चुके हैं और तीसरी बार सांसद चुने गए हैं। पार्टी ने भारी बहुमत से उन्हें कांग्रेस की कमान सौंपी हैं।

    एक धारणा यह भी है कि भले ही अध्यक्ष पद पर खड़गे की ताजपोशी हो गयी हो लेकिन सारे बड़े फैंसले गांधी परिवार की मंजूरी से ही होेंगे। ऐसे में खड़गे को न केवल यह दिखाना होगा कि वे गांधी परिवार की रबर स्टांप बनकर काम नहीं करेंगे बल्कि स्वतंत्रता पूर्वक निर्णय लेंगे। संक्षेप में कहें तो पार्टी और गांधी परिवार की इच्छाओं के बीच संतुलन बनाकर काम करने की चुनौती भी खड़गे के सामने होगी।

    खड़गे के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस को कितना फायदा होगा? कांग्रेस अध्यक्ष पर खड़गे की ताजपोशी के बाद क्या वाकई गांधी परिवार का एकाधिकार कांगेस पार्टी से खत्म हो पाएगा? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन कांग्रेस के यथास्थितिवादी कहे जाने के सवाल के जवाब में खड़गे का यह कहना कि मैं ‘मै’ में विश्वास नहीं करता। मैं ‘मैं’ को ‘हम’ में बदलना चाहता हूं। निसंदेह कांगेस के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है।

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