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    Digital Fasting: रोजाना 2 घंटे की डिजिटल छुट्टी, बेहतर जीवन की गारंटी

    Digital Fasting
    Digital Fasting: रोजाना 2 घंटे की डिजिटल छुट्टी, बेहतर जीवन की गारंटी

    सरसा (सच कहूँ/मनदीप सिंह)। Digital Fasting: आम्ज का युग तकनीक और डिजिटल क्रांति का युग है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट और स्मार्ट टीवी जैसे उपकरण हमारे जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ये साधन जहां एक ओर सुविधाएं प्रदान करते हैं, वहीं दूसरी ओर पारिवारिक रिश्तों, सामाजिक संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहे हैं। इसी डिजिटल अतिरेक से निकलने का एक सार्थक उपाय है- डिजिटल फास्टिंग। Digital Fasting

    डिजिटल फास्टिंग का आशय है, प्रतिदिन कुछ समय के लिए सभी डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाना और उस समय को परिवार, आत्मचिंतन और सामाजिक संवाद में लगाना। इस दिशा में डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने एक अनूठी और अनुकरणीय पहल की है। इस मुहिम के तहत करोड़ों लोग रोजाना शाम 7 बजे से रात 9 बजे तक डिजिटल उपकरणों से दूर रहकर परिवार के साथ समय बिताते हैं। यह पहल केवल एक सुझाव नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक सुधार का प्रभावी माध्यम बन चुकी है। करोड़ों अनुयायी इस दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। जब परिवार के सभी सदस्य मोबाइल से दूर होकर एक साथ बैठते हैं, बात करते हैं, एक साथ भोजन करते हैं, तो उनमें आत्मिक जुड़ाव, समझ और आपसी प्रेम बढ़ता है। यह समय बुजुर्गों से उनके अनुभव जानने का, बच्चों के मन की बात समझने का और आपसी रिश्तों को सहेजने का समय बन जाता है। Digital Fasting

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम भले ही एक ही घर में रहते हों, लेकिन मोबाइल और स्क्रीन की दुनिया ने हमें एक-दूसरे से दूर कर दिया है। माता-पिता बच्चों से बात करने की बजाय फोन में व्यस्त रहते हैं, बच्चे वीडियो गेम्स और सोशल मीडिया की लत में उलझे रहते हैं। ऐसे में यह डिजिटल फास्टिंग की पहल परिवारों में नए जीवन का संचार कर रही है। डिजिटल फास्टिंग का प्रभाव केवल रिश्तों तक ही सीमित नहीं है। यह मानसिक स्वास्थ्य, नींद की गुणवत्ता और एकाग्रता को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। दिनभर की भागदौड़ और सूचनाओं की बाढ़ के बाद दो घंटे का यह विश्राम करना मानसिक शांति देता है। यह आत्मचिंतन के लिए भी श्रेष्ठ समय हो सकता है।

    साथ बैठकर भोजन करना, एक पुरानी परंपरा थी जो आधुनिक जीवनशैली में लगभग विलुप्त हो चुकी थी। लेकिन इस पहल ने उसे फिर से जीवंत कर दिया है। अब लोग इस दौरान न केवल खाना साथ खाते हैं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की सेहत और दिनभर की गतिविधियों पर भी बात करते हैं। यह संवाद ही वह सेतु है जो परिवार को जोड़ता है और समाज को मजबूत बनाता है। डेरा सच्चा सौदा की यह मुहिम केवल अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है। Digital Fasting

    डिजिटल डिवाइस का उपयोग जरूरी है, लेकिन उसकी अति निश्चित रूप से हानिकारक है। जरूरत है संतुलन बनाने की और डिजिटल फास्टिंग उसी संतुलन की दिशा में एक सार्थक कदम है। हमें इस पहल को एक सामाजिक सुधार की दृष्टि से अपनाना चाहिए। अगर हर परिवार रोज दो घंटे मोबाइल फोन से दूर रहकर साथ समय बिताए, तो समाज में प्रेम, संवाद, सहयोग और आत्मिक सुकून की भावना निश्चित रूप से बढ़ेगी। अत: यह समय है, जब हम सबको डिजिटल फास्टिंग को अपनाकर परिवार, समाज और स्वयं के साथ जुड़ाव को पुनर्जीवित करना चाहिए। Digital Fasting

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