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    जब सच्चे सतगुरू जी ने कहा-बेटा बहुत सेवा करता है तू

    Shah-Satnam-Singh-Ji-Mahara

    एक बार पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज गुफा (तेरावास) के प्रांगण में विराजमान थे। गर्मियों के दिन थे। अचानक पूजनीय परम पिता जी ने एक सेवादार को कहा, ‘‘चलो, सरसा के थेड़ पर सैर करने चलते हैं।’’ इतना कहकर कुछ सेवादारों को साथ लेकर पूजनीय परम पिता जी सैर के लिए निकल पड़े। जब आश्रम के मुख्य द्वार के बाहर आए तो सामने से गुजर रहे तीन हजार के लगभग भेड़-बकरियों के एक झुंड को देखकर रुक गए। जब तक सारा झुंड निकल नहीं गया तब तक पूजनीय परम पिता जी उन पर अपनी दया-दृष्टि डालते हुए वहाँ खड़े रहे। इसके बाद पूजनीय परम पिता जी थेड़ पर जाने की बजाय गुफा (तेरावास) की तरफ चल दिए। तभी पास खड़े एक सेवादार ने पूजनीय परम पिता जी को सैर करने वाली बात याद करवाई। इस पर पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘बेटा, ये (भेड़-बकरियां) कोई संस्कारी रूहें थीं जिनकी वजह से हमें इस समय बाहर आना पड़ा।’’ इस प्रकार सतगुरु अपनी उन रूहों का भी उद्धार करते हैं जो इंसान की गुलाम हैं।
    बहुत सेवा करता है तू
    सन् 1980 की बात है। मैं मलोट शहर से दूध लाकर आश्रम में पहुंचाने की सेवा करता था। आश्रम में आते ही पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के दर्शनों की तड़प बढ़ जाती थी। एक बार पूजनीय परम पिता जी मलोट आश्रम में सत्संग के लिए पधारे हुए थे। सुबह-सुबह पूजनीय परम पिता जी बाग में घूमने के लिए गए हुए थे। मुझे पता नहीं था कि पूजनीय परम पिता जी बाग में घूमने के लिए गए हुए हैं। मैंने दूध लंगर-घर में जमा करवाया और गुफा की ओर टकटकी लगाकर देखने लगा। मैं मन ही मन सोचने लगा कि शायद परम पिता जी के दर्शन हो जाएं। कुछ देर बाद पूजनीय परम पिता जी जब घूमकर आए तो धीरे से उन्होंने मेरी आँखों पर अपने कर-कमल रख दिए। पूजनीय परम पिता जी के पवित्र हाथों का स्पर्श पाकर मैं फूले नहीं समा रहा था। पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘बेटा, बहुत सेवा करता है तू। सुबह-सुबह ही सेवा पर पहुँच गया।’’ यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई।
    श्री रमेश कुमार, मलोट (पंजाब)

    अनोखी सजा

    सन् 1989 में गाँव जोड़कियाँ में दस बारह जिम्मेवार आदमी पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के समक्ष पेश हुए और प्रार्थना की, ‘‘गुरु जी, हमने मिलकर गाँव में मंदिर बनाया है जिसके लिए आपके सत्संगी हरलाल ने मंदिर में सेवा नहीं की बल्कि यहां आ गया।’’ इस पर पूजनीय परम पिता जी ने हरलाल को बुलाया तथा उनके सामने ही पूछा, ‘‘क्यों हरलाल, तुमने मंदिर में सेवा नहीं की?’’ तब हरलाल ने कहा कि पिता जी, मैंने नहीं की। परम पिता जी ने उन गाँव वालों से पूछा, ‘‘क्यों भाई, मंदिर बन गया?’’ उन्होंने उत्तर दिया कि हाँ, गुरु जी। इस पर पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘बेटा हरलाल, तूने सात दिन तक मंदिर की सफाई करनी है यही तेरी सजा है।’’ फिर परम पिता जी ने गाँव वालों को कहा, ‘‘बेटा, अब तो खुश हो।’’ गाँव वालों ने कहा हाँ जी, हम खुश हैं। फिर सभी गाँव वाले खुशी-खुशी वापिस लौट गए।
    श्री नंदलाल, कल्याण नगर,
    सरसा (हरियाणा)

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