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Wednesday, March 25, 2026
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    सफेद मक्खी तक सीमित न रहे कृषि नीति

    पंजाब में इन दिनों मौसमी कीट सफेद मक्खी का फिर हमला हुआ है। कपास पर सफेद मक्खी के हमले के कारण जहां किसान चिंतित हैं वहीं पंजाब सरकार भी चिंता के साथ-साथ परेशान है। हालांकि सरकार ने दावा किया है कि कपास के बहुत कम क्षेत्रफल में सफेद मक्खी का प्रकोप है। सरकार की चिंता इस बात से स्पष्ट है कि यह पहली बार हुआ है। पंजाब के मुख्यमंत्री मीडिया में प्रकाशित खबरों के आधार पर प्रभावित खेतों का दौरा कर रहे हैं।

    तत्पश्चात कृषि विभाग भी सक्रिय हुआ है। इससे पहले केंद्रीय टीम ने भी दौरा किया। जमीनी सच्चाई कुछ और है एवं सरकार की यह सक्रियता केवल कागजी कार्रवाई मात्र नजर आ रही है और सरकार विरोध से बचने के लिए प्रयत्नशील है। विगत वर्षों में इस मक्खी ने अकाली-भाजपा सरकार को भी बुरी तरह से हराया था। पंजाब का कृषि संकट केवल सफेद मक्खी का संकट नहीं, बल्कि पूरी कृषि उपज व बेच प्रणाली में परिवर्तन ही एक मुद्दा है।

    किसानों को पारंपरिक फसल चक्र से निकालने के लिए सरकार गंभीर नहीं। सरकार किसानों को सब्जियों, फलों व अन्य वैकल्पिक फसलों की काश्त सिखाने के लिए न तो सक्रिय है और न ही कोई दृढ़ इच्छाशक्ति दिखा रही है। कृषि विभाग द्वारा नकली बीज व नकली कीटनाशकों को सफेद मक्खी का कारण बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री के बयान भी धड़ाधड़ आ रहे हैं कि नकली कीटनाशक विके्रता बख्शे नहीं जाएंगे, लेकिन नकली बीज व नकली कीटनाशक आखिर कौन बेच रहा है? इस विषय में कृषि विभाग के पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं।

    यदि महंगे कीटनाशकों से कपास की फसल बच भी जाती है, तब किसान को कोई ज्यादा मुनाफा नहीं होने वाला। फिलहाल नकली कीटनाशक बेचने वालों के खिलाफ कार्रवाई को ही सरकार की सफल कृषि नीति करार नहीं दिया जा सकता।

    सफेद मक्खी पर राजनीतिक जंग जीतने से कृषि आधारित सभी समस्याओं का समाधान नहीं होने वाला। पंजाब में कुछ ही किसान हैं, जो आधुनिक कृषि कर रहे हैं, लेकिन यह प्रयास निजी होने के कारण क्रांति का रूप धारण नहीं कर रहे। सरकार की कृषि संबंधी पुरानी योजनाएं दम तोड़ चुकी हैं। अधिकारियों की कमी को पूरा करने के लिए कृषि विभाग ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए।

    आधुनिकता के दौर में कृषि पक्ष से पंजाब, हरियाणा अभी 30 साल पीछे चल रहे हैं। कर्ज माफ करना, सस्ती खादें व बीज मुहैया करवाना, नकली बीजों की बिक्री रोकने जैसी घोषणाएं सरकार के दशकों पुराने एजेंडे का अंग हैं। फसलों के उत्पादन में विस्तार, पानी की बचत विधि, कृषि जानकारी के लिए नवीतम संचार साधनों का प्रयोग, कृषि आधारित उद्योग लगाए जाने की गंभीर आवश्यकता है, जो सरकारों के लिए अभी दूर की कौड़ी है।

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