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    क्या कांग्रेस के बिना बन पाएगी विपक्षी एकता

    Regionalism, Nationalism

    बीजेपी के खिलाफ विपक्ष का मोर्चा मजबूत करने की मुहिम पर निकलीं तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी ने बुधवार को महाराष्ट्र में जो आक्रामक तेवर दिखाए, उससे सत्तारूढ़ पक्ष के बजाय विपक्षी खेमे में ही ज्यादा तिलमिलाहट दिख रही है। दो दिन की यात्रा पर महाराष्ट्र पहुंची ममता ने एक सवाल के जवाब में कहा, कैसा यूपीए?, कोई यूपीए नहीं है अब। कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व पर सीधा हमला बोलते हुए वह यहां तक कह गईं कि ज्यादातर समय विदेश में बिताते हुए आप राजनीति नहीं कर सकते। जाहिर है, उनका इशारा राहुल गांधी की तरफ था। बीजेपी यही बात कहते हुए अक्सर राहुल पर निशाना साधती रही है। अभी तक विपक्षी एकता की जो भी कोशिश होती रही है, उसमें कहीं न कहीं कांग्रेस भी शामिल रही है। खुद ममता बनर्जी भी ऐसी कोशिश का हिस्सा रही हैं, लेकिन अब वही कांग्रेस को किनारे कर रही हैं। इसका सीधा मतलब है कि वह विपक्षी एकता के मामले में कांग्रेस को अनुपयोगी और अप्रासंगिक मानकर चल रही हैं।

    यह सामान्य बात नहीं कि एक क्षेत्रीय दल देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय दल की अहमियत को इस तरह खारिज करे। यदि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ऐसा कर रही हैं तो इसके लिए एक बड़ी हद तक कांग्रेस ही जिम्मेदार है। वह अपनी दयनीय दशा और बिखराव के लिए अपने अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकती। वैसे हर पार्टी को अपने विस्तार की कोशिश करने और उसके लिए अपना रास्ता चुनने का अधिकार है और जहां तक कांग्रेस के खिलाफ दिए गए तृणमूल चीफ के बयान का सवाल है तो उसका जवाब देना कांग्रेस नेताओं का काम है। लेकिन यदि सत्तारूढ़ बीजेपी को उखाड़ फेंकने के लिए विपक्ष की ताकत को एकजुट करने के घोषित मकसद के लिहाज से देखा जाए तो इस रणनीति का दूर तक जाना मुश्किल लगता है।

    आज की गिरी हुई स्थिति में भी कांग्रेस न केवल विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है बल्कि करीब 20 फीसदी वोट भी उसके पास हैं। ममता के संभावित रुख का अंदाजा एनसीपी को पहले से ही था। शायद इसीलिए एनसीपी के प्रवक्ता ने ममता-पवार मुलाकात के एक दिन पहले ही कहा कि कांग्रेस को छोड़कर विपक्ष की किसी पहल के बारे में नहीं सोचा जा सकता। भले ही कांग्रेस में राहुल और प्रियंका को करिश्माई नेता बताने वालों की कमी न हो, लेकिन सच यही है कि ये दोनों नेता अपनी तमाम सक्रियता के बावजूद कहीं कोई छाप नहीं छोड़ पा रहे हैं। वास्तव में इसीलिए कांग्रेस तेजी के साथ रसातल में जा रही है। यह कांग्रेस के लगातार कमजोर होते चले जाने का ही कारण है कि उसके नेता अन्य दलों की शरण में जा रहे हैं। फिर भी क्या अभी वह वक्त आ गया कि कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता आकार ले लेगी?

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